खुशियां ही खुशियां**एक सकारात्मक संक्षिप्त चर्चा 🏃कमल भंसाली

हम यहां अपनी चर्चा हमारे देश के एक विद्वान सी. राजगोपालाचारी के इस कथन के साथ शुरु करते है ” Without wisdom in the heart, all learning is useless.”। सी. राजगोपालचारी भारत में अंग्रेजों द्वारा मनोनीत अंतिम गर्वनर जनरल के साथ साथ एक विद्धवान लेखक, वकील और राजनेता भी थे। उनका उपरोक्त कथन आज के आधुनिक व शिक्षित वातावरण में काफी महत्वपूर्ण दृष्टिकोण जीवन के प्रति इंगित करता नजर आ रहा है। आज शिक्षा का असर जीवन पर काफी देखा जा सकता है, परन्तु जीवन के प्रति सही चिंतन की कमी के साथ। इसके कई कारण नजर भी आते है, परन्तु सार संक्षेप में यही कहना सही लगता है हमारे आस पास जीवन जीने के इतने मकसद तैयार हो गये कि हम अपना असली चिंतन ‘सुखी रहना और प्रसन्नता’ को विस्मृत कर चुके है। परन्तु, पूर्णता से भूलना ‘मुख्य उद्देश्य’ को कठिन होता है क्योंकि सच्चाई देर सबेर सामने आकर खड़ी हो जाती है। जब जीवन में नकारत्मक्ता सदृश्य होती है, खासकर शरीर के मामले में तो जीवन स्वयं ही चिंतन करने लगता है, मैं सब कुछ होते ही सुखी और प्रसन्न क्यों नहीं रह सकता ? इसका जो सबसे प्रमुख कारण है, वो है बिना संघर्ष व श्रम सब कुछ पाने की चाह, हम माने या न माने, ये और बात है।

“संघर्ष” हर एक के जीवन से जुड़ा सिर्फ अति महत्वपूर्ण अहम शब्द ही नहीं यथार्थ है। कोई भी संधर्ष किसी भी तरह की प्रसन्नता प्राप्ति का सबसे पहला प्रयास से लेकर कई प्रयासों की बुनियादी सफलता का फल भी हो सकता है। प्रयास रहित किसी भी प्राप्ति में जीवन को खुशी शायद ही हासिल हो सकती है। संघर्ष की ख़ास विशेषता है कि वो कुछ भी नहीं हासिल करके सन्तोषप्रद प्रसन्नता दे सकता है। हमारे देश में ‘प्रसन्नता’ प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना जरूरी है। अगर वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट 2018 के आंकडों पर नजर डाले तो भारत संसार में खुशियां या प्रसन्नता के हिसाब से 156 देशों की सूचि में 133 नम्बर पर है। सन् 2017 की तुलना में यह संख्या 11 कम है। इस रिपोर्ट के अनुसार ” Happiness can change and does change, according to the quality of the society in which people live” । इससे आगे रिसर्च का दावा है आप जितने साल ज्यादा जीवन पाओगे उतने ही आप प्रसन्न रह सकोगे।

सफलता और खुशी जीवन पथ के दो अलग पथ दावेदार है। खुश रहने वाला आदमी हो सकता है किसी विशिष्ट क्षेत्र में सफल न हो पर जीवन मकसद में वो प्रसिद्धि न पाकर भी जीवन सफलकर्ता बन जाता है। सफलता को जो खुशियों की सौगात समझते है, वो शायद भ्रम की स्थिति में ज्यादा रहना पसन्द करते है।

जीवन पर रिर्सच करने वाले के अनुसार जीवन का कार्यकाल अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार U की तरह होता है। अगर इस तथ्य को स्वीकार किया जाय तो इसका मतलब बचपन और बुढ़ापा ज्यादा खुशीदायक होता है, अगर जीवन की स्थिति सही हो। खुशी का ग्राफ युवा अवस्था और अधेड़ अवस्था में कमजोर रहता है, शायद इसलिए कि ये जिम्मेदारियां निभाने का समय होता है। पर जब भारतीय परिवेश के अंतर्गत हम सोचे तो इस तरह के सिद्धान्त को पूर्णता से नहीं स्वीकार किया जा सकता क्योंकि आर्थिक असमानता के कारण बचपन को शुरु से ही संघर्ष बोध होना शुरु हो जाता है। हालांकि जीवन पर शोध करने वालों का यह तथ्य काफी सही है कि संघर्ष की अवधि 20 वर्ष से 50 वर्ष तक कई जिम्मेदारियों को स्वीकार करती है, अतः खुशियों का अनुभव कम होता है। 50 वर्ष के बाद जीवन को कुछ राहत जरुर मिलती है क्योंकि जिम्मेदारियों से भी राहत मिलनी शुरु हो सकती है और जीवन भी अनुभवि हो जाता है।

तथ्य हालांकि अलग अलग जिंदगी के अनुसार ही तय किये जाय तो जीवन में खुशियों का आधार युवा अवस्था में भी कम नहीं होता क्योंकि शरीर, मन मिलकर जब भी कुछ प्राप्त करने का प्रयास करते है तो ऊर्जात्मक हो जाते है, और हर आनन्द ऊर्जा में निहित रहता है। फिर भी जिंदगी तो स्थितियों के अनुसार ज्यादा खुशियों का वरण करना पसन्द करती है और उसके अनुसार जो माहौल मिल जाये तो उसकी सकारत्मक्ता क्षमता निरन्तर खुशियों का आनन्द उठा सकती है। कुछ तथ्य है, जिन पर चिंतन करना सही लगता है, हम यहां कुछ अति मुख्य तत्व पर कुछ अनुसन्धान करने की चेष्टा करते है, जिनके कारण जीवन आज का तनाव भोग रहा है।

आपसी सम्बन्ध:

जिस तत्व का खुशी निर्माण सबसे ज्यादा सहयोग वो है मानव के आपसी सम्बन्ध जिन्हें हम कई तरह के बन्धनों और रिश्तों के तहत निभाते है। Harved Study of Adult Development ने तीन बातों को ‘सम्बंधों’ से प्राप्त होने वाली खुशियों के तहत जिक्र किया है।

1. सामाजिक सम्बन्ध खुशियां प्राप्त करनें का अच्छा स्त्रोत है।
2. अकेलापन खुशियों का एक नम्बर दुश्मन है।
3. सबसे महत्वपूर्ण है कि अनगनित सम्बंधों का स्वार्थ भरा जाल। पर सच्चाई यह है, ‘वही सम्बन्ध खुशियों को सार्थकता दे सकता है, जिनमे आपस में विश्वासनिय का अतुलनीय संगम हो’।

जीवन में दुःख की कल्पना कोई भी नहीं करता फिर भी दुःख कहीं न कहीं से आ जाता, सुख की कल्पना सभी करते है, परन्तु सुख कल्पनामयी होकर भी अनिश्चित होता है, यह एक सही तथ्य है।

सही श्रम का सही कर्म की प्रधानता:।

आंतरिक खुशियों का निर्माण जीवन को कर्म व सत्य श्रम प्रदान समय के उपयोग से होना काफी सहज कहा जा सकता है। अनुसन्धानकर्ताओं के अनुसार परिश्रम करने से खुशियों के अलावा आत्म-सन्तुष्टि का अनुभव भी जीवन को हो सकता है, जो बेमिशाल होता है। ओक्सवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर Jan-Emmanuel De Neve के अनुसार जीवन में कर्म व समय सन्तुलित उपयोग घर और कार्यक्षेत्र में करने की कुशलता को अर्जित कर आप सहजता से आनन्दमय जीवन जी कर खुश रह सकते है। हकीकत यह है हम अपनी तकनीकी कार्यकुशलता तो बढ़ा लेते है पर जब सवाल पारिवारिक जीवन का आता है, तो हम अपने कमजोर नजरिये के कारण जीवन को अनचाहा तनाव दे जाते है।
हमारी जीवन की डलिया खुशियों के फूलों की कमी महसूस न करे, इसलिए हमें खुश रहने वाले नुस्खों पर गौर करना चाहिए।

सामाजिक पर्यावरण :

स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रायः अपने मरीजों को कहते है, किसी भी बिमारी से आप तभी सफल संघर्ष कर सकते जब आप स्वयं को ज्यादा से ज्यादा खुश और तनाव रहित रह सकेंगे। सबसे कठिन परिस्थिति का अनुभव इस सन्दर्भ में आज की लाइफ स्टाईल है, ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि सब कुछ पास रहते हुए भी आदमी आज अकेला हो रहा है। सिर्फ स्वयं को समर्पित और स्वार्थ की अधीनता को स्वीकार करने वाले के पास इससे ज्यादा और होगा भी क्या ? जो अपने लिए ही सिर्फ जीना चाहते है, उन्हें एक दिन जड़ से अलग होना ही पड़ता है। फूल के रंग से ज्यादा उसकी महक ही जीवन को प्रसन्नता दे सकती है। अगर हमें खुशी और प्रसन्ता की सही चाहत है, तो हमें कभी नहीं भूलना चाहिए जीवन में समय और संस्कृति का समन्वय रहना नितांत जरूरी है।अगर हम अपने भारत की बात करे तो आप निश्चिन्त ही मानेगे की कभी हमारे यहां संयुक्त परिवार प्रथा का संस्कारयुक्त वातावरण था, जिसमे अपनापन ज्यादा झलकता था, जो आज नदारद हो रहा है या हो गया है। इसकी कार्य प्रणाली में जो प्रमुख तत्व था वो था “एक की खुशी सभी की ख़ुशी”। आज की रूपरेखा जीवन की “मैं खुश सब खुश”। नतीजा न हम खुश न तुम खुश।

ये लेख किसी भी जीवन सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है, परन्तु सच्चाई को हम नजरअंदाज कर दे, ये भी गलत होगा। अतः सही प्रसन्नता के संस्कारिक तत्व है उन्हें हम अगर स्वीकार करते है, तो निश्चित है, हम कुछ खो नहीं रहे सिर्फ उस सच्चाई का दामन थाम रहे है जिसे हम आज की जीवन शैली के कारण कई मटमैले रंग दे चुके है।
आधुनिक शिक्षा को ज्यादा महत्व देने से पूर्व हमें प्रसिद्ध शतरंज के खिलाड़ी के इस कथन पर एक विशेष नहीं तो एक सरसरी नजर जरूर डालनी चाहिए, ” GENIUSES HAVE VERY LIMITED TOOLS SETS. THEY HAVE A HAMMER, AND THEIR GENIUS IS IN LOOKING FOR NAILS” …ADAM ROBINSON

लेखक* कमल भंसाली*

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” आनन्द” 😃जीवन सूत्र भाग 3 अंश 1😆 कमल भंसाली

सत्य ही कहा गया है, “इन्सान को अगर ऊजालों को तलाशना है, तो उसे अंधेरों का अनुभव करना जरुरी है” । आखिर यह अँधेरा है,क्या !और मानव जीवन ज्यादा देर तक उसे क्यों नही सहन कर पाता ? प्रश्न उचित लगता है। सीधे सीधे ओशो के शब्दों में कहे, तो “अँधेरा, अज्ञान है, प्रकाश ज्ञान है”। आत्मिक अज्ञानी ही ज्ञान तलाशता है, चलिए हम भी उनमें शामिल हो ज्ञान के प्रकाश की एक हल्की झलक तो प्राप्त करने की कोशिश करें।

सृष्टि का नियम है, वो हर प्राणी को सक्षमता तो प्रदान करती है, परंतु जब सवाल पूर्णता का आता है, तो ज्ञान का सहारा लेने को कहती है। आज का इन्सान इस मामले में काफी सजग प्रतीत होता है, परन्तु उसकी सजगता में कहीं न कहीं एक प्रश्न उभर कर आ ही जाता है, आखिर इस ज्ञान से वो हासिल कर क्या करना चाहता है ! ऊपरी सतह से इस का उत्तर कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है, वो आनन्द, सुख, आराम और शान्ति को अपनाना चाहता है या फिर उसका कोई ऐसा लक्ष्य है, जो उसे सही जीवन की दिशा बता दे।

चलिए इस मर्म को भी तलाशते है, क्यों इन्सान जीवन को नये नये आयाम देकर आनन्दमय और उत्साही जीवन प्राप्त करना चाहता है ? इस चर्चा को आगे प्रस्तुति देने के लिए हमें थोड़ी विगत की सैर करनी चाहिए, जब मानव अपनी प्रारंभिक अवस्था में बिना साधनों के अपना अस्तित्व तलाश रहा था। आश्चर्य की बात है, आज की स्थिति और उस समय की स्थिति में एक समानता नजरआ रही है, पहले मानव बिन साधनों के आत्मिक आनन्द ढूंढता था, आज साधनों के रहते भी वो, उसी आनन्द को तलाश रहा है। मानते है, ना आप। तो बताइये ज्यादा साधनों को प्राप्त करने का मानव स्वभाव क्या सही है !

यहां बता देना उचित होगा कि पहले इंसान के पास सुख के साधन कम थे, आज इनकी गिनती असंभव है। जरा सी चेतना का सहारा लेकर हम आगे बढ़ते है, तो अहसास होगा पहले ज्ञान की रफ़्तार धीमी थी, आदमी धीरे धीरे अर्जित कर ता था अतः ज्यादा दैहिक सुख से अनजान था, नैतिकता के दायरे में रहकर ही आत्मिक आनन्द को तलाशता था। आज साधनों की अधिकता के बावजूद भी एक अनजान सा ख़ौफ हर समय उसके आनन्द या सुख को संकुचित करता रहता है। आखिर ये संकुचन क्या है ?, कैसा है, क्या यह किसी बाहरी प्रक्रिया की देन है !

सदिया बीत गई, आज तक बड़े बड़े महर्षि भी इस सवाल के उत्तर की तलाश करने का साहस ज्यादा दिन नहीं कर पाते, देह थक जाती, मन अवसादों से विचलित हो जाता, तब उनकी आत्मा में शायद एक प्रश्न लहरा जाता, कि जो अब तक की जीवन यात्रा की, क्या वो सही दिशा की लौकिक यात्रा थी ! क्या यह लौकिक यात्रा ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है ? जानता हूँ, ऐसे प्रश्न हर एक के दिमाग में नहीं आ सकते, आते तो शायद दुनिया के विस्तार के साथ “सच” जैसा अमृतमय तत्व कभी निम्नतम स्तर पर आज नहीं होता, ईमानदारी को ढूंढना नहीं पड़ता, रिश्तों को प्रेम के अहसास को याद नहीं दिलाना पड़ता, शान्ति को खोजना नहीं पड़ता, पर्यावरण कोई तर्क का विषय नहीं होता और शायद हर प्राणी को अपना सही अस्तित्व की खोज के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़ता। पर कहते है, जब धुरी से कोई अस्तित्व हट जाता है, तो उसके घूमने की लय असंगत हो जाती है, आज का जीवन भी असन्तुलित होकर सही सुख का अनुभव नहीं कर पा रहा है। एक रिक्तता का अनुभव हम सभी अंदर से कर रहे, चाहे स्वीकार करे या नहीं, सत्य तो यहीं है, चाहे हम इस सत्य से भी हम अपनी दैनिक आदत की तरह मुंह घुमा ले।

जीवन में दो तत्व काफी महत्वपूर्ण माने गए है, जी, हाँ, हम कर्म और धर्म की ही बात कर रहे है। किसी भी प्राणी को लीजिये उसका जीवन इन दोनों के ऊपर ही काफी हद तक निर्भर है, मानव चूँकि विशिष्ट श्रेणी का प्राणी है, अतः उसके लिए ये दोनों तत्व ही जीवन सार का निर्माण कर सकते है, निसन्देह इनकी गुणवत्ता उसके चिंतन पर ही निर्भर करती है। कर्म और दैहिक धर्म से ही हमारा अस्तित्व जगत में आता है, इन्हीं की दिशा निर्देश पर जीवन को चलने के संकेत मिलते है, जीवन चलता भी है, पर मन की गति का इनके साथ तालमेल धीरे धीरे कम होने लगता है, क्योंकि मन की तासीर चंचलता है, उसे अति बन्धन अस्वीकार्य होते है परन्तु उसे राजनीति आती है, अतः वो अपनी तिकड़मों से सदा भ्रम के रास्तों में चाहतों के प्रति इंसान को उकसाता ही रहता है। जिस इंसान की आत्मिक शक्ति कमजोर होती है, वो मन के इस भ्रमजाल में उलझ जाता है, और आत्मिक आनन्द को संसारिक सुखों में तलाशता रहता है, और जीवन लक्षित परमानन्द को जानने से कतराता रहता है, जबकि वो ही सही जीवन सार है। समझने की बात है, कि अंत का आनन्द परम् आनन्द ही सही जीवन की सही मीमांसा है।

जरुरी नहीं जीवन में हम आत्मिक आनन्द को केंद्र बिंदू मानकर ही कार्य करे या इस आनन्द को कर्म शक्ति का महत्व दे,। यह तो सहज और सरलता से स्वयं ही प्राप्त होने वाला होता है। नैतिकता और सादगी से प्राप्त जिस तत्व को आसानी से पाया जा सकता है, उसके लिए मश्क्त करना कहां तक उचित है ? सच कहें इसके सहज होने से ही हमारा ध्यान इस पर नहीं जाता, क्योंकि लगातार सहज रहना सरल नहीं है। नये नए साधनों की कल्पना कर हम कैसे आज के वर्तमान युग में सादगी पूर्ण जीवन की कल्पना कर सकते है ! अगर हम इस तरह का चिंतन कर रहे तो निसन्देह हम ज्ञान नहीं तकनीकी बात कर रहे है। सादगी का जीवनभूति साधनों से कोई दुश्मनी नहीं है, सादगी अगर हमारे व्यवहार में है, तो फिर हम क्या अपनाते है, इस से कोई फर्क जीवन में नहीं आ सकता, अनैतिक कार्यों से अगर दूर है, तो कोई भी साधन हमें विचलित नहीं कर सकता, अगर आडम्बरों को जीवन में स्थान न दे, तो कोई भी धार्मिक पंथ हमें नही फुसला सकता, सत्य हमारी जबान पर जब तक है, भय कभी पास नहीं आ सकता, कर्तव्य की ईमानदारी से आत्मा को सदा जागृत अवस्था में रखा जा सकता है, अतः असन्तोष के अलावा किसी से जीवन पर्यावरण दूषित नहीं हो सकता। जब पर्यावरण स्वस्थ रहेगा तो विश्वास कीजिये, जीवन स्वस्थ, सफल, और आनन्दित हो जाएगा, शायद हमें परमानन्द का जरा सा भी अनुभव हो जाए, और जीवन लक्ष्य की तरफ हमारा एक सही कदम बढ़ जाये। हमें सिर्फ ध्यान इतना ही रखना उचित होगा कि आनन्द को एक सफर ही समझे, अंतिम मंजिल नहीं, क्योंकि हमारा सफर ज्यादातर भावात्मक ही होता है, पता नही कब अपना रुख बदल ले। रिचर्ड बैक ने सही कहा है, ” प्रसन्नता वो पुरस्कार है जो हमें हमारी समझ के अनुरुप सबसे सही जीवन जीने पे मिलता है”।*****क्रमश*****लेखक कमल भंसाली