👏मेरे प्रभु👏कमल भंसाली✍️

हे प्रभु
खूबसूरती मेरे जीवन को दीजिये
मेरी सारी कमियों को हर लीजिये
पथ की कठिनाइयों को दूर कीजिये
महत्व जीवन का सब समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
जिसे अभी तक जीवन समझता रहा
आपको भूल रास्ते नये तलाशता रहा
उनकी हर कमी को ही अपनाता रहा
इस भूल को मेरी आज सुधार दीजिये
👏
हे प्रभु
मानव मन मेरा सदा कमजोर रहा
वासनाओं के फूल ही सूंघता रहा
संयम ही जीवन है ये भूलता रहा
इस भूल का निदान समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
असत्य की धुरी पर घूमता रहा जीवन
पथ भटका न मिली कोई सही मंजिल
आदर्शों के गीत तो सदा ही गाता रहा
पर अपनाने से हरदम ही कतराता रहा
जीवन की सही मीमांसा समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
जीवन आपका दिया है पवित्र वरदान
समर्पण आप में ही रहे जब तक रहे प्राण
जिस विधि से करुं मैं सही से वापस प्रयाण
उस यज्ञ की सारी रस्में आज समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
सकल सफल रहे मेरा यह अनमोल जीवन
हर पथ आपको समर्पित होकर बने पावन
इस जन्म की हर पीड़ा का हो यहीं समापन
गमन पथ को अब मेरी मंजिल समझा दीजिये

👏🏼रचियता और प्रार्थना कार✍️ कमल भंसाली👏

Advertisements

🌾पथ हार🌾 एक आत्मिक सुधार 👌 “प्रार्थना” 👃 कमल भंसाली👃

पथ हार
बैठ गया
एक नहीं कई बार
नजर न आया
एक भी सवेरा
नहीं जानता, सर्वेश्वर
कब दूर होगा जीवन अंधियारा
बचा सिर्फ
एक ही सहारा
लब पे रहता
अब सिर्फ नाम तुम्हारा
***
माफ़ कर देना
मनःस्थिति समझ लेना
हताश होकर
कर बैठा पुकार
“प्रभु” आओं
मेरे मन द्वार
इस जीवन के पालनहार
सिर्फ इतना बता दों
कब आओगे
कशमकश के
इस भँवर से निकाल दोगे
जन्म मरण मेरा
सार्थक कर दोगे
मुझे अपने में समेट
इस अस्तित्व बोध को कब
सम्पूर्णता दोगे
***
अंतर्मन हुआ गदगद
कहीं से आई जब
आत्म स्वीकृति की झंकार
छवि एक अदृश्य नयनों में उतरी
बिन किसी आकार
बोली इस प्रकार
“मैं” वहां ही हूँ कहां ?
जहां तुम नही
जब तुम स्वयं में नहीं
तब मैं वहां नही
विश्वास तुम्हारा
जब जग जाएगा
तब तुम्हें
मेरे अस्तित्व का पता लग जायेगा
हर अँधेरा
अपना सन्दर्भ तलाशने चला जाएगा
स्वर्णिम सवेरा
तुम्हारे कदम चूम ने आएगा
विकल्प चुनता जीवन
नई आस्था में समा जाएगा
तब सब कुछ् तुम्हारा
मुझ में समा जाएगा
एक निर्वाणित पथ
तुम्हारे सामने बिछ जाएगा
तब तुम नहीं भी पुकारोगे
स्वयं तुम्हें लेने आऊंगा
हर बन्धन से मुक्त कराऊंगा
जिस पथ के तुम दावेदार
उसी पथ पर साथ ले जाऊँगा
***
सागर की उदित लहरों को देखों
उसकी चंचलता में नजर आऊंगा
खिलती हुई कलियों की मासूमियत परखों
उनके खिलने में नजर आऊंगा
***
उगते भास्कर की रशिम निहारो
उसकी किरणन में नजर आऊंगा
अपने मन की रिक्तता तलाशों
सच की किसी शून्यता में मिल जाऊँगा

***
पथ हार न बेठना
कर्म के मर्म को समझना
आत्म धर्म की चेतना में
जीवन अर्पण का महत्व समझना
संसारी कल्याणी बन
अपने यहां होने के
सत्य की प्रस्तुति को समझना
गुनाह है “पथ हारना”
इसमें अदृश्यत् हमारे आपसी बन्धन को समझना
मानव जीवन को दी
मेरी इस साधना की अमृतता को समझना ……रचियता***कमल भंसाली

रचियता **कमल भंसाली

स्वर्णिम पल….कमल भंसाली

है, जिन्दगी के चाहे चार दिन
जीना तो पड़ेगा हर ‘पल’, हर क्षण
चाहे, जहर है, या अमृत जीवन
पीना तो पड़ेगा, हर ‘पल’, हर कण

‘पल’, जीवन सफर का एक हि रास्ता
राही को चलना, मंजिल का वास्ता
न यहां आज, न परसों,न ही कोई कल
जो है, वहीं है, यह निष्ठांत अछूता ‘पल’

अपरिचित सा भविष्य, हर ‘पल’ में रहता
मनमोहक, मधुर बन हर ,’पल’ छिन लेता
रातों की नींद में सितारे तक गिनवा देता
बड़ा जालिम, न जीने देता, न मरने देता

बुलन्दियों की गहरी घाटी में विलीन वर्तमान
बहुत कुछ देकर जाता, पर न करता अभिमान
सन्देश ही भेजता, जो आज, वो नहीं होगा कल
देख, समझ कर इंसान चल, आगे है, दूसरा ‘पल’

समझने लायक होता है, ‘पल’ का हर कमाल
हर ‘पल’, करता आशा और निराशा का निर्माण
देखते युग बदल जाता, पर रहता चंचल ‘पल’
उम्र को तराजू में तोल देता, वो ही है, यहीं ‘पल’

वर्तमान का हर लेखा, देता इतिहास को सौंप
जानेवाल ‘पल’, कितना निरहि, बिन संताप
इस ‘पल’ को जानना, यहीं है समय, यही वक्त
काल का निर्माणकर्ता, क्षणिक, पर पूर्ण सत्यत:

‘पल’ से बन्धी, हर सांस की डोर,
इसी से शुरु होती, आभामय भोर
जागों तो आएगा, सुरमई सवेरा
नहीं तो जिंदगी में, रहेगा अंधेरा

सच है, हर ‘पल’ नहीं सुनहरा
हर ‘पल’ में राज छुपा है, गहरा
न कोई इसका नाप, न हीं तौल
मणिमय ‘पल’, बिन मूल्य अनमोल

‘पल’ विश्वास, ‘पल’में समायी आस्था
‘पल’में ही आशा, पल में ही निराशा
पर, ‘पल’ का नहीं , किसी से वास्ता
‘पल’ तो है, प्रभु तक पँहुचने का रास्ता

मैं नहीं कहता, कहता हर ‘पल’
जीवन राही, मेरे साथ चला चल
देख दूर नहीं, तेरी प्रतीक्षित मंजिल
आज नहीं तो कल कहेगा, ‘स्वर्ण पल’
…..कमल भंसाली

उनकी गाड़ी…

“माटी”का तन
“मन”कांच का
“जीवन” सांस का
“आत्मा” “परमात्मा” की
सांस भी
समय की धरोहर
मेरे पास अपना
कुछ भी नहीं
हकीकत तो लगती
“यही”

पता नहीं,कभी लगता
जीवन एक है, गाड़ी
वो भी किसी और की
प्रेम का पेट्रोल खाती
संयम का गियर रखती
धैर्य के ब्रेक पर आधारित
सामने मोह के शीशे से
पीछे के संतुलन के दर्पण
निहारते हुए, मुझे चलानी
वापिस उसी को है, लौटानी

अनजान सफर,मंजिल दूर
नियम, कानून से मजबूर
गन्तव्य तक पहुंचना
“आत्मा”की सवारी को
“प्रभु” के दरवाजे तक
सही समय पहुंचाना

सफर आनन्द का
सफर रोमांच का
सफर अस्तित्व बोध का
सफर कर्म प्रभावक
सफर धर्म प्रभावित
सफर लालसाओं का
सफर करनी और भरनी का
सफर अनन्त प्रयासों का
सफर मिलन और बिछोह का
सफर आंसू और मुस्कराहट का
सफर मानवीय स्वभाव का
सफर सौभाग्य और दुर्भाग्य का

सफर ही, जिन्दगी
चलते रहना ही,आस्था
नियम पालन ही,धर्म
सर्व सम्मान ही, अबाधित गति
संस्कार ही, अवरोधक
बाकी सबकी,अपनी
शक्ति
और अपनी भक्ति
मै तो अब भी कहता
जीवन “उनकी”गाड़ी
“मै”
उनका सिर्फ ‘चालक’…..

कमल भंसाली