🌷जीवन मुक्तक 🌷कमल भंसाली

कहा है किसी ने इच्छाओं का कोई अंत नही होता
इस जग में ना इच्छा के तो कोई संत भी नहीं होता
दो पल की जिंदगी में क्या से क्या क्या नहीं होता
आदमी आज में भी अनजाने कल के लिए जीता
🌸🌸🌸
जो है वो कम है यह सोच जो जीवन से घबराता
इस कशमकश में बहुत कुछ छोड़ आगे बढ़ जाता
मंजिल पास ही है पर असंतोष से उसे देख न पाता
इच्छीत यात्रा के अंतिम क्षोर पर कभी न पँहुच पाता
🌺🌺🌺
रिश्ते जीवन की बुनियाद ये रखता जो याद
“प्रेम साँसों की सरगम” बजती बिन किसी वाद
उम्र की दहलीज के पास ही होता मृत्यु का वास
आत्मा की करुणता में ही है विधाता का निवास
🌹🌹🌹
मधुरता जीवन की प्रसन्नता का अनमोल प्रकाश
शब्दों में नम्रता का प्रवेश सही शुकून की तलाश
व्यवहार की दुनिया में सम्बन्धों का अपना इतिहास
स्वयं को जो सुधारे व्यक्तित्व का हो यही हो प्रयास
🌷🌷🌷
जीवन अनुपम होता उम्र के गुलदस्ते में सजता
शोभा जग की बन अपने अंदाज में ही लहराता
प्रेम की पगडंडिया पर फूल कांटो दोनों बिछाता
जीवन की विशेषता सुख और दुःख दोनों बताता
🌻🌻🌻
रचयिता ✍🌺 कमल भंसाली🌺

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👥कर्तव्य और अधिकार👤 जीवन अनुसन्धान चर्चा भाग 1✍कमल भंसाली

“अधिकार” और “कर्तव्य” ऐसे शब्द है, जो एक दूसरे के पूरक है, एक के बिना दूसरे का चिंतन व्यर्थ है, फिर भी विडम्बना ही कहिये एक सर्व पसन्द है, दूसरा ज्यादातर सिर्फ चिंतन का विषय ही है। जी हाँ, मैं अधिकार की खुश किस्मती और कर्तव्य निर्वाह के कम पसन्द की बात कर रहा हूं। अधिकार प्राप्त करना सबको प्रिय लगता है, पर यह बात कर्तव्य निभाने के लिए नहीं की जा सकती, ऐसा क्यों है ? उत्तर देना आसान नहीं पर तथ्य कहते है देने वाला ज्यादा प्रिय लगता है और लेने वाला कम, ऊपरी सतह पर कथन सही भी लगता है, पर ऐसा हकीकत में हरगिज नहीं है। जब हम “अधिकार” और “कर्तव्य” का चिंतन अपने ही जीवन के सन्दर्भ में करते है, तब लगता अधिकार हमें ज्यादा सुविधाओं के लिए प्रेरित करता है, और कर्तव्य कहता है सुविधाये मेरा ध्यान रखने से ही प्राप्त हो सकती है। सच भी है, दोनों स्थितियों के निर्माण से ही सुव्यस्थित जीवन का संचालन संभव है। अधिकार यानी प्रभुत्व, या हक जिसे हम इंग्लिस में Right या Rights के नाम से जानते है, जो मानव की उग्रता से पोषित होता है, अतः इसकी सक्षमता में मजबूती और तेजी जैसे तत्व ज्यादा झलकते है। उसके विपरीत कर्तव्य का मतलब करने योग्य कर्म यानि किसी कार्य को करना, नैतिक जिम्मेदारी के अधीन होकर, संजीदगी और संवेदनाओं से ज्यादा पोषित है ।अतः नम्रता से इंग्लिश भाषा में Duty शब्द का प्रयोग ज्यादातर कर्तव्य पूर्ति के लिए ही किया जाता है। हालांकि कुछ और शब्द भी इंग्लिश में प्रयोग किये जाते है, जैसे OUGHT, WORK, OBLIGATION, JOB, ROLE,DORESHIP, PART, DEVOIR, CALL, BUSINESS, OBEDIENCE, DISCHARGE, FALL, BE UP, CONSCIENTIOUS , TRUSTWORTHY तथा LOYAL। इंग्लिश में स्थिति के अनुसार कर्तव्य बोध कराने के लिए अलग अलग शब्दों का प्रयोग किया जाता है, इसलिए समझदारी से इनका प्रयोग करना होता है। “अधिकार” शब्द का प्रयोग हर जगह करना खतरनाक है, हाँ इसके प्रति अपनी चेतना को जागरूक रखना जरूरी होता है।जब इंसान किसी प्राकृतिक या शासन सम्बन्धी सुविधाओं से वंचित हो और उससे उसका जीवन संचालन कठिनता महसूस कर रहा है, तब उसे अपने अधिकारों का भी ज्ञान रहना चाहिए। समय के परिवर्तन स्वरूप स्वयं को बदलना जरूरी भी होता है पर यहीं जब हम विशेष परिस्थितियों में बेअसर अधिकारों का उपयोग करते है, तो परिणाम विपरीत ही मिलते है। ऐसी स्थिति सामूहिक जीवन के अंतर्गत कई बार आती है। परिवार और समाज दो ऐसे क्षेत्र इसके सर्वतम उदाहरण है, जहां कर्तव्य कमी और अधिकारों का अधिक उपयोग होता रहता है। बात साफ़ है, अधिकार मानसिक विसाद को बढ़ाता है और कर्तव्य निभाव सुख का अहसास कराता है, मात्रा चाहे उसकी कितनी भी कम हों। जब बात कभी हम देश की वर्तमान परिस्थितयों पर करते है तो ज्यादातर चर्चाये अपने अधिकारों के सन्दर्भ में होती है, शायद ही हम चर्चा करते है देश के प्रति अपने कर्तव्यों की। आखिर अधिकार का हक पाने वाले हम भूल जाते है कि जब तक हम अपने कर्तव्यों की पूर्ति नहीं करेंगे तब अधिकार किस सतह से अपनी पूर्णता पायेगा और कैसे हम उसका उपयोग कर सकेंगे। भारत शायद दुनिया का सबसे उदारवादी देश है, जहां स्वतन्त्रता के अधिकार का लोग अपने छोटे छोटे स्वार्थों की पूर्ति में विशेष उपयोग करते है, यानी अपने कर्तव्यों को भूल जाते है।हम जो इस देश के नागरिक है, यहां की सब सुविधाओं का तो उपयोग करते है, और उनकी कमियों पर दुःख महसूस करते है, पर किसी एक अपने जायज या नाजायज सुविधा के लिए अपने कर्तव्यों को भूल अनेक जीवन उपयोगी सुविधाओं को नुकसान पहुंचाने से परेहज नहीं करते है। इस लेख का यह कतई प्रयास नहीं है कि हम अपने अधिकारों के प्रति सचेतक न बने परन्तु देश और अपने हित के लिए जरूरी है कि हम अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का भी अहसास ही नही पालन करने का संकल्प होना चाहिए। ये देश की विडम्बना ही मानी जा सकती है कि उसके संचालन करने वाले नेता और पढ़े लिखे अफसर नैतिकता युक्त कर्तव्य का निभाव अपने निजी स्वार्थों के कारण नहीं पसन्द करते। ये तो तय है, कुछ भी बिना प्रयास संभव नहीं होता ।आज हम स्वतन्त्र है, परन्तु इसके लिए कितना कुछ खोया गया, इसका सही मानसिक चिंतन कम लोग ही करते है। याद करना जरूरी है, हासिल करना आसान होता पर त्याग करना कठिन होता है। अगर सुविधाओं का प्रयोग करना अधिकार है, तो उन्ही सुविधाओं को नष्ट करने की सोच को क्या कहें, हिसाब से तो ऐसे समय इन सुविधाओं को बचाने के कर्तव्य पर ध्यान देकर ही कोई कदम बढ़ाना चाहिए। जब हम परतन्त्र थे तो देश प्रेमियों ने कई तरह के आंदोलन किये, स्वतन्त्रता पाने के लिए नरम गर्म प्रयास भी किये पर सब की एक भावना थी कि देश दासता से स्वतन्त्र हो जाए, इस परिस्थिति में अधिकार और कर्तव्य का संयुक्त प्रयास था । लाला लाजपतराय ने जहां अधिकार याद दिलाया ” स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है वहीं नेताजी सुभाष चन्द्र ने कर्तव्य निभाने का आह्वान किया ” तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा”। शायद यही कर्तव्य और अधिकार की सही समझ और सक्षमता ने हमें आजादी का पुरस्कार दिया। युग परिवर्तन में अधिकारों के प्रति सचेतक इन्सान को सब साधन स्वतः ही मिल रहे फिर कर्तव्य की अवेहलना करने से प्राप्त परिणामों पर शिकायत करने का अधिकार कहां रह जाता है। सही चिंतन की जरूरत है, देश पर न्योछावर तो हम न हों पर देश से तो हमारा प्रेम आत्मिक होना जरूरी है। हमें R. J. Ingersoll के इस कथन पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि ” The place to be happy is here. The time to be happy is now. The way to be happy is to make others so.” । उपरोक्त चिंतन के बावजूद भी अगर हमें कर्तव्य बोध की जगह अधिकारों की चिंता है तो निश्चित मानकर चलिए हमारी स्थिति John May के इस वाक्य में व्यक्त है ” If you are waiting for inspriation, you are waiting at a bus stop on a road where no buses run. क्रमश****लेखक: कमल भंसाली

👉नये वर्ष के नये संकल्प👈भाग 1👌कमल भंसाली

“दोस्तों” वर्तमान साल या वर्ष हमसे शीघ्र ही विदा लेगा इस समझ के साथ कि हमें भी कभी न कभी धरती के जीवन से विदा होना है, अवधि या आयु के अनुसार। साल के सफर की एक निश्चित अवधि होती परन्तु जीवन अपनी अनिश्चितता के कारण कभी भी विदा हो सकता है। बिता समय अपनी महत्वपूर्णता के कारण भविष्य में भी याद किया जाता है, ठीक वैसे ही महत्वपूर्ण व्यक्तित्व जीवन के बाद भी याद किया जाता है। हर समझदार इंसान अपने जीवन को सुख और समृद्धि के साथ कुछ इस तरह से उपयोगी बनाना चाहता है कि उसका जीवन मिसाल के तौर पर लम्बे समय तक याद किया जाए। अगर हम चाहे तो नया साल आने की आहट से पहले हम अपने बीते साल की अपनी उपलब्धियों और असफलताओं की स्वयं समीक्षा और मूल्यांकन कर आने वाले साल को और बेहतर और प्रभावशाली बना सकते है। इस लेख का कत्तई यह उद्देश्य नहीं की जीवन का मूल्यांकन किसी असफलता को दुःखित मन से याद कर किया जाय, क्योंकि आज के युग की गतिविधिया काफी हद तक पिछली शताब्दियों के वनिस्पत तेजी से बदल रही है और इंसान को वर्तमान के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है, तो कहीं न कहीं असफल परिणाम आ ही जाते। रिश्तों में घटती मधुरता इसका ताजा उदाहरण कह सकते है। मानव स्वभाव से लेकर जीवन सम्बन्धी साधनो और सम्बंधों में भी परिवर्तन दृश्यत् हो रहे है, इसलिए स्वभाविक हो जाता युग परिवर्तन के अनुसार स्वयं को बदलना। चूँकि आज हमारी सफलता और असफलता जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है, अतः विदा लेने वाला वर्ष चाहता है कि वो मूल्यांकित हो जिससे उसे किसी न किसी रुप में याद किया जा सके। दोस्तों, पहले की तरह परम्परागत आय के साधन अब बीते युग की बात हो गई, मशीनीकरण के निर्माण की प्रक्रिया में इंसानी हाथ की जगह दिमागी कुशलता मुख्य होती जा रही है। कितना कुछ भी बदल गया परन्तु मृत्यु के हाथों से बचना आज भी मुश्किल है, अतः आनेवाले साल को स्वास्थ्य के अंतर्गत सन्तुलित ढंग से जीना भी जरुरी बन जाता है। अगर हम सच्चाई के साथ बीतते वर्ष पर गौर करेंगे तो अनुभव किया जा सकता है कि हमारा व्यक्तित्व कहीं न कहीं कमजोर रहा है, और आशा के अनुरूप परिणाम नहीं प्राप्त हो रहे है या फिर आर्थिक, पारिवारिक या फिर सामाजिक रुप कोई समस्या जिसका समाधान हम नहीं कर पा रहे है। दोस्तों, आनेवाले साल में आप इन समस्याओं से जरूर निजात पाना चाहेंगे, पर कैसे ? यही हमारी चर्चा का विषय होना चाहिए और हमें ज्यादा समय अब नहीं खो कर अभी से नये वर्ष में भविष्य की उन्नति की तरफ ध्यान देना चाहिए।

सबसे पहले जरूरी हो जाता है कि नये साल की शुरुआत से पिछले महत्वपूर्ण कार्यक्रम जो अधूरे रह गए उन सब को दुबारा क्रमवार स्थापित करने की कोशिश होनी चाहिए। उनके प्रति हमसे क्या लापरवाही हुई ? उस पर गहनतम चिंतन के बाद यह तय करना चाहिए नये साल में उनके लिए स्वयं में क्या क्या तकनीक, मानसिक, शारीरिक सुधार की जरूरत है ? उन समाधानों पर अमल करने के लिये व्यक्तित्व को नकारत्मकता से कैसे बचाव किया जा सकता है,? इस तथ्य पर हमें पूर्ण चेतना से ध्यान रखना होगा। E.H Harriman के इस संदेश से हमें सहमत होना चाहिए ” Much good work is lost for lack of a little more” दोस्तों, जैसे हर सफलता हमें मोहित करती वैसे ही हर असफलता चाहे किसी भी क्षेत्र क्यों न हो, पर हमें भीतर तक तोड़ती है। सबसे प्रथम इस चिंतन को एक मनोवैज्ञानिक दर्शन के माध्यम से तय करना चाहिए की जीवन फूलों से नहीं कड़े उसूलों से जीया जाता है। संसार, देश और सामाजिक दिशा निर्देश के अनुसार ही हमारा नया साल का नया चिंतन स्कारत्मकता, संयम आदी गुणों से युक्त होना चाहिये। मनोवैज्ञानिक मानसिक क्षमता का अद्भुत संगम जब गतिमान होगा तो निश्चित है, नया साल हमें काफी प्रभावकारी और चमत्कारी परिणाम देकर प्रफुलित कर देगा।

हम आगे बढ़े, उससे पहले Harold Sherman की इस नसीहत पर जरा गौर करते है ” Yours life is yours to make of it what you will be; but dare to be yourself at all times; and do not allow any person or force of circumstances to keep you from doing the thing you want most to do- for therein lies your greatest possibility of success.”

आनेवाले साल का स्वागत हमारा इस दृष्टि से करना सही हो सकता है “नया साल, नई राहे, नई मंजिले”। हम इस संकल्प ( Resolve or resolution )के साथ अगर जिंदगी को नियंत्रित कर उसे अगर एक सुहाने सफर की तरफ मोड़ दे तो किसी भी रुप में गलत कदम न होगा। हम अपने स्वास्थ्य को आलस की जगह स्फूर्ति देना तय कर ले तो बाहरी व्यक्तित्व भी मुखर हो सकता है। हम अच्छे परिधान हमारी संस्कृति के अनुसार धारण कर सामजिक क्षेत्रों की तरफ अपना प्रवेश दर्ज करा सकते है। हम नई किताबों से आज के सन्दर्भ का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर परिवार व समाज को नई दिशा की चेतना दे सकते है। हम नये शब्दों को आत्मसात कर अच्छे वक्ता बन दार्शनिक स्वरूप अपने जीवन को प्रदान कर सकते है। दोस्तों अगर यह सब नहीं कर पाये तो कोई बात नहीं परन्तु हम यह संकल्प जरूर ले सकते है, कि हम कोई भी गलत, चिंतन कोई गलत काम नहीं करेंगे, जिससे हमारी वर्तमान जिंदगी प्रभावित हों।

परिवर्तन करना और परिवर्तन की बात करना दोनों में फर्क होता है, संकल्प करना और उसे सक्रिय कर निभाना भी आसान नहीं होता। अतः सबसे पहले जरुरी है, हम अपना स्वयं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करे। चलिए थोड़ी देर के लिए इस पथ की जांच कर लेते है, अपने ही सन्दर्भ में। मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि हम अपनी भावनाओं की रुपरेखा को समझे और उनका उपयोग जीवन सुधार में करे। मसलन हमारी कुछ पुरानी आदतें (Habits)जिनसे हमारा आत्मविश्वास को कमजोरी प्राप्त होती है, हम उनमे सुधार का संकल्प कर सकते है। हम कुछ ऐसे काम को दृश्यत् कर सकते है, जिनसे परिवार, दोस्तों, और रिश्तेदारों का विश्वास हम में बढ़ जाये और सुखद सामाजिक जीवन का अनुभव हम करने लगे। “भावना” (Emotions) “रवैया” (Attitude)और “प्रतिक्रिया” इन तीन शब्दों के तहत अगर हम रोज की जिंदगी को जीये तो हम अपना दैनिक कार्य सिल सिलेवार कर सकते है।

बिना किसी टालमटोल के किये कार्य से आंतरिक शक्ति बढ़ती है और इस और जीवन को सुरक्षित वातावरण भी मिल सकता है। इससे हम स्वयं समस्याओं के समाधानों के अविष्कार कर्ता बन सकते है क्योंकि हमें अपनी अक्षमताओं का ज्ञान होता है और उन्हें स्वीकार करने की हिम्मत का भी अंदाजा होता है। इस से अपना व्यक्तिगत जीवन भी अक्षुणता प्राप्त कर सकता है जीवन की विविध समस्याओं की स्थिति अनुसार कभी जरूरत पड़ने पर ऐसे इंसान क्रोध, विरोध कर के भी अपनजनों में प्रिय रह सकते है। अतः हमारे नये वर्ष के सभी संकल्प हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप कैसे हो, यह हमें मनोविज्ञान की जानकारी रखने से प्राप्त हो सकते है। –क्रमश–लेखक: कमल भंसाली