“सम्बन्धों” मुक्तक आज के संदर्भ में

दोस्तों,
मुक्तक के रुप आज के बनते -बिगड़ते सम्बन्धों को समझने की एक मेरी अनचाही कोशिश है। नहीं चाहता सांसारिक सम्बन्ध जीवन की गरिमा भूल जाये। सबसे बड़ा खतरा संस्कारों को भूल नई स्वतंत्र राहों की तलाश से है। पर कहते है जो जुड़ता वो बढ़ता जो टूटता वो विलीन हो जाता। भगवान से प्रार्थना है सम्बन्धों की दुनिया सदाबहार रहे। शुभकामनाओं सहित✍ लेखक व रचियता**कमल भंसाली
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रिश्ते जो एक बार बिगड़ जाते
वापस कम ही जुड़ पाते
क्योंकि सच्चाई के जो पन्ने होते
वो नदारद हो जाते
बिन सही मलहम के हरे घाव तो
हरे ही रह जाते
लगे जख्म भी कभी सूख नहीं पाते
इसलिए
बिगड़े आपसी सम्बन्ध कभी सुधर नहीं पाते

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समझने की बात समझनी जरूरी होती
हर सम्बन्ध की अपनी कुछ मजबूरी होती
छोटी चिंगारी बन जब कोई बात बिगड़ जाती
निश्चित है, हर रिश्तों को स्वार्थ की बीमारी लग जाती
अच्छे रिश्तों की छवि दिल छोड़ दिमाग में चढ़ जाती
लाइलाज बीमारी है यह रिश्तों के प्राण तक ले जाती

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जीवन और सम्बन्ध का है आपसी गढ़ बंधन
एक दूसरे के पूरक करते समझ के अनुबन्धन
“खुद जियो और दूसरों को जीने दो” है प्रबंधन
जिससे विश्वास की सीमा का न हो कभी उल्लंघन

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अर्थ के संसार ने आज रिश्तों की परिभाषा बदल दी
हर रिश्तों की कीमत जरुरत अनुसार तय कर दी
बिन संस्कारों की जिंदगी बिन परवाह की राह चलती
“कल को किसने देखा” कहकर आज पर ही इतराती
जब तन्हा हो असहाय बन जाती, फांसी पर चढ़ जाती
जीवन में सम्बन्धों के महत्व का अदृश्य संदेश दे जाती

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न कोई माता, न कोई पिता, युग अब यही सन्देश देता
स्वयं से ही स्वयं बना रिश्तों की महिमा को ठुकरा देता
जीना खुद का अधिकार, अब खुद को यह ही भाता
हर सम्बन्ध अब दिल के अंदर की यात्रा नहीं करता
बाहरी दुआ सलाम में मधुरता से मुस्करा कर रह जाता
सतह पर जरुरत के समय तक थोड़ी देर साथ चलता
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सब मुक्तक यही कहते “सम्बन्धों” से जीवन बनता
सम्बन्ध से ही जीवन आगे की तरफ यात्रा करता
हर रिश्ता हर दिन का सहयात्री, सोये को जगाता
भावपूर्ण हो जो स्नेह,विश्वास और प्रेम से निभाता
जीवन की हर मंजिल तक हर “सम्बन्ध”अमर रहता
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💖💖 ✍ रचियता💘 कमल भंसाली 💝💝

😇अंतर्मन की चोट😇✍कमल भंसाली

कल तुमने अंगुली पकड़ी
तो मैने तुम्हे चलना सिखाया
आज कंधे तक क्या आये
मेरे चलने पर एतराज जताया
भूल न जाना उन राहों को
जिन पर मैने तुम्हारे लिए
न्यौछावर कर दिया अपना हर सपना
उन सपनों की कीमत अब भी तुम चुका नहीं सकते
आज अपने सपनों की कीमत मुझसे ज्यादा आंकते
तय सच अधूरा नहीं रहता झूठ कभी पूरा नहीं होता
किसी के बिना किसी का जीवन कभी नहीं रुकता
कोई भी पिता कभी भी मजबूरियों में नहीं झुकता

माना हवाओं का रुख बदल गया
प्यार का चमन भी शायद सो गया
पर तुम मुझे एक बार अपना कह देते
मुझे छू कर ही तुम्हारा होने का अहसास दे देते
बची सांसो को जरा ये अंतिम विश्वास दे देते
आंतरिक सम्बन्ध की क्षमता को स्पष्ट कर देते
सन्तान के सुख का छोटा सा आभास ही दे देते
तो तुम्हें मैं आज भी अपना हिस्सा समझता
माना वक्त है तुम्हारा पर मैं इससे झुक नहीं सकता

नन्हा सा वो स्पर्श तुम्हारा
तुतलाकर पापा पापा पुकारना
तुम्हारी आँखों में मेरे लिए वो स्नेह का कोना
जिदपूरी न होने पर तुम्हारा रोना
तुम्हारी हर ख़्वाईस को हंस कर पूरा करना
कितना कुछ आज खो गया
मैं वृद्ध आश्रम में आ गया
तुम्हारे हर अहसास को भूल गया
चिंता न करना
मुझे सब कुछ खोकर जीना आ गया
चोट खा कर स्वयं उसे सहलाना आ गया
रचियता: कमल भंसाली

🚱सारगर्भित जीवन🚱कमल भंसाली

“It seems to me that the natural world is the greatest source of excitement; the greatest source of visual beauty; the greatest source of intellectual interest. It is the greatest source of so much in life that makes life worth living.” ***David Attenborough***

सही ही लगता है, प्रकृति, प्यार और इंसान दुनिया की तीन बेशकीमती ताकते है। जिनके बिना इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जहां हम एक संक्षिप्त अवधि का जीवन अनेक तरह के अहसासों के साथ हर क्षण जीने का प्रयास करते है। इसी प्रयास को शायद हम जीवन भी कहते है। मानव का सबसे पहला रिश्ता अगर प्रकृति से माना जाय तो गलत नहीं है, क्योंकि हर प्राणी ही नहीं, हर वस्तु का सृजनकर्त्ता किसी न किसी रुप में वो ही है। अंततोगत्वा यही कहना सही होगा जीवन प्रकृति और प्रेम का सुंदर समिश्रण है। सही ढंग से जीने से आत्मानंद का अहसास जीवन अवधि तक होता रहेगा। सारगर्भित जीवन का अहसास स्वर्ग जैसा आनन्द इसी धरती पर प्रकृति, प्यार और इंसानी परिवर्तन से पाया जा सकता है, लेखक का मानना है यह सिर्फ एक सही और सुंदर कार्यकुशलता में विश्वास रखने वाला प्रबुद्ध व्यक्तित्व ही कर सकता है।

कुछ लोग ये मानकर सन्तोष कर लेते है, सुख और दुःख कर्मो के साथ भाग्य का खेल है। कथन की सत्यता या असत्यता पर सवाल न उठाकर यह प्रश्न किया जा सकता है, कि अगर ऐसा होता भी है तो क्या निष्क्रिय जीवन किसी भी तरह का अनुभव दे पाता ? माना जीवन की किसी भी स्थिति पर कोई दावा नहीं प्रस्तुत किया जा सकता, पर हम कह सकते है कि हमारे सांसारिक जीवन की एक सत्यता को आज भी हम मानते है कि जीवन सुख दुःख की छांव तले ही अपनी आयु सीमा की ओर का सफर करता है। इस यात्रा के दौरान जब भी जीवन असहज हो विपरीत परिस्थितियों का अनुभव करता है, तब, दुःख अपनी चरम सीमाओं के साथ उसकी मजबूती की परीक्षा लेने हर जगOह तैयार रहता है। यही समय सही होता है जब जीवन को अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना चाहिए, उसे हर गलती का सही मूल्यांकन कर दुःख को सारी निराशाएं वापिस लौटाकर अपने आगे के पथ की निरंतरता को सहजता प्रदान करनी चाहिये। पर ऐसा होता नहीं क्यों की सुख का आदी जीवन सुख भोगते भोगते बहुत सी कमजोरियों की गुलामी करने लगता है। प्रश्न किया जा सकता है, क्या सुख के कारण जीवन की क्षमताओं का ह्यास होने लगता है ? इस प्रश्न का सहज व सरल उत्तर यही है कि “अति” कैसी भी हो कितनी भी हो, नुकसान दायक ही होती है। जैसे हर देश सीमाओं के द्वारा विभक्त होता है, हर अति की सीमा संयमन होती है। अपनी क्षमताओं से ज्यादा उल्लंघन करने से जीवन विरोधी तत्व संग्रहित हो, खिन्नता का वातावरण तैयार करते है, और सुख के क्षण के अहसास उनके सामने लाचार से हो जाते है।

इस लेख का सारांश आप तय करे तो इतना ही कीजियेगा की वर्तमान के अच्छे जीवन को हम चाहे तो काफी और बेहतर कर सकते है। जी हां, “परिवर्तन” बहुत हि मोहक और अदाकारी शब्द है, परन्तु निरन्तरता से ही ये जीवन सहायक दोस्ती निभाता है, नहीं तो अजनबी की तरह कुछ क्षण के लिए ही मुस्कराता है। कुर्त लेविन के अनुसार यदि किसी चीज को अच्छी तरह समझना चाहते है तो उसे बदलने की कोशिश करनी चाहिए, खासकर आदतों को। हम जीवन में जिन दैनिक सुखों का अनुभव करते है या करना चाहते है वो मन की खुशियां ज्यादातर सफलता और आपसी सम्बंधों की मधुरता में ज्यादा निहित होती है। शरीर का स्वस्थ स्वास्थ्य और अर्थ का संक्षिप्त साम्राज्य अगर हमारे पास है और उन पर हमारा आत्मिक शासन नीतिगत के तहत सही ढंग से काम कर रहा है तो सदा यकीन इसी पर कीजिये, इस चिंतन के साथ की इससे ” बेहतर” अभी कुछ और भी आगे है। प्रकृति का एक निश्चित सन्देश हर मानव को जन्मतें ही मिल जाता है, मेरी शुद्धता तेरी जीवन साँसों की चाहत है हो सके तो इस रिश्ते की गरिमा को समझ कर ही मेरे साधनों का जरुरतमय और सही उपयोग करना। काश हम इस सन्देश की गरिमा को समझ पालन कर पाते। निश्चित मानिए, सार्थक जीवन का यही सही सार है, प्रकृति की महिमा को समझा, अपने ही जीवन की आस्थाओं को मान सम्मान का अहसास कराता है।

हर इंसान बेहतर होता है, हर एक का जीवन जीने का तरीका भी भिन्न होता है, पर सभी का मनपसंद जीवन पथ खुशियों की राह चाहता है। आइये, कुछ चमत्कारिक तथ्यों पर गौर करते है, जिन्हें हम जानते है, पर अपनाने की कोशिश बहुत ही कम करते है। इस तथ्य से इस लेख का कभी कोई इंकार नहीं कि हम अभी भी बेहतर जीवन जी रहे है, पर बेहतर को और बेहतर बनाने से परहेज करना भी सही नहीं महसूस होता। एक समझ भरी सही सलाह को सही रुप से समझने से इंकार भी नहीं होना भी उचित होता है। अगर कुछ अदृश्य कुशलता का हम प्रयोग कर हम स्वयं की खुशियों, सफलता और सम्बंधों को कुछ क्षणों के लिए और बढ़ाते है, तो निसन्देह इसे हम सोने पर सुहागा ही कहेंगे। चलिए जानते है, कैसे कुछ अतरिक्त क्षणों को जिससे इन्हें हम हासिल करने का प्रयास कर सकते है।

यहां स्वयं के लिए यह मानना उचित होता है कि हम दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों ही रुप से मूल्यांकित होते है, अतः गलत भी स्थिति वश हमारा कोई मूल्यांकन करता है, तो वो हमारे लिए निराशा का कारण न होकर स्वयं को अवलोकन करने का आधार मानना चाहिए। इस तरह हमारी भावनाओं में उत्साह और उमंग भरे तत्वों का आवागमन होता रहेगा और सही समय पर हमारे प्रति नकारत्मक चिंतन रखने वाले अपने गलत चिंतन की दिशा भी बदल देंगे।

जिंदगी को अगर हम सिर्फ साँसों की आवाजाही का साधन न मान उसे कुछ अतिरिक्त प्रयासों से उसे मान देते है, तो निश्चित है, ऐसे सही प्रयास, सही राह की सैर करने वाले लोगों की राह में खुशियों के फूल बिखरेने का काम कर सकते है। इन प्रयासों में साँसों और मस्तिष्क का तालमेल का रहस्य इंग्लिस फिल्मों के कलाकार Allisan Janney के इस कथन में निहित है, गौर जरूर कीजिये ” I do the best I can. Everything is everybody else’s problem. संसार में अपने सीमित अस्तित्व की पहचान ही सक्षमता निर्माण के योग्य होती है। कुछ लोग सस्ती प्रसिद्धि के चक्कर में इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते है, ये एक मानसिक कमजोरी के अलावा कुछ नहीं है।

जब अवस्थाये कभी विपरीतता का सन्देश दे तो हमें तीन तत्वों पर सदा ध्यान देना चाहिए वो है समझ, समय और संयम इनका सही अनुपात में उपयोग आत्मिक और मानसिक स्वास्थ्य को सम्बल प्रदान कर सकता है। ऐसी अवस्था में परिवार में मुख्य अनुभवी माता पिता और बुजर्ग लोगों के सुझावों पर जरूर प्रध्यान करना चाहिए क्योंकि वक्त की कसोटी पर उनका ज्ञान काफी सार्थक होता है। परिवार के हो रहे विभाजन से जीवन को काफी क्षति पंहुच रही है, ये इन दिनों में घट रही आत्महत्या की घटनाओं से समझा जा सकता है। माना जा सकता है, परिवर्तन एक सांसारिक नियम है, साथ में साधनों के विकास अनुरूप मानव स्वभाव भी बदलता रहता है। पर परिवर्तन और बदलाव अगर जीवन को आनन्दमय होने का अहसास दे, तो सही लगते है, नहीं तो गलत परिणाम का खामियाजा जिंदगी को ही भुगतान करना है। ये ही सोच अगर हम परिवर्तनमय होते है, तो सही दिशा की ओर हम अपनी जिंदगी का रुख कर रहे है, यकीन कीजिये। सारगर्भित जीवन हमारी आंतरिक मानसिक दशा का सम्पन्न मूल्यांकन तो करता ही है, साथ में हमें इस जहां में आने का मकसद भी बताता है।
जीवन को सारगर्भित करने वाले कुछ इंसानों के इन कथनों पर एक नजर इनायत की डालिये, कहना न होगा जीवन के गुलशन में आनन्द की बहार छा जायेगी, अगर इनसे हम अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करते है, तो।

1. शेक्सपियर के अनुसार हमें किसी की भावनाओं से इसलिये कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए कि हम उससे आगे बढ़ जाये। हो सकता है हम कुछ क्षण के लिए जीत जाये पर ऐसे सक्षम इंसान का सानिध्य हम जिंदगी भर के लिए खो देंगे।
2.नेपोलियन के अनुसार संसार को खराब आदमियों से फैलायी हिंसा उतना डर नहीं है, जितना कि अच्छे लोगों की चुप्पी से।
3.आइंस्टीन ने अपनी सफलताओं के लिए उन लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होनें उन्हें किसी भी तरह के सहयोग से इंकार किया। इससे उन्हें स्वयं हर कार्य करने की प्रेरणा मिली।
4. अब्राहम लिंकन ने दोस्ती की परिभाषा कुछ इस तरह की ” अगर दोस्ती आपकी कमजोरी है तो यकीन कीजिये आप दुनिया के सबसे मजबूत आदमी है।
5. किसी को हर समय खिलखिलाते देख कभी इस बात का अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि उनके जीवन में दुःख है ही नहीं, हां, यह हो सकता उन्होंने दुःख को संयम से आत्मसात करना सीख लिया होगा..शेक्सपियर
6. मौका मिलना सूर्य उदय के समान है अगर आप देर से जागरुक होते है तो हो सकता है आप उसे खो दे। ..विलियम आर्थर
7. सत्य है, जब हम सफल होते है तो शायद बहुत से लोग हमें प्रेरणा के लायक समझे परन्तु जब कभी हम असफलता के अन्धकार में प्रवेश करते है तो हमारी छाया भी हमारा साथ नहीं निभाती। हिटलर
8. खुदरा रेजगी सदा शोर करती है, परन्तु नोट सदा शांत रहते है, यानी जब हमारा सफलताओं मूल्य बढ़ता है, तो हम गंभीर हो जाते है ..शेक्सपियर
9. मैदान में हारा हुआ इंसान फिर से जीत सकता है पर मन से हारा इंसान कभी नहीं जीत सकता।
लेख समापन से पहले अर्नाल्ड श्र्वाजनगेर के इस कथन पर ध्यान देना सही होगा कि ताकत जीतने से नही आती, आपके संघर्ष आपकी ताकत पैदा करते है। जब आप मुसीबतों से गुजरते है और हार नहीं मानते है, वही ताकत है, शायद वह आपके जीवन की सारगर्भिता भी हो। सारांश में जीवन में सही मौलिक परिवर्तन अपनाइये, जीवन आपसे प्यार करेगा। लेखक: कमल भंसाली

🙆”मा”🙅 रिश्तों का व्यवहारिक आंकलन 👧 एक उद्धेषपूर्ण अनुसंधान चर्चा 👼भाग 1

जब भी हम कभी जिंदगी के सन्दर्भ में बात करते है, तो अहसास भर होता है कि जिंदगी को समझने की जरुरत होती है । जिंदगी बहुमूल्य होते हुऐ भी हम इसकी कीमत का शायद ही कभी मूल्यांकन करते है, यह हमारी शायद कोई नीतिगत कमजोरी है और इसका हर्जाना हम काफी बार क्षमता से ऊपर चुकाते है। एक सत्य जीवन का जो हमारे सामने कई प्रश्न खड़ा करता है, वो है आपसी रिश्तों का तालमेल, साधारण स्थिति में भी रिश्तों का निबाहना आजकल काफी चिंतन का विषय कहा जा सकता है। विपरीत परिस्थियों में तो हमारा आपसी सम्बन्ध निम्नतम रक्तचाप से भी नीचे चला जाता है। आखिर ऐसा क्यों है, कि सबसे सक्षम धरती का प्राणी अपनों से ही पराजित हो जाता है ! आज हम रिश्तों के विज्ञान की समीक्षा करेंगे परन्तु उससे पहले यह जानलेना जरूरी है, आखिर रिश्तों से हमारा क्या तातपर्य है ? सम्बंधों की रूपरेखा के अंतर्गत ही हमारा चिंतन होना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि इनपर हम अपना कुछ अधिकार मानते है। हम किसी भी रिश्ते का मूल्यांकन करे उससे पहले यह समझलें कि हर रिश्ता चाहे वो खून का हो या परिस्थितियों से बना हो दोनों में ही आपसी विश्वास की मात्रा बराबर होनी जरुरी होती है। विश्वास के धागों में प्रेम के मोतियों की कीमत अनमोल होती है, इस सत्य से परिचित इंसान हर रिश्ते का सही सम्मान करता है और आजीवन सुख का स्पर्श उसे प्राप्त होता रहता है, ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

रिश्तों की दुनिया विचित्र और सचित्र होती है, इसमे नये नये रिश्ते जो व्यवस्था और अर्थ अर्जन के अंतर्गत बनते और बिगड़ते है, उनके वजूद की सीमा सीमित होती है, अतः उनसे ज्यादा न सुख मिलता न ही दुःख। परन्तु इंसान को जन्म लेने के बाद जिन दो जीवन पर्यन्त रहने वाले आत्मिक रिश्तों से प्रथम साक्षात्कार होता है, वो दुनिया के सबसे बड़े विश्वास के ग्राहक होते है। जी, हाँ, मैं माता- पिता व सन्तान के अनमोल रिश्ते की बात कर रहा हूँ। शास्त्रों की बात माने तो दोनों ही रिश्तों को भगवान के समकक्ष पूज्य और सम्मानीय माना गया है। चूँकि माता- पिता का रिश्ता प्रेम और भावुकता के अमृत भरे तत्वों से संचालित रहता है अतः दुःख और सुख दोनों को अनुभव जीवन पर्यन्त करता रहता है। इसे जीवन विशेषज्ञ उम्मीद, आशा और भविष्य के तत्वों से पोषक रिश्ता भी बतलाते है, जो काफी हद तक सही मूल्यांकन लगता है। आज हम इसी रिश्ते के सन्दर्भ में अपना चिंतन आगे बढ़ाते है क्योंकि ये जीवन का प्रथम रिश्ता है, जिसे विधाता हमें धरती पर पहला उपहार देता है।

सबसे पहले हम मर्मस्पर्शी, ममतामयी व स्नेह से भर पूर “माँ ” के रिश्ते से अपनी विवेचना से शुरुआत करे तो शायद हम जीवन के इस मधुरमय रिश्ते का सर्वांग आनन्द प्राप्त करने की कोशिश करे। कहते है, “माँ “अगर स्नेह से भरपूर नहीं होती तो प्रेम की परिभाषा में अमृत्व नहीं झलकता अतः उचित हो जाता इस पवित्र रिश्ते के आत्मिक और सात्विक तथ्यों का मानसिक और संसारिक दृष्टि से विश्लेषण करने की चेष्टा करे।

इस पवित्र अनमोल रिश्ते की शुरुआत उसी दिन से शुरु हो जाती है, जब जीव “माँ” के गर्भ में जगह पाता है। हर “माँ” इसका प्रथम अहसास पाते ही स्नेहयुक्त तत्वों से इसकी सुरक्षा के लिए जागरूक हो जाती है। हालांकि “माँ “शब्द की महिमा को हर क्षेत्र से परिभाषित किया गया परन्तु आज तक सभी परिभाषायें सम्पूर्णता से अधूरी ही लगती। महाभारत महाकाव्य के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने माँ के बारे में जो लिखा वो काफी सारगर्भित लगता है।

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः ।
नास्ति मातृसंम त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।

( यानी माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है। )

इसे हम तकनीकी रुप से समझना चाहते है, तो ” माँ ” शब्द की गरिमा को समझना होगा। प्रथम सांस के साथ नव प्राण प्राप्त शिशु जब प्रथम स्पर्श का मूल्यांकन सुरक्षित पालन पोषण के लिए करता है, तो “माँ “का दूध उसके आँचल में मचलने लगता है।ये अमूल्य रिश्ता है, जिसको मंत्र के रुप हर दुःख के समय याद किया जाता है। जो, माँ की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाते है, उन्हें अपना शैशव जरूर याद करना चाहिए। एक माँ अपनी सन्तान का पालन पोषण कितना तपस्यामयि हो जाती है, ये जानना भी संक्षिप्त में जरूरी भी है। वो सन्तान को गर्भ धारण कर नौ महीनें तक उसे वहां सब दायित्व निभाते हुए सुरक्षित रखती, प्रसव पीड़ा सहन करती। जन्म देने के बाद स्तन पान करवाती, रात भर जागती, खुद गीले में सो कर बच्चे को सूखे में सुलाती, उसका हर दैनिक कार्य करती, उसे सदा आंचल में छुपा कर रखती और उसकी रक्षा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देती। ” माँ ” की महिमा और उसके आंचल की ममता को शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है, पर महसूस किया जा सकता है।

आज युग बदल गया, सब तरह के सम्बन्ध स्वार्थ के धागों में बंध गए परन्तु आज भी “माँ “एक मात्र सम्बन्ध रह गया जिससे कोई नुकसान की कल्पना भी नहीं करता। परन्तु आज हकीकत यह भी है, अर्थ के प्रभाव ने ” माँ ” की भूमिका भी बच्चों के लालन पालन की बदल गई। आज की कुछ शिक्षित माँये बच्चों को आया के सहारा उनका लालन पालन करना पसन्द करती है, इस तरह के और भी कारणों से वर्तमान की कई घटनाये माता के प्रति सन्तान का रवैया कुछ रूखापन महसूस कर रहा है। ये वक्त की मजबूरी कहिये या अर्थ तन्त्र की मेहरवानी की माँ की शुद्ध भूमिका कमजोर हो रही है। पुराने समय से जब तक अर्थ का प्रभाव नहीं बढ़ा तब तक मजाल थी, कोई इस रिश्ते के प्रति नकारत्मक विचार बदलता परन्तु वर्तमान में भूर्ण हत्या ने कुछ संशय को प्रोत्सहान दिया है, फिर भी “माँ “तो “माँ” होती है, अंतस में तो इस पर उसे पश्चाताप जरूर होता होगा। कुछ वक्त के कारणों को छोड़ दे तो आज भी “माँ” बेमिसाल होती है।

कुल मिलाकर, हर धर्म माँ की अपार महिमा को स्वीकार करता है। हर धर्म और संस्कृति माँ की जीवन निर्माण की भूमिका को स्वीकार किया है। हिन्दू धर्म हर देवी को माँ के रुप में माना गया है, मुस्लिम धर्म ने माँ को पवित्र माना है। हजरत मोहम्मद कहते है ” माँ के चरणों के नीचे स्वर्ग है “। ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ ने स्पष्ट माना है ” माँ के बिना जीवन ही नहीं “। कहने का इतना ही सार है, कोई भी देश, कोई भी संस्कृति, कोई भी सभ्यता या किसी भी भाषा में माँ के प्रति असीम प्यार व सम्मान मिलेगा। भाषा परिवर्तन से माँ शब्द की गरिमा कभी अपरिचित नहीं रहती। हिंदी में “माँ”, संस्कृत में “माता”, इंग्लिश में “मदर”, “ममी” या “ममा” फ़ारसी में “मादर” और चीनी में “माकून”शब्द का प्रयोग होता है। भाषायी दृष्टि से “माँ “के चाहे भिन्न भिन्न रुप हो लेकिन ममता और वात्सल्य से हर माँ एक ही तरह की होती है।

अगर हम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से “माँ” और सन्तान के सम्बंधों का विश्लेषण करने की कोशिश करे तो प्रथम समझना होगा, हर रिश्ते की बुनियाद भावनाऐं होती है । देश, जाति, धर्म तथा समय काल हर रिश्ते की गहनता को प्रभावित जरुर करते है, पर माँ का रिश्ता अंदर से अप्रभावित ज्यादा रहता है। माँ का रिश्ता बेटे के लिए या बेटी के लिए बिना कोई अलग् धारणा के एक जैसा रहता है यह और बात है, सन्तान गलतफेमियों के कारण इसे कम, ज्यादा में कभी कभी मूल्यांकित कर लेती है। हमारे देश में रिश्तों की नैतिकता बरकार रखने के लिए सदियों से प्रयास किया जाता रहा संस्कार निर्माण द्वारा बच्चों को बचपन से हर रिश्ते की गरिमा से अवगत कराया जाता इस प्रणाली माँ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। कड़वा सच यह भी है आज माँ की खुद की आस्थायें परिवार के नियमों के प्रति कम हो रहीं है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए शायद सही नहीं है।

भावुकता से ओतप्रोत ” माँ” का रिश्ता गीतकार और कवियों को इतना भावुक कर देता कि माँ उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाती। चरित्र निर्माण में “माँ ” की शिक्षा संतान को वक्त के अनुसार तैयार करने की क्षमता व मार्गदर्शन करती है। इतिहास गवाह है, संसार में बलशाली, बुद्धिमान, चरित्रवान आदि गुण युक्त व्यक्तित्व उभारने में ” माँ ” का सहयोग और मार्गदर्शन गुरुत्व केंद्र होता है।

फ़िल्म दादी माँ (1966 ) के इस गीत में ” माँ “की महिमा को मार्मित ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसे ह्रदय द्रवित हो जाता है, और आँखों में स्नेहमयी “माँ” की नमन योग्य तस्वीर उभर आती है।

“उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी जरूरत क्या होगी
ऐ माँ….ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी ।।”

दोस्तों संसार में सब कुछ मिल सकता सिवाय माँ के, अतः अगर आप के पास आज भी माँ का सौभाग्य है, तो
इस अनमोल रिश्ते का सम्मान सहित आनन्द लीजिये ।माता- पिता को सुखी रखकर नहीं चुकाने वाले कर्ज के ब्याज के रूप में ही सही। माँ- बेटे के रिश्ते की विवशता ही कहिये जिंदगी भर माँ जिस बेटे को समझने की कोशिश करती वो ही बेटा वक्त के साथ क्षीण होती माँ की काया व मन को सुख नहीं दे सकता। कहते है एक माँ कई सन्तानों को संभाल लेती पर सब सन्तान मिल कर भी एक माँ को अच्छी तरह संभालने में ज्यादातर असफल ही रहते है।

आगे बढ़े उससे पहले यही कहना सही होगा:-

“माँ” तेरा नहीं कोई मोल
तूं सदा रही अनमोल
तूं न होती तो
शायद ही बन पाता
जग का ये घूमता भूगोल”

रचियता और लेखक: कमल भंसाली **क्रमश कभी और…..

🐓 मुक्तक🐔 कमल भंसाली🐰

प्रशंसा का भूखा संसार, भूल गया सत्य का प्रकार
अभिमान की वेदी पर स्वाहा,आत्मा कर रही चीत्कार
पन्थों में उलझा धर्म तलाश रहा, अपना स्थायी आधार
अभिमान में गिरा इंसान,भूल गया मानवता का सत्कार
😢😢😢
बात बड़ी हो या छोटी हर एक होती है, मूल्यवान
इनकी कीमत से ही होती हर इन्सान की पहचान
जिसके पास अपने वचन का सही मोल नहीं होता
कितना ही कुछ न हो पास, वो सही इंसान नहीं होता
🐳🐳🐳

स्वार्थ की गगरी कितनी ही भरले कोई भी इंसान
तख्त ताज की दुनिया में सब के सब रहते फकीर
राजा हो या रंक, लेकर आते आधी अधूरी तकदीर
रुप रंग सब बिगड़ जाते, जब आते अति बुरे दिन
🐤🐤🐤
जग के रुप अनेक, कौन सही, कौन गलत
समय ही करता तय, कौन शत्रु, कौन भगत
रिश्तों से अच्छी होती, प्यार भरी सच्ची दोस्ती
निभ गई तो जिंदगी तन्हाई का दर्द नहीं भोगती
🐢🐢🐢

पुत्र हो पुत्री, जो माता पिता को नहीं मानते
वो पिछले जन्म के शत्रु, बदला लेने ही आते
सुख की बूंद में, कितना दुःख समाया रहता
चाहत की दुनिया में, प्रेम सदा पराया ही रहता
🐍🐍🐍

भले का ही भला होता, सत्य ही रहता सिर्फ अचल
जिसने मर्म जीवन का समझा, वो कहलाता इंसान
दूसरे के लिए जीना ही है, एक सही सच्चा जीवन
विश्वास में जो खरा, वो जग के कीचड़ मे “कमल”

रचियता**🌺कमल भंसाली🌺

🌒चन्द्रग्रहण🌓 कमल भंसाली🌕

लाल, मेरे

हाँ, तुम्हीं तो थे
मेरे जीवन नभ् के चन्दा
थे, तुम राज दुलारे
जब मुस्कराते तो
छितरा जाते
मेरे अरमां के सितारे
एक प्यारा शब्द
“माँ” तुम्हारा
खोल देते
खुशियों के बन्धन सारे

मेरे दिल की हर सांस
तुम्हारी धड़कन के साथ चलती
मेरे चेहरे से
तुम्हारी निगाहे नहीं उठती
आज, सच कहती बेटा
अब उनमें
यह “माँ” नहीं रहती
उम्र की दहलीज पर
आँखे झुकी रहती
टूटी कमर
बहुत कुछ सहती
मैं पुकारती
तुम नहीं आते
जब तुम्हें जरुरत होती
तो पुकार लेते
“माँ” कहकर
कोई बिना चूका
कर्ज समझ
सहन कर लेते
इस बन्धन की
कीमत कितनी जल्दी
आंक लेते
तुम समझदार हो गए
माँ बाप को
ढोने का दस्तूर
बेखुबी निभा रहे
हमें ही
बुढ़ापे में
जीने का ढंग
समझा रहे

भोली थी
कीमत अगर
कोख की जानती
तो सच कहती
नौं महीने के कष्ट को
इस तरह नहीं पालती
जिंदगी की शाम
इस तरह नहीं गुजारती
माँ होने की
बेबसी इस तरह
नहीं पहचान ती
परवरिश की कोई भूल
इस तरह सामने नही आती
नहीं जानती
तुम बदले
या वक्त बदल गया
पर कह सकती
मेरा चाँद
बादलों में खो गया
उसके फर्ज को
कोई ग्रहण लग गया
“माँ” होने का दर्द
अंत तक ठहर गया
चन्द्र ग्रहण बन
आँखों को धुंधला गया……..

रचियता : कमल भंसाली

🔥अनुभव ⭐ एक सार्थक चर्चा 🌞 कमल भंसाली

“अनुभव” एक शानदार शब्द होने के साथ सक्षमता प्रदान करने का सही और सुंदर साधन है। शास्त्रों से लेकर धार्मिक ग्रन्थों ने इसको महत्व दिया है। जीवन अपनी विभीषताओं से जब भी उलझता है, तब अनुभव एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है, शर्त यही है, कि वो हमारे पास अर्जित किया हुआ होना चाहिए। प्रश्न किया जा सकता है, अनुभव में आखिर ऐसा क्या है, जिससे उसे इतना महत्व दिया जा रहा है ? सही वस्तुस्थिति को समझने के लिए हमें अनुभव के साथ परिचय करना सही होगा। अनुभव का हिंदी में शाब्दिक अर्थ प्रत्यक्ष ज्ञान, काम की जानकारी, तजुर्बा आदि होता है। जरा और स्पष्ट शब्दों में अगर कहे तो प्रयोग और परीक्षा से प्राप्त ज्ञान भी अनुभव कहलाया जा सकता है। तर्क संग्रह के अनुसार ज्ञान के दो भेद होते है, स्मृति और अनुभव। संस्कार से प्राप्त ज्ञान स्मृति समझा जाता है, कर्म से प्राप्त ज्ञान अनुभव के दायरे में आता है। भारतीय शास्त्रों ने अनुभव को दो भागों में विभक्त किया है, यथार्थ अनुभव और अयथार्थ अनुभव। यहां तक तो शास्त्र एक मत है, पर उन्होंने जब यथार्थ अनुभव के चार भेद किये तो विभक्ति उनके अंदर भी हुई,। वस्तुतः ज्यादातर जो चार भेद स्वीकार करने योग्य थे, वो है,

1.प्रत्यक्ष, 2. अनुमिति, 3. उपमिति, 4. शाब्द ।

अयथार्थ अनुभव के सिर्फ तीन भेद माने गए,

1.संशय, 2. विपर्यय तथा 3. तर्क

यहां स्पष्ट करना उचित है, संदिग्ध ज्ञान को संशय, मिथ्या ज्ञान को विपर्यय तथा ऊह ( संभावना) को तर्क कहते है। तर्क सभी अनुभव ज्ञान का जबरदस्त दुश्मन है। अनुभव की जगह हम कभी अंग्रेजी शब्द Experience का प्रयोग करते है। इस शब्द में ज्ञान, व्यवहार, अनुभव कौशल, परीक्षा आदि सभी तत्वों का अर्थ सम्मलित है, एक पूरक और व्यवहारिक शब्द होने से इंग्लिश न जानने वाले भी इसको समझ जाते है। अनुभव रहित जीवन बिन दिशा और पतवार के कभी भी साहिल छूं नहीं पाता, यही एक गूढ़ तथ्य जो जीवन दर्शन का कोई भी समझ जाता तो उसे अपनी असफलता के प्रथम चरण पर अफ़सोस नहीं होगा, क्योंकि उसे पता है, असफलता, सफलता की पहली सीढ़ी है, तथा उसके पास रहा अनुभव उसे अपनी उन गलतियों का ज्ञान करा देता है, जो उसकी असफलता के कारण हो सकते हैं।

चूँकि अनुभव का सूक्ष्म सा कण भी सक्षमता को बढ़ाता है, अतः अनुभव के प्रति हमारी लाचारी कभी भी नहीं होनी चाहिए। यह भी समझना होगा कि चूँकि अनुभव दुर्लभ और अमूल्य होता है, किसी भी दुकान में नहीं मिलता, उसको तो उन से प्राप्त किया जाता है, जिन्होंने अपने कर्म, सोच, मेहनत, और आत्मिक ज्ञान से उसे प्राप्त किया है। क्षेत्र के अनुसार अनुभव अपनी विशिष्टता स्वयं इस तरह से तैयार करता है कि कई क्षेत्रों का ज्ञान स्वत् ही उसमे सम्मलित हो जाते है। कहने की बात नहीं अनुभव और ज्ञान एक दूसरे के पूरक है, कह सकते है, इनका चोली दामन का साथ है।

कल्पना करने में कोई हर्ज नहीं होगा की आज जितने रुप के अति आधुनिक साधन का अविष्कार किया गया, क्या बिना अनुभव के उत्तमता की कसौटी पर खरे उतरते ? शायद, कदापि नहीं। निसन्देह कर्म की कोख से ज्यादातर अनुभवों का जन्म स्वत् ही हो जाता है, पर उनका लालन पालन की भूमिका ज्ञान ही निभाता है। जान लेने की बात है, कि इंसान अपने अनुभवों और ज्ञान के द्वारा ही अपना परिचय इस संसार में तय करता है। आज जब हम कभी भी अपने मन की तथा शरीर की अवस्था की जांच करते है, तो भूल जाते है कि हमारे दैनिक कर्मो के अनुभव से वो भी प्रभावित हो सकते है। उदाहरण के तौर पर इस तथ्य को तो स्वीकार करना ही चाहिए कि गुस्से की हालत में हमारे शरीर और मन का हर हिस्सा जर्जर और कमजोर हो जाता है, और उसका विकृत प्रभाव हमारे चेहरे पर स्वयं ही आ जाता है, वैसे ही किसी सकारत्मक, जगहित का आत्मिक काम हमारे चेहरे को चमक देता है।

कोई दो राय नहीं होगी, जो हमें समझाएगी कि सिर्फ अनुभवित होना, या किसी अनुभवी से मार्ग दर्शन प्राप्त करने से विशिष्टता प्राप्त हो जायेगी, सही नहीं है, और क्योंकि अनुभव तभी गुणकारी होता जब हम उसे अभ्यास की कर्मठ कसौटी पर उसके खरे पन को जांचते है। हालांकि अनुभव शुद्ध सोना है, पर हमे दैनिक जीवन में लगातार नये नये गुणों के गहने बनाने है, तो कसौटी पर अनुभव के शुद्धता की जांच कर लगातार अभ्यास की आदत डालनी होगी। क्योंकि कहा गया है, :

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान ।

( जब रस्सी को बार बार पत्थर पर रगड़ने से पत्थर पर निशान पड़ सकता है, तो निरन्तर अभ्यास से मुर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है। )

आज संसार चारों तरफ से नवीनतम साधनों की खोज में लगा है, दूसरी तरह से हम कह सकते है, आज ज्ञान चारों तरफ बिखरा है, अगर उसे हमें अपने लिए समेटना है, तो निश्चिन्त है, कि अनुभव और अभ्यास दैनिक जीवन की जरुरत है। परन्तु, जो सबसे मुख्य बात ध्यान रखने की है, वो है, अपनी योग्यता पर विश्वास करके अनुभव प्राप्त करना। जब हम अपने ऊपर विश्वास की बात कर रहे है तो सदा ध्यान रखना होगा की अतिविश्वास से भी बचे।

“Anything that you learn becomes your wealth, that cannot be taken away from you; whether you learn it in a building called school or in the school of life. And not all things that you learn are taught to you, many things you realise you have taught yourself.”…C Joy Bell

इसलिए अपनी आंतरिक चेतना की जागरुकता से अनुभव प्राप्त करना ही उचित लगता है।

जिंदगी को किसी भी क्षेत्र में बेहतर और अनुभवी बनाने के लिए उपरोक्त कथ्य एक शानदार सूत्र है, इंसान का कर्म क्षेत्र में अभ्यास से किया यह अनुबन्ध उसे प्रगति की तरफ ले जाता ही नहीं बल्कि उसे अपने चुने क्षेत्र का विशिष्ट विशेषज्ञ भी बना देता है। यहां पर एक बात स्पष्ट कह देनी जरुरी हो सकती है, जब हम किसी क्षेत्र की बात करते है तो हमारा मकसद मानव और दूसरे प्राणियों को लाभ पंहुचाने वाले क्षेत्र के बारे में है, न कि उन के जो दहशत फैलाते है, हालांकि उनमें भी अनुभव अपनी खासी भूमिका निभाता है। सर्व कल्याण ही स्वयं का कल्याण करता है, इसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि सकारत्मक चिंतन ही जीवन को महत्वपूर्ण बनाता है ।

प्रश्न किया जा सकता है, अनुभव को किन स्त्रोतों से पाया जा सकता है ? मनोविज्ञान के अनुभवी जानकार बताते है, कि अनुभव स्वयं अर्जित प्रक्रिया है, जो हर चेतन के अंदर जन्म प्रक्रिया में समाहित रहती है, और जीवन अस्तित्व की सुरक्षा के लिए स्वत् ही समझ में आ जाती है। चूँकि यह प्रक्रिया स्वयं की समझ से तैयार होती है, तो व्यवहारिक जगत के लिए ज्यादा सार्थक नहीं बन पाती और बाहरी अनुभव की जरुरत धीरे धीरे होने लगती है। चूँकि हम मानव जीवन के सन्दर्भ में अनुभव को तलाश रहे है, तो लाजमी है, हम अपने जीवन के अंदर ही इसकी भूमिका को परखे। समझ के बात इतनी ही है, जो पहला जीवन सूत्र है वो है, अपने जीवन के अस्तित्व को सुरक्षित बनाये रखना।

अनुभव का सम्बंध आत्मा और मन से जुड़ा होता है, अतः ये हमारी जीवन रेखा को संचालित करता है। अनुभव प्राप्त करने के लिए हमारे पास वैसे आज बहुत साधन है, जो हमें हमारे अर्थपूर्ण जीवन को कामनामय बनाता है। परन्तु सुख, शान्ति से युक्त जीवन जीने के लिए तथा हमारी असफलताओं को सफलता में परिणित करने के लिए जो ज्ञान हमें चाहिए, वो हम बड़े बुजर्गो, माता-पिता, रिश्तेदारों, शिक्षक, आध्यात्मक धर्म गुरुओं, अच्छी पुस्तकों तथा आसपास के वातावरण की ऊर्जाओं से ज्यादातर प्राप्त होता है। हमें कदापि नहीं भूलना चाहिए, डिग्रियों से मिला ज्ञान हमारी सक्षमता को सर्व श्रेष्ठ बना सकता है, पर शिष्ट नहीं, जो हमें स्वस्थ और मुस्कानभरा वातावरण दे सके। ध्यान रखना होगा प्राप्त धन दैनिक जीवन के साधन जुगाल कर सकता है, पर दैनिक आत्मिक शान्ति नहीं। यह चर्चा तभी सफल हो सकती है, जब हम तकनीकी शिक्षाओं को अंहकार से दूर रखकर अपने से ज्यादा जीवन अनुभवी व्यक्तित्व की तलाश करे और अपने अनुभव को ज्ञान के रूप में बदलने की सोच रखे।

भ्रमित अर्जुन अगर सारथी बने श्रीकृष्ण के अनुभव को ज्ञान के रुप स्वीकार नहीं करता तो महाभारत का उज्ज्वल पक्ष शायद कभी भी हमारे सामने नहीं आ पाता और हम अमृतमय “गीता” ज्ञान से वंचित हो जाते। क्यों नहीं हम अर्जुन बन हमारे जीवन सारथि माता पिता और गुरुओं के अनुभव से ज्ञान लेकर जीवन के महाभारत में विजयी बने।

श्रीकृष्ण प्रदत्त गीता का ज्ञान युगों युगों तक मानव को प्रेरणा देता रहेगा, जिनके पास अनुभव की कमी है, ज्ञान किसी से लेना संकोच कारी लगता है, उन्हें गीता सार समझने की कोशिश करनी चाहिए। सच यहीं है, जहां ध्यान, वही ज्ञान। चलिए, सुखी, सफल जीवन के लिए गीता के कुछ तत्व पर नजर डालते है। ध्यान रहे, पूर्ण गीता ज्ञान प्राप्त करना लेखक जैसे साधारण आदमी के लिए असंभव है।

1. बिना किसी उचित कारण, सन्देह मत करो
2. क्रोध मनुष्य का दुश्मन है
3. मन की लगाम अपने हाथों में रखो
4. उठो और मंजिल की तरफ बढ़ो
5. अपने विश्वास को अटल बनाओं
6. वासना, क्रोध और अति लालच से दूर रहों
7. हर एक पल कुछ सिखाता है
8. अभ्यास आपको सफलता दिलाएगा
9. सम्मान के साथ जियो
10. खुद पर विश्वास रखो
11. कमजोर मत बनना
12. मृत्यु सत्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता
13. कुछ भी ऐसा मत करो जिससे खुद को तकलीफ हो
14. मेरे लिए सब एक समान हैं
15. बुद्धिमान बनो
16. सदा कर्म शील रहो
17. डर छोड़ लक्ष्य की तरफ बढ़ो
18. सहारे की तलाश नहीं, सहारा देने लायक बनो

अनुभव की सुंदरता निरन्तरता है, जीवन की सुन्दरता सक्षमता है, दोनों की सुंदरता से प्रभावित होकर जो कर्म हम करते है, उसका परिणाम ही सफलता या असफलता तय करता है, प्रसिद्ध बास्केट बाल खिलाड़ी Tim Duncan ने अनुभव के प्रसंग में कहा, ” Good, better, best. Never let it rest. Until your good is better and your better is best.”……शुभकामनाएं …लेखक कमल भंसाली…

मूल्यांकन स्वयं का…सम्बंधों के सन्दर्भ में…भाग 1 ★★कमल भंसाली ★★

स्वयं को चिन्हित कर, स्वयं का मूल्यांकन करने वाले विरले ही महापुरुष होते है। दूसरों के व्यक्तित्व और उनके कार्य पर नजर रखने वाले सब जगह नजर आते है, हो सकता है, हम भी उनमें से एक हो ? अगर ऐसा है, तो निश्चित है, हम एक कमजोर व्यक्तित्व के मालिक है। हमारा जीवन बिना किसी सार और उद्धेश के चल रहा है। क्यों नहीं हम आज विचार करे, हम अपने व्यक्तित्व को सही और शुद्ध कसौटी पर परखे। समय रहते, अगर हम अपनी कमियों को समझले, और उन्हें दूर करने की चेष्टा करे, तो हो सकता हम अपने जीवन को एक सही पहचान दे सके।

हमें मानने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, कि हम इस धरती के साधारण से इंसान है, और हर आती जाती सांस के मोहताज है। परन्तु जब जीवन मिला है, तो कोई उद्धेश्य इसमे भेजने वाले का जरुर है, नहीं तो हमें वो और किसी दूसरे रूप में भी भेज सकता था। इंसानी जीवन मिलना कोई साधारण बात तो है, नही, यह हमारा प्रथम चिंतन हमें प्रेरित करता है, कि हम अपना स्वयं मूल्यांकन समय समय पर करते रहे, पर हम करते नहीं, क्योंकि हम अपने को इसका दावेदार नहीं समझते। इस भूल का सुधार हम जितना जल्दी करेंगे, उतना जल्दी ही हमारा जीवन आत्मिक आनन्द प्राप्त करना शुरु कर देगा। किसी एक क्षेत्र की सीमित सफलता चाहे हमें महान न बनाये, पर गरुर और अभिमान कि परत हमारे व्यवहार पर लगा देती है। इस से बचने वाला इंसान बहुत दूर तक की यात्रा सहजता से करता है। अभिमान जिस मानवीय व्यवहार को प्रभावित करता है, उन्हें हम सम्बंध या रिश्ते भी कहते है। आज हम इसी बाबत कुछ चिंतनमयी चर्चा संक्षिप्त में करे, तो क्या हर्ज है ?

हर जीवन यात्रा, माता के गर्भ से शुरु होती है, हर प्राणी की, पिछले जन्मों का लेखा जोखा का भी उसमे असर होता होगा। परन्तु, बिना प्रमाण उस पर बहस करने से अच्छा है, हम इस जन्म को सार्थकता प्रदान करे, और जीवन उद्धेश्य को समझने की कोशिश करते रहे। कहते है, प्रथम कदम से ही इंसान को समझ मिलनी शुरु हो जाती है। उसेअपनी शारीरिक पूर्णता और क्षमता का अहसास हो जाता है, वो अपनी भूख की पहली ललक से समझ जाता है, उसे इतने दिन कहां आश्रय मिला था, और दुनिया के प्रथम, स्नेहशील, विशुद्ध प्रेम का अनुभव, वो माँ के आँचल के अंदर पाकर, इस जीवन के प्रति आशस्वत हो जाता है, और वो अपनी दैहिक और कुछ हद तक मानसिक प्रगति की तरफ अग्रसर होने लगता है। माँ के स्नेह भर प्यार का अहसास के बाद उसे जो पूर्ण सुरक्षा का अनुभव होता है, वो होती है, पिता की बांहे, जहां उसे दैनिक अनुभव से अहसास हो जाता कि माँ और पिता के अनुबन्ध का वो एक उपहार है, जिसमें वो अपना भविष्य अवलोकन करता है, और उसे अपनी प्रगति और सुरक्षा के आश्वासन का अहसास हो जाता है l चूँकि उसे संसार में अपनी भूमिका को स्वयं ही ढूंढना है, वो उसकी तलाश में समझदार होकर अपने जीवन की मकसद यात्रा शुरु कर देता है, धीरे धीरे प्रकृति उसकी सारी प्रारम्भिक बाहरी सुरक्षा सुविधा वापस लेनी शुरु कर देती है। यहीं से वो अपने संस्कार, ज्ञान, बुद्धि, विवेक से अपनी स्वयं की जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देता है। जैसे कोई भी यात्रा में असुरक्षा का खतरा रहता है, वैसे सही जीवन यात्रा भी काफी कठिन होती है, खतरों से भरपूर होती है। इसे सुलभ और सुखद बनाने में एक रक्षा कवच की तरह काम करता है ” सम्बंध “।

सम्बंध की परिभाषा जीवन के हिसाब से इतनी ही बनती है, जब हम विपरीत परिस्थितयों में गिरने लगते है, तो सहीं सम्बन्ध दीवार बन गिरने नहीं देता। बाकी सम्बन्ध या तो रिश्ते होते है, या व्यवहारिक कार्य क्षेत्र से बनते है, कुछ सम्बंध शरीर के लिए कुछ आत्मा के लिए, कुछ दिल के होते है। हर सम्बंध का अपना क्षेत्र होता है, उसी के अनुरुप ही हमारे जीवन की उनकी जरुरत होती है। सारे सम्बंधों की कड़ी आपसी व्यवहार से जुड़ी होती है, सम्बंध का बनना और बिगड़ना इसी पर निर्भर करता है। सम्बंध का स्वास्थ्य भावना और वाणी पर ज्यादा निर्भर करता है। हमें सम्पन्न और स्वस्थ जीवन के लिए सम्बंधों की भूमिका पर सदा ही गौर करना चाहिए। सम्बंधों की मजबूरी भी होती है, प्रेम के धागे के दो क्षोर होते है, प्रेम पर जब जरा सा आघात दोनों में से कोई भी करता है, तो सम्बंधों की डोर कमजोर होती है। ये तो, हम सभी जानते है, संवेदनशील कई धागों से कोई डोरी या डोर बनती है। इन धागों की विश्वस्ता पर ही उसकी मजबूती निर्भर करती है। इसलिए हर सम्बन्ध का जीवन के सन्दर्भ में समय समय पर मूल्यांकन जरुरी होता है। हर सम्बंध की आस्था को टटोल कर ही कोई नजदीकी सम्बंध बनाना चाहिए। सावधानी बरतना भी उतना ही जरुरी है, जितना सम्बंधों को मधुरता देना। एक गलत सम्बंध जीवन को भी खतरा दे सकता है। सब मिठास भरे सम्बंध असली नहीं होते, समय समय पर कसौटी पर कसने से ऐसा अनुभव भी किया जा सकता है। कुछ सम्बंध कडुवे भी कभी लगते है, जैसे पिता, गुरु या सही दोस्त या शुभचिंतक का, उन पर हमें विश्वास करने का कारण ढूंढना चाहिए क्योंकि किसी समझदार ने कहीं लिखा है, ” रिश्तों की बगियां में एक रिश्ता, नीम के पेड़ जैसा भी रखना, जो सीख भले ही कड़वी देता हो पर तकलीफ में मरहम भी बनाता है”।

सम्बंधों का मनोविज्ञान जाने बिना सम्बंधों की सही विवेचना करना मुश्किल होता है, आइये संक्षिप्त में उसको भी जानने की कोशिश कर लेते है। हर वो रिश्ता खरा है, जो विपरीत स्थिति में हमारा साथ बिना किसी शर्त के निभाता है, ऐसे रिश्ते का अहसान और गरिमा को कभी भी खण्डित नहीं करने की सोच ही, सही सोच है। समय कठिन दौर में चल रहा हो, रास्ता नहीं दिख रहा, सत्य के साथ ऐसे सम्बंधों से राय लेने में कोई हर्ज नहीं है, और अगर वो सहयोग कर रहे है, तो उस सहयोग का सही उपयोग करना चाहिए, स्थिति सही हो जाये तो तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हुए, उन्हें उनका सहयोग वापस कर देना उचित होगा। कहना न होगा, आज के आर्थिक युग में अर्थ की कमी के सन्दर्भ में ही उपरोक्त कथ्य सही है।

सम्बंध शब्द सम और बन्ध दोनों का संयुक्त उद्बोधन है, जिसका मतलब ही होता है, समान सम्बंध इसी दृष्टि से हर सम्बंध को निभाया जाना चाहिए, गरिमा अनुसार। अर्थ की कसौटी पर किसी भी सम्बंध या रिश्ते को परखा जाता है, तो उसमे प्रेम की मात्रा ढूंढने का साहस कम ही लोगों में होता है, और निश्चित है, उनके पास भरपूर ज्ञान है, क्योंकि वो जानते है, अर्थ का वक्त कभी भी बदल सकता है।

हालांकि रिश्तों की तासीर में नजदीकी ही मुख्य है, परन्तु कुछ दुरी का पर्याय होना भी आवश्यक है। सत्य को पूर्ण नंगा देखना मुश्किल काम होता है, क्योंकि आँखे सहन नहीं कर सकती। कुछ आवरण हर सम्बंध की जरुरत है, अतः गरिमानुसार ही व्यवहार ही उचित होता है, इसमें वाणी और शब्द ही सम्बंधों की इज्जत अपने रुत्बों के अनुसार तय करते है, अतः सबंधों को अमृतमय बनाने है, तो अभिमान को दूर रखकर उचित भाषा का प्रयोग श्रेयस्कर होता है। …..क्रमश…..कमल भंसाली

प्रेम और वासना.. एक चिंतन, भरी चर्चा…कमल भंसाली

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प्रेम और वासना इंसानी जीवन के वो दो पहलू है, जिनके बिना जिंदगी को लय मिलना मुश्किल होता है। प्रेम को अगर वासना से अलग कर दिया जाय, तो प्रेम की परिभाषा को समझना, जरा मुश्किल ही होता है।जहां शुद्ध प्रेम का केंद्र बिंदु आत्मा को ही माना गया, वहां वासना युक्त प्रेम का केंद्र बिंदु, दिमाग और ह्रदय बताया जाता है। आत्मिक प्रेम निस्वार्थ और निराकार बताया गया, वहां वासना को कई आकार से पहचाना जा सकता है।शुरुआती जिंदगी में दोनों का ही समावेश होता हैं। कुछ विशिष्ट आदमी ही वासना की भूमिका को जीवन से अलग कर पाते है, परन्तु काफी कठिनता से।

प्रेम बिना जीवन नहीं चल सकता, पर बिना वासना के जीवन को संयम से चलाया जा सकता है। पूरी यथा स्थिति को समझने के लिये हमें सबसे पहले प्रेम की परिभाषा को समझना होगा।

प्रेम की शाब्दिक परिभाषा जान ने से पहले यह महशूस करना जरूरी होगा, की प्रेम ज्यादातर आभासीत होकर ही अभिव्यक्ति करता है, और अपनी चरम अनुभूति में स्पर्शमय भी हो सकता है। शुद्ध प्रेम त्यागदायी होता है,उसमे स्वार्थ का निम्नतम अंश ही पाया जाता है। स्वार्थ और वासना की बढ़ती मात्रा प्रेम के स्वास्थ्य के लिए घातक माना जाता है।

प्रेम की उत्तम परिभाषा यही है, इसमे कहीं “मैं” का समावेश नहीं रहता, इसके लिए “हम” ही उत्तम माना गया है। दूसरी बात प्रेम में पवित्रता का आभास होता है, परन्तु वासना के बारे में ऐसा कहने से संकोच का अनुभव होता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है, कि प्रेम सत्यता के आसपास ज्यादा रहना चाहता।

ख़ैर, हम पहले प्रेम का शाब्दिक अर्थ की तरफ ध्यान करते है। प्रेम को कभी कभी प्यार शब्द से भी
सम्बोधित किया जाता है। हिंदी शब्दकोश के अनुसार
प्रेम का मतलब प्रीति, माया, लोभ, और लगाव भी होता है। परन्तु, प्रेम को शब्दों से नहीं अहसास और भाव से ज्यादा अनुभव किया जाता है। प्रेम और प्यार दो शब्दों की एक ही व्याख्या है, दोनों ही अढ़ाई अक्षर से संस्कारित है। दोनों को जोड़ने वाला आधा शब्द सदा अधूरा रहेगा, क्योंकि सच्चा प्यार कभी समाप्त नहीं होता। इतिहास की बात करे तो इसका प्रमाण बहुत सारे प्रेम किस्सों में मिलेगा जहां प्रेम के लिए प्रेमियों ने शुद्ध प्रेम के कारण मौत को गले लगा लिया। आज के दौर में भी ऐसी कई घटनाये, हमारे सामने आती है,परन्तु ऐसे प्यार को नासमझ प्रेम की श्रेणी में ही समझा जाता है।

प्रेम शब्द, जीवन का आधार, सिर्फ मानव के लिए ही नहीं अपितु सभी सजीव प्राणी मात्र के लिए है। हालांकि इसके लिए कोई निश्चित आधार स्थापित नहीं किया जा सकता कि प्रेम का सिद्धांत क्या है। जो इस विषय पर शोध कर रहे है, उनका कहना की इसके बारे में एकमत होना असंभव है। कुछ लोग इसे भगवान की कृपा, कुछ रहस्मय, कुछ आत्मिक, मानते है, पर स्पष्टता कहीं नहीं है। मनोवैज्ञानिक जीक रुबिन के अनुसार शुद्ध प्रेम में तीन तत्वों का होना, अति आवश्यक है, वो है,
1• लगाव (attachment)
2• ख्याल (caring)
3• अंतरंगता (intimacy)
उनका मानना है, इन तीनके के कारण ही, एक आदमी दूसरे से प्रेम चाहता है।

जब की भारतीय दर्शन शास्त्र कुछ और ही बात करता है, उसके अनुसार प्रेम हर एक की आत्मा में रहता है, उसे अहसास कराया नहीं जाता, उसे समझना पड़ता है, उसमे शरीर की उन क्रियाओं को गौण महत्व दिया है, जिनमे स्पर्श की जरुरत होती है, उनके लिए देखने भर से प्रेम प्रकाशित हो जाता है। हमारे यहां कुछ रिश्तों में प्रेम को अवश्यंभावी माना गया है, जिसका नहीं होना लोगो में कुछ अचरज पैदा करता है, जैसे की माता, पिता, बेटा, बेटी और पत्नी, ये कुछ ख़ास रिश्ते है, जिनका प्रेम को शुद्धता के रुप में ही मिलने को, स्वीकार किया गया है, हालांकि सच्चाई यही है, ये ही रिश्ते ज्यादा तकलीफ में होते है।

प्रेम की सबसे बड़ी कमजोरी चाहत होती है, जब किसी से कोई अपेक्षा की आशा करे, और किन्ही कारणों से वैसा न हो, तो जिंदगी निराशमय हो सकती है। विश्वास और सत्य प्रेम के दो बुनियादी तत्व है, जिससे प्रेम सहज ही अपनी शक्ति का संदेश मन में प्रकाशित कर सकता है।

आइये, इस शृंखला में आगे बढ़ने से पहले कुछ जन्मातिक पारिवारिक सम्बन्धों की संक्षिप्त परिभाषा का अनुसंधान करने की चेष्टा करते है। परिभाषाओं के विश्लेषण में जरुरी नहीं कि लेखक की परिभाषा, आपके अनुसार हो, क्योंकि प्रेम का महत्व सबके लिए अपने अनुभव के आधार पर होता है, परन्तु तय यहीं है, सब रिश्तों में प्रेम की उपस्थिति से इंकार करना मुश्किल है।

पति और पत्नी के रिश्ते को काफी संवेदनशील माना गया है, जिसमे आसक्ति और प्रेम दोनों की जगह तय की गई है, चूँकि यह रिश्ता संस्कारो के निर्माण में सहयोग करता है, अतः इस रिश्ते में वासना का उचित गरिमामय प्रवेश की अनुमति स्वीकार की गईं है। सामाजिक दर्शन ऐसे सम्बंधों में हिंसा को छोड़ कर इसे अवैध करार नहीं करता।

सबसे आदर्श रिश्ता माँ का होता है, जिसमे एक ही तरह का शुभता भरा प्रेम अविरल बहता ही रहता है।
इस प्रेम की विशेषता यह होती है, कि इस प्रेम की पहचान से ही इंसान की जिंदगी शुरु होती है, और उत्तरोत्तर आदमी इसके प्रेम के अलग अलग रंगों की पहचान रिश्तों के सन्दर्भ से करने लगता है। माँ का प्रेम जीवन स्पंदन से शुरु होकर अंत तक बिना किसी शर्त अपना दायित्व निभाता रहता है। इस प्रेम में वात्सल्य और स्नेह का अद्भुत समावेश देखा जा सकता है।

पिता का रिश्ता जीवन को सम्बलता और दृढ़ता प्रदान करता है, यह रिश्ता कुछ दायित्यों से मजबूर होने के कारण स्पष्ट प्रेम नहीं प्रकाशित कर पाता, परन्तु आंतरिक होते हुए भी अनिष्ट से बचाता है। इस रिश्तें के प्रति सन्तान की समझ ज्यादातर कमजोर और भ्रामक होती है। सब प्रेम की किस्मों में उत्तम होते हुए भी पिता के प्रति प्रेम सहमा सा रहता है। माता पिता दोनों के प्रेम को समझने वाला आदमी सही जीवन दर्शन का ज्ञान कर सकता है। माता का प्रेम जहां शांत और शीतल और सहज बहने वाली धारा है, वहां पिता का प्रेम जीवन में आने वाली कठोर चट्टानों के प्रति सक्षमता प्रदान करता है। समझने वाली बात है कि “भगवान न दिखने वाले माता पिता होते है, परन्तु माता पिता दिखने वाले भगवान है।”

सबसे सुखद अनुभूति और दोस्ती जैसा रिश्ता भाई- बहन का होता है, इस में अहसास आत्मिक होता है,
माँ के बाद इंसान सात्विक स्नेह, प्रेम, और विश्वास इसी बन्धन में ढूंढता है। बहन पिता के बाद अपनी सुरक्षा का अनुभव इसी रिश्तें में करतीं है, शादी के बाद भी, इस बन्धन का अपना महत्व है।….क्रमश..कमल भंसाली