💕प्रेम पुजारी💕 कमल भंसाली

दिल की दुनिया बसा डाली फिर भी लगता खाली
दिल को जो आबाद करे अब वो हवाये नहीं चलती
निगाहों में प्यार की जगह नफरत की आंधी दिखती
वफ़ा की कीमत नहीं बाजार में बेवफाई ही बिकती

नाम मौहब्बत है शराब बन मदिरालयों में परसती
जिस्म के हर हिस्से में वासना बन हैवानियत बनती
दिल की बातें करती पर कातिल बन कर इठलाती
पता नहीं किस फूल से ये कौनसी महक निकलती

कल तक जो सिर्फ मौहब्बत होती आज है रोती
किसकी है यह बेटी जो इतने गहरे रंग ये बरसाती
उल्फत कह कर सिर्फ हसरतों के जाम ही छलकाती
आग यह कैसी जो लग जाने के बाद कभी न बुझती

प्यार की भूखी दुनिया सिर्फ प्यार की ही बात करती
दस्तूर जो इसके जरूरी उन्हें कभी भी नहीं निभाती
लेने को राजी पर जब देने की बारी हो तो कतराती
फिर भी प्यार की चाहत तो हर दिल को है ललचाती

त्याग सच्चे प्रेम की मंजिल, नफरत से रहो दूर
ये ही एक सन्देश जग को करता हिंसा से दूर
आज की बात करो कल की कोई हस्ती नहीं होती
बड़ा सोचो तो सच मानों जिंदगी सदाबहार ही रहती

आज हो कल न भी हो पर चमन योंही आबाद रहे
कभी वापस आओ तो तुम्हारी अमानत जवां रहे
विदा इसलिए प्यार से होना कुछ तो तुम्हारा यहां रहे
तुम थे यहां कभी “प्रेम के पुजारी” जग को याद रहे

🍸शराबी जिंदगी🍹✍ कमल भंसाली

अरमानों के मदिरालय में
खब्बाबों के पैमाने
जज्बातों की मदिरा में
गुजर गई तमाम उम्र
फिर, भी फिक्र नहीं करती, जिंदगी
बता, क्या तू संसारिक नशे में डूब गई
है, किसी को जबाब देना
शायद, यह बात तुम भूल गई

कुछ तो ख्याल कर अपनी औकात का
लड़खड़ाते पैर तेरे
गुणगान कर रहे, तेरी ताकत का
क्या थी क्या, हो गई
रिश्ते, बन्धनों के अंधेरो में
तूं, गिरकर बदनाम हो गई
लोग कहते है, किस्से तेरे बदनामी के
इज्जत की कमीज पर
नशे में कितने दाग लगा गई

मोह, मौहब्बत, प्यार
दुश्मन है, मेरे यार
नशा जितना भी होता मादक
उतना ही है, घातक
संभल जा, कुछ वक्त के लिए
दोष जमाने को न देना
जमाने को वक्त नहीं, तेरे लिए
मान मेरी बात
पीना है, तो पी,
पर जब जग में तूं आई
तो, कुछ अपनी
आत्मा के लिये, जी
तोड़ नशे के सारे बन्धन
पकड़ मेरा हाथ
आ, फिर,
एक बार चलते
कोई नए, उज्ज्वल पथ पर
तुम और मैं, साथ, साथ…..कमल भंसाली

रचियता ✍कमल भंसाली

♻समझदारी♻ कमल भंसाली

“सब कुछ सीखा हमने पर न सीखी होशियारी, सच है दुनियावालों हम है अनाड़ी” राज कपूर अभिनीत फिल्म, ‘अनाड़ी’ का यह शीर्षक गीत जीवन की सच्चाई का आज भी एक पहलू है, जिसमें वक्त के अनुसार परिवर्तन के अंश जरुर नजर आते है, पर परिस्थितियों के अनुसार आज भी आदमी बहुत जगह अपने आप की समझदारी पर शंका करता है। चूंकि “समझदारी” ‘समझ’ शब्द से अलंकारित हुआ है, अतः  वर्तमान में “अनाड़ी” शब्द का प्रयोग सही नहीं हो सकता क्योंकि जिस समय फ़िल्म बनी थी उस समय हमारे देश में शिक्षा का प्रसार न्यूनतम था। आज साधनों आधारित जीवन के कारण अनपढ़ आदमी तकनीकी क्षेत्र में कुछ न कुछ सीख जाता है, परन्तु व्यवहार के क्षेत्र में भावुकता और मोह की अतिरिक्तता उसे कभी न कभी अपने  अनाड़ीपन का अहसास करा देती है।  परिणाम कि अज्ञानता वश अनपढ़ इंसान चतुर इंसानों से मात खा जाता।  ऐसा आज भी होता है, जब अज्ञानता का फायदा लेने में किसी को संकोच नहीं रहता।  वैसे तो हर देश की सामाजिक स्थिति में बदलाव आना एक स्वाभाविक क्रिया है, फर्क गति में ही होता है, हमारा देश में  स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा का महत्व बहुत कम गति से बढ़ा, सीमित साधनों में रहने वाले परिवार शिक्षा से ज्यादा भूमिगत कर्म को ही ज्यादा महत्व देते थे। जातिवादी परम्पराओं से हर तरह के कार्य का एक क्षेत्र निश्चित था, उसी के अंदर शोषित हो अनपढ़ता के कारण दासता का शिकार हर इंसान अंदर से कमजोर होता और उसका फायदा संपन्न और पढ़े लिखे लोग बहुत बेखुबी से उठाते। चूंकि हमारा उद्देश्य सिर्फ यह समझने का है, क्या सिर्फ समझदारी की कमी का नुकसान सिर्फ कम दिमाग  वाले व्यक्ति की संम्पति  है। जी, नहीं, अति समझदारी में भी गलती होना भी निश्चित होता है, इसके कई मुख्य कारण हो सकते है, उनमें प्रमुख है:

1.समस्या को सही ढंग से न समझना
2. समय पर समस्या को न समझना
3. असंयमित जीवन शैली
4. भावुकता भरा निदान
5. अधूरा प्रयास
6. मानसिक अदृढ़ता
7. सत्य से दूर भागना
असफलता की परिभाषा को समझने के लिए हमें अपनी आंतरिक क्षमता का उपयोग करना सहज नहीं होता अतः हम अपनी नाकामियों को सहज कभी नहीं लेना चाहिए। प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटों ने कहा “ ignorance or knowledge, which is better ? Entire ignorance is not so terrible or extreme an evil, and is far from being the greatest of all; to much cleverness and too much learning accompanied by I’ll bringing- up, are far more fatal.
कभी बीती या वर्तमान की जिंदगी पर सरसरी नजर डालें तो हमें लगेगा हमारी इन कुछ कमजोरियों ने या तो समस्याएं पैदा की या मौजूद समस्याओं का समाधान सही नहीं होने दिया । भारत में सबसे ज्यादा चालाक कूटनीतिज्ञ विद्वान चाणक्य के अनुसार “कोई भी काम शुरु करने से पहले सदा अपने आप से तीन प्रश्न जरूर करने चाहिए: मैं यह काम क्यों कर रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम हो सकता है ? क्या मैं  सफल परिणाम प्राप्त कर सकता हूँ ? उनके अनुसार इन प्रश्नों पर गंभीरता से चिंतन कर अनुकूल उत्तर के बाद ही कोई विशेष काम शुरु करना चाहिए”।
कहते है, अधूरा ज्ञान तो पूर्ण अज्ञानता से भी खतरनाक होता है। यह बात आज के युग के संदर्भ में ज्यादा सही है क्योंकि आज ज्ञान तो हर जगह बिखरा है,  पर अधिकता की कमजोरी होती है, उसको अगर कोई न संभाल पाये तो बिखरने में देर नहीं लगती। विडम्बना यह भी है  पहले तो बिखरे को समेटना सहज नहीं होता, दूसरे समेटने से दूसरे नकारत्मक तत्वों का  साथ आने का खतरा भी रहता है। अतः अपनी मानसिक शक्ति के प्रति जागरूक होकर उसकी क्षमता का सदुपयोग समझदारी में  करना सही हो सकता है,परन्तु ध्यान रखना सही होता है,कि भावुकता या उग्र आवेग में ये शक्ति निष्क्रिय भी हो सकती है। समझदारी तभी परिणाम सही लाती है, जब अवस्था, समय, और स्थिति के अनुरूपक निर्णय लिया जाय। मान लीजिए कोई आदमी अभी तक शान शौकत की जिंदगी जीता है और कोई कारण से उसकी आर्थिक हालात दब रहे है तो बिना देरी किये अगर वो अपनी जीवन शैली का बदलाव कर लेता है, तो उसकी क्षमता क्षीण होने के बजाय उसे क्षमता प्रदान कर सकती और शायद जल्दी ही वो वापिस अपनी आर्थिक स्थिति को सही जगह वापस भी ले आये। इस संदर्भ में कई उदाहरण हमारे सामने आते है, जब उनकी समझदारी को हम दाद देते नजर आते है, जब वो पूर्ण गिरने से पहले वापस खड़े हो जाते है।
अतः सब कुछ खोइये परन्तु समझदारी को सदा साथ रखिये, ये ही आज के जीवन की सही सच्ची जीवन संगिनी है ।
चूंकि आज हम उच्चतम शिक्षा के महत्व को समझने लगे है, उस सन्दर्भ में समझदारी की परिभाषा को जान को जान लेना उचित समझेंगे । जहां तक हमारे दैनिक जीवन की बात है, समझदारी का मतलब समझ बुझ कर लिया निर्णय और उसी अनुसार किये कार्य को हम तर्क संगत परिभाषा कह सकते है। वैसे अंग्रेजी में Sensibly इसके लिये सबसे उपयुक्त शब्द है। ऐसे दूसरे शब्दों में इस तरह भी समझा जा सकता है बुद्धिमान होने की अवस्था का भाव, युक्ति से पूर्ण होने का भाव या फिर भली बुरी बात समझकर उसे मूल्यांकित करने का भाव। दोस्तों हकीकत में समझदारी मनुष्य का स्वयं अर्जित गुण है, इसमें विशेषज्ञ होने के लिए संयम, धैर्य और संतुलित चिंतन सर्व पर्याय जरूरतें है। समझदारी को सौभाग्य का प्रवेश द्वार और बेवकूफी को दुर्भाग्य का द्वार ज्ञान शास्त्रों में माना गया है और ये भी हिदायत दी गई है तात्कालीन आकर्षण से बचकर, दूर की सोच का उपयोग कर किसी भी काम की प्रतिक्रिया और परिणति का रूप समझ कर स्थितियों के अनुकूल निर्णय लेकर प्रयास करना ही सही “समझदारी” है। न तो इस लेख का लेखक ये दावा कर सकता है कि वो समझदार है, न ही आप।  जब तक सही निर्णय के सफल फल हम प्राप्त करते रहेंगे, तब तक कि अवधि तक ही हम समझदार है, नहीं…तो सच है….गुनगुनाते रहिये …..✍ लेखक ..कमल भंसाली

😱इंसान में इंसान😱 ✍कमल भंसाली

सब कुछ देखा
दुनिया में
यहां तक
प्यार को रोते
बेवफाई को हंसते देखा
जग को
अपने स्वार्थ के लिए
उशूलों को बदलते देखा
घर की सुंदरता को
दूसरों के नैनों में खिलखिलाते देखा
यार क्या बताऊँ
क्या क्या नहीं देखा ?
अनहोनियों का जल्वा देखा
होनी को तन्हाई में मरते देखा
झूठ के कफ़न में हर सच को दफन होते देखा
⭐⭐⭐⭐⭐
आज उधार, कल नकद, ये कैसा है व्यापार
कर्तव्य कुछ भी नही सिर्फ चाहिये अधिकार
देह को बन्धन नही, सिर्फ स्वतंत्रता स्वीकार
सेवा प्रचारित हो बन गई धार्मिक आडम्बर
🌝🌝🌝🌝🌝
गुमा नहीं था दुनिया इतनी तेजी से बदल जाएगी
जिंदगी के छोटे से सफर में इतनी तेजी आ जायेगी
धीमे चलने वाले हमसफ़र को रास्ते मे ही छोड़ देगी
अपनों के संग चुप्पी परायों के संग खिलखिलायेगी
⛈⛈⛈⛈⛈
बड़ा अजीब हो गया आज का इंसान
खुद से खुद को ही कर रहा परेशान
आवश्यकताओं को ही करता रहता तलाश
उपयोगिता को ही कहता जीवन का आभास
🔥🔥🔥🔥🔥
शायद दुनिया की ये तस्वीर अच्छी ही होगी
पर तेजी से बदलते रंगों की लय कुछ और होगी
जिंदगी बाहर से मुस्करायेगी भीतर से रोयेगी
न रहेगा कोई योगी सब बन जाएंगे रोगी, भोगी
❄❄❄❄❄
ये कैसी डगर है मेरे दोस्त
जिसमें अपने डर से इंसान प्रशस्त
ऊपरी निडरता में करता आज गुजारा
कहता कल देख लूंगा आज है तुम्हारा
भविष्य में आज तलाश करता ये कैसा इंसान
जो भगवान का नाम लेकर स्वयं बन जाता भगवान
विडम्बना ही कहलों, सब कुछ रहे भले, पर नहीं रहेगा
🌞🌞🌞🌞इंसान में इंसान🌞🌞🌞🌞
रचियता✍💖कमल भंसाली💖

♨उस पार♨ कमल भंसाली

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दस्तूर दुनिया के हजारों बार अपनाये
जब जरुरत पड़ी तो एक काम न आये
पता नहीं वो अपने ही थे या कोई पराये
हालांकि वक्त के धागों से ही फूल पिरोये

दावा किया था कभी हाथ उठाकर हमने
सच होंगे एक दिन देखे हुए संजोये सपने
हकीकत आज यह है, नहीं वो अबअपने
ख्याल दुनिया का क्यों देखे बहुरंगी सपने

मुरझा गए फूल सारे, रह गए धागों के किनारे
एक छोर पकड़ के दूसरे को ही तलाशते रहे
जीवन का बदला रुप, कभी छावं कभी धूप
समझ गए हर दिन बदलता दुनिया का स्वरुप

अब पांव जमी पर ही रखते, उड़ने से डरते
बेदर्द ख्याल जब भी आते, सिर्फ मुस्कराते
गैरो की परवाह नहीं, सिर्फ अपनों से डरते
जख्म जितने खाये सब दिल में संभाले रखते

चाह नहीं रही अब दिल को और तड़पाऊ
जिऊ तब तक मर्म जिंदगी का समझ जाऊ
जो शुकुन इस पार न पाया शायद उस पार पाऊ
माफ़ करना, अगर जल्दी में अलविदा न कह पाऊ

**रचियता**कमल भंसाली

जीवन चिंतन, भाग 1…सही समय, सही चिंतन….कमल भंसाली

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कहते है, “मन” तन का मन्दिर है, आस्थाओं से बनी ही मूर्ति इस में स्थापित की जाती है। कहना न होगा कि मन्दिर की प्रसिद्धि इसकी पवित्रता पर निर्भर करती है। मूर्ति के प्रति पूर्णआस्था से मानव स्वयं को विशेष बना सकता है, यह अनुभव पूर्ण आस्तिक को ही हो सकता है, और, इस पर तर्क वितर्क की कोई गुंजाइस नहीं होनी चाहिए। आस्तिक परिवर्तन में विश्वास रखता है, तथा अपनी विचारधारा में लचीला पन आवश्यकता अनुसार ला सकता है। इससे इस बात पर भी सहमत हो सकते है, कि आशावादी होना आस्तिक के लिए सहज होता है, वनिस्पत नास्तिक के। परन्तु पूर्ण नास्तिक में भी परिवर्तन की थोड़ी संभावना हो सकती है, जब उसके विचारों की सार्थकता कमजोर हो। परन्तु, हमारी आत्मा का केंद्रबिंदु “मन” शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से काफी प्रभावित भी होता है, यह एक सहज साक्ष्य है। इसकी पुष्टि हमारे बचपन, यौवन, अधेड़ और बुढ़ापे की अवस्था के विचारों से की जा सकती है।

जीवन तो जीवन है, उसे किसी भी प्रयास से जीने के लायक तो हर प्राणी को बनाना पड़ता है, पर बात उन्हीं की दूर तक की जाती है, जो उसे विशेष ढंग से जीने की कौशिश करते है। मानव को छोड़ कर शायद ही दूसरा प्राणी सामाजिक दबाब में अपना जीवन जीता हो, अतः उनमें मानव से ज्यादा निर्भीकता और हिंसा का भाव देखा जा सकता है। इसलिए मानव मन का विश्लेषण करने के लिए मनोविज्ञान का अविष्कार किया गया। आज दुनिया जितनी बदली वो मानव मन का ही चमत्कार है। यह बात अलग हो सकती है, आखिर दुनिया आज कितनी सहज है ? ऋषि,मुनियों व जीवन विशेषज्ञ गुरुओं ने जीवन के सात्विक पक्ष पर ज्यादा ध्यान इसलिए दिया की मन की चंचलता से इंसान किसी भी प्राणी को नुकसान न पहुंचाने वाले कर्म करे, पर इस चिंतन की पूर्ण सफलता धीरे धीरे कमजोर हो रही है। अति साधनों के विकास ने मानव मन के हर क्षेत्र में अपना कब्जा करना शुरु कर दिया, और आत्मचिंतन की सारी प्रक्रियाओं से उसे उदासीन कर दिया। आज संसार का जो स्वरूप है, आकर्षक है, साधनों से, परन्तु पूर्णतया असुरक्षित सा महसूस कर रहा है। आज हम “आत्मचिंतन” की भूमिका हमारे जीवन के सन्दर्भ में करे, तो क्या हर्ज है, क्योंकि जीवन की संक्षिप्ता से इंकार करना हमारे लिए अंसभव है। जो, जीने वाले क्षणों की श्रेष्ठता तलाश लेते है, उनके लिये आत्मचिंतन की बात साधारण है।

किसी ने कहा ” जीवन क्षण भंगुर है” , ये कितना सही, कितना गलत , हमारा यहां इसको जांचने का कोई इरादा नहीं है, हम इसका भावार्थः अपनी जीवन शैली में अगर खोजे तो शायद हमे महसूस करने में सहायता होगी की “पल” “पल”से शासित जीवन ही हम जीते है। अतः हर पल जीवन अपना नया रुप प्रस्तुत करता है, हमारे विचारो और कर्म के अनुरुप, अतः कोई कहे “जीवन क्षण भंगुर है” तो काफी हद तक सही लगता है। सवाल यह भी हो सकता है, जीवन पल पल से क्यों शासित रहता है ? तो समझने की कोशिश के अंतर्गत हमें यह ध्यान में लाना होगा, शरीर जीवन के लिए जरुर बना है, परन्तु संचालन तो कोई और कर रहा है, जिसे प्रत्यक्ष में हम नहीं जानते वो कौन है, कैसा है, परन्तु उसने हर चेतन में एक ऊर्जा स्त्रोत अवधि अनुसार सबके तन में स्थापित कर दिया, उसी स्त्रोत से शरीर को स्पंदन मिलता है, उसी से चेतना। स्पंदन अपनी दैनिक जरुरत को व्यवस्था निर्देश देता है, तो चेतना कर्म करने की गति, जिससे हमारे जीवन को सार्थकता मिलती है।

प्रश्न किया जा सकता है, जीवन को इतना महत्व क्यों दिया जाय ? तो उसका उत्तर में इतना ही समझना चाहिए, जो चीज बार बार मिलनी शंकित है, उसका मूल्यांकन साधारण स्तर पर करना बुद्धिमानी की बात नहीं होगी। इस सन्दर्भ में मुझे किसी इन्सान की बनाई ये चार पंक्तिया काफी समझदार लगती है।

रोने से किसी को पाया नहीं जाता
खोने से किसी को भुलाया नही जाता
वक्त सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिए,
पर जिंदगी नहीं मिलती वक्त बदलने के लिए !

लिखनेवाले ने किसी भी एवज में इन पंक्तियों का सहारा लिया हो, पर जीवन की उपयोगिता की सही जानकारी का अनुभव हमें कराता है। हकीकत में जीवन में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, “वक्त”यानी “समय” यानी वही “पल”जिसका जिक्र हमने ऊपर किया। कहा भी गया है, जिसने समय को नहीं समझा, वो जीवन क्या समझेगा ? इसलिए पहला चिंतन हमारा “समय” के लिए होना चाहिए। हमारा दैनिक जीवन ही हमें हर दिन एक आयाम की तरफ अग्रसर कराता है, वो आयाम हर इंसान अपने विवेक से करता है। आयाम का सही और गलत होना, उसीके चिंतन पर निर्भर करता है। एक आयाम के कई पहलू हो सकते है, परन्तु उनमे आपसी तालमेल नहीं हो तो चिंतन उपयुक्त्त हो सकता है, चिंतन में विरोधभ्यास न हों तो उसकी निर्थकता ही सामने आती है, हम अपने अंदर के किसी भी तत्व का गलत सही का मूल्यांकन स्थापित नहीं कर सकते । समय का दुरुपयोग सही चिंतन में अपरिवक्ता के अंतर्गत ही माना जाता है। चिंतन समयनुसार समस्याओं के अनुरुप तभी सार्थकता प्रदान करता है, जब अच्छाइयों और बुराईयों की तुलना प्राणी कर सके। गलती करना उतना नुकसान नहीं करता, जितना गलत होना।

समय जीवन को गति और अवधि दोनों का बोध बड़ी मृदुलता से कराता है, और हमारे कर्म को परिणाम भी मुहैया कराता है। देखा जाय तो एक माँ की तरह व्यवहार करता है, जिससे हम समझ के साथ जीवन जीये। जब साधनों का विकास धीमा था, उस समय जीवन चिंतन करता था, झूठ क्यों बोलू ! आज जीवन चिंतन कम करता, सुविधानुसार झूठ का प्रयोग करते संकोच भी नहीं करता ? क्या समय की गति बदल गई, शायद नहीं, जिंदगी अति शिक्षित हो गई, साधनों के मामले में। साधनों की भूख से इंसान लालच के घोर अँधेरे में चिंतन के नैनों पर पटी बाँध अर्थ की दौलत खोजने में लग गया। परिणाम मानवता जीवन की ऊंचाइयों से फिसल रही है, पता नहीं किस गति से जल्द ही गर्त से गहरी खाई में समा जाए। हम समझते है, कुछ अविष्कारों से जीवन को बदल सकते है, काफी सही है, परन्तु यह भी सही है, प्रकृति सब अविष्कारों के दुष्परिणाम सहन कर लेती है, परन्तु जब वो अपना विरोध किसी भी रुप में दर्ज कराती है, तो हम दहल जाते है। भूंकप को ही लीजिये, एक सेकेंड का हमारा अनुभव हमसे क्या नहीं करा देता ? समय और प्रकृति का रिश्ता माँ- बेटा का है, माँ अपने बेटे का ज्यादा दुरुपयोग एक सीमा तक ही सहन करती है, ये समझने और चिंतन की बात है।

जीवन को सत्य से ही समझना पड़ता है, झूठ हमें छलावा ही देता है। जब तक हम उसको नहीं समझते, जिसके कारण हम इस धरती पर है, तो हम जब गौण होंगे, तो शायद कहीं और उसकी कीमत चुकानी ही है, आखिर अर्थ शास्त्र को तो हम सही ही समझते है, ना….आइये चिंतन करते है, फिर एक बार अपने जीवन को सही पथ पर वापस कैसे मोड़े ?, अगर हमने अपनी किसी कमजोरी के अंतर्गत गलत कदम किसी गलत राह की तरफ रख दिये हो, तो। सुबह का भुला शाम को अगर घर वापस आ जाये, तो उसे भूला कहां कहते है ? आखिर, हम अनूह तो नहीं है। ….क्रमश …..कमल भंसाली

चलते चलते …पढ़ लेते है, Richard Aedon का यह सन्देश… “All photos are accurate. None of them is truth”.

मेरे हमसफ़र….कमल भंसाली

चल मेरे, हमसफ़र, उन राहों पर ही तू चल
जिन, पर सफलता के फूल, खिलते हर पल
देख, चारों ओर, सुनहली,आंकाक्षाओं की भोर
मौसम है, कुछ करने का, कह रहा, आज का दौर

कल हम क्या थे, आज क्या, दे, दे जरा पहचान
जो कुछ करते, वो भला कब रहते है, अनजान
जीना उसी को कहते, जो कभी नहीं रहते बेजान
बिना मंजिल के कैसे जगेगे बता, तेरे मेरे अरमान

देख इस पल की रवानगी, कितनी सक्षमता से आता
कितना, कुछ हमें दे जाता, कितना, कुछ ले भी जाता
आ, सजाते इस पल को, कर्म से, खुलेंगे भाग्य के द्वार
कहते है, सूर्य की प्रथम, रश्मि में रहती चेतना बेशूमार

आये है जब दूनिया में, कुछ मकसद से ही जी रहे
उस मकसद की पहचान ही बढ़ाएगी, हमारी शान
बिन वजह तो पत्ती भी नहीं खिलती, हम है, इन्सान
चल कर्म करे हम, फल देने की चिंता करे, भगवान

आ आगे बढ़ते, “परिश्रम की रानी” ‘दोपहर’ कितनी चमक रही
हमें पथ का दावेदार मान, परिश्रम के पसीने की बुँदे सुखा रही
पर्वतों की नुकीली चोटियों के सिंहासन पर “दिव्या” मुस्करा रही
जीवन के हर संघर्ष में है, गहराई, कितनी सहज हो, समझा रही

विषय भोग न हो हमारी, कमजोरी की मजबूरी
अतृप्त पेड़ की शाखायें, जल्द ही सूख जाती सारी
बटोही है हम उस मंजिल के, जहां से कभी आये
आत्म रसानुभूति का रसायन, बता फिर कब पाये

आत्मा की मृष्टि को समझना, अब ऋजुता से जरुरी
यथार्थ का अनुभव ही, लक्षित उर्ध्वगामी मंजिल की दूरी
यकायक कुछ ऐसा न हो, भटक जाए निगाहें हमारी
तेरी मेरा अलग रास्ता न हो, यही है हमारी “जिम्मेदारी”
आखिर, मैं हूँ तन तुम्हारा, तू मन की चंचलता मेरी…कमल भंसाली