👏मेरे प्रभु👏कमल भंसाली✍️

हे प्रभु
खूबसूरती मेरे जीवन को दीजिये
मेरी सारी कमियों को हर लीजिये
पथ की कठिनाइयों को दूर कीजिये
महत्व जीवन का सब समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
जिसे अभी तक जीवन समझता रहा
आपको भूल रास्ते नये तलाशता रहा
उनकी हर कमी को ही अपनाता रहा
इस भूल को मेरी आज सुधार दीजिये
👏
हे प्रभु
मानव मन मेरा सदा कमजोर रहा
वासनाओं के फूल ही सूंघता रहा
संयम ही जीवन है ये भूलता रहा
इस भूल का निदान समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
असत्य की धुरी पर घूमता रहा जीवन
पथ भटका न मिली कोई सही मंजिल
आदर्शों के गीत तो सदा ही गाता रहा
पर अपनाने से हरदम ही कतराता रहा
जीवन की सही मीमांसा समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
जीवन आपका दिया है पवित्र वरदान
समर्पण आप में ही रहे जब तक रहे प्राण
जिस विधि से करुं मैं सही से वापस प्रयाण
उस यज्ञ की सारी रस्में आज समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
सकल सफल रहे मेरा यह अनमोल जीवन
हर पथ आपको समर्पित होकर बने पावन
इस जन्म की हर पीड़ा का हो यहीं समापन
गमन पथ को अब मेरी मंजिल समझा दीजिये

👏🏼रचियता और प्रार्थना कार✍️ कमल भंसाली👏

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नफरत दिल में इतनी✍💝 कमल भंसाली

नफरत दिल में न इतनी बसाये
कि संसार में अनचाहे बन कर रह जाये
जीना सब का बराबर का हक
हो सके तो दिल को यह बात समझाये
इंसान है इसलिए सही होगा
इंसानियत की राह के ही मुसाफिर कहलाये
नफरत..

हर धर्म यही कहता मैं सब में एक समान सा रहता
तुम फिर क्यों इसे अलग अलग होने का संकेत देते
कितने अच्छे कितने बुरे अगर स्वयं को तुम जान लेते
मैं जीवन का सार बन तुम्हारे आत्मा मे ही सदा बसता
नफरत..

बातें बड़ी बड़ी करके खेल कई प्रकार के खेलते
आडम्बरों की छाया में क्यों इतने पाप को झेलते
स्वयं समझने का दावा कर स्वयं ही अनजान रहते
स्वार्थ में नैतिकता की राह एक कदम भी नहीं चलते
नफरत…

सीधा सा जीवन कम जरूरतों की चाहत रखता
विलासिता के मटमैला चोले में वजूद फंस जाता
हसरतों के वश में आकर वो सब कुछ भूल जाता
माया जाल में फंस जाता वो इंसान नहीं रह पाता
नफरत…

फलसफा जीवन का इतना साँसों का राज जितना
जीना है सही तो हर कर्म में अहिंसा का साथ रखे
सत्य की सीढ़ियों से सफलता की मंजिल को पाना
मानवता ही धर्म इसे ही जीवन भर ये विश्वास रखे
नफरत…..
रचियता✍ 💖 कमल भंसाली

♨खुदगर्ज नहीं ♨खुद्दार बनिये भाग 1 ✍कमल भंसाली

आधुनिक युग जिसमें हम अपनी जिंदगी का सफर कर रहे वो समय समय पर हमें इस अहसास की अनुभूति कहीं न कहीं करा ही देता है कि क्या हमारा इस युग का जीवन सफर हमें आनन्दमय और सुखी होने से कहीं वंचित तो नहीं कर रहा है ? सवाल ऊपर से जितना सरल दीखता उतना ही अंदर से सही उत्तर खोजने में सरल नहीं लगता। फिर भी हमारी कोशिश है, हम आज कम से कम इस सन्दर्भ में स्वयं को अवलोकन करने की चेष्टा करे। माना जा सकता है संसार वक्त के अनुसार बदलता है । बदलाव से कोई भी अछूता नहीं रहता चाहे हो प्रकृति ही क्यों न हो ? यह तय है, आधुनिक साधनों की भरमार के बावजूद हम आज भी अंदर से खुश नहीं है, क्षीण सी प्रसन्ता भी हमारे चेहरे से दूर हो रही है। तनाव पूर्ण होकर मानते है कि आज के जीवन में मधुरता और मीठापन का अभाव हो रहा हैें। बात अगर सुख की करे तो लगता है हमारा सुख जाने अंजाने कई मानसिक बीमारीयों से आहत है, जिनका निकट समय में कोई संशोधन भी नजर नहीं आ रहा। उन्हीं में से एक विलासिता के साधनों की मुख्य उपज है, वो है “खुदगर्जी”, यानी “Selfishness” की। ये रोग आपसी रिश्तों के अलावा भी जीवन के हर क्षेत्र को तहस नहस कर रहा है। आज के व्यस्त वातावरण में दूसरों के भलार्थ सोचने का समय ही कहां है, यह कहकर लोग अपने आप को सांतवित करना सही समझते है। नीति शास्त्र के अनुसार दूसरों की भलाई से ही खुद का भला होने वाले तत्व जीवन से दूर हो रहे है। नजदीक के रिश्ते जो कभी जीवन सहायक होते वो आज अर्थ तन्त्र के प्रभाव से संकुचित होकर नगण्य होनें का सफर शुरु कर चुके है, नतीजा इंसान सबके रहते, सबकुछ पास रहते अकेला हो रहा है।

अंग्रेजी शिक्षा- संसार का भारतीय परिवेश में प्रवेश करने के बाद हमारी सोच संस्कारिता से धीरे धीरे विमुख होने लगी, इस सत्य को नकारना कहीं भी सही नहीं है। पर वक्त के साथ चलना भी जीवन की शायद अलिखित मजबूरी है, अतः इस लेख को जीवन प्रेरणा के तहत समझा जाय, तो शायद हम कुछ खुशियों की प्राप्ति में सफल हो जाये। सर्वप्रथम हमें एक स्वयं से प्रश्न करना सही होगा क्या हम आधुनिक साधनों की प्राप्ति से शारीरिक सुख के अलावा किसी आत्मिक सुख से आनन्दित हो रहे है ? संभावना तो नहीं उत्तर की है, बाकी जो अति साधनों के प्रयोगों से सुखी समझते है, निश्चिन्त ही वो बधाई के पात्र है।

हकीकत यही कहती है, जो जीवन आधुनिक युग का सफर कर रहा है, वो अंदर से बिखरा है। ज्यादा बाहरी सहायक साधनों का ज्यादा प्रयोग करने वाले अपनी क्षमताओं पर उतना विश्वास नहीं रख पाते, जितना उन्हें मानसिक रुप से रखना जरुरी होता है। आज अगर हम ईमानदारी से अपनी जीवन शैली पर अनुसन्धान करे तो एक बात समझ में जरूर आ जायेगी कि हम हर दिन खुदगर्ज होकर ही बिताते है, वो भी खुदगर्जी के बढ़ते अंशों के साथ। विश्व को ही लीजिये हर देश अपनी खुदगर्जी के अनुसार दूसरे देश के साथ अपने सम्बंधों को महत्व देते नजर आता है। इसी अनुसार संसार में नई नई गुटबाजी तैयार हो रही है। हर देश मानव कल्याणकारी आंकड़े की बात नहीं करता बल्कि अपने देश के शक्ति सम्पन्नता के आंकड़ों को प्रमुखता देता है।

बात जब हम देश, समाज, परिवार और जीवन धर्म की करते है, तो हमारी प्रवृत्ति काफी हद तक आलोचनामय हो जाती है। हम कमजोरियों को सामने रखकर असफलता के कारण ढूंढते है और दोषापरण से आपसी सम्बंधों में तनाव होने वाली सारी साम्रगी परोस देते है। अगर इसी तथ्य का समाधान की दृष्टि से चिंतन करे तो हमें जांचना होगा हमारी सारी मजबूतियों में किस बात का योगदान नहीं रहा जिससे समुचित सफलता नहीं मिली। इस तरह के चिंतन युक्त दृष्टिकोण से आपसी रंजिश को बढ़ावा नहीं मिलता और प्रयासों को मजबूती भी मिलती है।

हम यहां दो शब्द “खुदगर्ज” और “खुदार” पर विशेष चर्चा करेंगे क्योंकि हमारे दैनिक जीवन में दोनों स्थितियों का हर दिन प्रयोग होता है। देखने में दोनों शब्दों में अंह का अस्तित्व नजर आता है, पर ऐसा है नहीं क्योंकि एक कमजोरी का दुसरा मजबूती का प्राणदाता है। विवेचना को आगे प्रस्तर करे उससे पहले इन शब्दों से परिचय करना जरूरी है।

खुदगर्ज एक हिंदी शब्द है, जिसका तार इंसान के स्वार्थी स्वभाव से बंधा है। शब्द को दो भागों में विभक्त करने से खुद का अर्थ स्वयं और गर्ज का मतलबी या स्वार्थी निकलता है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करने वाले ज्यादातर “selfish” का प्रयोग करते है। ऐसे स्वभाव और प्रवृत्ती वाले लोग खुद भी कमजोर होते है और परिवार, समाज और देश को चिंताग्रस्त और कमजोर बनाने में भी उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उनका भय उनकी इस क्षमता को हर रोज बढ़ाता रहता है। कायरता खुदगर्जी की आंतरिक थैली होती जो सिर्फ द्वेष का जहर इकट्ठा करती है। सवाल किया जाना उचित है क्या खुदगर्ज होना पूर्ण गलत है, उत्तर में इतना ही सहजता से कहा जा सकता है, अति किसी भी तरह की हो और कैसी भी हो दुष्परिणामों का कारण होती है। इस सन्दर्भ में हम हम एडवर्ड अल्बर्ट के इस कथन पर भी गौर करना पड़ेगा ” Sometimes you have to be selfish to be selfless” ।

कभी हमारा देश अपनी सेवाभावी संस्कृति और आपसी स्नेह के लिए आत्मिक आनन्द स्थल था। संसार के विशिष्ठ व्यक्तित्व वाले महापुरुषों ने इस को स्वीकारा और भारत को आध्यात्मिक गुरु कहलाने का सोभाग्य भी प्राप्त हुआ। स्वामी विवेकानन्द जैसे कई दार्शनिक गुरुओं का जन्म स्थल हमारा देश है। इतिहास, साहित्य, धर्म की पुस्तको को टटोलने से इससे आप इंकार भी नहीं कर सकते कि हमारी सांस्कारिक विरासत साधनों के अभाव में जितनी भव्यवता की ऊंचाइयों को छुआ आज अर्थ व आधुनिक साधनों के बढ़ते प्रभाव से संदेहात्मकता की तरफ अग्रसर हो रही है।
बड़ी विडम्बना है जो मार्गदर्शक होनें का दावा करते वो खुदगर्जी की बदतर मिसाल बन रहे है। सेवा तो बिक रही है जो कभी सुखों की गिनती में शामिल होती आज वो अपना अस्तित्व नहीं संभाल पा रही, अर्थ उसे हर रोज बदनाम कर रहा है।

चर्चा जब हम यहां खुदगर्जी पर कर रहे तो यह कहना सही होगा कि भले ही खुदगर्ज हो इंसान अपनी जरूरतों की पूर्ति करे पर उसे समझना होगा यही स्वभाव की वो क्रिया है, जिससे वो अपने निम्नतम व्यक्तित्व का प्रदर्शन करता है। अतः जिंदगी की इससे एक उचित दुरी आवश्यक है, सिर्फ इसे समझने की बात ही नहीं अपने आंतरिक चिंतन में उचित जगह देनी भी जरूरी है। “खुदगर्जी” का अगर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से तत्व अनुसन्धान करे सहज ही समझ में आ सकता है की यह अंह यानी अंहकार का निम्नतम स्वरुप वाला अवगुण है, जिसका प्रयोग हम अपने स्वार्थ के लिये बिना प्रभाव की जानकारी उपयोग कर रहे है, स्वयं को सन्तुष्ट करने के लिए। सवाल उठता है, आखिर क्यों ? उत्तर समझने के लिए एक मनोवैज्ञानिक के विचारों पर अवलोकन करते है, ” “The desire to always be on top and appear with your best face forward takes a toll. To be the centre of attention becomes a necessity, and this forces us to overlook our own emotional threshold. We begin to move away from our comfort zones to become popular, “liked” and than fail to realise when we have moved too far away from our own nature. By then, we are trapped in this false identity we have created for ourselves. It leads to huge conflict between our external and internal identities.And that creates an imbalance in our brain which leaves us at our vulnerable best.” Bhawna Monga psychologist.

उपरोक्त विश्लेषण को समझने से इस बात पर भी गौर करना उचित लगता है कि आखिर किस तरह की चाहते या इच्छाओं के कारण इंसान खुदगर्ज कहलाता है। सरसरी तौर पर जो प्रमुख कारण हो सकते है, उन पर एक नजर डालते है।
1. अति सुख और उसके साधनों की
2. देखा देखी, प्रतिस्पर्धा
3. देखे हुए सपनों की पूर्ति
4. नासमझी
5. भोग विलास लिप्त जीवन
6. सामाजिक और राजनैतिक प्रभाव हासिल करने की चाहत
7. प्रसिद्धि,
8. जीवन और नैतिक सिद्धान्तों की अज्ञानता

कभी कभी विपरीत परिस्थितियों से जूझता आदमी मजबूरी से खुदगर्ज बन जाता है, ये कुछ समय की बात होनी चाहिए जब तक संघर्ष की अवधि रहे, इससे स्वभाव पर प्रभाव न आये, ये ध्यान रहे तो सही होगा।
चिंतन को विराम देने से पहले ये हमें लगातार समझना होगा जीवन वही कहलाता जो अपने शरीर सुख के लिए कम पर आत्मा-परमात्मा के लिए ज्यादा समर्पित रहता है।

*” यही पशु प्रवृति है कि आप आप ही चरे।
मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे। ” (मैथली शरण जी गुप्त की एक कविता का सार)
**”सुखिनः भंवतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः,
सर्व भद्राणि पश्यंतु मा काश्चित दुःख भाग भवेत।।” ( सार: दूसरों के परोपकार में ही सुख का अनुभव हो सकता है।

लेखक: *कमल भंसाली*

🍀कर्म का मर्म🍀धर्म के मर्म का दूसरा चरण🌷कमल भंसाली

तय है, “धर्म” स्वयं ही परिभाषित होता है, यह कोई मीमांषा का मोहताज भी नहीं होता। जो लोग दैनिक कर्तव्य को धर्म से जोड़कर जीना चाहते, वहां धर्म उनकी आत्मा की पहरेदारी करता नजर आता है। जीवन सभी को सहजता से जीनें के लिए ही मिलता है, पर इन्सान अपने जज्बातों के साथ उदारता बरतने लगता, तो कठिनाइयों को रास्ता मिल जाता और जीवन अविलक्ष्य होकर अवैध मंजिलों की चाह रखने लगता है। आत्मिक अनुसंधान और उससे अर्जित अनुभव ही एकमात्र इस अवस्था का समाधान हो सकता है। अगर हमारे दैनिक कर्म करनें की प्रवृत्ति में नैतिकता समावेश हो, जो साधारण चिंतन में विश्वास रखने वाले के लिए एक असहज क्रिया है क्योंकि चाहतों का चक्रव्यूह में फंसा मन जल्दी से उसे तोड़ नहीं सकता। ऐसी स्थिति में ‘धर्म’ शब्द ही उसे एक संकेतक चेतावनी जरुर देता है कि अति भोग जीवन की मूल्यता नहीं समझ पा रहा अतःउसे नैतिकता से परिचय कराना जरुरी है। प्रलोभ से घिरा इन्सान अपनी इस जगत की असहज महत्वकांक्षाओं के कारण नैतिकता को महज एक बाहरी ही तत्व समझता है, और भूल जाता है, कि नैतिकता और धर्म एक दूसरे के पूरक है, कह सकते है, उनका ‘चोली दामन’ का साथ है। यहां अब जरुरी हो जाता है यह बताने के लिए की धर्म के दस तत्वों का संगम ही ” नैतिकता” है। बिना कर्म नैतिकता की कोई भी परिभाषा नहीं बनती, सही कर्मों को समझ सही ढंग से करना ही ” नैतिकता” है। चूँकि नैतिकता धर्म के साथ हमारे जीवन से जुडी है, अतः संक्षिप्त में नैतिकता की परिभाषा नीति शास्त्र के ज्ञान और उसके अनुरुप किया जानेवाला आचरण होता है। जिसे हम इंग्लिश में morality, moral और ethics जैसे और कई शब्दों के रूप से जानते है।

ध्यान देने की बात है, अतः गंभीरता के साथ हमें यह स्वीकार कर लेना होगा हर जीवन की एक सीमा रेखा होती है, उन सीमाओं के अंतर्गत हर कर्म की अपनी गुणवत्ता होती है, इस गुणवत्ता के विरुद्ध किया हर कर्म अनैतिक और अधार्मिक गिना जा सकता है। जीवन की सत्यता वो ही समझ सकता है, जो सत्य की सत्ता स्वीकार करनें में संकोच नहीं करता। जिसने संसार या इस सृष्टि की सरंचना की उसने बहुत सोच समझकर मानव की भूमिका तय की है। प्रकृति को हम किसी भी दृष्टि से निहारे, अच्छी लगती इसका एक ही कारण है, सत्य सुंदरता का मालिक है, और संसार में सत्य की चाहत हर किसी को होती है। सत्यता की मजबूती कभी कोई भी झूठ कम नहीं कर सकता, यह बात और है, कुछ समय के लिए वो सत्य से इंसान को दूर कर देता परन्तु सत्य से सामना होते ही वो स्वयं अदृश्य हो जाता पर अपने नुकसान कारी प्रभाव से मानव जीवन की मुश्किलें बढ़ा जाता। कहते है, “झूठ के पाँव नहीं होते” पर दिमाग तेज होता है क्योंकि हर अवगुणों का नेता होता है, अतः उसके चालाक होने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होता।

अगर देखा जाय तो हर नैतिकता की कसौटी ‘सत्यता’ ही होती है, आदमी द्वारा कि हर धार्मिक क्रिया अस्तित्वहिन ही रहती है, जब तक वो आत्मा में स्वर्ण शुद्ध “सत्य “को जगह देने के लिए “पूर्ण ईमानदारी” से स्वयं को तैयार नहीं कर लेता। जैसे शरीर अपनी दैनिक क्षुधा शांत करने के लिए भोगवादी बन नाना प्रकार की इच्छायें जागृत करता है, ठीक वैसे आत्मा अपनी पवित्रता की महत्वकांक्षा के लिए हर दैनिक कर्म में एक निष्कलंक सत्य की कामना करती है। हालांकि दैनिक जीवन की परिस्थितया इन्सान को मजबूर और कमजोर बना देती है, और वो आत्मा की कामना पूर्ण करने में अपने आप को ज्यादातर अक्षम ही पाता है। अतः साधारण इन्सान की उपलब्धिया अगर साधारण रहती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये, क्योंकि साधारण और असाधारण का असमान्य फर्क ही तो उसे इस संसार में मान सम्मान का अधिकारी बनाता है।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रवि: ।
सत्येन वायवो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिष्ठतम्।।

( सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है , सब सत्य पर आधारित है )

अगर उपरोक्त श्लोक के अर्थ पर गौर करे तो यही कहना सही होगा की “सत्य ही जीवन” है। झूठ का जंगल कितना ही विस्तृत क्यों न हो जाये, सत्य की समर्थता को वो कभी भी नहीं छू सकता।

हम बात नैतिकता के सन्दर्भ में आगे बढ़ाये तो स्वभाविक है, एक सवाल हमें परेशान कर सकता है, लालच, मोह, क्रोध, स्वार्थ और कई क्षणिक गलत अवस्थाओं में नैतिक तत्वों की क्यों कमी हो जाती है ? यहां हमें कंफ्यूश के उस कथन को प्राथमिकता देनी होगी जब उन्होंने इसी तरह के एक सवाल में जबाब दिया,” Wisdom, compassion and courage are the three universally recognized quality of men.” यानी एक श्रेष्ठ इंसान हमेशा नैतिकता के बारे में सोचता है, साधारण इंसान केवल सुविधा के बारे में सोचता है। तो क्या सुविधाओं को नैतिकता का शत्रु समझा जाय। शायद कदापि नहीं क्योंकि जरुरी सुविधाये इंसानी जीवन के लिए जरुरी है। कहते है ‘अति’ हर साधन की सही नहीं होती क्योंकि उसकी चाह में नकारत्मक तत्व अपना अस्तित्व बोध इंसान को नैतिक चिंतन से दूर करने की कोशिश करते है और देखा गया भी है अति साधनों की भूख कभी तृप्त नहीं होती।

मानव और उसका व्यक्तित्व काफी हद तक एक ही तलाश के मालिक है, जिनकी चाह होती है उन्हें सही उद्धेश्य प्रेरित, आनन्दित जीवन की प्राप्ति हों, और उसके लिए उन्हें संसारिक जीवन धारा की गतिविधि में नैतिक तत्वों का उचित समावेश रखना होगा। चूँकि नैतिकता हर कर्म में लिप्त रहती है, और उसका अदृश्य भाग दैनिक जीवन का मूल्यांकन, देश, समाज, जाती, भाषा, धर्म आपसी मानव सम्बन्धो के दिशा निर्देश के अनुसार तय करता रहता है। नैतिकता का मतलब मानवता की मर्यादा को आत्मिक सुरक्षा प्रदान करना होता है, क्योंकि सृष्टि की रचना करने वाले ने सजीव प्राणियों में सिर्फ मानव को असीमित अधिकारों से साथ सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमता का वरदान दिया है। अतः सृष्टिकर्ता कभी नहीं चाहेगा उसकी गलत धारणाओं का अंजाम बाकी की मानवता को भोगना पड़े।

हमारे सांसारिक साधारण जीवन के सम्बंध में नैतिकता की जो सही परिभाषा Potter Stewart के अनुसार दी जो सकती, वो ” “Ethics is knowing the difference between what you have right to do and what is right to do” है।
क्रमश…..लेखक: कमल भंसाली

💅कर्म का मर्म “धर्म” ✍कमल भंसाली✍ प्रथम चरण

“धर्म” मानव के लिए सिर्फ एक शब्द नहीं अपितु एक सुखद आत्मिक स्पर्श है, साथ में मानव कर्म की सात्विकता के अंश की मीमांसा भी है। सीधा साधा धर्म किसी भी भव्यता का भी मोहताज नहीं है, न ही वो आडम्बरों और पंथो की डोर से बंध कर कोई नीतिगत सिद्धांत तय करता है। इंसानी फितरत धर्म की लाखों परिभाषाएं बना ले , पर सच यही है, “धर्म कभी भी प्रदर्शित नहीं होना चाहता”, वो हमारे दैनिक कर्मो द्वारा अर्जित परिणामों के फल से स्वयं ही दृष्टिगत हो जाता है। धर्म का सम्बंध हर जीवित प्राणी से है, धर्म का शरीर और आत्मा दोनों से ही सम्बंध रहता है। कुछ आधात्यमक शास्त्रों के अधीन होकर हम यह भी कह सकते है कि हर आत्मा की एक ही चाहत होती है, वो अक्षुण रहें कहीं से भी खण्डित न हों जिससे उसके वापसी सफर में कम कष्ट हों या न हो । धर्म इसमें उसको सहयोग करता है। आत्मा एक चीज से बहुत घबराती वो है मन की चंचलता। मन की चंचलता सांसारिक सुख और दुःख दोनों का निर्माण करने की क्षमता रखती है। हम जीवन के धार्मिक पहलू पर दृष्टिकोण तय करे, उससे पहले हमें एक नजर इस श्लोक पर जरुर डालनी चाहिए, शायद जिससे हम कुछ हद तक धर्म कि परिभाषा के आसपास के माहौल से परिचित हो सकते है।

अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेयन्द्रिय संयमा ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशक धर्म साधनम् ।।

( अंहिसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप, और ध्यान धर्म के साधन है।)

सवाल यह भी किया जा सकता है, क्या इनके अलावा बचे कर्मों में अधर्म समाया है, नहीं, सच्चे आत्मिक चिंतकों के अनुसार चेतनामयी आत्मा जिस कर्म की अच्छाई को पुष्टि कर दे और उस से दूसरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे तो वो कर्म भी धर्म की सांकेतिक परिभाषा के अंतर्गत ही आता है।धर्म कि हम सब बातें और चर्चा करते है, पर हम उससे कितने प्रभावित है और हमारे जीवन में उसकी क्या भागदारी है ! ये एक सत्य सवाल है, जो हर एक की आत्मा जीवन के अंधेरों में स्वयं से पूछती है। हालांकि सन्तोषजनक उत्तर कर्म से ही जाना जा सकता है, पर यह पूर्ण सत्य की कमी की वजह से जान पाना जटिल है।अति संपन्न धर्म शालीनता चाहता है, उसे अपने नाम की चर्चा में जरा भी उग्रवाद या प्रशंसा की चाहना पसन्द नहीं है। माना जाता है, मानव जाति के उदय के साथ धर्म और कर्म का भी उदय हो गया था। हालांकि कर्म ने पहले जीव विज्ञान के तहत अपना वजूद मानव को स्वीकार करा दिया। कर्म मानव की पहली जरुरत थी, अपने आपके अस्तित्व को बचाने के लिए। कुछ कर्मो के नकारत्मक फल पाने के बाद मानव ने कर्म की नैतिकता पुष्टि के लिए आत्मिक तराजू पर उसे तोलना शुरु कर दिया तब ” धर्म” की शालीनता हर प्राणी तक को समझ में आने लगी। अब हम “धर्म” शब्द को भारतीय परिवेश में बतलायी परिभाषा के अंतर्गत समझने की कोशिश करते है। वास्तव में धर्म एक संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ बहुत व्यापक है। ध + र + म = धर्म । ध देवनागरी वर्णमाला का 19 वा अक्षर और तवर्ग का चौथा व्यंजन है। भाषाविज्ञान के दृष्टि से यह दन्त्य, स्पर्श, घोष, तथा महाप्राण ध्वनि है। संस्कृत के अनुसार धा ( धातु ) + ड विशेषण- धारण करने वाला, पकड़ने वाला होता है। यानी जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म कभी विभक्त नहीं हुआ, न ही गलत परिभाषित होता है, पंथों के आडम्बरों में कितना धर्म सही है, यह एक तर्क का विषय भले ही हो पर धर्म की परिपक्वता सत्य से पोषित होने कारण उसकी अखण्ड पवित्रता आज भी बरकरार है। इसलिए ये हमें सदा सुनने को मिलता रहेगा कि” धर्म की जड़ हरी होती है”। ये प्रकृति का धर्म के प्रति अपना विशिष्ट अनुराग है।

चूँकि धर्म जीवन का एक हिस्सा है, अतः आत्मबोध से उसकी अपनी अनुबन्धनता है। यही आत्मबोध हर इंसान की कमजोरी और मजबूती का निर्माणिक तत्व है। अगर धर्म के वैज्ञानिक पहलू पर एक नजर से चिंतन करे तो हमें धर्म को जाती, पंथ, समुदाय, देश और काल से विच्छिन करना जरुरी होगा क्योंकि ये इंसानी जरुरत की इजाद की हुई धाराणायें है, जिनमें ऐसी कोई भी गारन्टी नहीं मिलती कि ऐसा करने से हमें देवत्व या आत्मा को निर्वाण मिल जाएगा। इस कथन को सहजता से स्वीकार करने में स्वामी विवेकानन्द यह सन्देश शायद सहयोग करे जिसमे उन्होंने कहा है ” तुम्हे अंदर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हे पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्हे आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई गुरु नहीं है”। वास्तिवकता भी इस बात को स्वीकार ही करेगी की धर्म सात्विक रसात्मक तत्व है, सदा अप्रभावित रहता है, न यह किसी से कलंकित किया जा सकता न ही ये किसी से आलोचित हो सकता। दस सहः तत्व से निर्मित धर्म जीवन को अखण्डता, विशालता, आत्मिक सम्पन्नता, उसकी अपनी नैसर्गिक का सही अनुभव कराना चाहता है। हर मानव, धर्म के इस सूक्ष्म चिंतन को नकारता भी नहीं पर पूर्णता से भी इसे स्वीकारता भी नहीं, दुःख या उसकी मजबूरी कह लीजिये सीधे सरल समुज्ज्वल सत्य पर उसका विश्वास जीवन की कई अँधेरी टेडी मेड़ी पगडंडियों पर अक्सर डगमगा जाता है। मानव कि इस कमजोरी ने “माध्यम” को जन्म दिया, जिसकी शायद ही कोई जरुरत नहीं थी। पर वक्त की अपनी करामत होती है, उसका आनन्द वो कई तरह से लेता है। मानव वक्त का एक हिस्सा है, अतः “धर्म” का बाहरी स्वरुप भी प्रभावित होना लाजमी हो गया और क्षेत्रीय स्थल के अनुसार समझा जाने लगा। हम अपने देश के सन्दर्भ में इस पर ज्यादा चिंतन नहीं कर सकते, क्योंकि हर सकारत्मक और नकारत्मक क्षेत्र में लोग अपनी सुविधा अनुसार इस का सिर्फ शाब्दिक उपयोग करते है, जिसकी परवाह अमृतमय धर्म कभी नहीं करता। धर्म सिर्फ उस विशेष मानव से ही सम्बंध रखता है जो उसके अस्तित्व को स्वीकारता है, सामूहिकता से उसका कोई सम्बंध शायद ही हो। आर्थिक युग में धर्म को सामूहिक रूप देकर पुण्यता की खरीद समझना सिर्फ एक मानसिक क्रिया का ही स्वरुप है। निज- धर्म की शुद्धता की कसौटी स्वयं इन्सान का अर्जित आत्मिक सन्तोष ही होता है। जब कोई आडम्बरो से सजा समुदाय, जाति, पंथ या देश जब धर्म निर्देशक होने का दावा करता तो कहने में संकोच नहीं हो सकता उनका उद्धेश्य धर्म को समझने में संकुचित ही है, या फिर, किसी अस्वीकृत छवि को प्रचलित और प्रसारित करने का प्रयास मात्र है ।

कहते है, राजा हरिश्चंद्र ने सत्य से बंध कर ही धर्म को अपना जीवन आधार बनाया और कभी भी कर्तव्य के प्रति अपनी आस्था को मोह, स्वार्थ, झूठ, फरेब, लालसा, असंयमन आदि नकारत्मक चिंतन का शिकार नहीं होने दिया। जिंदगी सभी के पास एकल रुप में सीमित अवधि लेकर आती है, अपूर्णता के जंगल में सही राह भूल जाती है और स्वयं निभने वाले धर्म से दूर होकर जब उसे अपनी विपरीत दिशा में होने का अनुभव शुरू होता है, तो धर्म को पाने के लिए छटपट करने लगती है। संसार की विचित्रता को देखिये, जो धर्म अपने हम में स्वयं समाहित हो एकान्तिय होना चाहता है, अपने प्रत्येक तत्व के साथ मसलन सच, संयम, धैर्य, सेवा, स्नेह, प्रेम,साधना, अहिंसा और तप उन्हें हम अनदेखा कर झूठ, भोग, अधैर्य, तिरस्कार, घृणा, हिंसा, अंहकार आदि संसारिक मंजिल प्राप्ति के साधनो को अधिक महत्व देते है। अफ़सोस इतना ही है जन्म से जीवन के अंतिम क्षण तक की सवेंदनशील स्थितियों में जहां इन्सान का हमराही प्राकृतिक धर्म होना चाहिए, वहां व्यवहारिक आडम्बर कितनी शान से खड़ा मुस्करा रहा होता है। हमारे परिमार्जनीय कर्मों में ही शायद संभावित धर्म माखन के रुप में सम्माहित है, हमें इसलिए अपने हर कर्म का आत्ममंथन नियमानुसार करने की जरुरत है। वैसे भी उपदेश से ज्यादा धर्म को साथ साथ रखने की कोशिश में स्वयं का स्वयं ही आत्म मूल्यांकन करने का प्रयास सर्वश्रेष्ठ होता है, ये मेरी नहीं जीवन सुधारक विशेषज्ञों की राय है …..क्रमश …लेखक *** कमल भंसाली***