प्यार की समझ

प्रिय, जीवन पथ पर साथ चले
पर कभी कभी प्रेम हमारा
उमंगों से वंचित होकर अधूरा लगता
जब कभी तुम कुछ कहती
शायद प्रेम तुम से ही सही
कोई शुभता का संकेत पाता
मन अपनी कमजोरियों से भीतर में घबराता
पर बाहर से तो सदा मुस्कराता नजर आता
जीवन और प्रेम का खेल
भला कौन सहज समझ पाता
जो तुम्हारे संकेतों से मैं समझ जाता

सच कहुं प्रिय आज आत्मा के आगार से
जब कभी मैं अपने प्यार को भावुकता के
असहाय क्षणों से निकाल कर
पवित्रता के पावन मन्दिर में
सत्यता की मूर्ति के सामने खड़ा करता
तो शायद मै भी असहाय हो जाता
तुम्हारी आँखों में फिर न झांक पाता
निर्विकार भाव से वहीं पत्थर का बूत बन
प्रेम की कोई नई परिभाषा तलाशता

जब अपने प्रेम को कसौटी पर प्रखरता
बहुत कमजोर और घबराया लगता
तुम्हारा प्रेम संयमित और आलोकित लगता
तुम्हारे प्रयासों को अगर समझने लगता
तो हमारे प्यार का पथ खुश्बुओं से दामन भरता
तुम्हारा पूर्ण सर्मपण मेरी आत्मा के कोने कोने
ज्योति पुंज बनकर मुझे प्रेम की पवित्रता से नहलाता
अमरता का कुछ अंश मेरे प्रेम को भी मिल जाता
तुम्हारे साथ जन्मों के बन्धन है, यह तो कह पाता
प्रिय, आओं फिर मुझे कोई नया प्रेम पथ दिखलाओं…..

♠कमल भंसाली ♠