“वाह” वाह कहना चाहता…..कमल भंसाली

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आत्मा मेरी हुई उदास
जाने का समय है, आसपास
कुछ लम्हें जो बाकी
जीना है, उन्हें हर सांस
पूरी जिंदगी बीत गई
कुछ नहीं किया ख़ास
अंतिम प्रहर में
जीवन को एक बार
नये ढंग से सजाना चाहता
जिंदगी को
“वाह” वाह कहना चाहता

अब तक जो जीया
कह नहीं सकता
कब सुख में हंसा
कब दुःख में रोया
दोनों ही मेरे साथी
दोष उन्हें नहीं देना
अपनी खामियां
अपनी नकारात्मकता से
मुकर नहीं सकता
अब बन्धन मुक्त हो
जिंदगी को
“वाह” वाह कहना चाहता

कौन थे, अपने, कौन पराये
जो खुद न समझा, चलो भूल जाए
अच्छे लगे, अपनत्व के बादल
छाये, पर बरस न पाये
शिकवा दिल अब नहीं करता
मिला जो, भाग्य मानता
जो नहीं मिला, उसे दुःख नहीं मानता
बन हर मोड़ का राही
सभी को सुखी देखना चाहता
जिंदगी को
वाह वाह कहना चाहता

सत्य की धुरी से कई बार बिछड़ा
लालसाओं के जाल ने भी जकड़ा
क्रोध, कामनाओं से अतृप्त रहा
अहंकार के मदिरालय में
नशे में झूमता ही रहा
मन,अब सब छोड़ना चाहता
जिंदगी को
वाह वाह कहना चाहता

जीवन को ख्बाब ही समझा
नित नई मंजिले तलाशता रहा
साँसों को जीवन समझता रहा
समय का मुफ़्त का उपहार
देता रहा सदा सब को उधार
अंतर्मन अब नया रुप चाहता
हकीकत में, अब तक सोया
उठकर अब , जागना चाहता
जिंदगी को
वाह वाह कहना चाहता
आप से शुभकामनायें चाहता……कमल भंसाली