🙌संवेदन पूर्ण सत्य🕸️कमल भंसाली

“दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है वह है “दूसरों के द्वारा बोलेजाने वाला सत्य”, यह एक तथ्य है, इससे इंकार करना शायद ही आसान होगा। “सत्य” बोलने वाले लोगो की तादाद नगण्य के आसपास ही अब रहती परन्तु किसी समय झूठ बोलने वालो की गिनती हुआ करती थी, इस बात को आज का आधुनिक युग शायद ही स्वीकार करेगा। आज सत्य को एक हारा हुआ खिलाड़ी या नेता भी स्वीकार करने से झिझकता है। शाश्वत चिंतन करे तो ये बात समझ में आ सकती है कि दुनिया का अस्तित्व पूर्ण सत्य में आज भी समाया है, हम चाहे या नहीं प्रकृति अपने आप को सत्य से अलग नहीं कर सकती। हम कितना ही झूठ का दैनिक जीवन में प्रयोग कर ले पर आत्मा उसे अंदर तक नहीं ले पाती, हमारे बोले हुए किसी भी झूठ पर उसका कराहना महसूस किया जा सकता है।

“हम जी रहे है यह सत्य हो सकता है” परन्तु हम ‘सही’ जी रहे ये संदेहपूर्ण है। सवाल किया जा सकता है, क्या सत्य पूर्ण जीवन जीया सकता है ? उत्तर आज के युग में आसान नहीं लग रहा कारण जीवन की गतिविधिया आजकल झूठ के इर्द गिर्द ही ज्यादा समय बिता रही है। कभी सत्य को जीवन की धुरी समझा जाता था, आज उसकी जगह झूठ ले रहा है, इसे जीवन की विडम्बना ही कहे क्योंकि जीवन आज इसी कारण शायद टूट कर बिखर रहा है। जीवन को आज सब सांसारिक सुविधायें बहुत तेजी से प्राप्त हो रही है और बताना भी जायज नहीं होगा जीवन अपना सास्वत मूल्य खो चूका है, और स्वयं ही किसी त्रासदी का शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह देता है। सही भी है, झूठ का भारीभरकम वजन कब तक ढोयेगा।

चाणक्य राजनीति के गुरु थे उन्होंने राजधर्म के लिए कई तरह की चालाकियों का सहारा लिया परन्तु झूठ को दूर रहकर। उनके इस कथन पर गौर करते है ” सत्य मेरी माता है। आध्यात्मिक ज्ञान मेरा पिता है। धर्माचरण मेरा बंधु है। दया मेरा मित्र है। भीतर की शांति मेरी पत्नी है। क्षमा मेरा पुत्र है। मेरे परिवार में ये छह लोग है।” काश आज के राजनेताओं में इस तरह के विचार अपनाये हुए होते तो निश्चित ही भारत आंतरिक रुप से कमजोर और गरीब राष्ट्र की गिनती में न होता।

इंसान का व्यक्तित्व प्रकृति ने बड़ी सूझबूझ वाला बनाया है, सर्वगुण और अवगुण वाले संसार में उसको अपना व्यक्तित्व स्वयं निर्धारण करने का अधिकार भी उसे दिया। सक्षम व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के जीवन दर्शन पर सरसरी नजर डालने से इस बात से इंकार नहीं करना पड़ेगा कि बिना असत्य का सहारा लिए वो इस मंजिल तक पंहुचे है।

असहाय सी स्थिति है आज जीवन की, भाग्य से प्राप्त खुशहाली अति अर्थ के दीमक से हर दिन जीवन को छीजत प्रदान कर रही है। पल की मोहताज जिंदगी अर्थ के कारण कटुता भरे वातावरण में कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों के विषालु कीटाणुओं से ग्रस्त हो रही है। इस का प्रमुख कारण हम सब समझकर भी नहीं समझते वो है “अति दौलत की भूख”।
हर रोज हमारे आसपास ही क्या हमारे स्वयं के जीवन मे उसकी कमी या अति, जीवन को संकुचित होने का अनुभव कराती है। जब की जानते है, जब तक जीवन है, तब तक मालिक होने का दावा कर सकते है पर उसके बाद उसका मालिक कोई और स्वतः ही हो जाता। अतः इस सत्य को स्वीकार कर लेना ही सही होता है अर्थ के कारण किसी भी सम्बन्ध को कटुता का अनुभव न दिया जाय। कठिन समय मे आपसी प्रेम काफी फलदायक होता है।

कहते है जीवन की शुरुआत प्रेम से हुई और प्रेम सदा सत्य से संपन्न रहना पसन्द करता है, झूठ से वो सदा नफरत करता है। किसी शारीरिक बंधन के चलते वो झूठ को मजबूरी से सहन करता है। इस तथ्य को रिश्तों की दुनिया में सदृश्य समझा जा सकता है। रिश्तों के बनते बिगड़ते तेवर जीवन को कई तरह से प्रभावित करते है। रिश्तों की मधुरता जीवन को सकारात्मक चिंतन प्रदान कर उसे मजबूत कर सकती है। गलत भावनाओं के बस में होकर रिश्तों में कटुता का संकेत देना मात्र जीवन के पथ को कठोरता प्रदान कर सकता है, अतः रिश्तों के प्रति हमारी संवेदनशीलता में सत्य का अंश सही मात्रा में रखना उचित लगता है। जीव विज्ञानी डेविड जार्ज हस्कल का यह कथन आज के युग अनुसार अक्षरस सत्य लगता है कि ” The forest is not a collection of entities (but) a place entirely made from strands of relationship”.

आलोचना से पीड़ित प्रेम कभी भी जीवन को सुख नहीं देता परन्तु समझने की बात है बिना आलोचना का प्रेम चापलूसी की या गुलामी की श्रेणी में आता है, प्रेम का निम्नतम पतन भी यहीं होता है, इस सत्य को कितना ही कड़वा कह लीजिए पर ह्रदय इसे स्वीकार कर सन्तुलित रहता है। आधुनिक अर्थतन्त्र की इस दुनिया की विडंबना ही कहिये इंसान के पास हजारों साधनों का भरपूर भंडार हर दिन तैयार हो रहा है, शरीर नाच रहा सब कुछ भोग रहा पर मन तो खालीपन का शिकार हो रहा। सबके रहते इंसान जब उम्र या किसी कारण से लाचार होता है तो टूट कर बिखर जाता है और दिल के अरमान दिल मे ही रह जाते, कोई सुनने वाला, कोई मन से सेवा करने वाला नहीं रहता उसके आस पास। इसका एकमात्र सत्य उतर यही हो सकता:

“जो दिया नहीं वो मिला नही
झूठ से सत्य कभी दबा नहीं
प्रेम को साधन नहीं संवेदना चाहिए
सही जीने के लिये इस सत्य की समझ चाहिए”

लेखक: कमल भंसाली ।

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उल्फत की रानी 😛चुनाव महारानी🤑कमल भंसाली

उल्फत कि रानी
प्रफुलित चांदनी
निखर रही प्रखर रही
धवल भारत की वसुंधरा
गुंजन भरीआवाजों से सहम रही
चुनावी मौसम आया
नेताओं का जमघट छाया

दूर गगन में हजारों सितारे
नभ को फुसला रहे
चांदनी को प्राप्त करने के लिए
कसमें खा रहे
वादे कर रहे
दूर जैसे
नेताओं के भाषण
भारत की जनता को
सुनहरे भविष्य की कल्पना कर रहे

दूर एक टूटी फूटी झोंपड़ी में
एक माँ
भूखी नंगी संतान को
सहला सहला कर
बिन भविष्य सुला रही
कई आवाजें
देश को प्रगति पथ पर
ले जाने की बात कर रही
भ्रमित जनता से
आश्वासन मांग रही
उनके मूल्यवान वोट को
अवमूल्यन कर
हसीन ख्बाबों की सैर करा रही

मजबूरी में देश उनका विश्वास कर रहा
कह रहे
कल देश का फिर
भविष्य तय हो रहा
थोड़े दिन में सब कुछ बदल जायेगा
कोई बच्चा
खाली पेट न सोयेगा
हमारा यह वादा रहा
देश स्वर्ग हो जायेगा
आपको भी स्वर्ग में रहने का
कुछ और ही आनन्द आएगा

उल्फत कि रानी
पता नही किसे
कैसे नहा गई
भूखी माँ भी
बेखबर हो सो गई। ….कमल

👥कर्तव्य और अधिकार👤 जीवन अनुसन्धान चर्चा भाग 1✍कमल भंसाली

“अधिकार” और “कर्तव्य” ऐसे शब्द है, जो एक दूसरे के पूरक है, एक के बिना दूसरे का चिंतन व्यर्थ है, फिर भी विडम्बना ही कहिये एक सर्व पसन्द है, दूसरा ज्यादातर सिर्फ चिंतन का विषय ही है। जी हाँ, मैं अधिकार की खुश किस्मती और कर्तव्य निर्वाह के कम पसन्द की बात कर रहा हूं। अधिकार प्राप्त करना सबको प्रिय लगता है, पर यह बात कर्तव्य निभाने के लिए नहीं की जा सकती, ऐसा क्यों है ? उत्तर देना आसान नहीं पर तथ्य कहते है देने वाला ज्यादा प्रिय लगता है और लेने वाला कम, ऊपरी सतह पर कथन सही भी लगता है, पर ऐसा हकीकत में हरगिज नहीं है। जब हम “अधिकार” और “कर्तव्य” का चिंतन अपने ही जीवन के सन्दर्भ में करते है, तब लगता अधिकार हमें ज्यादा सुविधाओं के लिए प्रेरित करता है, और कर्तव्य कहता है सुविधाये मेरा ध्यान रखने से ही प्राप्त हो सकती है। सच भी है, दोनों स्थितियों के निर्माण से ही सुव्यस्थित जीवन का संचालन संभव है। अधिकार यानी प्रभुत्व, या हक जिसे हम इंग्लिस में Right या Rights के नाम से जानते है, जो मानव की उग्रता से पोषित होता है, अतः इसकी सक्षमता में मजबूती और तेजी जैसे तत्व ज्यादा झलकते है। उसके विपरीत कर्तव्य का मतलब करने योग्य कर्म यानि किसी कार्य को करना, नैतिक जिम्मेदारी के अधीन होकर, संजीदगी और संवेदनाओं से ज्यादा पोषित है ।अतः नम्रता से इंग्लिश भाषा में Duty शब्द का प्रयोग ज्यादातर कर्तव्य पूर्ति के लिए ही किया जाता है। हालांकि कुछ और शब्द भी इंग्लिश में प्रयोग किये जाते है, जैसे OUGHT, WORK, OBLIGATION, JOB, ROLE,DORESHIP, PART, DEVOIR, CALL, BUSINESS, OBEDIENCE, DISCHARGE, FALL, BE UP, CONSCIENTIOUS , TRUSTWORTHY तथा LOYAL। इंग्लिश में स्थिति के अनुसार कर्तव्य बोध कराने के लिए अलग अलग शब्दों का प्रयोग किया जाता है, इसलिए समझदारी से इनका प्रयोग करना होता है। “अधिकार” शब्द का प्रयोग हर जगह करना खतरनाक है, हाँ इसके प्रति अपनी चेतना को जागरूक रखना जरूरी होता है।जब इंसान किसी प्राकृतिक या शासन सम्बन्धी सुविधाओं से वंचित हो और उससे उसका जीवन संचालन कठिनता महसूस कर रहा है, तब उसे अपने अधिकारों का भी ज्ञान रहना चाहिए। समय के परिवर्तन स्वरूप स्वयं को बदलना जरूरी भी होता है पर यहीं जब हम विशेष परिस्थितियों में बेअसर अधिकारों का उपयोग करते है, तो परिणाम विपरीत ही मिलते है। ऐसी स्थिति सामूहिक जीवन के अंतर्गत कई बार आती है। परिवार और समाज दो ऐसे क्षेत्र इसके सर्वतम उदाहरण है, जहां कर्तव्य कमी और अधिकारों का अधिक उपयोग होता रहता है। बात साफ़ है, अधिकार मानसिक विसाद को बढ़ाता है और कर्तव्य निभाव सुख का अहसास कराता है, मात्रा चाहे उसकी कितनी भी कम हों। जब बात कभी हम देश की वर्तमान परिस्थितयों पर करते है तो ज्यादातर चर्चाये अपने अधिकारों के सन्दर्भ में होती है, शायद ही हम चर्चा करते है देश के प्रति अपने कर्तव्यों की। आखिर अधिकार का हक पाने वाले हम भूल जाते है कि जब तक हम अपने कर्तव्यों की पूर्ति नहीं करेंगे तब अधिकार किस सतह से अपनी पूर्णता पायेगा और कैसे हम उसका उपयोग कर सकेंगे। भारत शायद दुनिया का सबसे उदारवादी देश है, जहां स्वतन्त्रता के अधिकार का लोग अपने छोटे छोटे स्वार्थों की पूर्ति में विशेष उपयोग करते है, यानी अपने कर्तव्यों को भूल जाते है।हम जो इस देश के नागरिक है, यहां की सब सुविधाओं का तो उपयोग करते है, और उनकी कमियों पर दुःख महसूस करते है, पर किसी एक अपने जायज या नाजायज सुविधा के लिए अपने कर्तव्यों को भूल अनेक जीवन उपयोगी सुविधाओं को नुकसान पहुंचाने से परेहज नहीं करते है। इस लेख का यह कतई प्रयास नहीं है कि हम अपने अधिकारों के प्रति सचेतक न बने परन्तु देश और अपने हित के लिए जरूरी है कि हम अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का भी अहसास ही नही पालन करने का संकल्प होना चाहिए। ये देश की विडम्बना ही मानी जा सकती है कि उसके संचालन करने वाले नेता और पढ़े लिखे अफसर नैतिकता युक्त कर्तव्य का निभाव अपने निजी स्वार्थों के कारण नहीं पसन्द करते। ये तो तय है, कुछ भी बिना प्रयास संभव नहीं होता ।आज हम स्वतन्त्र है, परन्तु इसके लिए कितना कुछ खोया गया, इसका सही मानसिक चिंतन कम लोग ही करते है। याद करना जरूरी है, हासिल करना आसान होता पर त्याग करना कठिन होता है। अगर सुविधाओं का प्रयोग करना अधिकार है, तो उन्ही सुविधाओं को नष्ट करने की सोच को क्या कहें, हिसाब से तो ऐसे समय इन सुविधाओं को बचाने के कर्तव्य पर ध्यान देकर ही कोई कदम बढ़ाना चाहिए। जब हम परतन्त्र थे तो देश प्रेमियों ने कई तरह के आंदोलन किये, स्वतन्त्रता पाने के लिए नरम गर्म प्रयास भी किये पर सब की एक भावना थी कि देश दासता से स्वतन्त्र हो जाए, इस परिस्थिति में अधिकार और कर्तव्य का संयुक्त प्रयास था । लाला लाजपतराय ने जहां अधिकार याद दिलाया ” स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है वहीं नेताजी सुभाष चन्द्र ने कर्तव्य निभाने का आह्वान किया ” तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा”। शायद यही कर्तव्य और अधिकार की सही समझ और सक्षमता ने हमें आजादी का पुरस्कार दिया। युग परिवर्तन में अधिकारों के प्रति सचेतक इन्सान को सब साधन स्वतः ही मिल रहे फिर कर्तव्य की अवेहलना करने से प्राप्त परिणामों पर शिकायत करने का अधिकार कहां रह जाता है। सही चिंतन की जरूरत है, देश पर न्योछावर तो हम न हों पर देश से तो हमारा प्रेम आत्मिक होना जरूरी है। हमें R. J. Ingersoll के इस कथन पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि ” The place to be happy is here. The time to be happy is now. The way to be happy is to make others so.” । उपरोक्त चिंतन के बावजूद भी अगर हमें कर्तव्य बोध की जगह अधिकारों की चिंता है तो निश्चित मानकर चलिए हमारी स्थिति John May के इस वाक्य में व्यक्त है ” If you are waiting for inspriation, you are waiting at a bus stop on a road where no buses run. क्रमश****लेखक: कमल भंसाली

बिगड़ती मानसिकता, भविष्य का डर….. कमल भंसाली

आज कल जो हिंसा और कमजोर मानसिकता से पूर्ण घटनाक्रम घट रहें है, उनसे मानव मन कि स्थिति विचित्र और नहीं समझने योग्य हो गई है। हम दैनिक समाचार पत्रों पर नजर डाले तो शायद हीं ऐसा पृष्ठ सामने आये, जिसमे अपराधिक समाचार न हों। सवाल है, ऐसा क्यों हो रहा है ? काफी कुछ चिंतन का विषय है, आज का दैनिक जीवन ! ‘प्रेम’ के नाम पर जो उत्पाद समाज भोग रहा है, वो कहीं साबित नहीं करता, हम शिक्षित हो रहे है, हम आत्मिक भूमिका को अपनी शिक्षा प्रणाली से दूर रखकर गलत राह के राही बन गए है। हकीकत तो यही समझा रही है, कि हमारा जीवन दर्शन अर्थ और साधनों का इतना मोहताज हो गया, कि वो भूल गया अंतरंग आत्मिक ख़ुशी क्या होती है ?
आखिर ऐसा कुछ क्या हुआ, जो हमारी मानसिकता का अंधापन बढ़ा रही है। समझने की चेष्टा करते है।

आज, इंसान जब संसार में जब समझ की पहली अनुभूति का अहसास करता है, तो वातावरण अनुसार, उसके हाथ पांव मचलने लगते है, दिमाग में कुछ चाहत की तरंगे उठने लगती है। परिवार उसे पालने के लिए, इतने कृत्रिम साधनों का प्रयोग करता है, कि , तभी से वो, अपनी काया की चाहत भरी तरंगों का दासत्व स्वीकार करने लगता है, और उसकी हर इच्छा का गुलाम बन जाता है। उस दिन से वो उसकी हर इच्छा की पूर्ति करना अपना धर्म मान लेता है। समझा जा सकता है, आज साधनों से भरपूर संसार उसी चाहत का और इन्सान की गुलामी का नतीजा है। यहां तक तो बात ठीक थी, वो चाहत के कारण जीवन जरुरी साधनों का निर्माणकर्ता था, पर जब से वो खुद साधनों का गुलाम होने लगा, तबसे मानवीय गुणों का उसमे ह्यस होने लगा, यह एक चिंता की बात है।

इसी सन्दर्भ में यह तथ्य भी हमें स्वीकार कर लेने में कोई हर्ज नहीं, अति साधनों के प्रयोग से हम अपने जीवन को मौलिकता से दूर ले जाकर उसे बीमारियों की नगरी की तरफ ले जा रहे हैं, या फिर उसे अशांति के घने जंगल में भटकने के लिए छोड़ रहे है। हकीकत यहीं कहती है,सत्य की तरफ न देखकर, उससे मुंह मोड़ कर हम अपनी कमजोरियां रात दिन बढ़ा रहे है। इसमें दो राय नहीं हो सकती, बिना उपकरण और साधनों के बिना जीवन गतिमय नहीं हो सकता, पर गति जब अति हो जाए, तो ब्रेक का प्रयोग भूलने से दुर्घटना होना निश्चित है, और सब दुर्घटनाओं से शुभ का फल नहीं अर्जित किया जा सकता, यह भी तय है।

सबसे पहले यह बता देना जरूरी है, की इस लेख का कतिपय उद्धेश्य नहीं है, आज के युग में साधनों के प्रयोग के विरुद्ध जाया जाय। उद्धेश्य यहीं है, कि जीवन में सुख का अनुभव होता रहे, जिंदगी स्कारत्मकत्ता से अपनी तय उम्र प्रेम और शांति से गुजारे। अनियमितता से जिन्दगीं को तनाव ही मिल सकता है, शुकून नहीं। तय हमें करना है, कि हमें आखिर क्या चाहिए ? पता नहीं आधुनिक शस्त्रों के निर्माण करने वाले वैज्ञानिकों ने इस तथ्य पर अति गौर क्यों नही किया, कि आखिर मानव इन शस्त्रों का प्रयोग अपने को ही नष्ट करने में करेगा, उसे किसी बाहरी लोक से तो कोई खतरा अभी तक नजर नहीं आया। पहले आम आदमी घर में किसी भी प्रकार का अस्त्र रखना अशुभ मानता था, सिर्फ सीमा के प्रहरियों या पुलिस अधिकारियों तक ही इनकी पहुंच थी। धीरे, धीरे, अराजकता बढ़ी, तभी तो आज ये सरलता से प्राप्त किये जा सकते है। इसका यही अर्थ निकलता है, कि आपसी विश्वास, स्नेह, प्रेम की कमी हो रही है। क्या यह स्थिति मानव विनाश के प्रारम्भिक संकेत तो नहीं है ? आश्चर्य, नही होगा अगर दैनिक समाचारों की विवेचना से यह तथ्य भी सामने उजागर होता है, कि प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा मानव निर्मित संघारक घटनाये आज ज्यादा हो रही है।.

यह निश्चित तथ्य है, प्रकृति की सरंचना में धरातल का निर्माण एक साथ ही हुआ, मानव के अस्तित्व से पहलें कई तरह के जीव जन्तु और पेड़ पौधों का निर्माण हो चूका था। यह भी एक आश्चर्य की बात है, मानव जाती का विस्तार शुरु में प्रेम के तत्व से ही हुआ, फिर घृणा कहां से आई ? इसका एक मात्र कारण,स्वार्थ की भावना का पनपना ही हो सकता है। स्वार्थ के पनपने के साथ जो कारण जोड़ा जा सकता है, वो है, धरती पर साधनों का जरुरत से ज्यादा विकास, और उनके प्रति स्वामित्व का बोध होना। कहनेवाले यह भी कहते है, कलयुग है, अंत तो होना ही है, पर क्या अंत भी घृणात्मक हो, यह उनके आत्म चिंतन की बात है ।

निसन्देह, उपकरणों के विस्तार से जीवन को तेजी मिली, पर उसके लिए नैतिकता को अपने कई नैसर्गिकी गुणों को नैष्कर्म्य बनाना पड़ा जिसके कारण भीतरी सुख का अनुभव कमजोर होने लगा। सब कुछ होते हुए भी जिंदगी अपने आप को अकेली अनुभव करनें लगी है, आखिर क्यों ? वक्त की बात है, गांवों से निकल कर जीवन ने जब शहरों की तरफ अपना रुख किया, तभी से उसमें में कई तरह के परिर्वतन होना शुरु हो गया। यह आश्चर्य की बात है, कि शहरों में रहने वाले लोग अब शान्ति के लिए ग्राम जीवन अच्छा मानते है। इसका कारण शहरों का बढ़ता प्रदूषण तथा सामाजिक सुरक्षा का कमजोर होना। रिश्तों का व्यपारिकरण ने रही सही कसर पूरी करके आज इन्सान को लाचार कर दिया।आज गांव भी इन्हीं रोगों से ग्रस्त हो गए। शहर के संसर्ग ने उसे साधनों का एड्स दे दिया। आखिर, शांति धीरे धीरे अदृश्य हो जायेगी, उसे किसी भी जगह तलाशना मुश्किल काम ही रह जाएगा। राम ने वनवास जंगल में क्यों बिताया, बुद्ध और महावीर जैसे राजाओं ने वन में हीं शांति की तलाश क्यों की, राजमहल में उन्हें क्यों नहीं मिली ,सब साधनों के होते ,यह आज एक अनुत्तरित सवाल है ?जंगल को काट कर तहस नहस करने वाला मानव, पत्ता नहीं क्यों यह समझ रहा कि हकीकत में वो प्रकृति के पेड़ की उसी शाखा को काट रहा है, जिस पर वों सुख शांति से बैठा है।

‘अवेहलना’ एक नकारत्मक शब्द ही नहीं, संस्कारों को नष्ट करने वाला जहर है। आज जैसे हमारे देश चीनी उपकरणों से भरा है, वैसे ही ,,,,’अवहेलना’ ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर लिया है। स्वतन्त्रता का दुरूपयोग होना ही, आनेवाली गुलामी का संकेत होता है, इसे माने या नहीं पर तथ्य यहीं समझाते है, कि फिलहाल हम अभी आदतों के गुलाम तो हो ही गये। समय बदलता है, विचार भी बदलते है, परंतु जब मानसिकता और मानवीय संवेदनशीलता बदलने लगती है, तो चिंता होना स्वभाविक है। दर्द सभी भोग रहे है, पर साधनों और उपकरणों के अति प्रयोग से व्यवहार में बनावटी संवेदना ही रह गई, जो किसी के काम नहीं आती। हमारे देश के संस्कारिक परिवेश की विशेषता यहीं है, कि धर्म का प्रभाव आज भी बरकरार है, शायद इसलिए हमें अति आधुनिकत्ता से अब तक बचा रखा। जो थोड़ा आत्मिक प्रेम बोध बचा है, शायद कुछ सालों तक जीवन को क्षणिक सुख अनुभूति प्रदान करता रहे।

मेरा मानना यहीं है, कि खानपान का असर स्वास्थ्य के साथ विचारों पर भी पड़ता है। हम अभी तक संस्कारित और स्वास्थ्यवर्द्धक खानपान ही पसन्द करते थे, परन्तु आधुनिककरण की नई सभ्यता को परम्परागत संस्कार और खानपान रास नहीं आ रहा है। धीरे धीरे जीवन साधनों, उपकरणों और बाहरी नए खानपान के व्यंजनों का आदी हो रहा है। शारीरिक श्रम की भूमिका दैनिक जीवन में कमजोर हो गई और आराम दायक साधनों की क्षत्र छाया में दिमागी मेहनत सीमा पार करने लगी। नतीजा जो होना था, वहीं हो रहा है, आदमी भीतर और बाहर दोनों से कमजोर हो रहा है। लालच के जहर ने हर चिंतन को इतना जहरीला बना दिया कि मिलावट करने वाला स्वयं हर पदार्थ निश्चिन्त होकर प्रयोग करने के लिए मजबूर हो गया। आखिर विचारों में शुद्धता नहीं तो अक्षेपा कैसे करे, सब शुद्ध मिले।

कोई ज्यादा वक्त नही बिता, जब लोग भारत को दूध दही की बहने वाली नदियों के देश के नाम से पहचानते थे। आज स्थिति यह है, कि शुद्ध दूध, दही कल्पना मात्र ही रह गये है। सवाल जेहन में एक हीं आता है, आखिर ऐसा क्या हुआ ? जिसके कारण अमृत पैदा करने वाला देश, विष का देश बन गया। अपने हि दैनिक जीवन से खिलवाड़ करने वाला देश किस तरह से उन्नति और सुख की बात सोच सकता है। पग पग पर हिंसा, कदम कदम पर अशांति, हर समय अर्थ की चाह और उसके लिए होने वाले अनैतिक कार्य किसी भी देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ही लगाता है। जैसे शरीर और मन का सन्तुलन बिगड़ जाने से आनन्द की अनुभूति नहीं हो सकती, ठीक वैसे ही किसी भी देश की शासन व्यवस्था तब तक शांतिदायक परिणाम नहीं दे सकती, जब तक ईमानदारी से कार्य न करे, यही कमजोरी, भारतीय लोकतन्त्र को बीमार ग्रस्त कर चुकी है। आखिर सदियों से फलती फूलती ईमानदारी कहां विलुप्त हो गई, पर इसे तलाश करने का समय किसी के पास भी नहीं है। देश शब्द की मार्मिकता में सब अपने स्वार्थ की पूर्ति होते देखना चाहते है। नेता गरीबी के नाम पर अमीर हो जाते है। “गरीबी”शब्द अमीरी की दासी बन गई …यह चिंतन की क्या बात नहीं है ?

पिछले दिन अखबारो, टीवी में मैगी, नूडल्स पर हाहाकार मचा, दिग्गज अभिनेताओ, अभिनेत्रियों और यहां तक खिलाड़ियों ने अपने असीमित लालच के कारण विज्ञापनों में इसे स्वस्थ, रोचक,और शीघ्र बनने वाला आहार बताया। घर, घर में प्रयोग होने वाला यह पदार्थ इतने सालो तक, हमारी कमजोरी बन कर दैनिक जीवन पर शासन करता रहा। कल यह भी भुला दिया जाएगा, कोई नये नाम से हमें फिर परोसा जाएगा और हमारी स्वीकृति भी प्राप्त कर लेगा, बिना जांच परख के। आम इन्सान की उदासीनता समझ में आती है, परन्तु सरकारी संस्थाओं की अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही, क्या दण्डनीय नहीं है ?……क्रमश …..कमल भंसाली