★★आस्था का फूल★★कमल भंसाली

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अपनी ही मंजिल का हूँ, दीवाना
उसी राह का मस्त सा हूं, परवाना
सही राह पर मुझे चलते ही जाना
क्या फर्क पड़ेगा, दुश्मन बने जमाना

एकपथ की कठिनता से नये रास्ते बनते
आलोचना से ही गंभीर पुष्प जन्म लेते
मासूमियत से ही आता हर रोज सवेरा
कैसा भी हो अन्धेरा ? सपना है, सुनहरा

जो दुनिया की करते परवाह, वो ठहर जाते
न वो जीते, न वो मरते, बुत बनकर रह जाते
कौन किसका ? सम्बंधों में प्यार जो तलाशते
हकीकत में वो दर्द के काँटों से ही दामन भरते

कल के अफ़साने, आज काम नहीं आ सकते
शीशे के घर में रहकर पत्थर नहीं फैंक सकते
निर्लोभ, निर्लेप को डर भी ख़ौफ़ नहीं दे सकते
अस्तित्व के भय से, कभी मंजिल नहीं पा सकते

कहते है, बिगड़ी हुई चाहते जब सुधर जाती
जिंदगी कुछ विशेष पूरक पहचान बन जाती
दीप के लिए बाती, तैल में डूब मगन हो जाती
उजाला बन अंधेरो को कुछ अहसास दे जाती

मस्त मस्त मुसाफिर, मैं अपनी ही राहों का
क्यों परवाह करु, खुदगर्ज दुनिया की बाहों का
सफर मेरा है यह है, कर्मफलों से पराग पाने का
समझ गया खेल है, जिंदगी, शमा और परवाने का

चल रहा आज, कल तक हद दुनिया की पार कर जाऊंगा
जाने से पहले, यकीन कर दुनिया, तुझे क्षमा कर के जाऊँगा
इतनी सी राय मेरी, गैर की खिड़कियों में न करे तेरे नैन प्रवेश
फूल ही चुनना है, “कमल” का, तो फिर अंदर का कीचड़ ही तलाश…..कमल भंसाली