💘इंसाफ का दरवाजा💘 कमल भंसाली

नसीब की बारिश
इस तरह बरसती रही
आंखे भीगती रही
ख्वाइसे दिल जलाती रही
भूल गई जिंदगी
सब कुछ
आस्थाओं के संगम में
प्रेम को तलाशती रही
नहीं जानती
दर्द के शैलाब
जब बेताब हो जाते
तो मकसद सारे
सिमट कर रह जाते
नम नयनों के आंसू
पलको पर ही सुख जाते
नसीब…..

तन्हा हो मन
दिल को समझाता
अपनों के होनें का
दिलाशा देता
पर एक भी स्पर्श
मरहम लगाने से कतराता
अपनों की दहलीज से
जब कोई खाली हाथ लौटता
मत पूछिये
गुनहगार न होते हुए भी
दिल उम्र भर दर्द की
सजा पा जाता
अपने ही वजूद में
तन्हा हो जाता

वक्त फिसलता रहा
जिंदगी लड़खड़ाती रही
दस्तूरी दुनिया
हंसती रही
मर्म की किताब खोली
नसीहते मुस्कराती रही
एक अदद् ख्बाब
क्या टूटा
गफलत की चांदनी भी
दाग को गिनाती रही
दुनिया इसे
मेरी नसीब की बरसात कह
मजाक उड़ाकर
मेरे अपने वजूद को नकारती रही
है, खुदा बता जरा
इंसाफ किसके पास रहा
आज तक मैं किसका दरवाजा खटखटाता रहा….रचियता✍ कमल भंसाली

दुनिया “औ” दुनिया…..कमल भंसाली

दुनिया, “औ” दुनिया
रंगो छंदो से सजी दुल्हन बन रहती
कभी अपनों जैसी बातें करती
कभी गैरों की तरह मुस्कराती
किस रंग में क्या है, तेरा
आ, पास बैठ, जरा
कौन सा,. रंग मेरे लिए
बता,जरा….

किसी के लिए करती,श्रृंगार
क्यों करवाती,अति मनुहार
इतनी चाहत भरी पलकों में
किसका कर रही,. इंतजार ?
कौन सी चाहत में, कैसा प्यार
आ, पास बैठ, जरा
कैसा प्यार, मेरे लिए
बता, जरा…

चंचल चाल तेरी
मदहोश तमन्नाओं पर निसार
कैसा है,तेरा भावनाओं का व्यापार
बिनार्थ कुछ नही है, म्यसर
गुनाह की इमारतों पर ही
लिखती, तुम बेमिसाल मुकद्दर
ये कैसा है, तेरा नासमझ व्यवहार
आ, पास, बैठ, जरा
कौन सा, नसीब लिखा,मेरे लिए
बता, जरा …….

न तू अनुचरी, न ही सहचरी
अर्थ की तूं है, अर्द्धांगिनी
लफ्जो के परिधान से सजी संवरी
लगती आडंम्बरों की रानी
अब “असत्य” ही तेरा उत्तराधिकारी
संशय से भरा जीवन लगता भारी
आ, पास, बैठ, जरा
क्या सुखद भविष्य है, तेरे यहां, मेरा
दुनिया,”औ” दुनिया,
बता जरा…

कमल भंसाली