🙌संवेदन पूर्ण सत्य🕸️कमल भंसाली

“दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है वह है “दूसरों के द्वारा बोलेजाने वाला सत्य”, यह एक तथ्य है, इससे इंकार करना शायद ही आसान होगा। “सत्य” बोलने वाले लोगो की तादाद नगण्य के आसपास ही अब रहती परन्तु किसी समय झूठ बोलने वालो की गिनती हुआ करती थी, इस बात को आज का आधुनिक युग शायद ही स्वीकार करेगा। आज सत्य को एक हारा हुआ खिलाड़ी या नेता भी स्वीकार करने से झिझकता है। शाश्वत चिंतन करे तो ये बात समझ में आ सकती है कि दुनिया का अस्तित्व पूर्ण सत्य में आज भी समाया है, हम चाहे या नहीं प्रकृति अपने आप को सत्य से अलग नहीं कर सकती। हम कितना ही झूठ का दैनिक जीवन में प्रयोग कर ले पर आत्मा उसे अंदर तक नहीं ले पाती, हमारे बोले हुए किसी भी झूठ पर उसका कराहना महसूस किया जा सकता है।

“हम जी रहे है यह सत्य हो सकता है” परन्तु हम ‘सही’ जी रहे ये संदेहपूर्ण है। सवाल किया जा सकता है, क्या सत्य पूर्ण जीवन जीया सकता है ? उत्तर आज के युग में आसान नहीं लग रहा कारण जीवन की गतिविधिया आजकल झूठ के इर्द गिर्द ही ज्यादा समय बिता रही है। कभी सत्य को जीवन की धुरी समझा जाता था, आज उसकी जगह झूठ ले रहा है, इसे जीवन की विडम्बना ही कहे क्योंकि जीवन आज इसी कारण शायद टूट कर बिखर रहा है। जीवन को आज सब सांसारिक सुविधायें बहुत तेजी से प्राप्त हो रही है और बताना भी जायज नहीं होगा जीवन अपना सास्वत मूल्य खो चूका है, और स्वयं ही किसी त्रासदी का शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह देता है। सही भी है, झूठ का भारीभरकम वजन कब तक ढोयेगा।

चाणक्य राजनीति के गुरु थे उन्होंने राजधर्म के लिए कई तरह की चालाकियों का सहारा लिया परन्तु झूठ को दूर रहकर। उनके इस कथन पर गौर करते है ” सत्य मेरी माता है। आध्यात्मिक ज्ञान मेरा पिता है। धर्माचरण मेरा बंधु है। दया मेरा मित्र है। भीतर की शांति मेरी पत्नी है। क्षमा मेरा पुत्र है। मेरे परिवार में ये छह लोग है।” काश आज के राजनेताओं में इस तरह के विचार अपनाये हुए होते तो निश्चित ही भारत आंतरिक रुप से कमजोर और गरीब राष्ट्र की गिनती में न होता।

इंसान का व्यक्तित्व प्रकृति ने बड़ी सूझबूझ वाला बनाया है, सर्वगुण और अवगुण वाले संसार में उसको अपना व्यक्तित्व स्वयं निर्धारण करने का अधिकार भी उसे दिया। सक्षम व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के जीवन दर्शन पर सरसरी नजर डालने से इस बात से इंकार नहीं करना पड़ेगा कि बिना असत्य का सहारा लिए वो इस मंजिल तक पंहुचे है।

असहाय सी स्थिति है आज जीवन की, भाग्य से प्राप्त खुशहाली अति अर्थ के दीमक से हर दिन जीवन को छीजत प्रदान कर रही है। पल की मोहताज जिंदगी अर्थ के कारण कटुता भरे वातावरण में कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों के विषालु कीटाणुओं से ग्रस्त हो रही है। इस का प्रमुख कारण हम सब समझकर भी नहीं समझते वो है “अति दौलत की भूख”।
हर रोज हमारे आसपास ही क्या हमारे स्वयं के जीवन मे उसकी कमी या अति, जीवन को संकुचित होने का अनुभव कराती है। जब की जानते है, जब तक जीवन है, तब तक मालिक होने का दावा कर सकते है पर उसके बाद उसका मालिक कोई और स्वतः ही हो जाता। अतः इस सत्य को स्वीकार कर लेना ही सही होता है अर्थ के कारण किसी भी सम्बन्ध को कटुता का अनुभव न दिया जाय। कठिन समय मे आपसी प्रेम काफी फलदायक होता है।

कहते है जीवन की शुरुआत प्रेम से हुई और प्रेम सदा सत्य से संपन्न रहना पसन्द करता है, झूठ से वो सदा नफरत करता है। किसी शारीरिक बंधन के चलते वो झूठ को मजबूरी से सहन करता है। इस तथ्य को रिश्तों की दुनिया में सदृश्य समझा जा सकता है। रिश्तों के बनते बिगड़ते तेवर जीवन को कई तरह से प्रभावित करते है। रिश्तों की मधुरता जीवन को सकारात्मक चिंतन प्रदान कर उसे मजबूत कर सकती है। गलत भावनाओं के बस में होकर रिश्तों में कटुता का संकेत देना मात्र जीवन के पथ को कठोरता प्रदान कर सकता है, अतः रिश्तों के प्रति हमारी संवेदनशीलता में सत्य का अंश सही मात्रा में रखना उचित लगता है। जीव विज्ञानी डेविड जार्ज हस्कल का यह कथन आज के युग अनुसार अक्षरस सत्य लगता है कि ” The forest is not a collection of entities (but) a place entirely made from strands of relationship”.

आलोचना से पीड़ित प्रेम कभी भी जीवन को सुख नहीं देता परन्तु समझने की बात है बिना आलोचना का प्रेम चापलूसी की या गुलामी की श्रेणी में आता है, प्रेम का निम्नतम पतन भी यहीं होता है, इस सत्य को कितना ही कड़वा कह लीजिए पर ह्रदय इसे स्वीकार कर सन्तुलित रहता है। आधुनिक अर्थतन्त्र की इस दुनिया की विडंबना ही कहिये इंसान के पास हजारों साधनों का भरपूर भंडार हर दिन तैयार हो रहा है, शरीर नाच रहा सब कुछ भोग रहा पर मन तो खालीपन का शिकार हो रहा। सबके रहते इंसान जब उम्र या किसी कारण से लाचार होता है तो टूट कर बिखर जाता है और दिल के अरमान दिल मे ही रह जाते, कोई सुनने वाला, कोई मन से सेवा करने वाला नहीं रहता उसके आस पास। इसका एकमात्र सत्य उतर यही हो सकता:

“जो दिया नहीं वो मिला नही
झूठ से सत्य कभी दबा नहीं
प्रेम को साधन नहीं संवेदना चाहिए
सही जीने के लिये इस सत्य की समझ चाहिए”

लेखक: कमल भंसाली ।

♨खुदगर्ज नहीं ♨खुद्दार बनिये भाग 1 ✍कमल भंसाली

आधुनिक युग जिसमें हम अपनी जिंदगी का सफर कर रहे वो समय समय पर हमें इस अहसास की अनुभूति कहीं न कहीं करा ही देता है कि क्या हमारा इस युग का जीवन सफर हमें आनन्दमय और सुखी होने से कहीं वंचित तो नहीं कर रहा है ? सवाल ऊपर से जितना सरल दीखता उतना ही अंदर से सही उत्तर खोजने में सरल नहीं लगता। फिर भी हमारी कोशिश है, हम आज कम से कम इस सन्दर्भ में स्वयं को अवलोकन करने की चेष्टा करे। माना जा सकता है संसार वक्त के अनुसार बदलता है । बदलाव से कोई भी अछूता नहीं रहता चाहे हो प्रकृति ही क्यों न हो ? यह तय है, आधुनिक साधनों की भरमार के बावजूद हम आज भी अंदर से खुश नहीं है, क्षीण सी प्रसन्ता भी हमारे चेहरे से दूर हो रही है। तनाव पूर्ण होकर मानते है कि आज के जीवन में मधुरता और मीठापन का अभाव हो रहा हैें। बात अगर सुख की करे तो लगता है हमारा सुख जाने अंजाने कई मानसिक बीमारीयों से आहत है, जिनका निकट समय में कोई संशोधन भी नजर नहीं आ रहा। उन्हीं में से एक विलासिता के साधनों की मुख्य उपज है, वो है “खुदगर्जी”, यानी “Selfishness” की। ये रोग आपसी रिश्तों के अलावा भी जीवन के हर क्षेत्र को तहस नहस कर रहा है। आज के व्यस्त वातावरण में दूसरों के भलार्थ सोचने का समय ही कहां है, यह कहकर लोग अपने आप को सांतवित करना सही समझते है। नीति शास्त्र के अनुसार दूसरों की भलाई से ही खुद का भला होने वाले तत्व जीवन से दूर हो रहे है। नजदीक के रिश्ते जो कभी जीवन सहायक होते वो आज अर्थ तन्त्र के प्रभाव से संकुचित होकर नगण्य होनें का सफर शुरु कर चुके है, नतीजा इंसान सबके रहते, सबकुछ पास रहते अकेला हो रहा है।

अंग्रेजी शिक्षा- संसार का भारतीय परिवेश में प्रवेश करने के बाद हमारी सोच संस्कारिता से धीरे धीरे विमुख होने लगी, इस सत्य को नकारना कहीं भी सही नहीं है। पर वक्त के साथ चलना भी जीवन की शायद अलिखित मजबूरी है, अतः इस लेख को जीवन प्रेरणा के तहत समझा जाय, तो शायद हम कुछ खुशियों की प्राप्ति में सफल हो जाये। सर्वप्रथम हमें एक स्वयं से प्रश्न करना सही होगा क्या हम आधुनिक साधनों की प्राप्ति से शारीरिक सुख के अलावा किसी आत्मिक सुख से आनन्दित हो रहे है ? संभावना तो नहीं उत्तर की है, बाकी जो अति साधनों के प्रयोगों से सुखी समझते है, निश्चिन्त ही वो बधाई के पात्र है।

हकीकत यही कहती है, जो जीवन आधुनिक युग का सफर कर रहा है, वो अंदर से बिखरा है। ज्यादा बाहरी सहायक साधनों का ज्यादा प्रयोग करने वाले अपनी क्षमताओं पर उतना विश्वास नहीं रख पाते, जितना उन्हें मानसिक रुप से रखना जरुरी होता है। आज अगर हम ईमानदारी से अपनी जीवन शैली पर अनुसन्धान करे तो एक बात समझ में जरूर आ जायेगी कि हम हर दिन खुदगर्ज होकर ही बिताते है, वो भी खुदगर्जी के बढ़ते अंशों के साथ। विश्व को ही लीजिये हर देश अपनी खुदगर्जी के अनुसार दूसरे देश के साथ अपने सम्बंधों को महत्व देते नजर आता है। इसी अनुसार संसार में नई नई गुटबाजी तैयार हो रही है। हर देश मानव कल्याणकारी आंकड़े की बात नहीं करता बल्कि अपने देश के शक्ति सम्पन्नता के आंकड़ों को प्रमुखता देता है।

बात जब हम देश, समाज, परिवार और जीवन धर्म की करते है, तो हमारी प्रवृत्ति काफी हद तक आलोचनामय हो जाती है। हम कमजोरियों को सामने रखकर असफलता के कारण ढूंढते है और दोषापरण से आपसी सम्बंधों में तनाव होने वाली सारी साम्रगी परोस देते है। अगर इसी तथ्य का समाधान की दृष्टि से चिंतन करे तो हमें जांचना होगा हमारी सारी मजबूतियों में किस बात का योगदान नहीं रहा जिससे समुचित सफलता नहीं मिली। इस तरह के चिंतन युक्त दृष्टिकोण से आपसी रंजिश को बढ़ावा नहीं मिलता और प्रयासों को मजबूती भी मिलती है।

हम यहां दो शब्द “खुदगर्ज” और “खुदार” पर विशेष चर्चा करेंगे क्योंकि हमारे दैनिक जीवन में दोनों स्थितियों का हर दिन प्रयोग होता है। देखने में दोनों शब्दों में अंह का अस्तित्व नजर आता है, पर ऐसा है नहीं क्योंकि एक कमजोरी का दुसरा मजबूती का प्राणदाता है। विवेचना को आगे प्रस्तर करे उससे पहले इन शब्दों से परिचय करना जरूरी है।

खुदगर्ज एक हिंदी शब्द है, जिसका तार इंसान के स्वार्थी स्वभाव से बंधा है। शब्द को दो भागों में विभक्त करने से खुद का अर्थ स्वयं और गर्ज का मतलबी या स्वार्थी निकलता है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करने वाले ज्यादातर “selfish” का प्रयोग करते है। ऐसे स्वभाव और प्रवृत्ती वाले लोग खुद भी कमजोर होते है और परिवार, समाज और देश को चिंताग्रस्त और कमजोर बनाने में भी उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उनका भय उनकी इस क्षमता को हर रोज बढ़ाता रहता है। कायरता खुदगर्जी की आंतरिक थैली होती जो सिर्फ द्वेष का जहर इकट्ठा करती है। सवाल किया जाना उचित है क्या खुदगर्ज होना पूर्ण गलत है, उत्तर में इतना ही सहजता से कहा जा सकता है, अति किसी भी तरह की हो और कैसी भी हो दुष्परिणामों का कारण होती है। इस सन्दर्भ में हम हम एडवर्ड अल्बर्ट के इस कथन पर भी गौर करना पड़ेगा ” Sometimes you have to be selfish to be selfless” ।

कभी हमारा देश अपनी सेवाभावी संस्कृति और आपसी स्नेह के लिए आत्मिक आनन्द स्थल था। संसार के विशिष्ठ व्यक्तित्व वाले महापुरुषों ने इस को स्वीकारा और भारत को आध्यात्मिक गुरु कहलाने का सोभाग्य भी प्राप्त हुआ। स्वामी विवेकानन्द जैसे कई दार्शनिक गुरुओं का जन्म स्थल हमारा देश है। इतिहास, साहित्य, धर्म की पुस्तको को टटोलने से इससे आप इंकार भी नहीं कर सकते कि हमारी सांस्कारिक विरासत साधनों के अभाव में जितनी भव्यवता की ऊंचाइयों को छुआ आज अर्थ व आधुनिक साधनों के बढ़ते प्रभाव से संदेहात्मकता की तरफ अग्रसर हो रही है।
बड़ी विडम्बना है जो मार्गदर्शक होनें का दावा करते वो खुदगर्जी की बदतर मिसाल बन रहे है। सेवा तो बिक रही है जो कभी सुखों की गिनती में शामिल होती आज वो अपना अस्तित्व नहीं संभाल पा रही, अर्थ उसे हर रोज बदनाम कर रहा है।

चर्चा जब हम यहां खुदगर्जी पर कर रहे तो यह कहना सही होगा कि भले ही खुदगर्ज हो इंसान अपनी जरूरतों की पूर्ति करे पर उसे समझना होगा यही स्वभाव की वो क्रिया है, जिससे वो अपने निम्नतम व्यक्तित्व का प्रदर्शन करता है। अतः जिंदगी की इससे एक उचित दुरी आवश्यक है, सिर्फ इसे समझने की बात ही नहीं अपने आंतरिक चिंतन में उचित जगह देनी भी जरूरी है। “खुदगर्जी” का अगर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से तत्व अनुसन्धान करे सहज ही समझ में आ सकता है की यह अंह यानी अंहकार का निम्नतम स्वरुप वाला अवगुण है, जिसका प्रयोग हम अपने स्वार्थ के लिये बिना प्रभाव की जानकारी उपयोग कर रहे है, स्वयं को सन्तुष्ट करने के लिए। सवाल उठता है, आखिर क्यों ? उत्तर समझने के लिए एक मनोवैज्ञानिक के विचारों पर अवलोकन करते है, ” “The desire to always be on top and appear with your best face forward takes a toll. To be the centre of attention becomes a necessity, and this forces us to overlook our own emotional threshold. We begin to move away from our comfort zones to become popular, “liked” and than fail to realise when we have moved too far away from our own nature. By then, we are trapped in this false identity we have created for ourselves. It leads to huge conflict between our external and internal identities.And that creates an imbalance in our brain which leaves us at our vulnerable best.” Bhawna Monga psychologist.

उपरोक्त विश्लेषण को समझने से इस बात पर भी गौर करना उचित लगता है कि आखिर किस तरह की चाहते या इच्छाओं के कारण इंसान खुदगर्ज कहलाता है। सरसरी तौर पर जो प्रमुख कारण हो सकते है, उन पर एक नजर डालते है।
1. अति सुख और उसके साधनों की
2. देखा देखी, प्रतिस्पर्धा
3. देखे हुए सपनों की पूर्ति
4. नासमझी
5. भोग विलास लिप्त जीवन
6. सामाजिक और राजनैतिक प्रभाव हासिल करने की चाहत
7. प्रसिद्धि,
8. जीवन और नैतिक सिद्धान्तों की अज्ञानता

कभी कभी विपरीत परिस्थितियों से जूझता आदमी मजबूरी से खुदगर्ज बन जाता है, ये कुछ समय की बात होनी चाहिए जब तक संघर्ष की अवधि रहे, इससे स्वभाव पर प्रभाव न आये, ये ध्यान रहे तो सही होगा।
चिंतन को विराम देने से पहले ये हमें लगातार समझना होगा जीवन वही कहलाता जो अपने शरीर सुख के लिए कम पर आत्मा-परमात्मा के लिए ज्यादा समर्पित रहता है।

*” यही पशु प्रवृति है कि आप आप ही चरे।
मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे। ” (मैथली शरण जी गुप्त की एक कविता का सार)
**”सुखिनः भंवतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः,
सर्व भद्राणि पश्यंतु मा काश्चित दुःख भाग भवेत।।” ( सार: दूसरों के परोपकार में ही सुख का अनुभव हो सकता है।

लेखक: *कमल भंसाली*

🙆”मा”🙅 रिश्तों का व्यवहारिक आंकलन 👧 एक उद्धेषपूर्ण अनुसंधान चर्चा 👼भाग 1

जब भी हम कभी जिंदगी के सन्दर्भ में बात करते है, तो अहसास भर होता है कि जिंदगी को समझने की जरुरत होती है । जिंदगी बहुमूल्य होते हुऐ भी हम इसकी कीमत का शायद ही कभी मूल्यांकन करते है, यह हमारी शायद कोई नीतिगत कमजोरी है और इसका हर्जाना हम काफी बार क्षमता से ऊपर चुकाते है। एक सत्य जीवन का जो हमारे सामने कई प्रश्न खड़ा करता है, वो है आपसी रिश्तों का तालमेल, साधारण स्थिति में भी रिश्तों का निबाहना आजकल काफी चिंतन का विषय कहा जा सकता है। विपरीत परिस्थियों में तो हमारा आपसी सम्बन्ध निम्नतम रक्तचाप से भी नीचे चला जाता है। आखिर ऐसा क्यों है, कि सबसे सक्षम धरती का प्राणी अपनों से ही पराजित हो जाता है ! आज हम रिश्तों के विज्ञान की समीक्षा करेंगे परन्तु उससे पहले यह जानलेना जरूरी है, आखिर रिश्तों से हमारा क्या तातपर्य है ? सम्बंधों की रूपरेखा के अंतर्गत ही हमारा चिंतन होना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि इनपर हम अपना कुछ अधिकार मानते है। हम किसी भी रिश्ते का मूल्यांकन करे उससे पहले यह समझलें कि हर रिश्ता चाहे वो खून का हो या परिस्थितियों से बना हो दोनों में ही आपसी विश्वास की मात्रा बराबर होनी जरुरी होती है। विश्वास के धागों में प्रेम के मोतियों की कीमत अनमोल होती है, इस सत्य से परिचित इंसान हर रिश्ते का सही सम्मान करता है और आजीवन सुख का स्पर्श उसे प्राप्त होता रहता है, ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

रिश्तों की दुनिया विचित्र और सचित्र होती है, इसमे नये नये रिश्ते जो व्यवस्था और अर्थ अर्जन के अंतर्गत बनते और बिगड़ते है, उनके वजूद की सीमा सीमित होती है, अतः उनसे ज्यादा न सुख मिलता न ही दुःख। परन्तु इंसान को जन्म लेने के बाद जिन दो जीवन पर्यन्त रहने वाले आत्मिक रिश्तों से प्रथम साक्षात्कार होता है, वो दुनिया के सबसे बड़े विश्वास के ग्राहक होते है। जी, हाँ, मैं माता- पिता व सन्तान के अनमोल रिश्ते की बात कर रहा हूँ। शास्त्रों की बात माने तो दोनों ही रिश्तों को भगवान के समकक्ष पूज्य और सम्मानीय माना गया है। चूँकि माता- पिता का रिश्ता प्रेम और भावुकता के अमृत भरे तत्वों से संचालित रहता है अतः दुःख और सुख दोनों को अनुभव जीवन पर्यन्त करता रहता है। इसे जीवन विशेषज्ञ उम्मीद, आशा और भविष्य के तत्वों से पोषक रिश्ता भी बतलाते है, जो काफी हद तक सही मूल्यांकन लगता है। आज हम इसी रिश्ते के सन्दर्भ में अपना चिंतन आगे बढ़ाते है क्योंकि ये जीवन का प्रथम रिश्ता है, जिसे विधाता हमें धरती पर पहला उपहार देता है।

सबसे पहले हम मर्मस्पर्शी, ममतामयी व स्नेह से भर पूर “माँ ” के रिश्ते से अपनी विवेचना से शुरुआत करे तो शायद हम जीवन के इस मधुरमय रिश्ते का सर्वांग आनन्द प्राप्त करने की कोशिश करे। कहते है, “माँ “अगर स्नेह से भरपूर नहीं होती तो प्रेम की परिभाषा में अमृत्व नहीं झलकता अतः उचित हो जाता इस पवित्र रिश्ते के आत्मिक और सात्विक तथ्यों का मानसिक और संसारिक दृष्टि से विश्लेषण करने की चेष्टा करे।

इस पवित्र अनमोल रिश्ते की शुरुआत उसी दिन से शुरु हो जाती है, जब जीव “माँ” के गर्भ में जगह पाता है। हर “माँ” इसका प्रथम अहसास पाते ही स्नेहयुक्त तत्वों से इसकी सुरक्षा के लिए जागरूक हो जाती है। हालांकि “माँ “शब्द की महिमा को हर क्षेत्र से परिभाषित किया गया परन्तु आज तक सभी परिभाषायें सम्पूर्णता से अधूरी ही लगती। महाभारत महाकाव्य के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने माँ के बारे में जो लिखा वो काफी सारगर्भित लगता है।

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः ।
नास्ति मातृसंम त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।

( यानी माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है। )

इसे हम तकनीकी रुप से समझना चाहते है, तो ” माँ ” शब्द की गरिमा को समझना होगा। प्रथम सांस के साथ नव प्राण प्राप्त शिशु जब प्रथम स्पर्श का मूल्यांकन सुरक्षित पालन पोषण के लिए करता है, तो “माँ “का दूध उसके आँचल में मचलने लगता है।ये अमूल्य रिश्ता है, जिसको मंत्र के रुप हर दुःख के समय याद किया जाता है। जो, माँ की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाते है, उन्हें अपना शैशव जरूर याद करना चाहिए। एक माँ अपनी सन्तान का पालन पोषण कितना तपस्यामयि हो जाती है, ये जानना भी संक्षिप्त में जरूरी भी है। वो सन्तान को गर्भ धारण कर नौ महीनें तक उसे वहां सब दायित्व निभाते हुए सुरक्षित रखती, प्रसव पीड़ा सहन करती। जन्म देने के बाद स्तन पान करवाती, रात भर जागती, खुद गीले में सो कर बच्चे को सूखे में सुलाती, उसका हर दैनिक कार्य करती, उसे सदा आंचल में छुपा कर रखती और उसकी रक्षा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देती। ” माँ ” की महिमा और उसके आंचल की ममता को शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है, पर महसूस किया जा सकता है।

आज युग बदल गया, सब तरह के सम्बन्ध स्वार्थ के धागों में बंध गए परन्तु आज भी “माँ “एक मात्र सम्बन्ध रह गया जिससे कोई नुकसान की कल्पना भी नहीं करता। परन्तु आज हकीकत यह भी है, अर्थ के प्रभाव ने ” माँ ” की भूमिका भी बच्चों के लालन पालन की बदल गई। आज की कुछ शिक्षित माँये बच्चों को आया के सहारा उनका लालन पालन करना पसन्द करती है, इस तरह के और भी कारणों से वर्तमान की कई घटनाये माता के प्रति सन्तान का रवैया कुछ रूखापन महसूस कर रहा है। ये वक्त की मजबूरी कहिये या अर्थ तन्त्र की मेहरवानी की माँ की शुद्ध भूमिका कमजोर हो रही है। पुराने समय से जब तक अर्थ का प्रभाव नहीं बढ़ा तब तक मजाल थी, कोई इस रिश्ते के प्रति नकारत्मक विचार बदलता परन्तु वर्तमान में भूर्ण हत्या ने कुछ संशय को प्रोत्सहान दिया है, फिर भी “माँ “तो “माँ” होती है, अंतस में तो इस पर उसे पश्चाताप जरूर होता होगा। कुछ वक्त के कारणों को छोड़ दे तो आज भी “माँ” बेमिसाल होती है।

कुल मिलाकर, हर धर्म माँ की अपार महिमा को स्वीकार करता है। हर धर्म और संस्कृति माँ की जीवन निर्माण की भूमिका को स्वीकार किया है। हिन्दू धर्म हर देवी को माँ के रुप में माना गया है, मुस्लिम धर्म ने माँ को पवित्र माना है। हजरत मोहम्मद कहते है ” माँ के चरणों के नीचे स्वर्ग है “। ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ ने स्पष्ट माना है ” माँ के बिना जीवन ही नहीं “। कहने का इतना ही सार है, कोई भी देश, कोई भी संस्कृति, कोई भी सभ्यता या किसी भी भाषा में माँ के प्रति असीम प्यार व सम्मान मिलेगा। भाषा परिवर्तन से माँ शब्द की गरिमा कभी अपरिचित नहीं रहती। हिंदी में “माँ”, संस्कृत में “माता”, इंग्लिश में “मदर”, “ममी” या “ममा” फ़ारसी में “मादर” और चीनी में “माकून”शब्द का प्रयोग होता है। भाषायी दृष्टि से “माँ “के चाहे भिन्न भिन्न रुप हो लेकिन ममता और वात्सल्य से हर माँ एक ही तरह की होती है।

अगर हम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से “माँ” और सन्तान के सम्बंधों का विश्लेषण करने की कोशिश करे तो प्रथम समझना होगा, हर रिश्ते की बुनियाद भावनाऐं होती है । देश, जाति, धर्म तथा समय काल हर रिश्ते की गहनता को प्रभावित जरुर करते है, पर माँ का रिश्ता अंदर से अप्रभावित ज्यादा रहता है। माँ का रिश्ता बेटे के लिए या बेटी के लिए बिना कोई अलग् धारणा के एक जैसा रहता है यह और बात है, सन्तान गलतफेमियों के कारण इसे कम, ज्यादा में कभी कभी मूल्यांकित कर लेती है। हमारे देश में रिश्तों की नैतिकता बरकार रखने के लिए सदियों से प्रयास किया जाता रहा संस्कार निर्माण द्वारा बच्चों को बचपन से हर रिश्ते की गरिमा से अवगत कराया जाता इस प्रणाली माँ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। कड़वा सच यह भी है आज माँ की खुद की आस्थायें परिवार के नियमों के प्रति कम हो रहीं है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए शायद सही नहीं है।

भावुकता से ओतप्रोत ” माँ” का रिश्ता गीतकार और कवियों को इतना भावुक कर देता कि माँ उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाती। चरित्र निर्माण में “माँ ” की शिक्षा संतान को वक्त के अनुसार तैयार करने की क्षमता व मार्गदर्शन करती है। इतिहास गवाह है, संसार में बलशाली, बुद्धिमान, चरित्रवान आदि गुण युक्त व्यक्तित्व उभारने में ” माँ ” का सहयोग और मार्गदर्शन गुरुत्व केंद्र होता है।

फ़िल्म दादी माँ (1966 ) के इस गीत में ” माँ “की महिमा को मार्मित ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसे ह्रदय द्रवित हो जाता है, और आँखों में स्नेहमयी “माँ” की नमन योग्य तस्वीर उभर आती है।

“उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी जरूरत क्या होगी
ऐ माँ….ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी ।।”

दोस्तों संसार में सब कुछ मिल सकता सिवाय माँ के, अतः अगर आप के पास आज भी माँ का सौभाग्य है, तो
इस अनमोल रिश्ते का सम्मान सहित आनन्द लीजिये ।माता- पिता को सुखी रखकर नहीं चुकाने वाले कर्ज के ब्याज के रूप में ही सही। माँ- बेटे के रिश्ते की विवशता ही कहिये जिंदगी भर माँ जिस बेटे को समझने की कोशिश करती वो ही बेटा वक्त के साथ क्षीण होती माँ की काया व मन को सुख नहीं दे सकता। कहते है एक माँ कई सन्तानों को संभाल लेती पर सब सन्तान मिल कर भी एक माँ को अच्छी तरह संभालने में ज्यादातर असफल ही रहते है।

आगे बढ़े उससे पहले यही कहना सही होगा:-

“माँ” तेरा नहीं कोई मोल
तूं सदा रही अनमोल
तूं न होती तो
शायद ही बन पाता
जग का ये घूमता भूगोल”

रचियता और लेखक: कमल भंसाली **क्रमश कभी और…..

●●●नया साल, तलाशते आयाम●●● 【कमल भंसाली 】

आज, हर पल को हम नव पल्लवित करेंगे
नये साल में इनको ही, चारों ओर उन्नत करेंगे
नई आशाओं से जीवन को नया आयाम देंगे
ह्र्दय से देश को सुख, शान्ति का पैगाम देंगे

देश है हमारा, इस जीवन का आशियाना प्यारा
अपने ही घर में हमसे ही न उछले कोई चिंगारी
स्वस्थ माहौल में रहकर हम यह विचार करेंगे
सुखी रहे हम देशवासी, इसका इंतजाम करेंगे

छोटी छोटी बातों से न हो दिल हमारा, ह्र्दयघाती
न ही करेंगे ऐसे कर्म जिससे दुनिया कहे,जज्बाती
देशप्रेमी बन, इसकी सुखी समृद्धि की बात करेंगे
किसी भी बात पर मतभेद हो हजारों, पर न बटेंगे

माँ भारती की हम सन्तान, संस्कारो का दूध पीया
तब खून खराबे क्यों करे, अहिंसा का अमृत पिये
मेहरवानी उसकी, देश को हर संसाधन से सजाया
मन से इसको समझ, गरीबी का भूत दिल से भगाये

साल जितने भी आये, अब इस पल में सम्मलित हो जाए
इस पल की खेती करे, जीवन हमारा महक महक जाए
हम इस देश के वासी, आओं, आज प्रण एक एक कर जाए
वतन हमारा पल पल में निखर, एक सत्य शिखर बन जाए

★★★★■

कामना भी एक, मनोकामना भी है, एक
जन्मों जन्मों रहे, देश हमारा, यही एक
★★★★★
हर जन्म में राष्ट्र गीत गाये, तिरंगा को सदा लहराये
देश प्रेम का धर्म ही, कर्म बन चारों और बिखर जाए

( आनेवाले नये साल की मंगलकामनाओं सहित…..कमल भंसाली )

असहिष्णुता●●●कमल भंसाली

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दोस्तों, आज देश काफी कुछ विषम परिस्थियों से गुजर रहा है, देश में कुछ ऐसा हो रहा है, जो कभी नहीं होना चाहिए। कभी कभी अपने आप से यह प्रश्न पूछने का मन करता है, क्या इतना कुछ देने वाले देश से हम दिल से प्यार करते है ? अगर हाँ कहे, तो फिर हम आपसी प्रेम में नफरत क्यों पाल रहे, शब्दों पर संयम क्यों नही रख रहे, किसी के गलत विचारों को ज्यादा महत्व क्यों दे रहे है। देश हमारा है, इसे सुरक्षित और शांत रखने वाले काम करे, क्या यह हमारा देश के प्रति कर्तव्य नहीं है ? देशप्रेमी वहीं है, जो देश को अशांति, असन्तोष, कलह और हिंसा से दूर रखे। इन सबके लिए जरुरी है, हमारे दिल में देश के प्रति प्यार और मौहब्बत सदा आत्मा में रहे, हम देश की निगाहे दुनिया में न झुकने दे।यह कविता एक छोटी सी मेरी कोशिश है, कवि नहीं हूं, गलती होनी स्वभाविक है, माफ़ करे। प्रार्थना है, हमारा प्रिय देश सदा शांत और खुशहाल रहे।

अंदाज जब मौहब्बत का बदल जाता
खताओं का सिलसिला शुरु हो जाता
गुलो जैसा उम्र भर का मासूम प्यार
अग्नि बन सब कुछ भस्म कर जाता

मौहब्बत का इतना सा ही है, फ़साना
मौहब्बत में ही जीना, उसी में मर जाना
जिसमे हो शंका, वो है, और कोई तराना
टुटा तार दिल का गाता दर्द भरे अफ़साना

हर बन्धन मौहब्बत का ही मोहताज होता
जिससे साँसों को प्यार का अहसास होता
सिर्फ खुदा की मौहब्बत में शुद्ध विश्वाश होता
मौहब्बत नहीं, तो कहां जिंदगी का सारांश होता

हर इंसान प्यार की इबादत का सुनहरा फल
प्यार और मौहब्बत से ही होता जीवन सफल
शंका और खताओं में न खो जाए आज और कल
कहते है ज्ञानी, जो है, आज, अभी, और यह पल

मौहब्बत करने वालों से करनी, इतनी ही आरजू
शब्दों का मूल्यांकन करना, सही जब हो तराजू
इजहार में प्यार हो, व्यवहार में, सही आंकलन
नफरत का एक शब्द, बदल देता हर कोई का ईमान

क्या सही, क्या गलत प्यार नहीं बनाता परिभाषा
मौहब्बत और प्रेम दोनों से जगती सुंदर सी आशा
देश में नफरत के जो बीज बो रहे, उन्हें हो निराशा
भारत के अस्तित्व में जग ने सदा शांति को तलाशा

रखनी है, अगर अपनी स्वतन्त्रता हमें सदा बरकार
समझना जरुरी,प्यार बढ़े,न की नफरत का आकार

★★जय हिन्द
☺☺ कमल भंसाली☺☺

परिवार…बिखरता दर्द.. भाग…2…कमल भंसाली

परिवार व्यक्तित्व निर्माण में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है, इस तथ्य पर वैसे तो कोई शंका का कारण नजर नहीं आता फिर भी निवारण के लिए इतना कहना जरुरी है, कि संसार की महान से महान विभूतियों ने स्वीकार किया है, कि उनकी सफलता में परिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शालीनता का अगर कोई स्कूल है, तो मेरी नजर में परिवार ही है। परिवार आज भी है, पहले भी था और शायद आगे भी रहे, परन्तु क्या परिवार की गरिमा पहले जैसी है, यह चिंतन की बात है, इस पर हमे गंभीरता से विचार करना चाहिए। आखिर एक स्वच्छ और शालीन परिवार कैसे बनता है ? आइये, थोड़ी चेष्टा करते है, समझने की, शायद भविष्य इसकी जरुरत समझे। पहले परिवार सिर्फ इसी नाम से जाना जाता था, सयुंक्त परिवार (Joint Family), बाद में अविष्कार हुआ, छोटा परिवार का (Nuclear Family), दोनों ही हमारी समझ और समय की देन है। परिवार शब्द की जब व्याख्या करे तो हमारे सामने दादा, दादी, माँ, बाप, भाई, बहन और भाभी के अलावा और भी रिश्तों का माहौल नजर आता है, जिन्होंने इस तरह के पुरे परिवार को कभी देखा, निश्चिन्त ही उन्होंने एक पूर्ण प्रेम भरे वातावरण का सुखद अनुभव किया होगा। क्या सब परिवारों में शांति, प्रेम और भाईचारा रहना संभव है ? इस प्रश्न का उत्तर भी सहजता से दिया जा सकता है, जिस परिवार में अनुशासन और त्याग की भावना रहती है, वैसे परिवार प्राय: सुख का अहसास करते है, दुःख की आद्रता इन्हे कमजोर नहीं करती। हमारे हाल ही में हुए दिंवगत भूतपूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक A.P.J Abdul Kalam के अनुसार “अगर कोईं राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त रखकर सुंदर बुद्धिमान राष्ट्र बनाना है, तो परिवार के तीन सदस्यों की अहम् भूमिका का आदर करना होगा, वो है, माता पिता और शिक्षक”। किसी भी राष्ट्र की समृद्धि में परिवार की भूमिका को छोटा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि परिवार बिना संस्कार और सेवा की भावना आना मुश्किल ही लगता है। देश को, समाज को, यहां तक की हर प्राणी को सेवा की जीवन के हर मोड़ पर जरुरत होती है, यह आप और हम अच्छी तरह जानते है।

भावनाओं के सन्दर्भ में परिवार काफी मजबूती प्रदान कर सकता है, अगर सदस्यों का आपसी तालमेल समझदारी पूर्ण हो, और एक दूसरे की कमियों को दूर करने में सहायक बने, तो निश्चित है, परिवार आर्थिक समृद्धि की नई ऊंचाइयां तो छुएगा, साथ में जीवन भी सही आनन्द प्राप्त करेगा। एक कहावत है, “एक अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता”, एकल परिवार के सीमित सदस्यों में एक प्रकार की घुटन अनुभव कई बार महसूस की जा सकती है, क्योंकि उनके पास जीवन का कमजोर अनुभव होता है। आखिर पुराने परिवार को टूट कर बिखरने की नौबत क्यों हुई, तो इस सन्दर्भ में सबसे प्रमुख कारण अति स्वतन्त्रता की चाह और नैतिकता का असन्तुलित होना है। नैतिकता बन्धन रखती है, और थोड़ा सा बन्धन भी आज असहाय लगता है। कुछ लोगो का चिंतन है कि “आर्थिक जरूरत की असीमित्ता और शिक्षा का प्रसार इसका कारण है”। मुझे लगता है, यह मन्तव्य पूर्ण सत्य नहीं है, अर्थ हर काल में प्रमुख रहा है, शिक्षा सदियों से पसन्द की जाती रही है, उसे जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। कमी तो अपनी आस्था में ही नजर आ रही है, इसका कारण भी सुविधाकारी जिंदगी और उसके लिए असत्य का भरपूर प्रयोग, सच तो यही होना चाहिए कि परिवार सत्यता की धरती पर ही फलताफूलता है, वरना नाम मात्र का परिवार होता है।

आज के वातावरण में जो परिवार अपनी क्षमता का सही प्रयोग करता है, वो देश काल में अपनी साख लम्बे समय तक कायम रख सकते है। हमारे देश में भी बहुत से परिवार है, जिनका नाम आज भी शान से लिया जाता है। भारत जातिवादी का देश रहा है, आज भी यहां जाति का ख्याल वैवाहिक सम्बंधों के समय पूरा रखा जाता है, इसका एक सही कारण यह है, कि धर्म, संस्कार के अनुरूप परिवार का वातावरण कायम रहे, हर सदस्य अपने आपको परिवार के वातावरण में सहज अनुभव करे। परन्तु अब यह ख्यालात बदल रहे है, नारी की भूमिका घरेलू कामकाज के प्रति कमजोर पड़ रही है। पहले नारी घर की आंतरिक व्यवस्था को सक्षमता प्रदान करती थी, पुरुष आर्थिक और सामाजिक सीमा का प्रहरी था। आज दोनों ही अर्थ की तलाश में भटक रहे है। शिक्षा जिसमे पहले नैतिकता का समावेश ज्यादा होता था, आज उसने दिमाग को सिर्फ एक ही काम में लगा दिया, अर्थ व नाम की अधिकता कैसे प्राप्त की जा सकती है। निश्चिन्त है, व्यक्तित्व तो कमजोर होना ही था, मानसिक रोगों की बढ़ती गति ने जीवन को अस्वस्थकारी और एकांगी कर दिया। अभिमान को पहले शान कहते थे, जो उनकी विशेष आदतो के रुप में सिर्फ परिवार के भीतर पनपता, उसमे परिवार के हर सदस्य अपनी विशेषता मानता। जैसे कोई परिवार में कोई सदस्य किसी के बड़े बूढ़े के सामने तर्क नहीं करता, तो यह उस परिवार की शालीनता भरी शान समझी जाती। कोई समय था, परिवारों की इज्जत के अनुसार नाई विवाह के सम्बन्ध तय करा देते, एक नारियल का आदान प्रदान ही सम्बन्ध की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त था। आखिर इतना विश्वास पहले कैसे था, जब इसका चिंतन करता हूं, तो गीता का यह श्लोक काफी कुछ स्पष्ट कर देता है।

नासतो विधते भावो नाभावो विधते सत:।
उभयोरपि दृष्टोSन्तस्त्वन्योस्तत्त्वदर्शिभिः ।।

श्लोक का सार संक्षेप यही कहता है, सत्य कभी बदलता नहीं, असत्य ही बदलता रहता है, फिर भी मनुष्य असत्य को ही ज्यादा अपनाता है, वो उसकी ही अधीनता स्वीकार करता है, उसके अनुसार असत्य के बिना काम चल नहीं सकता। पहले हर घर में सुबह की शुरुआत धार्मिक चेतना के अनुसार ही होती थी, और हर सदस्य को बोध रहता था, कि उसके आचरण से परिवार की गरिमा को ठेस न पँहुचे। आज यह सब बातें असत्य ही लगती है, क्योंकि विश्वास की कमी धीरे धीरे दैनिक जीवन में अग्रसर हो रहीं है। यथार्थ में यह आदमी के व्यक्तित्व की एक सबसे बड़ी कमजोरी, परिवार के साथ नहीं चलने से आती है।

ध्यान रहे, इस लेख का उद्धेश्य कतिपय नहीं है, कि पुरानी बातों का गुणगान किया जाय, हाँ यह जरुर प्रयास है, कि जीवन पुरानी अच्छी बातो का मूल्यांकन करता रहे,अपने व्यक्तित्व को प्रखर और उन्नतिमय करे, आखिर जीवन जीने के लिए हमें कुछ समय ही प्रदान किया गया है। जीवन अगर शिष्ट होकर, विशिष्ट बने, तो गलत क्या है ? आज सब कुछ पास होते हुए भी जब आदमी अपनी एक बचकानी हरकत से जीवन का जब गलत रुप समाज के सामने लाता है, तो दुःख का ही अनुभव होता है, कि भूल समय से पहले सुधरी क्यों नहीं ? काश, ऐसे जीवन के पास सुसंस्कृत परिवार का अनुभव होता, तो कोई इंद्राणी अपनी बेटी की अपने झूठ और गलत महत्वकांक्षाओं के लिए हत्या नहीं करती। आज के अनूसार, एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की यह घटना कई प्रश्नो का उत्तर अनुत्तरित ही रख रही है। कहते है, “बिना चिंतन का विकास, विनाश का प्रारम्भ भी हो सकता है”……कमल भंसाली ……क्रमश…

बिगड़ती मानसिकता, भविष्य का डर….. कमल भंसाली

आज कल जो हिंसा और कमजोर मानसिकता से पूर्ण घटनाक्रम घट रहें है, उनसे मानव मन कि स्थिति विचित्र और नहीं समझने योग्य हो गई है। हम दैनिक समाचार पत्रों पर नजर डाले तो शायद हीं ऐसा पृष्ठ सामने आये, जिसमे अपराधिक समाचार न हों। सवाल है, ऐसा क्यों हो रहा है ? काफी कुछ चिंतन का विषय है, आज का दैनिक जीवन ! ‘प्रेम’ के नाम पर जो उत्पाद समाज भोग रहा है, वो कहीं साबित नहीं करता, हम शिक्षित हो रहे है, हम आत्मिक भूमिका को अपनी शिक्षा प्रणाली से दूर रखकर गलत राह के राही बन गए है। हकीकत तो यही समझा रही है, कि हमारा जीवन दर्शन अर्थ और साधनों का इतना मोहताज हो गया, कि वो भूल गया अंतरंग आत्मिक ख़ुशी क्या होती है ?
आखिर ऐसा कुछ क्या हुआ, जो हमारी मानसिकता का अंधापन बढ़ा रही है। समझने की चेष्टा करते है।

आज, इंसान जब संसार में जब समझ की पहली अनुभूति का अहसास करता है, तो वातावरण अनुसार, उसके हाथ पांव मचलने लगते है, दिमाग में कुछ चाहत की तरंगे उठने लगती है। परिवार उसे पालने के लिए, इतने कृत्रिम साधनों का प्रयोग करता है, कि , तभी से वो, अपनी काया की चाहत भरी तरंगों का दासत्व स्वीकार करने लगता है, और उसकी हर इच्छा का गुलाम बन जाता है। उस दिन से वो उसकी हर इच्छा की पूर्ति करना अपना धर्म मान लेता है। समझा जा सकता है, आज साधनों से भरपूर संसार उसी चाहत का और इन्सान की गुलामी का नतीजा है। यहां तक तो बात ठीक थी, वो चाहत के कारण जीवन जरुरी साधनों का निर्माणकर्ता था, पर जब से वो खुद साधनों का गुलाम होने लगा, तबसे मानवीय गुणों का उसमे ह्यस होने लगा, यह एक चिंता की बात है।

इसी सन्दर्भ में यह तथ्य भी हमें स्वीकार कर लेने में कोई हर्ज नहीं, अति साधनों के प्रयोग से हम अपने जीवन को मौलिकता से दूर ले जाकर उसे बीमारियों की नगरी की तरफ ले जा रहे हैं, या फिर उसे अशांति के घने जंगल में भटकने के लिए छोड़ रहे है। हकीकत यहीं कहती है,सत्य की तरफ न देखकर, उससे मुंह मोड़ कर हम अपनी कमजोरियां रात दिन बढ़ा रहे है। इसमें दो राय नहीं हो सकती, बिना उपकरण और साधनों के बिना जीवन गतिमय नहीं हो सकता, पर गति जब अति हो जाए, तो ब्रेक का प्रयोग भूलने से दुर्घटना होना निश्चित है, और सब दुर्घटनाओं से शुभ का फल नहीं अर्जित किया जा सकता, यह भी तय है।

सबसे पहले यह बता देना जरूरी है, की इस लेख का कतिपय उद्धेश्य नहीं है, आज के युग में साधनों के प्रयोग के विरुद्ध जाया जाय। उद्धेश्य यहीं है, कि जीवन में सुख का अनुभव होता रहे, जिंदगी स्कारत्मकत्ता से अपनी तय उम्र प्रेम और शांति से गुजारे। अनियमितता से जिन्दगीं को तनाव ही मिल सकता है, शुकून नहीं। तय हमें करना है, कि हमें आखिर क्या चाहिए ? पता नहीं आधुनिक शस्त्रों के निर्माण करने वाले वैज्ञानिकों ने इस तथ्य पर अति गौर क्यों नही किया, कि आखिर मानव इन शस्त्रों का प्रयोग अपने को ही नष्ट करने में करेगा, उसे किसी बाहरी लोक से तो कोई खतरा अभी तक नजर नहीं आया। पहले आम आदमी घर में किसी भी प्रकार का अस्त्र रखना अशुभ मानता था, सिर्फ सीमा के प्रहरियों या पुलिस अधिकारियों तक ही इनकी पहुंच थी। धीरे, धीरे, अराजकता बढ़ी, तभी तो आज ये सरलता से प्राप्त किये जा सकते है। इसका यही अर्थ निकलता है, कि आपसी विश्वास, स्नेह, प्रेम की कमी हो रही है। क्या यह स्थिति मानव विनाश के प्रारम्भिक संकेत तो नहीं है ? आश्चर्य, नही होगा अगर दैनिक समाचारों की विवेचना से यह तथ्य भी सामने उजागर होता है, कि प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा मानव निर्मित संघारक घटनाये आज ज्यादा हो रही है।.

यह निश्चित तथ्य है, प्रकृति की सरंचना में धरातल का निर्माण एक साथ ही हुआ, मानव के अस्तित्व से पहलें कई तरह के जीव जन्तु और पेड़ पौधों का निर्माण हो चूका था। यह भी एक आश्चर्य की बात है, मानव जाती का विस्तार शुरु में प्रेम के तत्व से ही हुआ, फिर घृणा कहां से आई ? इसका एक मात्र कारण,स्वार्थ की भावना का पनपना ही हो सकता है। स्वार्थ के पनपने के साथ जो कारण जोड़ा जा सकता है, वो है, धरती पर साधनों का जरुरत से ज्यादा विकास, और उनके प्रति स्वामित्व का बोध होना। कहनेवाले यह भी कहते है, कलयुग है, अंत तो होना ही है, पर क्या अंत भी घृणात्मक हो, यह उनके आत्म चिंतन की बात है ।

निसन्देह, उपकरणों के विस्तार से जीवन को तेजी मिली, पर उसके लिए नैतिकता को अपने कई नैसर्गिकी गुणों को नैष्कर्म्य बनाना पड़ा जिसके कारण भीतरी सुख का अनुभव कमजोर होने लगा। सब कुछ होते हुए भी जिंदगी अपने आप को अकेली अनुभव करनें लगी है, आखिर क्यों ? वक्त की बात है, गांवों से निकल कर जीवन ने जब शहरों की तरफ अपना रुख किया, तभी से उसमें में कई तरह के परिर्वतन होना शुरु हो गया। यह आश्चर्य की बात है, कि शहरों में रहने वाले लोग अब शान्ति के लिए ग्राम जीवन अच्छा मानते है। इसका कारण शहरों का बढ़ता प्रदूषण तथा सामाजिक सुरक्षा का कमजोर होना। रिश्तों का व्यपारिकरण ने रही सही कसर पूरी करके आज इन्सान को लाचार कर दिया।आज गांव भी इन्हीं रोगों से ग्रस्त हो गए। शहर के संसर्ग ने उसे साधनों का एड्स दे दिया। आखिर, शांति धीरे धीरे अदृश्य हो जायेगी, उसे किसी भी जगह तलाशना मुश्किल काम ही रह जाएगा। राम ने वनवास जंगल में क्यों बिताया, बुद्ध और महावीर जैसे राजाओं ने वन में हीं शांति की तलाश क्यों की, राजमहल में उन्हें क्यों नहीं मिली ,सब साधनों के होते ,यह आज एक अनुत्तरित सवाल है ?जंगल को काट कर तहस नहस करने वाला मानव, पत्ता नहीं क्यों यह समझ रहा कि हकीकत में वो प्रकृति के पेड़ की उसी शाखा को काट रहा है, जिस पर वों सुख शांति से बैठा है।

‘अवेहलना’ एक नकारत्मक शब्द ही नहीं, संस्कारों को नष्ट करने वाला जहर है। आज जैसे हमारे देश चीनी उपकरणों से भरा है, वैसे ही ,,,,’अवहेलना’ ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर लिया है। स्वतन्त्रता का दुरूपयोग होना ही, आनेवाली गुलामी का संकेत होता है, इसे माने या नहीं पर तथ्य यहीं समझाते है, कि फिलहाल हम अभी आदतों के गुलाम तो हो ही गये। समय बदलता है, विचार भी बदलते है, परंतु जब मानसिकता और मानवीय संवेदनशीलता बदलने लगती है, तो चिंता होना स्वभाविक है। दर्द सभी भोग रहे है, पर साधनों और उपकरणों के अति प्रयोग से व्यवहार में बनावटी संवेदना ही रह गई, जो किसी के काम नहीं आती। हमारे देश के संस्कारिक परिवेश की विशेषता यहीं है, कि धर्म का प्रभाव आज भी बरकरार है, शायद इसलिए हमें अति आधुनिकत्ता से अब तक बचा रखा। जो थोड़ा आत्मिक प्रेम बोध बचा है, शायद कुछ सालों तक जीवन को क्षणिक सुख अनुभूति प्रदान करता रहे।

मेरा मानना यहीं है, कि खानपान का असर स्वास्थ्य के साथ विचारों पर भी पड़ता है। हम अभी तक संस्कारित और स्वास्थ्यवर्द्धक खानपान ही पसन्द करते थे, परन्तु आधुनिककरण की नई सभ्यता को परम्परागत संस्कार और खानपान रास नहीं आ रहा है। धीरे धीरे जीवन साधनों, उपकरणों और बाहरी नए खानपान के व्यंजनों का आदी हो रहा है। शारीरिक श्रम की भूमिका दैनिक जीवन में कमजोर हो गई और आराम दायक साधनों की क्षत्र छाया में दिमागी मेहनत सीमा पार करने लगी। नतीजा जो होना था, वहीं हो रहा है, आदमी भीतर और बाहर दोनों से कमजोर हो रहा है। लालच के जहर ने हर चिंतन को इतना जहरीला बना दिया कि मिलावट करने वाला स्वयं हर पदार्थ निश्चिन्त होकर प्रयोग करने के लिए मजबूर हो गया। आखिर विचारों में शुद्धता नहीं तो अक्षेपा कैसे करे, सब शुद्ध मिले।

कोई ज्यादा वक्त नही बिता, जब लोग भारत को दूध दही की बहने वाली नदियों के देश के नाम से पहचानते थे। आज स्थिति यह है, कि शुद्ध दूध, दही कल्पना मात्र ही रह गये है। सवाल जेहन में एक हीं आता है, आखिर ऐसा क्या हुआ ? जिसके कारण अमृत पैदा करने वाला देश, विष का देश बन गया। अपने हि दैनिक जीवन से खिलवाड़ करने वाला देश किस तरह से उन्नति और सुख की बात सोच सकता है। पग पग पर हिंसा, कदम कदम पर अशांति, हर समय अर्थ की चाह और उसके लिए होने वाले अनैतिक कार्य किसी भी देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ही लगाता है। जैसे शरीर और मन का सन्तुलन बिगड़ जाने से आनन्द की अनुभूति नहीं हो सकती, ठीक वैसे ही किसी भी देश की शासन व्यवस्था तब तक शांतिदायक परिणाम नहीं दे सकती, जब तक ईमानदारी से कार्य न करे, यही कमजोरी, भारतीय लोकतन्त्र को बीमार ग्रस्त कर चुकी है। आखिर सदियों से फलती फूलती ईमानदारी कहां विलुप्त हो गई, पर इसे तलाश करने का समय किसी के पास भी नहीं है। देश शब्द की मार्मिकता में सब अपने स्वार्थ की पूर्ति होते देखना चाहते है। नेता गरीबी के नाम पर अमीर हो जाते है। “गरीबी”शब्द अमीरी की दासी बन गई …यह चिंतन की क्या बात नहीं है ?

पिछले दिन अखबारो, टीवी में मैगी, नूडल्स पर हाहाकार मचा, दिग्गज अभिनेताओ, अभिनेत्रियों और यहां तक खिलाड़ियों ने अपने असीमित लालच के कारण विज्ञापनों में इसे स्वस्थ, रोचक,और शीघ्र बनने वाला आहार बताया। घर, घर में प्रयोग होने वाला यह पदार्थ इतने सालो तक, हमारी कमजोरी बन कर दैनिक जीवन पर शासन करता रहा। कल यह भी भुला दिया जाएगा, कोई नये नाम से हमें फिर परोसा जाएगा और हमारी स्वीकृति भी प्राप्त कर लेगा, बिना जांच परख के। आम इन्सान की उदासीनता समझ में आती है, परन्तु सरकारी संस्थाओं की अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही, क्या दण्डनीय नहीं है ?……क्रमश …..कमल भंसाली