मेरे हमसफ़र….कमल भंसाली

चल मेरे, हमसफ़र, उन राहों पर ही तू चल
जिन, पर सफलता के फूल, खिलते हर पल
देख, चारों ओर, सुनहली,आंकाक्षाओं की भोर
मौसम है, कुछ करने का, कह रहा, आज का दौर

कल हम क्या थे, आज क्या, दे, दे जरा पहचान
जो कुछ करते, वो भला कब रहते है, अनजान
जीना उसी को कहते, जो कभी नहीं रहते बेजान
बिना मंजिल के कैसे जगेगे बता, तेरे मेरे अरमान

देख इस पल की रवानगी, कितनी सक्षमता से आता
कितना, कुछ हमें दे जाता, कितना, कुछ ले भी जाता
आ, सजाते इस पल को, कर्म से, खुलेंगे भाग्य के द्वार
कहते है, सूर्य की प्रथम, रश्मि में रहती चेतना बेशूमार

आये है जब दूनिया में, कुछ मकसद से ही जी रहे
उस मकसद की पहचान ही बढ़ाएगी, हमारी शान
बिन वजह तो पत्ती भी नहीं खिलती, हम है, इन्सान
चल कर्म करे हम, फल देने की चिंता करे, भगवान

आ आगे बढ़ते, “परिश्रम की रानी” ‘दोपहर’ कितनी चमक रही
हमें पथ का दावेदार मान, परिश्रम के पसीने की बुँदे सुखा रही
पर्वतों की नुकीली चोटियों के सिंहासन पर “दिव्या” मुस्करा रही
जीवन के हर संघर्ष में है, गहराई, कितनी सहज हो, समझा रही

विषय भोग न हो हमारी, कमजोरी की मजबूरी
अतृप्त पेड़ की शाखायें, जल्द ही सूख जाती सारी
बटोही है हम उस मंजिल के, जहां से कभी आये
आत्म रसानुभूति का रसायन, बता फिर कब पाये

आत्मा की मृष्टि को समझना, अब ऋजुता से जरुरी
यथार्थ का अनुभव ही, लक्षित उर्ध्वगामी मंजिल की दूरी
यकायक कुछ ऐसा न हो, भटक जाए निगाहें हमारी
तेरी मेरा अलग रास्ता न हो, यही है हमारी “जिम्मेदारी”
आखिर, मैं हूँ तन तुम्हारा, तू मन की चंचलता मेरी…कमल भंसाली

निराशिष पतझड़…..कमल भंसाली

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अगर उम्मीदें, मैं रखता, हौसले, वो, दे देता
जीवन, शायद सही, दिशा कि ओर मुड़ जाता
जीत हों या हार, कर रहा, आज सब है, स्वीकार
जान गया, भाग्य, सही कर्म से ही होता तैयार

डरता ही रहा, चाह के जंगल में न भटक जाऊ
मंजिल सामने हो, अर्द्ध ज्ञान से पहचान न पाऊ
यथार्थ की दहलीज पर, कहीं लड़खड़ा न जाऊ
सत्य की शक्ति न मिले, तो शायद संभल न पाऊ

कल को सही समझता, तो आज वीराना न होता
पल की कीमत की पहचान होती, तो महान होता
समस्याओं के रेगिस्तान में, ऊंट की तरह चलता
तो, आज खुशियों के गुलशन के आसपास होता

वो, अगर अपनी हंसी में मेरे आंसू को थोड़ी जगह देते
जीवन पथ पर कोमलता के, महकते फूल बिखर जाते
उस पथ का राही बनता, जहां अमृत ही बरसता रहता
देह का अनुयायी, मन, बून्द बून्द लेकर, हर रोज पीता

पर, ऐसा हो न सका, जीवन गली में रही रात अंधियारी
दिल की उदासियों को, आज भी सवेरे की तलाश है, जारी
कल वक्त बदल जायेगा, सोच, दिलाशों की करता सवारी
पर,आशा की एक बून्द पर, निराशा का पतझड़ लगता भारी

आज जहां खड़ा हूं, वहां कोई राह ही नहीं दिखती
हकीकत यही है, पीछे पर्वत जैसी दुर्लभता दिखती
सामने देखू, तो बिन आरपार पीड़ा की खाई दिखती
दायें, बायें की बात न करो, वहां मुस्कराती मौत हंसती ….कमल भंसाली

स्वर्णिम पल….कमल भंसाली

है, जिन्दगी के चाहे चार दिन
जीना तो पड़ेगा हर ‘पल’, हर क्षण
चाहे, जहर है, या अमृत जीवन
पीना तो पड़ेगा, हर ‘पल’, हर कण

‘पल’, जीवन सफर का एक हि रास्ता
राही को चलना, मंजिल का वास्ता
न यहां आज, न परसों,न ही कोई कल
जो है, वहीं है, यह निष्ठांत अछूता ‘पल’

अपरिचित सा भविष्य, हर ‘पल’ में रहता
मनमोहक, मधुर बन हर ,’पल’ छिन लेता
रातों की नींद में सितारे तक गिनवा देता
बड़ा जालिम, न जीने देता, न मरने देता

बुलन्दियों की गहरी घाटी में विलीन वर्तमान
बहुत कुछ देकर जाता, पर न करता अभिमान
सन्देश ही भेजता, जो आज, वो नहीं होगा कल
देख, समझ कर इंसान चल, आगे है, दूसरा ‘पल’

समझने लायक होता है, ‘पल’ का हर कमाल
हर ‘पल’, करता आशा और निराशा का निर्माण
देखते युग बदल जाता, पर रहता चंचल ‘पल’
उम्र को तराजू में तोल देता, वो ही है, यहीं ‘पल’

वर्तमान का हर लेखा, देता इतिहास को सौंप
जानेवाल ‘पल’, कितना निरहि, बिन संताप
इस ‘पल’ को जानना, यहीं है समय, यही वक्त
काल का निर्माणकर्ता, क्षणिक, पर पूर्ण सत्यत:

‘पल’ से बन्धी, हर सांस की डोर,
इसी से शुरु होती, आभामय भोर
जागों तो आएगा, सुरमई सवेरा
नहीं तो जिंदगी में, रहेगा अंधेरा

सच है, हर ‘पल’ नहीं सुनहरा
हर ‘पल’ में राज छुपा है, गहरा
न कोई इसका नाप, न हीं तौल
मणिमय ‘पल’, बिन मूल्य अनमोल

‘पल’ विश्वास, ‘पल’में समायी आस्था
‘पल’में ही आशा, पल में ही निराशा
पर, ‘पल’ का नहीं , किसी से वास्ता
‘पल’ तो है, प्रभु तक पँहुचने का रास्ता

मैं नहीं कहता, कहता हर ‘पल’
जीवन राही, मेरे साथ चला चल
देख दूर नहीं, तेरी प्रतीक्षित मंजिल
आज नहीं तो कल कहेगा, ‘स्वर्ण पल’
…..कमल भंसाली