खुशियां ही खुशियां**एक सकारात्मक संक्षिप्त चर्चा 🏃कमल भंसाली

हम यहां अपनी चर्चा हमारे देश के एक विद्वान सी. राजगोपालाचारी के इस कथन के साथ शुरु करते है ” Without wisdom in the heart, all learning is useless.”। सी. राजगोपालचारी भारत में अंग्रेजों द्वारा मनोनीत अंतिम गर्वनर जनरल के साथ साथ एक विद्धवान लेखक, वकील और राजनेता भी थे। उनका उपरोक्त कथन आज के आधुनिक व शिक्षित वातावरण में काफी महत्वपूर्ण दृष्टिकोण जीवन के प्रति इंगित करता नजर आ रहा है। आज शिक्षा का असर जीवन पर काफी देखा जा सकता है, परन्तु जीवन के प्रति सही चिंतन की कमी के साथ। इसके कई कारण नजर भी आते है, परन्तु सार संक्षेप में यही कहना सही लगता है हमारे आस पास जीवन जीने के इतने मकसद तैयार हो गये कि हम अपना असली चिंतन ‘सुखी रहना और प्रसन्नता’ को विस्मृत कर चुके है। परन्तु, पूर्णता से भूलना ‘मुख्य उद्देश्य’ को कठिन होता है क्योंकि सच्चाई देर सबेर सामने आकर खड़ी हो जाती है। जब जीवन में नकारत्मक्ता सदृश्य होती है, खासकर शरीर के मामले में तो जीवन स्वयं ही चिंतन करने लगता है, मैं सब कुछ होते ही सुखी और प्रसन्न क्यों नहीं रह सकता ? इसका जो सबसे प्रमुख कारण है, वो है बिना संघर्ष व श्रम सब कुछ पाने की चाह, हम माने या न माने, ये और बात है।

“संघर्ष” हर एक के जीवन से जुड़ा सिर्फ अति महत्वपूर्ण अहम शब्द ही नहीं यथार्थ है। कोई भी संधर्ष किसी भी तरह की प्रसन्नता प्राप्ति का सबसे पहला प्रयास से लेकर कई प्रयासों की बुनियादी सफलता का फल भी हो सकता है। प्रयास रहित किसी भी प्राप्ति में जीवन को खुशी शायद ही हासिल हो सकती है। संघर्ष की ख़ास विशेषता है कि वो कुछ भी नहीं हासिल करके सन्तोषप्रद प्रसन्नता दे सकता है। हमारे देश में ‘प्रसन्नता’ प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना जरूरी है। अगर वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट 2018 के आंकडों पर नजर डाले तो भारत संसार में खुशियां या प्रसन्नता के हिसाब से 156 देशों की सूचि में 133 नम्बर पर है। सन् 2017 की तुलना में यह संख्या 11 कम है। इस रिपोर्ट के अनुसार ” Happiness can change and does change, according to the quality of the society in which people live” । इससे आगे रिसर्च का दावा है आप जितने साल ज्यादा जीवन पाओगे उतने ही आप प्रसन्न रह सकोगे।

सफलता और खुशी जीवन पथ के दो अलग पथ दावेदार है। खुश रहने वाला आदमी हो सकता है किसी विशिष्ट क्षेत्र में सफल न हो पर जीवन मकसद में वो प्रसिद्धि न पाकर भी जीवन सफलकर्ता बन जाता है। सफलता को जो खुशियों की सौगात समझते है, वो शायद भ्रम की स्थिति में ज्यादा रहना पसन्द करते है।

जीवन पर रिर्सच करने वाले के अनुसार जीवन का कार्यकाल अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार U की तरह होता है। अगर इस तथ्य को स्वीकार किया जाय तो इसका मतलब बचपन और बुढ़ापा ज्यादा खुशीदायक होता है, अगर जीवन की स्थिति सही हो। खुशी का ग्राफ युवा अवस्था और अधेड़ अवस्था में कमजोर रहता है, शायद इसलिए कि ये जिम्मेदारियां निभाने का समय होता है। पर जब भारतीय परिवेश के अंतर्गत हम सोचे तो इस तरह के सिद्धान्त को पूर्णता से नहीं स्वीकार किया जा सकता क्योंकि आर्थिक असमानता के कारण बचपन को शुरु से ही संघर्ष बोध होना शुरु हो जाता है। हालांकि जीवन पर शोध करने वालों का यह तथ्य काफी सही है कि संघर्ष की अवधि 20 वर्ष से 50 वर्ष तक कई जिम्मेदारियों को स्वीकार करती है, अतः खुशियों का अनुभव कम होता है। 50 वर्ष के बाद जीवन को कुछ राहत जरुर मिलती है क्योंकि जिम्मेदारियों से भी राहत मिलनी शुरु हो सकती है और जीवन भी अनुभवि हो जाता है।

तथ्य हालांकि अलग अलग जिंदगी के अनुसार ही तय किये जाय तो जीवन में खुशियों का आधार युवा अवस्था में भी कम नहीं होता क्योंकि शरीर, मन मिलकर जब भी कुछ प्राप्त करने का प्रयास करते है तो ऊर्जात्मक हो जाते है, और हर आनन्द ऊर्जा में निहित रहता है। फिर भी जिंदगी तो स्थितियों के अनुसार ज्यादा खुशियों का वरण करना पसन्द करती है और उसके अनुसार जो माहौल मिल जाये तो उसकी सकारत्मक्ता क्षमता निरन्तर खुशियों का आनन्द उठा सकती है। कुछ तथ्य है, जिन पर चिंतन करना सही लगता है, हम यहां कुछ अति मुख्य तत्व पर कुछ अनुसन्धान करने की चेष्टा करते है, जिनके कारण जीवन आज का तनाव भोग रहा है।

आपसी सम्बन्ध:

जिस तत्व का खुशी निर्माण सबसे ज्यादा सहयोग वो है मानव के आपसी सम्बन्ध जिन्हें हम कई तरह के बन्धनों और रिश्तों के तहत निभाते है। Harved Study of Adult Development ने तीन बातों को ‘सम्बंधों’ से प्राप्त होने वाली खुशियों के तहत जिक्र किया है।

1. सामाजिक सम्बन्ध खुशियां प्राप्त करनें का अच्छा स्त्रोत है।
2. अकेलापन खुशियों का एक नम्बर दुश्मन है।
3. सबसे महत्वपूर्ण है कि अनगनित सम्बंधों का स्वार्थ भरा जाल। पर सच्चाई यह है, ‘वही सम्बन्ध खुशियों को सार्थकता दे सकता है, जिनमे आपस में विश्वासनिय का अतुलनीय संगम हो’।

जीवन में दुःख की कल्पना कोई भी नहीं करता फिर भी दुःख कहीं न कहीं से आ जाता, सुख की कल्पना सभी करते है, परन्तु सुख कल्पनामयी होकर भी अनिश्चित होता है, यह एक सही तथ्य है।

सही श्रम का सही कर्म की प्रधानता:।

आंतरिक खुशियों का निर्माण जीवन को कर्म व सत्य श्रम प्रदान समय के उपयोग से होना काफी सहज कहा जा सकता है। अनुसन्धानकर्ताओं के अनुसार परिश्रम करने से खुशियों के अलावा आत्म-सन्तुष्टि का अनुभव भी जीवन को हो सकता है, जो बेमिशाल होता है। ओक्सवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर Jan-Emmanuel De Neve के अनुसार जीवन में कर्म व समय सन्तुलित उपयोग घर और कार्यक्षेत्र में करने की कुशलता को अर्जित कर आप सहजता से आनन्दमय जीवन जी कर खुश रह सकते है। हकीकत यह है हम अपनी तकनीकी कार्यकुशलता तो बढ़ा लेते है पर जब सवाल पारिवारिक जीवन का आता है, तो हम अपने कमजोर नजरिये के कारण जीवन को अनचाहा तनाव दे जाते है।
हमारी जीवन की डलिया खुशियों के फूलों की कमी महसूस न करे, इसलिए हमें खुश रहने वाले नुस्खों पर गौर करना चाहिए।

सामाजिक पर्यावरण :

स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रायः अपने मरीजों को कहते है, किसी भी बिमारी से आप तभी सफल संघर्ष कर सकते जब आप स्वयं को ज्यादा से ज्यादा खुश और तनाव रहित रह सकेंगे। सबसे कठिन परिस्थिति का अनुभव इस सन्दर्भ में आज की लाइफ स्टाईल है, ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि सब कुछ पास रहते हुए भी आदमी आज अकेला हो रहा है। सिर्फ स्वयं को समर्पित और स्वार्थ की अधीनता को स्वीकार करने वाले के पास इससे ज्यादा और होगा भी क्या ? जो अपने लिए ही सिर्फ जीना चाहते है, उन्हें एक दिन जड़ से अलग होना ही पड़ता है। फूल के रंग से ज्यादा उसकी महक ही जीवन को प्रसन्नता दे सकती है। अगर हमें खुशी और प्रसन्ता की सही चाहत है, तो हमें कभी नहीं भूलना चाहिए जीवन में समय और संस्कृति का समन्वय रहना नितांत जरूरी है।अगर हम अपने भारत की बात करे तो आप निश्चिन्त ही मानेगे की कभी हमारे यहां संयुक्त परिवार प्रथा का संस्कारयुक्त वातावरण था, जिसमे अपनापन ज्यादा झलकता था, जो आज नदारद हो रहा है या हो गया है। इसकी कार्य प्रणाली में जो प्रमुख तत्व था वो था “एक की खुशी सभी की ख़ुशी”। आज की रूपरेखा जीवन की “मैं खुश सब खुश”। नतीजा न हम खुश न तुम खुश।

ये लेख किसी भी जीवन सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है, परन्तु सच्चाई को हम नजरअंदाज कर दे, ये भी गलत होगा। अतः सही प्रसन्नता के संस्कारिक तत्व है उन्हें हम अगर स्वीकार करते है, तो निश्चित है, हम कुछ खो नहीं रहे सिर्फ उस सच्चाई का दामन थाम रहे है जिसे हम आज की जीवन शैली के कारण कई मटमैले रंग दे चुके है।
आधुनिक शिक्षा को ज्यादा महत्व देने से पूर्व हमें प्रसिद्ध शतरंज के खिलाड़ी के इस कथन पर एक विशेष नहीं तो एक सरसरी नजर जरूर डालनी चाहिए, ” GENIUSES HAVE VERY LIMITED TOOLS SETS. THEY HAVE A HAMMER, AND THEIR GENIUS IS IN LOOKING FOR NAILS” …ADAM ROBINSON

लेखक* कमल भंसाली*

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“आशीर्वाद ” अमृतमय ऊर्जा प्रदाता■■■कमल भंसाली■■■

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“आशीर्वाद” एक ऐसा अमृतमय शब्द है, जिसकी चाहत हर कोई इंसान अपने जीवन की शुभता के लिए करता है। इस शब्द की सबसे प्रमुख विशेषता है, कि ये किसी भी मानवीय सीमा रेखा से बंधा नहीं रहता। इस शब्द को मानो कोई अमृतमय वरदान मिला है, इसका विरोध कोई भी जाति, धर्म, परिवेश, क्षेत्र, समाज और भूमिमण्डल का कोई देश नहीं करता है। ऐसा क्या है, आशीर्वाद में और क्यों इसे हम इसे जीवन पूरक तत्व के अंतर्गत लेते है, जरा इसका अध्ययन करने की कोशिश करते है। इसकी सम्पूर्ण विवेचना करना किसी के भी वश की बात नहीं है, अगर आपके पास इस लेख के अलावा भी कोई जानकारी है, तो उसे इसमे सम्मलित समझ कर ही इसे पढ़ने की चेष्टा करे।

आशीर्वाद शब्द की अगर हम सबसे पहले विवेचना करे, तो शायद हमारी सही शुरुआत हो, इसलिए हम यहीं से प्रारम्भ करते है। आशीर्वाद यानी आशीष या असीस, ये तो हुआ इसका शाब्दिक अर्थ, परन्तु ये उन शुभ विचारा से जुड़ा है, जिनसे हम दूसरों से कुछ आत्मिक प्रोहत्सान लेते है, या किसी को देते है। इसकी विवेचना भी हम जरुर करेंगे, पर धीरे धीरे। सबसे पहले हमें ये जानकार आश्चर्य हो सकता है, कि ” आशीर्वाद” एक अकेला शब्द है, इसके समकक्ष कई और शब्द हो सकते है। परन्तु यह जान कर जरा हैरानी हो सकती है कि इसका कोई पर्यायवाची और विलोम शब्द नहीं होता है। अतः इसकी शुभता पर हमारी कभी कोई शंका नहीं होनी चाहिये। चूँकि इस शब्द की पवित्रता पर कोई सवाल नहीं है, अतः आशीर्वाद हर देश में प्रयोग दैनिक जीवन में कई बार किया जाता है। हालांकि हमारा मोह अंग्रेजी भाषा से, अपनी धरोहर भाषा से ज्यादा है, परन्तु “आशीर्वाद ” हम ज्यादातर अपनी ही भाषा में देते है।

आशीर्वाद की कई विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है, कि यह सिर्फ हमें उम्र से बड़ों से मिलता है, सिर्फ गुरु ही एक इसका अपवाद है, जो हमसे ज्ञान में बड़े होते है, इसे हम उनसे भी ले सकते है,। आशीर्वाद है, ही ऐसा है, जिसकी शुद्धता पर हम कोई प्रश्न नहीं कर सकते। आशीर्वाद सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है, इसमे देनेवाले की आत्मा की पवित्र ऊर्जा भी होती है, जो लेनेवाले के भाग्य के नवनिर्माण में सहयोग करती है। आशीर्वाद का भारतीय संस्कृति में सबसे उच्च स्थान हासिल है, इसलिये जन्म से ही बच्चे को आशीर्वाद देना शुरु हो जाता है और बचपन से उसे प्रणाम करने की आदत डाली जाती है, जिससे उसे आशीर्वाद मिलता रहे और उसका जीवनपथ आसान हो जाए। हमारे यहां बड़े बुजर्गो और गुरु के आशीर्वाद का बहुत महत्व है। भगवान को हम सब किसी ने किसी रुप में अपना जीवन ईष्ट मानते है, और उनके आशीर्वाद के लिए लम्बी लाईनो में खड़े होते है। परन्तु हमारी संस्कृति में गुरु महिमा को अम्परम्पार माना गया है, क्योंकि वो ही उस तक के वापसी सफर का सही रास्ता दिखाने की कोशिश करते है,अतः गुरु का दर्जा काफी उच्चस्थान पर है। हकीकत में सही भी लगता है, क्योंकि बिन गुरु ज्ञान पाना आसान नहीं होता और बिना ज्ञान का जीवन, “जीवन” नहीं कहलाता। इस सन्दर्भ में महान संत कबीरदास का जिक्र करना सही होगा, उन्होंने कहा ” गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पॉय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय”। पर क्या आज के युग में गुरु के प्रति इस दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है ? यह एक चिंतन की बात है, जिसका जबाब आज के आर्थिक युग में तलाशना व्यर्थ होगा। आज हमलोगों को ज्ञान की नहीं जीवन तकनीक की जरुरत ज्यादा है, और तकनीक खरीदी जाती है। अतः जिसकी कीमत तय हो, वो कीमती जरुर कहला सकती है, पर वह विशिष्ट नहीं हो सकती, यह भी तय है। विशिष्ट बिना “श्रद्धा” का पैदा होना, वो भी आत्मा में, कठिन काम है।

आशीर्वाद को अंग्रेजी में BENEDICTION कहते है, इसे इंग्लिश में और भी कई शब्दों में लोग व्यक्त करते है, उसमे bless (noun), Wish ( Verb), Valedictory (Adjective) परन्तु ये सहयोगी शब्द है, पर्याय नहीं। हिंदी में आशीर्वाद का संक्षिप्त अर्थ किसी की मंगलकामनाओं के लिये बडों की ओर से कहे हुए शुभ वचन समझना ही सही होगा। चूँकि हमारा लक्ष्य इसके महत्व को जानना ज्यादा है, और आशीर्वाद का अर्थ हमारे दिमाग में बचपन से सही समाया हुआ है। हम अब जरा आगे बढ़ने की सोचते है।

हमारे जीवन को जो सबसे पहला आशीर्वाद मिलता है, “वो” ही देता है, जिसने इस धरा के लिए हमें निर्माण कर भेजा है। हमें भी उसका तहदिल से शुक्रगुजार होना चाहिए, और उसकी पवित्रता का आभास करने के लिए रोज उसका नमन करना चाहिए। माँ ही वो देवी है, जो हमें पनपने के लिए नौ महीने अपनी देह में जगह ही नहीं प्यार भरा आशीर्वाद, “स्वयं” बिन मांगे देती रहती और सभी से हमारे कोख में सलामती, और सही जन्म के लिए दूसरों से आशीर्वाद लेती। जिस घर में प्रेम का आँगन होता है, वहा परिवार का हर सदस्य जैसे दादा, दादी, बड़े बुजर्ग सदस्य हमें जन्मते ही आशीर्वाद देना शुरु कर देते है, हकीकत यहीं है, इस प्यार से ही हमारी जीवन समझ शुरु होती है। ध्यान देने की बात है, जन्म तक हमे कितने बिन मांगे आशीर्वाद हमे मिलते है, पता नही हम बड़े होकर उनका मूल्य क्यों नही समझ पाते। पिता और गुरु का आशीर्वाद सहजता से प्राप्त होना थोड़ा मुश्किल होता है, क्योंकि ये जीवन संस्थापक की भूमिका करते है, और इनसे कटु अनुभव प्राप्त होते है,,जो जीवन को आगे सहज और सरल करने में श्रेष्ठ होते है। इनके प्रति अगर आस्था हमारी नहीं हो तो निश्चित है, यह व्यवहारिक आशीर्वाद दे देंगे, परन्तु आत्मिक नहीं और उसके बिना सही ज्ञान मिलना मुश्किल काम है। इन दोनों रिश्तों को चाहिए, नम्रता और आज्ञा पालन और दोनों जरुरी है, सही, सुंदर और समृद्धिमय जीवन के लिए। जिनको आशीर्वाद की कीमत में आस्था नहीं होती उनके लिए यह सम्बन्ध कमजोर होते है, और उनको कोई विशेष उन्नतमय जीवन हासिल भी नहीं होता, यह तथ्य है, स्वीकार या अस्वीकार की इसमे कोई भूमिका नहीं है।

आशीर्वाद एक ऊर्जा है, इसका संचालित अनुभव हमारी आत्मा करती है। तथ्य यही कहते है, अगर हमारी आस्था इससे जुडी होती है, तो सुखद परिणामों की प्रतीक्षा ज्यादा दिन नहीं करनी पड़ती। किसी विशेष प्रयोजन या उद्धेश्य के लिए चाहा गया आशीर्वाद प्रयास में मृदुलता जरुर करता है, हालांकि परिणाम तो वक्त की मेहरवानी और अपनी सक्षमता पर निर्भर होता है। आशीर्वाद को कभी भी प्राप्त वरदान नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये मनुष्य की क्षमता के बाहर है। फिर भी , राजा महाराजा क्या देवताओं तक इसकी महिमा है। आशीर्वाद के परिणाम गौण जरुर रहते है, पर शुभता में इसका होना तय है। नम्रता से अगर दुश्मन से भी आशीर्वाद लिया जाय तो वो भी इंकार नहीं करते। इसका उदाहरण महाभारत के उस प्रकरण में हमें नजर आ सकता है, जब अर्जुन भीष्म पिता से आशीर्वाद उसी युद्ध की विजय के लिए मांगते है, जिसमे वो अर्जुन के विरुद्ध युद्ध करनेवाली सेना के सेनापति थे। परन्तु आज हम यह नहीं कह सकते कि ऐसी परिस्थितयों में ऐसा आशीर्वाद मिलेगा, इसका एक ही कारण है, हमारे जीवन से नैतिकता का गायब हो जाना।

आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए हमें नम्र बनकर प्रणाम और प्रार्थना दोनों की जरुरत होती है। जब हम अपने इष्ट से आशीर्वाद लेना हो तो आत्मा की पवित्रता जरुरी होती है, उसी पवित्रता से हमको प्रार्थना और प्रणाम के स्वरुप जो आशीर्वाद मिलेगा, वो हमें सकारत्मक बनाकर किसी भी क्षेत्र की सफलता की तरफ निश्चिंत आयाम जरुर प्रदान कर देगा। बड़ों से आशीर्वाद पाने के लिए हमेंअभिमान को दरकिनार करना होगा,और सम्मान सहित उनके चरणों को छूना होगा। कई वार हमारे हाथ उनके चरणों तक नहीं पहुंचते आधी दूर ही रहते, किसी भी कारण से, तब शायद इससे वो परिणाम नहीं प्राप्त हो सकते, जिनका पाना हमारा लक्ष्य था।

अंततः यह जानना भी उचित ही होगा, कि शुभकामना, मंगलकामना, भी जीवन उपयोगी है, अगर किसी की आत्मा की गहराई से आती हो पर ऐसा होना हर समय संभव नहीं होता क्यों कि ज्यादातर हम इनका व्यवहारिक प्रयोग ही करते है। मजबूरी है, मिलती है, तो कह देते है, अर्थ की दुनिया में आखिर दिखावटी सम्बंध भी तो कोई चीज है।…….कमल भंसाली

परिवार…बिखरता दर्द ..भाग 4….सन्त्रास और भ्रमित जीवन

आज का युग साधारण आदमी के लिए कोई मायना नहीं रखता। शिष्टता की जगह विशिष्टता का महत्व बढ़ गया है। समय अपनी गति के साथ रंग बदलता रहता है, यह आदमी की मजबूरी है, कि समय के अनुरुप वो अपनी जीवन शैली को परिवर्तित करता रहे। पहले एक सीधा सादा आदमी अपना जीवन सही नैतिकता के आधार पर चला सकता था, उसके गुण उसे इज्जत की रोटी के लिए भटकने नहीं देते थे। इतिहास के कई पन्नों में हमें बहुत सी ऐसी घटनाओं का जिक्र मिलेगा, जहां इंसान को अपनी सच्चाई और ईमानदारी के कारण उच्च श्रेणियों की जिम्मेदारियां मिली, और उन्हें सब तरह कि सुविधाएं दी गई। आज स्थिति बदल गई, सच्चाई और ईमानदारी की चाहत कम हो गई, सम्बन्ध और व्यापार दोनों में नैतिक कोई जिम्मेदारी वो नहीं निभाना चाहता, पर सवाल एक ही है, क्या बिना नैतिक गुणों के इंसान अपनी क्षमताओं का विकास उस स्तर तक कर सकता है, जहां उसकी काबिलियत की पहचान हो सके ? इस तथागत प्रश्न का उत्तर मेरे अनुसार यही होगा कि बिना मानवीय गुणों के ऐसा कोई चमत्कार होना मुश्किल है, चाहें इन गुणों की तादाद कम ही क्यों न हो या जन्म से ही विरासत में प्राप्त किये गए हो। आप बुद्धिमान है, आप जीवन के किसी विशिष्ठ क्षेत्र में काफी कुछ हासिल करना चाहते है, तो जान लीजिये, कुछ श्रेष्ठ नैतिक गुण आप में होनें निहायत ही जरूरी है। मैं नहीं समझता मेरे लिए यह बताना जरुरी होगा की बहुमूल्य हीरे को भी आकर्षक आंकलन के लिए किसी कीमती धातु में जड़ना पड़ता है। यही बात हर प्राणी के लिए जरूरी है, कि अपने व्यक्तित्व को अगर आकर्षक करना है, तो कुछ नैतिक गुणों का उसे विकास करना ही पड़ेगा।

प्रकृति का विधान है, प्राण का आधार स्पंदन है, चाहे दिल हो या दिमाग, दोनों की कार्यशैली काफी कुछ इस पर निर्भर है। स्पंदन, दिल और दिमाग दोनों का रुकने से जीवन को खतरा हो जाता है। हमारी सामाजिक स्थिति भी कुछ इसी बुनियाद पर तैयार की गई है, जहां हमारी इंसानियत के अनुरूप हमे सम्मान और इज्जत मिलती है, बिना सम्मान की नकारत्मक जिंदगी खोखली और अस्तित्वहीन सी होती है। कहीं न कहीं यह गलतफहमी इंसान के दिमाग में घुसी रहती है, कि दौलत होने से उसे सम्मान मिलेगा, भूल जाता है, कि यह सम्मान उसे नहीं दौलत को मिल रहा है, दौलत गई, सम्मान गया। पर, नैतिक गुणों के मामले में ऐसा होना कतई संभव नहीं लगता, क्योंकि यह गुण हमारा कभी साथ नहीं छोड़ पाते, यह सब हमारे स्पंदन में समाहित हो जाते है। एक पूर्ण सत्य बोलनेवाला इंसान कठिन से कठिन परिस्थिति में झूठ नहीं बोलता, इसका उदाहरण राजा हरिश्चंद्र है, जिनका नाम आज भी लोग याद करते है, सत्य और राजा हरिश्चंद्र को लोग बहुत बार पर्याय के रुप में प्रयोग करते है।

इस लेख का उद्देश्य किसी भी आर्थिक सफलता को कम नहीं आंकना है, अपितु ऐसे व्यक्तित्व में ऐसे गुणों कों समाहित करने का आग्रह है, जिससे से समाज और देश में सभी वर्गो के लिए एक शुभ संस्कृति का उदय हो सके, तथा हर एक का जीवन सुखद और शांतिमय हो सके। आधुनिक युग ने दो बातों को पूर्ण सार्थकता दी, एक शिक्षा और दूसरी आर्थिक चेतना, इससे यह फायदा हुआ आदमी को नए नए साधन मिले और काम के प्रति लोगों का लगाव भी बढ़ा। अर्थ का काफी हद तक विकेन्द्रीयकरण भी हुआ, पैसा आज कब, कैसे और कहां पैदा हो सकता है, समझा जा सकता है। यहां तक तो सब ठीक ही लगता है, पर इसका दूसरा पहलू भी है, जिससे सामाजिक सुरक्षा काफी प्रभावित हुई है, वो हमारी रोज की चिंता बन गई है। शिक्षा बिना संस्कारों की तथा धन की अधिकता का लालच को बढ़ाना कहीं ने कहीं हमें आक्रांत कर रहा है, इसे समझना होगा तथा मानवीय गुणों को दैनिक जीवन में पर्याप्त स्थान देना होगा, तभी स्वच्छ देश और समाज का विकास हो सकेगा।

सवाल फिर यही खड़ा होता है, ऐसा आज के युग में कैसे यह संभव हो सकता है, इसका एक ही संभावित उत्तर जो नजर में आता है, वो है, संयुक्त परिवार। विगत को अगर टटोला जाय तो इतिहास गवाही दे सकता है, कि परिवार संस्कार निर्माण का एक समुचित सम्पन्न कारखाना रहा। आज इसकी मशीनों के जंग लग रहा है, बिना उपयोग के अनुभव की शानदार प्रणाली खत्म की जा रही है। यह मशीने और कोई नहीं हमारे माता, पिता, गुरु,और बुजुर्ग है, जिन्हें उपेक्षित कर आज का युवक अर्थ के सुनियोजित जाल में फंस रहा है, और हर तरह की सुविधाओं के होते हुए भी सन्त्रास का शिकार हो रहा है। बड़ी विडम्बना है, जिन्होंने जिस जिंदगी को अंगुली पकड़ कर भविष्य के साथ सन्तान को खड़ा होना तथा चलना सिखाया, वो उपेक्षा का शिकार हो रहे है। आखिर वो क्यों उपेक्षित किये जा रहे तो दिमाग में एक ही उत्तर आता है, स्वतन्त्रता और अर्थ की अधिकता ने संस्कारो को बदनाम कर दिया। लगता है, उन्होंने नई पीढ़ी को दिशा भ्रमित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पुरानी पीढ़ी और आज के युवकों के मध्यम में एक रेखा जो उन्हें विभाजित करती है, वो है, अनुशासन और संयम। आज का युवक यह बात सहजता से नहीं ले रहा है, कि जिंदगी के कुछ अपने उसूल होते है, वो इन्सान की अति स्वतन्त्रता और अधिक साधनों का प्रयोग सहज नहीं लेती। रुपयों के लिए क्षमता से अधिक काम, खानेपीने के लिये निश्चित समय नहीं होना, घर के पौष्टिक खाने का अभाव, परिवार और समाज से कट कर रहना, शरीर से ज्यादा दिमाग पर बोझ, आदि कई कारण है, जो आज की पीढ़ी को समय से पहले बुढ़ापे की तरफ धकेल रहे है। इन सब समस्याओं का समाधान जो नजर आता है, वो है, सयुंक्त परिवार !

कुछ लोग मेरे इस प्रयास पर हंस सकते है, आधुनिक युग, फिर सयुंक्त परिवार ? बात समझ के परे है ! उन सब को मैं नम्रता से आग्रह करता हूं, मैं समाज सुधारक नहीं हूं, जो अपने दृष्टिकोण पर उनकी सहमति चाहू, न हीं कोई भविष्य दृष्टा, परन्तु इतिहास कहता है, सच कभी बोझिल हो सकता है, पर एक दिन अपना विस्तृत रुप लेकर जब वापस आता है, तो अस्वीकार करने की क्षमता किसी में नहीं होती। गौर कीजिये, हम किस सत्य से कितने दूर जा सकते है ? क्या हम अपने जीवन को निश्चित अवधिमय बना सकते है ?क्या हम किसी दुर्घटना से बच सकते है ? क्या रुपया से इंसान की दूसरों से शरीर की सेवापूर्ति की जा सकती है ? क्या हम कभी बूढ़े नहीं होंगे ? क्या एक दिन हमे भी बीती हुई पीढ़ी करार नहीं दिया जाएगा ? ऐसे सभी प्रकार के अन्यवासक परन्तु सत्य से सम्पन प्रश्नों का एक ही उत्तर हो सकता है, परिवार साथ में है, तो इन सब समस्याओं में कुछ सुकून मिल सकता है।

परिवार अगर आस्थाओं और अनुशासित हो, तो एक सुंदर भविष्य की कल्पना सार्थक हो सकती है। यह अब भी सोभाग्य की बात है, कि भारतीय परिवेश खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ऐसे परिवार है, जो संगठन में विश्वास रखते है,और एक ही पीढ़ी के अनेक परिवार अलग होते हुए भी ख़ास मौके पर एक हो जाते है, तथा परिवार के बुजर्ग सदस्यों की राय को पूर्ण सम्मान देने की कोशिश करते है। अभी हाल में कुछ ऐसे ग्रामीण परिवारों ने अपने से कम आर्थिक सम्पन पारिवारिक सक्षम बच्चों को उच्चतम शिक्षा में योगदान किया, कि परिवार रहते बच्चे किसी संस्था के सहयोग के मोहताज क्यों बने। भारत ने सदा संस्कारित व्यक्तित्व संसार को दिए है, और यह तय है, ये संस्कार उन्हें परिवार से ही मिले है।

समय बड़ा विचित्र होता है, यह विभिन्न रंगों से हर प्राणी की दुनिया सजाता है, परन्तु मानव अपनी समझ से कभी कभी उसके इन रंगों की वास्तिविकता को नजर अंदाज करने की चेष्टा करता है, या उन रंगों का अपने जीवन में अधिक प्रयोग करता है। प्रेम और स्नेह दो रंग ऐसे है, जिनकी गुणवत्ता के लिए सत्य व संयम का सादा रंग जरुरी होता है। इसकी घटवट से जीवन प्रभावित होता है। परिवार की शोभा सादगी से बढ़ती है, जो आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी है, अतः आज हर आदमी अपने आप से ज्यादा दुखी है।

परिवार……बिखरता दर्द……भाग 3………..कमल भंसाली

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आज जो संसार का स्वरुप है, उसकी उन्नति में परिवार की भूमिका को नकारना सहज नहीं है। यह विडम्बना आज के स्वरुप की होगी कि आनेवाले समय में सबकुछ होते हुए भी परिवार में, अटूट स्नेह और प्रेम नहीं होगा, अगर हालात इसी गलत दिशा की तरफ मुड़ रहे है, तो निसन्देह मानवता को अपने अस्तित्व के प्रति गंभीर चिंतन की जरुरत है । समय के तीन भाग होते है, यह हम सभी जानते है, वर्तमान, भूतकाल और भविष्य और शायद इनका निर्माण भी बड़ी शालीनता से इंसान को अपनी गलतियों को सुधारने और उसके अनुरुप जीवन को बेहतर और शांत बनाने के लिए किया गया है। समय के मामले में हर इंसान को अपनी भूमिका स्वयं समझनी होती है, अनिश्चित भविष्य उसे बुद्धिमान बनाना चाहता है, बिता हुआ समय उसे समझदार बनाना चाहता है। पर हकीकत कुछ और ही आभाष देती है, समय के प्रति लापरवाही इंसानी फितरत नजर आती है। परिवार शब्द की अगर कोई विशेषताओं पर आत्मिक ज्ञान से अनुसंधान करें तो उसे अपने जीवन की सफलताओं में परिवार की समयानुसार भूमिका में उसके समय की बचत का अनुभव किया जा सकता है। दैनिक जीवन की कई आवश्यकताओं की पूर्ति जब परिवार करता है, तो सोचिये आपकी सफलताओं और आपकी प्रसिद्धि में परिवार कितना उपयोगी है ? आज उसी परिवार की अनदेखी अपनी स्वार्थपूर्ण महत्वकांक्षाओं के कारण जब कोई करता है, तो तय है, उसका सफलता का सफर थोड़े दिनों बाद गुमनामी और स्त्रांश का शिकार होनेवाला है।

आखिर, आज परिवार जो सदियों से अपनी भूमिका सही ढंग से निभा रहा था, उसे किसने बीमार किया और कौन कौन से विषैले कीटाणुओं से त्रस्त वो हुआ ? इसी सन्दर्भ में हम अपना चिंतन गतिमय करे तो यथार्थ यही कहेगा, आपसी अपनत्व और प्रेम जो परिवार की रीढ़ की हड्डी का काम करते थे, वो स्वार्थ और अंहकार के कीटाणुओं से ग्रसित हो गए, और परिवार लकवे की गंभीर बीमारी का शिकार हो निष्क्रिय जीवन निभा रहा है। आइये, एक नजर से, आज के सन्दर्भ में परिवार को बीमार करने वाली हमारी सोच पर कुछ शुद्ध आत्मिक चिंतन कर, अपने आप को शिक्षित बनाने की चेष्टा करे।

अंहकार और अभिमान…..

किसी भी परिवार की शालीनता इन दोनों की मात्रा और आकृति पर निर्भर करती है। ये दोनों तत्व अपना अस्तित्व बोध हर कर्म में कराना चाहते है, मात्रा की अधिकता बिना इनका ज्यादा असर परिवार की शालीनता पर नगण्य ही होता है। पर किसी कारण किसी भी सदस्य में जब इसका अनुपात बढ़ जाता है, तो शालीनता में कमी आ जाना स्वभाविक ही होता है। आजतक परिवारों में इसका इलाज नम्रता के उपदेश से किया जाता था। घर का धार्मिक वातावरण में नम्रता की कभी कमी नहीं होती थी। आधुनिक युग ने घर से धर्म को उठाकर सार्वजनिक जगह पर एक कार्निवल का रुप दे दिया। आज धर्म की चर्चा और उपासना दैनिक जीवन में परिवार के भीतर कम नजर आने लगी, उसकी जगह आपसी तनाव का वातावरण नजर आने लगा। शिक्षा में नैतिक अंश की कमी का होना भी परिवार के लिए भारी पड़ रहा है। घर का स्वामी अनुशासनहीनता को संयमित करने में अक्षम हो रहा है, उसकी विचार धाराओं को सब समय नकारा जाता है। उसकी मजबूरी यही होती है, कि वो परिवार को सिर्फ आर्थिक सम्पन्नता से ही नहीं संस्कारों और आपसी प्रेम से सक्षम करना चाहता है। यह सही है, की उसका चिंतन आज की जीवन शैली के कुछ विपरीत हों पर असली जीवन का मूल्यांकन सदस्यों को भी नहीं भूलना चाहिए।

अंहकार, कभी भी इंसानी भावनाओं पर आक्रमण कर सकता है, उसकी फितरत भी यहीं है, किसी एक सफलता पर यह इंसानी मस्तिष्क में प्रवेश करने की चेष्टा करता है, और परिवार में विद्रोह की भूमिका बनाना शुरु कर देता है। नम्रता की भावना अगर परिपूर्ण है, तो निश्चित है, यह कुछ भी नुकसान नहीं कर पाता। इसलिए परिवार में नम्रता का वातावरण बना रहना चाहिए, जो काफी मुश्किल है। परिवार की बदलती स्थिति जहां सदस्य अलग अलग जगह रहते है, उन का सन्तुलन सही रहना, वर्तमान में परिवारों के सामने चुनौती ही है, इस से इंकार करना असंभव लग रहा है। कहते है, जिस परिवार में हंसी का वातावरण होता है, वहां अंहकार अदृश्य रहता है, तथा कम नुकसान दायक होता है।

अंहकार की लाचारी यही है, वो कभी अदृश्य नहीं रह सकता, अत: उसका प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ना लाजमी है। परिवार का हर रिश्ता परिवार की गरिमा होता है, उसे कभी जब इस पीड़ा से गुजरना पड़ता है, तो नकारत्मक ऊर्जा परिवार को बीमार करने में सफलता हासिल कर सकती है, और परिवार का मानसिक विघटन यहीं से शुरू हो जाता है। इस बीमारी का इलाज सहज और सरल है, अगर परिवार बिना तर्क के सभी सदस्यों के सुझाव को उचित स्थान दे और आपसी चिंतन में अगर प्रत्येक सदस्य बेखोप सम्मलित होता है, तो समझ लीजिये आप एक सही परिवार के सदस्य है।

अभिमान एक ऐसा तत्व है, जिसका महत्व दैनिक जीवन में नकारना गलत होगा, इसकी सिर्फ अधिकता से खतरा है। “हमें अपने देश पर अभिमान है”, “हमेंअपने परिवार पर अभिमान है” या, “हमें हमारे परिवार के अमुक सदस्य की सफलता पर अभिमान है” । कितने अच्छे लगते है, ह्रदय की गहराई से निकलते है, लाजमी है, प्रभाव भी चमत्कारी होते है। यहां संगठन की मजबूती तो सामने आती है, परन्तु अपनी सक्षमता का अहसास भी दूनिया की नजर से देखा जा सकता है, चाहे वो देश हो, समाज हो या फिर हमारा अपना परिवार। यह भी एक साक्ष्य है, बिना किसी एक विशिष्ठता के अभिमान करना हास्यपूर्ण ही होगा। गौर कीजिये, ” सन्तानो से परिवार बनता, परिवार से समाज और कई रूपांतरों के समावेश से देश बनता तो फिर परिवार अपने योगदान पर गर्व कैसे नहीं करेगा”। एक सही मजबूत परिवार ही देश को सच्चा सैनिक दे सकता है, जिससे हम सुरक्षित रहते है। जरा गौर कीजिये, परिवार के लिए अपने योगदान पर। हमारा सही दृष्टिकोण जीवन में यही हो, हम अंहकार को परिवार के वातावरण से दूर रखकर एक सक्षम परिवार के सदस्य होने का गौरव प्राप्त करने की चेष्टा करेंगे, जिससे हम अपने परिवार, समाज और देश पर सही अभिमान कर सके।…..क्रमश

परिवार…बिखरता दर्द.. भाग…2…कमल भंसाली

परिवार व्यक्तित्व निर्माण में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है, इस तथ्य पर वैसे तो कोई शंका का कारण नजर नहीं आता फिर भी निवारण के लिए इतना कहना जरुरी है, कि संसार की महान से महान विभूतियों ने स्वीकार किया है, कि उनकी सफलता में परिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शालीनता का अगर कोई स्कूल है, तो मेरी नजर में परिवार ही है। परिवार आज भी है, पहले भी था और शायद आगे भी रहे, परन्तु क्या परिवार की गरिमा पहले जैसी है, यह चिंतन की बात है, इस पर हमे गंभीरता से विचार करना चाहिए। आखिर एक स्वच्छ और शालीन परिवार कैसे बनता है ? आइये, थोड़ी चेष्टा करते है, समझने की, शायद भविष्य इसकी जरुरत समझे। पहले परिवार सिर्फ इसी नाम से जाना जाता था, सयुंक्त परिवार (Joint Family), बाद में अविष्कार हुआ, छोटा परिवार का (Nuclear Family), दोनों ही हमारी समझ और समय की देन है। परिवार शब्द की जब व्याख्या करे तो हमारे सामने दादा, दादी, माँ, बाप, भाई, बहन और भाभी के अलावा और भी रिश्तों का माहौल नजर आता है, जिन्होंने इस तरह के पुरे परिवार को कभी देखा, निश्चिन्त ही उन्होंने एक पूर्ण प्रेम भरे वातावरण का सुखद अनुभव किया होगा। क्या सब परिवारों में शांति, प्रेम और भाईचारा रहना संभव है ? इस प्रश्न का उत्तर भी सहजता से दिया जा सकता है, जिस परिवार में अनुशासन और त्याग की भावना रहती है, वैसे परिवार प्राय: सुख का अहसास करते है, दुःख की आद्रता इन्हे कमजोर नहीं करती। हमारे हाल ही में हुए दिंवगत भूतपूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक A.P.J Abdul Kalam के अनुसार “अगर कोईं राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त रखकर सुंदर बुद्धिमान राष्ट्र बनाना है, तो परिवार के तीन सदस्यों की अहम् भूमिका का आदर करना होगा, वो है, माता पिता और शिक्षक”। किसी भी राष्ट्र की समृद्धि में परिवार की भूमिका को छोटा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि परिवार बिना संस्कार और सेवा की भावना आना मुश्किल ही लगता है। देश को, समाज को, यहां तक की हर प्राणी को सेवा की जीवन के हर मोड़ पर जरुरत होती है, यह आप और हम अच्छी तरह जानते है।

भावनाओं के सन्दर्भ में परिवार काफी मजबूती प्रदान कर सकता है, अगर सदस्यों का आपसी तालमेल समझदारी पूर्ण हो, और एक दूसरे की कमियों को दूर करने में सहायक बने, तो निश्चित है, परिवार आर्थिक समृद्धि की नई ऊंचाइयां तो छुएगा, साथ में जीवन भी सही आनन्द प्राप्त करेगा। एक कहावत है, “एक अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता”, एकल परिवार के सीमित सदस्यों में एक प्रकार की घुटन अनुभव कई बार महसूस की जा सकती है, क्योंकि उनके पास जीवन का कमजोर अनुभव होता है। आखिर पुराने परिवार को टूट कर बिखरने की नौबत क्यों हुई, तो इस सन्दर्भ में सबसे प्रमुख कारण अति स्वतन्त्रता की चाह और नैतिकता का असन्तुलित होना है। नैतिकता बन्धन रखती है, और थोड़ा सा बन्धन भी आज असहाय लगता है। कुछ लोगो का चिंतन है कि “आर्थिक जरूरत की असीमित्ता और शिक्षा का प्रसार इसका कारण है”। मुझे लगता है, यह मन्तव्य पूर्ण सत्य नहीं है, अर्थ हर काल में प्रमुख रहा है, शिक्षा सदियों से पसन्द की जाती रही है, उसे जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। कमी तो अपनी आस्था में ही नजर आ रही है, इसका कारण भी सुविधाकारी जिंदगी और उसके लिए असत्य का भरपूर प्रयोग, सच तो यही होना चाहिए कि परिवार सत्यता की धरती पर ही फलताफूलता है, वरना नाम मात्र का परिवार होता है।

आज के वातावरण में जो परिवार अपनी क्षमता का सही प्रयोग करता है, वो देश काल में अपनी साख लम्बे समय तक कायम रख सकते है। हमारे देश में भी बहुत से परिवार है, जिनका नाम आज भी शान से लिया जाता है। भारत जातिवादी का देश रहा है, आज भी यहां जाति का ख्याल वैवाहिक सम्बंधों के समय पूरा रखा जाता है, इसका एक सही कारण यह है, कि धर्म, संस्कार के अनुरूप परिवार का वातावरण कायम रहे, हर सदस्य अपने आपको परिवार के वातावरण में सहज अनुभव करे। परन्तु अब यह ख्यालात बदल रहे है, नारी की भूमिका घरेलू कामकाज के प्रति कमजोर पड़ रही है। पहले नारी घर की आंतरिक व्यवस्था को सक्षमता प्रदान करती थी, पुरुष आर्थिक और सामाजिक सीमा का प्रहरी था। आज दोनों ही अर्थ की तलाश में भटक रहे है। शिक्षा जिसमे पहले नैतिकता का समावेश ज्यादा होता था, आज उसने दिमाग को सिर्फ एक ही काम में लगा दिया, अर्थ व नाम की अधिकता कैसे प्राप्त की जा सकती है। निश्चिन्त है, व्यक्तित्व तो कमजोर होना ही था, मानसिक रोगों की बढ़ती गति ने जीवन को अस्वस्थकारी और एकांगी कर दिया। अभिमान को पहले शान कहते थे, जो उनकी विशेष आदतो के रुप में सिर्फ परिवार के भीतर पनपता, उसमे परिवार के हर सदस्य अपनी विशेषता मानता। जैसे कोई परिवार में कोई सदस्य किसी के बड़े बूढ़े के सामने तर्क नहीं करता, तो यह उस परिवार की शालीनता भरी शान समझी जाती। कोई समय था, परिवारों की इज्जत के अनुसार नाई विवाह के सम्बन्ध तय करा देते, एक नारियल का आदान प्रदान ही सम्बन्ध की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त था। आखिर इतना विश्वास पहले कैसे था, जब इसका चिंतन करता हूं, तो गीता का यह श्लोक काफी कुछ स्पष्ट कर देता है।

नासतो विधते भावो नाभावो विधते सत:।
उभयोरपि दृष्टोSन्तस्त्वन्योस्तत्त्वदर्शिभिः ।।

श्लोक का सार संक्षेप यही कहता है, सत्य कभी बदलता नहीं, असत्य ही बदलता रहता है, फिर भी मनुष्य असत्य को ही ज्यादा अपनाता है, वो उसकी ही अधीनता स्वीकार करता है, उसके अनुसार असत्य के बिना काम चल नहीं सकता। पहले हर घर में सुबह की शुरुआत धार्मिक चेतना के अनुसार ही होती थी, और हर सदस्य को बोध रहता था, कि उसके आचरण से परिवार की गरिमा को ठेस न पँहुचे। आज यह सब बातें असत्य ही लगती है, क्योंकि विश्वास की कमी धीरे धीरे दैनिक जीवन में अग्रसर हो रहीं है। यथार्थ में यह आदमी के व्यक्तित्व की एक सबसे बड़ी कमजोरी, परिवार के साथ नहीं चलने से आती है।

ध्यान रहे, इस लेख का उद्धेश्य कतिपय नहीं है, कि पुरानी बातों का गुणगान किया जाय, हाँ यह जरुर प्रयास है, कि जीवन पुरानी अच्छी बातो का मूल्यांकन करता रहे,अपने व्यक्तित्व को प्रखर और उन्नतिमय करे, आखिर जीवन जीने के लिए हमें कुछ समय ही प्रदान किया गया है। जीवन अगर शिष्ट होकर, विशिष्ट बने, तो गलत क्या है ? आज सब कुछ पास होते हुए भी जब आदमी अपनी एक बचकानी हरकत से जीवन का जब गलत रुप समाज के सामने लाता है, तो दुःख का ही अनुभव होता है, कि भूल समय से पहले सुधरी क्यों नहीं ? काश, ऐसे जीवन के पास सुसंस्कृत परिवार का अनुभव होता, तो कोई इंद्राणी अपनी बेटी की अपने झूठ और गलत महत्वकांक्षाओं के लिए हत्या नहीं करती। आज के अनूसार, एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की यह घटना कई प्रश्नो का उत्तर अनुत्तरित ही रख रही है। कहते है, “बिना चिंतन का विकास, विनाश का प्रारम्भ भी हो सकता है”……कमल भंसाली ……क्रमश…

परिवार…बिखरता दर्द…..कमल भंसाली ….भाग 1

रिश्तों की दुनिया की अनेक विविधताएं है, रिश्तों के बिना न परिवार, न समाज, न देश की कल्पना की जा सकती है, कहने को तो यहां तक भी कहा जा सकता कि रिश्तों बिना जीवन कैसे जीया जा सकता है ? सवाल यही है, क्या आज भी रिश्तों की गरिमा के प्रति इन्सान की जागरुकता सही और उचित है ? मेरे अनुसार, हमारी रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता काफी कमजोर हुई है, इन वर्षो में, जब से हम आर्थिक चेतना का उपयोग दैनिक जीवन में ज्यादा करने लगे है। चलिए, अंतर्मन के किसी कोण से इस सवाल का उत्तर दीजिये, क्या आप वो ही आदर, सम्मान बुजर्गों और माँ बाप को देते है, जो वो आज से कुछ समय पहले हमसे भरपूर पाते थे ? जानता हूं, आप सत्य से आँख नहीं चुरा सकते। अगर आप फिर भी सहमत नहीं है, तो बता दीजिये आज बुजर्गो तथा माँ, बाप के साथ जो घटित घटनाओं का वर्णन समाचार पत्रो, टी. वी. तथा अन्य साधनों से हम तक पंहुचता है, वो सभी असत्य है ? याद कीजिये, कुछ सालो पहले के वो दिन, अगर आप इस सदी से पहले पैदा हुए हैं, तो आप को याद होगा, हमारा एक संयुक्त परिवार होता था, जिसे अब खोजना पड़ता है, उस समय क्या परिवार जिस शासन और अनुशासन व्यवस्था के अंतर्गत चलता था, क्या आज हम ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत अपना छोटा सा परिवार चला रहे है ? थोड़ी हिचकिचाहट का अनुभव, शायद हो रहा है, क्योंकि हम जानते है, कि आज परिवार शब्द एक उच्चारण मात्र रह गया है। हर सदस्य अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता का भरपूर उपयोग खुद के लिए कर रहा है। उसकी भावनाओं में परिवार के प्रति अपनत्व की भावना कमजोर होती दिख रही है। परिवार की मजबूरी है, खुली स्वतन्त्रता से सुखी नहीं रह सकता,उसे संस्कारों की भी जरुरत होती है। परिवार का बिखरने से हर एक प्रभावित हुआ है, हमे प्रेमयुक्त जो सुरक्षा मिलती उससे हम ही वंचित हुए है। इस में दोष हमारा ही है, परिवार की परम्परा को हम ने ही तोड़ा है। सवाल उठता है, परिवार क्यों बिखरते है, इसके दो प्रमुख कारण हो सकते है, आर्थिक समृद्धि और अति स्वतन्त्रता की चाह। पारिवारिक रिश्तों का सारा दरमदार आपसी सम्बन्धों की पारस्परिक व्यहारिकता से जुड़ा है।”रिश्ते या आपसी सम्बंधों में तनाव, शक और गलतफहमी के पेड़ की उपज होती है, और आदमी की समझ को जहरीला बनाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है। इस समझ के कारण परिवारों में राजनीति का प्रयोग होने लगा, परिवार टूट कर बिखरने शुरु हो गये है”। यह भी कई लोगों का विश्लेषण है, जो काफी हद तक सही है।

परिवार की भूमिका को आज हम भले ही हल्के से ले, पर इतिहास गवाह है, परिवार बिना संस्कार की खेती मुश्किल है। आज व्यवहार की दुनिया में बेहद तंगी का दौर चल रहा है, आदमी की गुणवता की कीमत, परख की मोहताज हो रही है। आपसी रिश्तों में मधुरता की तलाश करने पर ऊपरी सतह तक खोखली नजर आने लगी है। ऐसे में चिंता की बात यही है, कहीं हम नितांत अकेले होकर मानसिक अवसाद के शिकार न हो जाए। परिवार की खासकर संयुक्त परिवार की उपयोगिता आज भले ही कम समझ में आ रही है, परन्तु जिस दिन आदमी ऊपरी दिखावट का यथार्थ जान लेगा, तब उसे अपनी आर्थिक गुलामी का अफ़सोस जरुर होगा। मैं यहां कोई डर और भय का वातावरण नहीं तैयार कर रहा हूं, क्योंकि भय की शुरुवात तो होने लगी है, आदमी घर से अशांत होकर निकलता है, और जानता है, वो चलती सड़क पर ही नहीं, वो अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है। किसी तरह का घटनाक्रम घटने से शायद उसे सहारा देने वाला भी कोई नहीं मिले, यह जीवन की लाचारी नहीं तो क्या है ?

आज की विचारधारा ने अर्थ की मजबूती को ही जीवन की पूर्ण मजबूती समझ लिया है, इस समझ के अनुसार कोई भी ऐसा शारीरिक सुख नहीं है, जो अर्थ से खरीदा नहीं जा सकता। बेचारे मन को तो हमने सारे दिन साधनों की खरीद फरोख्त में लगा दिया, भला ऐसे में उसे आत्मिक आनन्द की तलाश का समय कहां मिलेगा ? मैंने ही नहीं, शायद आपने कभी अनुभव किया होगा कि घर में तमाम कीमती साज समान से सजे होने के बावजूद श्मशान जैसी वीरानी लिए हम रहतें है। वैसे ख़ौफ़ भरे वातावरण में घर में कामकरने वाले भी चलते फिरते रोबोट की तरह लगते है। एक बन्धी बंधाई जिंदगी, बिना किसी आत्मिक ख़ुशी के कब तक स्वस्थ रह सकेगी, यह एक ज्वलन्त प्रश्न है, इसका समाधान नहीं होने से मानसिक और शारीरिक रोगों से हमारा बचाव भाग्य पर ही निर्भर करता है। डॉक्टरों और चिकित्सकों की राय में ब्लड प्रेशर व डाईबिटिज मानसिक तनाव के सहयोग से शरीर के भीतर अपना अस्तित्व ढूंढते है। आखिर अकेला भ्रमित जीवन कहाँ से सही जीवन शैली अपनाये, कई मनोचिकित्सक तो यहां तक स्वीकार करते है, बिना बड़े बुजर्गो के परिवार गलत दिशा ले लेते है, और किसी भी संगीन परिस्थिति के सामने ऐसे परिवार घुटने टेक देते है,अपने जीवन के कदम आत्महत्या की ओर अग्रसर कर देते है। कहने में कोई सार नहीं कि पूरा परिवार अगर समाज से घुलमिल कर रहता, तो शायद ही ऐसी नौबत आये। हम कितना ही अपने आप को महत्व दे, पर परिवार के बिना जीवन की कल्पना करना सहज नहीं है। देखा गया कि बच्चे बड़े होने के बाद जब अपना परिवार तैयार करने लगते है, तो वो उस परिवार के प्रति गफलत और नासमझी करने लगते है, जिनसे उनका उद्गगम हुआं था। भूल जाते है, उस से बदतर स्थिति भविष्य में उनके निजी परिवार की भी होनी है, इस सत्य से वो दूर रहने की कोशिश आज कर रहे, परन्तु वक्त बीतते देरी कितनी लगती है।

आखिर संयुक्त परिवार की वकालत मैं, क्यों कर रहा हूं ? इसका एक ही कारण है, आज का अवसाद। सन्तान होते हुए भी नहीं जैसी स्थिति हो तो जीवन को फिर किस सही भूमिका की तलाश है ? हंसने के लिए वातावरण न बने, तो फिर किस ख़ुशी की बात हम कर रहे है ? विषम स्थिति में विश्वास योग्य माहौल नहीं तो फिर क्या जीवन समस्याओं का समाधान सरलता से कर पायेगा ? उम्र की बढ़ती सीढ़ियों को क्या सहारे की जरूरत नहीं होगी ? बीमारी के समय सिर्फ अर्थ से पाये इलाज से हम स्वस्थ हो जाएंगे ? ऐसे अनगिनत और कई सवालो के जबाब शायद ही हम दे पाये। समझने की बात है, अभी तक पुराने परिवारो के संस्कारों के कारण अभी तक जीवन कुछ सुरक्षित है, नहीं तो अर्थ का अनर्थ शायद और भी जटिलता हमें दे सकता है। अभी भी बहुत सी जगह है, जहां पड़ोसी भी काम आते है, नहीं तो आज आदमी परिचय का मोहताज हो रहा है। इसका साधारण सा कारण अंहकार और अभिमान है, जो किसी की सहायता भी नहीं करना चाहता, न ही किसी का सहयोग लेना चाहता, कुछ लोग इसे अहसान कहते है। दंभ, घमंड़ इन्सान में, अर्थतन्त्र का तोहफा है, उसे अस्वीकार चन्द समझदार लोग ही करते है। सूक्ष्मता से अगर अध्ययन करे, परिवार की गंभीरता भरी छवि में हम एक अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते है, कहते है ना, परिवार से ही गुणता का विकास होता है।……क्रमश…..कमल भंसाली