😜पर्यावरण🤑 कमल भंसाली

वक्त बेवक्त
बड़ी बेवजह
जिंदगी मुझसे
अपने होने की वजह पूछती
मेरे अंदर के
कलुषित रक्त को
तंग करती
तमतमा कर
उससे यही कहता
मेरी होकर
वो ये सब क्यों पूछती ?
मुझमे अपने होने की
विश्वास की कमी
अक्सर
क्यों ढूंढती ?

सहम सी जाती
थोड़ी धीमी हो जाती
पर बुदबुदाती
अपने ही गैरों जैसे होते
नाजुक रिश्तों को भूल जाते
वजूद मेरा भी
तिलमिला जाता
जिंदगी मेरी ही है
ये मैं भी भूल जाता

पर जब कभी
बाद में शांति से सोचता
सन्दर्भ जब रिश्तों का आता
तो सही से मन में
उनका अस्तित्व क्यों धुंधला जाता
प्यार में
कभी कभी
शक के धुंए का
फूल कैसे उग जाता !

तब यही समझ में आता
हक और अधिकार की रफ्तार में
दिल का पर्यावरण बिगड़ जाता
मैल कहीं तरह से
दिल पर शक की घनेरी कालिख छोड़ जाता
जिंदगी का सवाल
उत्तर की वजह दे जाता
अपने अस्तित्व को
एक नया आयाम दे जाता

रचियता कमल भंसाली