💖दोस्ती💖 दोस्ती दिवस पर सप्रेम भेंट कमल काव्य सरोवर के दोस्तों को✍ कमल भंसाली

दोस्ती खास दिन की नहीं दिल की मौहताज होती
सच्ची दोस्ती हर अंधेरे में आशाओं की धूप होती
मकसद न रखे तो दोस्ती हर रोज फलती फूलती
स्वार्थ के गलियारों में भी मायूस होकर साथ देती

जिन्हें सच्चे दोस्त मिले उन्हें कृष्ण की नहीं है तलाश
सुदामा बनना नहीं आसान प्रेम की अगर नहीं प्यास
गलतफहमियों की जब भी बहे कोई नाजुक बहार
तो मेरे दोस्तों गले मिल कर कहो कैसे हो मेरे यार !

अर्पण कर दे जो सब कुछ सच्ची दोस्ती के नाम
निभाये हर राह में, न करे शक न ही करे बदनाम
दोस्ती है जीवन की शान हर दोस्त को आज सलाम
दोस्ती सदा अमर रहे,”कमल” कहे हर दिन हर शाम

समय बदले, मौसम बदले, बदल जाये अगर नसीब
गरुर न करे कोई दोस्त रहे सुख दुःख में सदा करीब
कृष्ण समझ कभी भी नहीं कहे सुदामा तूं है गरीब
चावल की कीमतजो समंझे वो दोस्ती का है नसीब

🚸 दोस्ती 😃एक चर्चा भावुकता भरी🔴कमल भंसाली

रिश्तों के आकाश में कितने ही आपसी सम्बंधों के सितारे चमकते है, उनकी चमक जितनी दूर से तेज नजर आती है, शायद ही नजदीक से उतने चमकते नजर आये, पर एक रिश्ता जो खून का नहीं होते हुए भी जिंदगी की क्षितिज में ध्रुव तारा की तरह हर तरह के सुख दुःख में अपनी चमक कायम रख सकता है, उसे हम “दोस्ती” के नाम से जानते है। दोस्ती शब्द की एक बड़ी शानदार परिभाषा पुरानी फ़िल्म दोस्ती के इस गाने के शुरुआती मुखड़े से उजगार होती है,

“मेरा तो जो भी कदम है, वो तेरी राह में है
के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाह में है ”

क्या वास्तव में दोस्ती को इस तरह से महत्वपूर्ण दर्जा दिया जा सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर बड़ा संक्षिप्त है, अगर दोस्ती सच्ची और पवित्र हो, तथा दो दोस्त अगर अपने दिल के तार एक ही सुर में बजाते हो, जिनकी आत्मा में हर सवाल का ईमानदार जबाब हो, तो निसन्देह जीवन को इस से बड़ा किसी भी प्रेम का उपहार नहीं मिल सकता। रिश्तों का महत्व अपनी जगह कम नहीं होता, परन्तु आज के यथार्थ में दोस्ती की भूमिका बड़ी हो गई है, इससे इंकार करना, सही नहीं कहा जा सकता। कभी कभी तो ऐसा होता है, कि पारिवारिक शान्ति के लिए दोस्तों का सहयोग लिया जाता है। आज के युग में जब तकनीकी युग से ऊपर की तरफ जा रहा है, तब से पारिवारिक रिश्ते खोखले और कहने मात्र के लिए रह गए और इससे इस कृत्रिम रिश्ते का महत्व और भी बढ़ गया है।

हम अपनी चर्चा में इस रिश्ते के हर पहलू पर गौर करना चाहेंगे पर उससे पहले यह स्पष्ट करना उचित होगा कि इसकी कोई सटीक उम्र की बात नहीं कर सकते पर हाँ, इसे हम समझदारी का रिश्ता कह सकते है। जब तक दोस्ती करने वालों की समझ साथ चलती है, उतनी ही इसकी उम्र होती है। हकीकत में दोस्ती एक कलात्मक सम्बंध है, इसका सहजता से दो प्राणियों में निर्माण किया जा सकता है। कई ऐसे साक्ष्य है, जिनसे प्रमाणित किया जा सकता है, कि दोस्ती जीव, जन्तुओं सभी की भी जरुरत है, और वो इंसानी दोस्ती से ज्यादा सच्ची व ईमानदार मानी गई है। दोस्ती का कोई जैविक कारण ढूंढना बहुत मुश्किल होता है, परन्तु इतना तय किया जा सकता है की दिल और दिमाग दोनों के सहयोग से जन्म लेने वाला यह रिश्ता ज्यादातर अपनी उच्चतम क्षमता में भी स्वार्थ से काफी ऊपर होता है। पारिवारिक रिश्तों में अपेक्षाओं की आंशका जहां ज्यादा रहती है, वहां दोस्ती बड़ी बिंदास होती है।

आखिर दोस्ती बनती क्यों फिर किस कारण से बिगड़ भी जाती है, इसका एक संक्षित सा उत्तर है, स्वार्थ और अविश्वास। आज हम कृष्ण और सुदामा के युग की बात नहीं कर सकते क्योंकि उस समय स्वार्थ की भूमिका बड़ी ही कम होती थी, अतः उनकी जैसी दोस्ती अब सिर्फ इतिहास का उदाहरण मात्र ही है। आज ज्यादातर दोस्ती आपसी स्वार्थ से ही बनती है, और विश्वास की मात्रा तो नगण्य के समान या ऊपरी सतह की पर्त मात्र है। इस तरह की दोस्ती जरुरत की दोस्ती कह लाती है, और ये ज्यादातर राजनेताओं, अधिकारीगण, प्रसिद्धि पानेवाले लोगों में और उच्चतम धनाढ़्य लोगों के अंतर्गत ही होती है। कहने की जरुरत नहीं ऐसी दोस्तियों की बुनियाद दिल से नहीं दिमाग से बनती है। इनकी उम्र जरुरत के अनुसार ही होती है, और रोजमर्रा की जिंदगी में बेखुबी से प्रयोगित होती रहती है। इनके टूटने से सुख दुःख का कोई अनुभव नहीं होता। दोस्ती शब्द की मजबूरी ही कहिये ऐसे सम्बंधों में उसका प्रयोग किया जाता है, हकीकत में जब की एक भी सद् गुण का मिलना उस सम्बोधन में मुश्किल होता है।

चूँकि हमारा ध्येय दोस्ती को अंदर तक आज के युग के अनुसार जानने का है, तो हम उस दोस्ती की बात थोड़ी यहां करले, जो सचमुच में हमारे लिए उपयोगी है, तो शायद हमारा मकसद अधूरा नहीं रहे। आधुनिक युग ने इंसान के दिल की परिभाषा प्यार के सम्बंध में बदल दी है। प्यार आत्मिक नहीं शारीरिक सुख का साधन बन गया है। बात यहां तक भी रहती तो शायद ठीक थी, परन्तु जब अर्थ की उतप्ती भी इससे करने की सोच दिमाग में पनपने लगे तो शायद दोस्ती शब्द खंजर का काम करने लगे। आप और हम इस से वंचित कब तक रह सकेंगे ! यह चिंतन और चिंता का विषय है। आज जन्म लेने के बाद जब बच्चा कुछ ही साल बाद फ़ेसबुक जैसी सोसियल साइड पर अपनी प्रोफाइल बनाता है, और दोस्ती के लिए निमन्त्रित करता है, तब ख्याल आता है, उन दोस्तियों का जो कभी गांव की गलियों में तैयार होती और बिन निमन्त्रण सच्ची गुणवता के आधार पर बनती, कहना ना होगा, ऐसी दोस्ती जिंदगी भर अपनी महक से लिपटी रहती, जब भी साथ होती, ख़ुशी का वातावरण तैयार करती। फ़ेसबुक तथा अन्य सोसियल साइड जो दोस्ती को बनाने का काम करते है, वो मानव की त्रासदी है, या प्यार की आकांक्षा, कहना फिलहाल मुश्किल ही है, पर वक्त की शंका गलत भी नहीं है, आदमी, आदमी कम व्यपारी ज्यादा बन गया है। खुदा ख़ैर करे।

किसी भी चीज का हर पहलू अच्छा या बुरा नहीं होता है, उसका उपयोग ही उसे अच्छा या बुरा बनाते है। आज जिंदगी जिस तरह से बिखर कर अनुशासनहीन हो रही है, उसमे हम अपनी कुछ इच्छाओं का तुस्टिकरण जरुर इस तरह के मीडिया से करते है, परन्तु दैनिक और व्यवहारिक दुनिया में तो सजीव दोस्ती ही सही काम करती है। भावनओं से सजी दोस्ती का हर मर्म समझती है। अतः हम अभी सजीव दोस्ती के ऊपर ज्यादा समय दे सके, तो जिंदगी का आनन्द कुछ और ही होगा, सोसियल मीडिया की दोस्ती बिना किसी गुणवत्ता के कई एब तो देती है, पर तन्हाई का भी कोई उपचार नहीं कर पाती।

अगर हमारे पास कुछ दोस्त है, तो उन्हें अगर बेहतर ढंग से जानकार जीवन को हम सुगम ढंग से जीने की कल्पना कर सकते है, आवश्यकता इतनी है, दोस्त को मान सम्मान हमसे मिले, जरुरी नहीं की हर समय वो साथ चले पर जीवन की कठिनता में अगर बिना कोई प्रश्न किये, वो अपनी क्षमता के साथ खड़ा है, तो समझिये एक सच्चे दोस्त की महत्वपूर्ण सम्पदा आपके पास है। तभी तो अल्बर्ट कामुस ने कहा ” Don’t walk behind me; I may not lead. Don’t walk in front of me; I may not follow. Just walk beside me and be my friend.”

वैसे दोस्त बनने का कोई कारण होना जरुरी नहीं है, कोई जब चाहे दोस्त बना सकता या बन सकता है, वास्तव में ऐसे सम्बंधों की हकीकत सिर्फ जीवन के ऊपरी धरातल तक ही सीमित रहती है। माना, चन्द क्षणों की जान पहचान भी दोस्ती में तबदील होते देरी नहीं लगती, परन्तु उम्र की तराजू से इस तरह की दोस्ती को गंभीरता से नापना सहज नहीं होता। आइये, संक्षिप्त रुप से दोस्ती के प्रकार की चर्चा करते है, हालांकि यह दावा नहीं है, इनके अलावा और भी प्रकार की दोस्ती नित नये अनुभव के द्वारा हर रोज सामने आकर अपना अंत भी बता जाती है।

1.सच्ची दोस्ती
2. आकर्षण की दोस्ती
3. वैचारिक दोस्ती
4. मीडिया द्वारा दोस्ती
5. मजबूरी की दोस्ती
6. स्वार्थ की दोस्ती
7. राजनैतिक दोस्ती

चूँकि सभी प्रकार की दोस्ती स्वयं को खुद परिभाषित करती है, सिवाय, एक सच्ची दोस्ती को छोड़ कर क्योंकि सब कि कोई वजह बनती है, उनकी गुणवता की चर्चा करना कोई अच्छी बात नहीं है। अतः जो दिल, आत्मा को जीवन पर्यन्त सन्तोष दे, की , कि मेरे पास एक सच्चा और सही दोस्त है, हकीकत में वो ही ” सच्ची दोस्ती ” होती है । ऐसी पवित्र दोस्ती के लिए खुद को भी सच्चा और संयमित बना रहना जरुरी है।

” छुपा हुआ सा मुझ ही में है तू कहीं ऐ दोस्त
मेरी हँसीं में नहीं है, तो मेरी आह में है……( फ़िल्म दोस्ती )

चर्चा यहीं समाप्त नहीं होती……..लेखक कमल भंसाली……क्रमश

प्यार और वासना…एक चिंतन, भरी चर्चा…भाग 2 अंश 1 *****कमल भंसाली

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दोस्तों, हमने प्रेम के रिश्तों के सन्दर्भ में कुछ पारिवारिक रिश्तों की चर्चा की, परन्तु कुछ रिश्तें जो आज के जीवन में काफी उभर कर पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर भारी पड़ रहे है, उनमे कुछ को समझना बहुत जरुरी है। “दोस्ती” और “प्रेयसी” का सम्बन्ध आज के आधुनिक युग में काफी महत्वपूर्ण बनते जा रहे है। दोस्ती का रिश्ता आपसी सहमति से बनने के कारण जीवन को काफी प्रभावित करता है । कुछ इस तरह के रिश्तें जब दैहिक सीमा रेखा को पार करने लगते है, तो काफी संवेदनशील होने का डर रहता है। कहना न होगा, इनके लिये संयम, धैर्य और सही चिंतन की बहुत जरुरत होती है। सबसे पहले हम दोस्ती के रिश्ते की तरफ नजर करते है । इस रिश्ते में एक खूबसूरती है, यह परम्परागत बन्धनों से आजाद होता है । सबसे बड़ी सावधानी दोस्ती के रिश्तें में यही है, कि इसमे वित्तीय लेनदेन से बचना चाहिए, परन्तु आज अर्थ तन्त्र का युग है, अतः इसमे जब वित्तीय लेनदेन होना ,कभी कभी जरुरी हो सकता है। ज्यादातर दोस्ती इस कारण प्रभावित होती है, अतः इसकी सावधानी रखी जाए, तो जीवन के क्षेत्र में दोस्ती चमत्कारी साबित हो सकती है। अमेरिका में एक कहावत का प्रचलन है कि ” जब आप किसी दोस्त से रुपया मांगों तो पहले आपको निश्चित कर लेना चाहिए की आपके लिए दोस्त और रुपये में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है “। दूसरे कारणों में आपसी प्रतिस्पर्धा होती है, यह एक ही क्षेत्र विशेष में दोनों के होने के कारण हो सकती है। हालांकि ज्यादातर दोस्ती स्वभाव, और व्यवहार के आकर्षण से की जाती है, पर धीरे धीरे इसमे परिपक्वता आती रहती है,और समझदार आदमी उसकी सीमा रेखा को पहचान कर दायरे के अंतर्गत दोस्ती निभाता है। इसमे बिना रिश्ते के प्रेम के बावजूद काफी अंतरंगता होती है, यह अनमोल हो, तो कृष्ण सुदामा जैसी दोस्ती समझी जाती है।

प्रेयसी और प्रेमी के सम्बन्ध में यह चिंतन काम नहीं कर सकता, क्योंकि उसमे प्रत्यक्ष वासना ज्यादा होती है, प्रेम की जगह आकर्षण ही ज्यादातर होता है। इसकी बुनियाद में अगर सच्चा प्यार हो तो अलग बात है, नहीं तो आजकल स्वार्थ का भरपूर प्रयोग दोनों पक्ष करते है। प्रेयसी या प्रेमी दोनों ही विस्फोटक स्थिति में रहते है, क्योंकि इस तरह के सम्बंधों को ज्यादातर गुप्त ही रखा जाता है, जब तक यह किसी कारण से उजगार नहीं होते या दोनों इसे कानूनी मान्यता नहीं देते। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने है, जो अनैतिक और कानून के विरुद्ध है, फिर भी, ऐसे रिश्ते को परिवार और समाज की मान्यता मिल जाती है, अतः आजकल विरोध भी नगण्य नजर आता है, शायद, यह कोई नई सोच का नया चमत्कार है, जहां समाज शांत रहता है।

भारतीय संस्कृति की एक विशेषता है, यह युग के अनुसार बदलती है, परन्तु गति धीमी होती है, अतः संघर्ष भी हर बदलाव को झेलना पड़ता है। आज रिश्तों के सन्दर्भ में कुछ ख़ास परिवर्तन की बात हम यहां करना चाहेंगे, जैसे आज के दौर में लड़का लड़की का बिना शादी साथ रहना। आज से कुछ वर्षो पहले किसी लड़के का किसी लड़की से बात करना मामूली बात नहीं होती थी, यहां तक की पति पत्नी दिन में मिलना मुश्किल होता था। प्यार का इजहार करने में कई तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ता था। समय बदला, तरीके बदले, प्रेम पत्र का विकास हुआ। कहते है, इंतजार के साथ प्राप्त हुई वस्तु का एक अलग ही रोमांच होता है, सच भी है, प्रेम जाने अनजाने कई कसौटियों पर परखा जाताऔर पूर्ण सम्पूर्णता प्राप्त करता। स्थानीय आय के साधन कम होनें के कारण लोग दूसरे राज्यों या देश उपार्जन करने के लिए जाते थे, इस जाने को “परदेश” जाना कहते थे। दूरिया प्रेम करने वालों को असहनीय विरह देती है, अतः वेदना को कम करने के लिए प्रेम पत्रों का अविष्कार हुआ। निश्चित तौर पर यह कहना मुश्किल होगा कि पत्रों का आदान प्रदान कब शुरु हुआ, परन्तु प्रेम पत्र इंसानी भावनाओं को प्रकट करने का एक अनुपम साधन है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता, जिसमे प्रेम के प्रति शालीनता, स्वस्थता, और संस्कारित चाहत का समावेश किया जाता है। इन पत्रों में कस्तूरी की तरह सुंदर शब्दों से ही प्रेम या प्रणय प्रकट किया जाता, भाषा का काव्यमय हो जाना इन पत्रों में मामूली बात होती है। हालांकि आज के युग में फेसबुक और वाट्सअप पर ज्यादातर फूहड़ सन्देशों की भरमार ही नजर आती है।

जरा गौर कीजिये नेपोलियन के इस पत्र के अंश पर जो उसने अपनी प्रेमिका जोशफिन को लिखा था । ” जब से, मैं तुमसे बिछड़ा, मैं बहुत उदास हूं । लगता है, मेरी सारी खुशिया तुम्हारें पास रह गई, मैंने सारे समय तुम्हारी यादों की बाहों में, तुम्हारे आंसुओ में, तुम्हारे स्नेहपूर्ण प्रेम में रहता हूं। जोशफिन, तुम्हारी अपरुव खूबसूरती मेरे दिल को लगातार जलाने वाली मशाल बन गई। तुम्हारा एक महीने का प्यार, जब से अलग हुआ, मुझे अहसास कराता है, मैं तुम्हे उससे हजार गुना प्यार ज्यादा करने लगा हूं। हर दिन यह प्यार तुम्हारे लिए बढ़ता ही जाता है”।
सच्चा प्यार जीवन को कितना खूबसूरत बना देता है ? है, ना दोस्तों। क्रमश*****कमल भंसाली

दोस्त बनो, पर दिल से……कमल भंसाली

कहने को, दोस्ती हजारों से की जाती
नगण्य, ही सच्चे दिल से निभाई जाती
दुश्मनी एक से भी हो, जिंदगी भर रहती
न ऐसी दुश्मनी अच्छी, न ही ऐसी दोस्ती

करो आरजू जिंदगी से, दोस्ती सलामत रहे
तहे दिल से कहो, दोस्त आस पास ही रहे
हम राही मंजिल के हो चाहे, अलग अलग
दिल हमारा सहज धड़कता रहे , संग संग

भूले भी होगी, जीवन पथ में अनेक
पर, न रहे गलतफहमी की बूंद, एक
मन सजा रहे, स्नेह दोस्ती में, सदा रहे
दिल के पट पर दोस्ताना का चिन्ह रहे

दोस्ती “दिवसो” की मोहताज न समझो
उसे सदा अपने जिगर का, अंश समझो
फूल दोस्ती है, जरा संभाल कर ही रखना
अर्थ के जंगल में, इसे निस्वार्थ बन समझो

कहो दोस्त से, आज भी हूँ दोस्त तुम्हारा
विपरीत स्थिति में, हाथ न छिटके हमारा
बन्धन प्यार के विश्वास का, बंधे ही रहना
तस्वीर बदल दे वक्त, पर दोस्त न बदलना……कमल भंसाली