बुलन्दियों ने कब कहा….. कमल भंसाली…


बुलन्दियों ने कब कहा
इन्सान से, आओं, मुझे “छू” लो
ये तो इन्सान की फितरत ही हैं
वो आकाश की तरफ देखता
जमीं पर पड़े सपनों को
चलते, चलते अपने
पैरों से रौंद्धता

हकीकत से दूर होकर
कब कोई गिरे, को उठाकर
देता हैं, सहारा ?
कहते है, सब का
रखवाला है, “भगवान”
आखिर हम तो है
सिर्फ “इन्सान”

तमन्नाओं के संसार
का भी होता होगा, दस्तूर
बेदर्द बन कर जीओं
कब तक जियेगा, कमजोर
ये, जीवन दुबारा नहीं, मयस्सर

पत्थरों का कोई
खुदा नहीं होता
“मूर्तियो” को कहां
नसीब है, प्राण
फिर भी मुस्कराती
ही, नजर आती

एक तिनके का सहारा
ढूंढने वाला इन्सान
कैसे बन सकता है, महान ?
जब उसके दिल में
नही बसते “सब के भगवान”

भूल जाता, ऊपर देखने वाला
पाँव धरती पर ही चलते
“सांस” ही सिर्फ ऊपर से आती
इसलिए स्थिरता नहीं पाती
कभी आती, कभी जाती
फिर एक दिन, छोड़ जाती
शायद वापस, कभी नहीं आती……..कमल भंसाली

कमल भंसाली