नाराज सी रहती, जिंदगी कमल भंसाली

नाराज सी रहती
हर रोज जिंदगी
आनेवाला है , कोई तूफ़ान
कहती रहती, आजकल जिंदगी
समझाने पर भी नहीं मानती
वक्त के दरिया से
आनेवाले छोटे छोटे झोंकों से
सहम सी जाती, आज कल जिंदगी

🌹

असहमति के हजारों
पहलू बदल कर
सारी रात करवटे
बदलती रहती, आजकल जिंदगी

🌻

असहाय सी खड़ी
विश्वास की जमीन पर भी
आगे चलने से पहले
अविश्वास से,
सहारे को तलाशती, आजकल जिंदगी

🍁

है, जो, उसको नहीं मानती
दुनिया को ही
अपनी हर हार का
जिम्मेदार मानती, आजकल जिंदगी

🌺

उम्र के दर्द
सहन कर लेती
बिन रौशनी
अंधेरों में शुकुन तलाशती
अपनी ही चुप्पी में
अपनी सीमा रेखा
पहचान लेती, आजकल जिंदगी

😙🚶😙

नासमझ को कैसे समझाऊं

सही से कैसे

उसे दूर हटाऊँ

बेदर्द दुनिया में
उसका हश्र यही, होना
सही समझती, आजकल जिंदगी ….

रचियता ✍कमल भंसाली

02/12/2017

💑”अलविदा 💑कमल भंसाली

“अलविदा” ही कहा था
मैंने
तुम्हारे नैन भर आये
कुछ दर्द के साये
जो तुमने मुझ से छिपाए
अफसोस ही कह लो
साथ चले, पर दिख नहीं पाये
पता नहीं आज
कैसे सामने उभर आये?

गम की कोई किताब होती
तो सब कुछ समझ जाता
तेरी बेवक्त मुस्कान में
दर्द, तुम्हारे तलाशता
पीकर उन्हें शायद
शकुन से विदा लेता
जग में “प्यार” को
अपनी मंजिल समझा देता

होठ, तेरे,
अब क्यों थरथराते
मेरे “अलविदा” पर
शब्दों को चिपका कर
दर्द, तेरे, छिपा ते
औदास्य, चेहरे में
समा ये, निः स्पृही राज गहरे
बाहर आ रहे
आज ही, क्यों सारे ?

तुम्हारी चुप्पी को
बन्धन समझ
साथ निभाता रहा
कुछ शंकाओं के फूल
तेरे जुड़े में सजाता रहा
अनचाहे समर्पण में
अपनी ही आत्मा तलाशता रहा

कब ख्याल करता
औरत के दिल में क्या, क्या होता ?
बदन के हर हिस्से को छुआ
अगर एक कोना
तेरे, मन का टटोल लेता
तो सच कहूं
मुझे, “अलविदा” न कहने का
भी, अफसोस नहीं होता…..”कमल भंसाली”

 

★★आस्था का फूल★★कमल भंसाली

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अपनी ही मंजिल का हूँ, दीवाना
उसी राह का मस्त सा हूं, परवाना
सही राह पर मुझे चलते ही जाना
क्या फर्क पड़ेगा, दुश्मन बने जमाना

एकपथ की कठिनता से नये रास्ते बनते
आलोचना से ही गंभीर पुष्प जन्म लेते
मासूमियत से ही आता हर रोज सवेरा
कैसा भी हो अन्धेरा ? सपना है, सुनहरा

जो दुनिया की करते परवाह, वो ठहर जाते
न वो जीते, न वो मरते, बुत बनकर रह जाते
कौन किसका ? सम्बंधों में प्यार जो तलाशते
हकीकत में वो दर्द के काँटों से ही दामन भरते

कल के अफ़साने, आज काम नहीं आ सकते
शीशे के घर में रहकर पत्थर नहीं फैंक सकते
निर्लोभ, निर्लेप को डर भी ख़ौफ़ नहीं दे सकते
अस्तित्व के भय से, कभी मंजिल नहीं पा सकते

कहते है, बिगड़ी हुई चाहते जब सुधर जाती
जिंदगी कुछ विशेष पूरक पहचान बन जाती
दीप के लिए बाती, तैल में डूब मगन हो जाती
उजाला बन अंधेरो को कुछ अहसास दे जाती

मस्त मस्त मुसाफिर, मैं अपनी ही राहों का
क्यों परवाह करु, खुदगर्ज दुनिया की बाहों का
सफर मेरा है यह है, कर्मफलों से पराग पाने का
समझ गया खेल है, जिंदगी, शमा और परवाने का

चल रहा आज, कल तक हद दुनिया की पार कर जाऊंगा
जाने से पहले, यकीन कर दुनिया, तुझे क्षमा कर के जाऊँगा
इतनी सी राय मेरी, गैर की खिड़कियों में न करे तेरे नैन प्रवेश
फूल ही चुनना है, “कमल” का, तो फिर अंदर का कीचड़ ही तलाश…..कमल भंसाली

👌👌नमन👌👌 कमल भंसाली

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आशा उसी से कीजिये, जिसने हमको बनाया
वो ही देता, सहारा, दूर कितना चाहे, हो किनारा
डगमग हो जब जीवन नैया, क्यों इतने घबराये
जब हाथ पकड़ कर, वो, स्वयं किनारे ले जायें

सुख दुःख होते है, सिक्के के दो पहलू
दोनों तरफ की एक ही होती है, पहचान
निराशा के पलो की सीमितता को ले जान
तो, फिर समझले, हम,जीवन मूल्य है, ज्ञान

दर्द हजारों मिलते, तो क्यों करे हम गम
दया धर्म से सब हो जाएंगे एक दिन कम
चार दिन की जिंदगी, कब तक रोये हम
लेंगे उसका नाम, दर्द सारे हो जाएंगे कम

उसके नाम हजारों, पर है, तो वो है,एक
पथ हजारो ही सही, मंजिल भी तो है, एक
आये है, जाना निश्चित, कर्म करना है, एक
सही कर्म हो, सत्य पूर्ण, प्रार्थना यही है एक

दुःख के भँवर में फसा जीवन, मांगे अपनी ख़ैर
इस दुनिया में न अपना, न गैर, फिर कैसा बैर
पल जो भी बचे, उसको ही, अब करने अर्पण
पवित्र हो जाये आत्मा, प्रभु, स्वीकार करो,नमन
👌👌कमल भंसाली👌👌

कमल भंसाली

जख्म प्यार का, दर्द दिल का

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“देख जमाने के हर सितम
“प्यार” हो गया, कमजोर
अब बदल गया, सब कुछ
नहीं चलता, उसका जोर”

कल तक इन्सान जिसे सदा दिल में रखता
आज पता नहीं, वो “प्यार”अब कहां रहता ?
खुदगर्जी ने लुभाया, सदा अब उसकी चलती
बिन प्यार शब्द, उसकी भी शायद नहीं निभती

कल तक का इंसान, प्यार का पूर्णता से कायल
आज इंसान अपनी बदलती फितरत से घायल
ख्वाईसों ने बदल डाला, आज हर इंसानी चेहरा
खुशियों का मोहताज हो रहा, इंसानी दिल बेचारा

सदियों से दिल टूटता आया, सबने समझा उसे ही खिलौना
प्यार ही हुआ बदनाम, दिल ने सदा उसे ही गुनहगार माना
बेवफाई सनम की, जब बर्दास्त की हर हद पार कर जाती
प्यार और वफ़ा की हर कसम, दिल को चूर चूर कर जाती

कल तक झूठ से कतराता, आज उसी का ही बिगुल बजाता
कल गुनाह कर शर्माता, आज उसे अपनी उपलब्धि बताता
बेशर्मी की हर हद से गुजर, जी रहा, प्राणी बेखबर, बेअसर
फिर भी कहता हर जिस्म, आ मुझे प्यार कर, बेशुमार कर

प्यार जिस्म की भूख नही, दिल की आरजू होती
बिन प्यार आत्मा की कोई उपासना पूर्ण नहीं होती
सच्चा प्यार बिन शब्दों के, रोम रोम से आवाज देता
इंसानी रिश्तों के गुलशन में, सत्य की महक फैलाता

समझने की बात है, इसलिए प्यार की व्याख्या करता
प्यार एक प्रवाह है, हर प्राणी के खून में बहता रहता
प्यार को खुदगर्जी को जहर न पिलाना, यही मानवता
रिश्तों और बन्धनों से बंधा जीवन ही, स्वर्ग कहलाता

प्यार आज भी कहता, मोहताज नहीं, मैं उपहार का
न मैं कोई दस्तावेज व्यवहार और कोई व्यापार का
दस्तखत दिल पर करता, हर कसम, वादा पूर्ण निभाता
नयनों की भाषा से, हर खुदगर्ज को पहचान भी जाता

कहना है, प्यार की गागर हर पल छलके, पर न टूटे
जग चाहे छूटे पर, पर दिल किसी का कभी भी न टूटे
प्यार हर सम्बन्ध का अस्तित्व, है, विश्व का स्थायित्व
सत्य से प्रेम का सबंध, प्यार का ही कोई अमृतमय तत्व…….कमल भँसाली

बेहतर जीवन शैली….भाग ४……कर्ज..एक दर्द….

दोस्तों, बेहतर जीवन शैली के अगले पायदान पर आपका फिर एक बार स्वागत ।हमने काफी कुछ चिंतन पिछले पायदानों पर किया, उन सबसे ज्यादा महत्व्पूर्ण आज का होगा । यह है “आर्थिक कर्ज” जिससे शायद ही कोई परिवार कभी बचा हो । “कर्ज” शब्द बड़ा अनूठा है, सच में तो स्वागतमय रोग है, जिसको निमन्त्रित किया जाता है । ज्यादातर इसका प्रयोग कठिन समय में किया जाता है । कर्ज को हम दो तरह से यहां जानेगें, प्रथम व्यक्तिगत और दूसरा वाणिज्यक, जिन्हें हम इंग्लिश में personal loan और business loan के नाम से जानते है। उससे पहले इसकी दूसरी परिभाषाओं पर एक नजर डालते है । कर्ज, ऋण, उधार, साधारणतय इसी नाम से हम दूसरे से प्राप्त आर्थिक सहयोग को सम्बोधित करते है ।

कहते है, समय सब कुछ करा सकता, आदमी समय के हाथों मजबूर हो जाता। जिंदगी में जब दौर कठिनाइयों का शुरु होता है तो कई अप्रिय निर्णय लेने जरूरी हो जाते है । जब समय आर्थिक रुप से कमजोर साबित होता दिखाई पड़ता तब हम उसे फिर से मजबूत करने के लिए कुछ कर्ज करके उसे उभारने की चेष्टा करते है। ऊपरी सतह से इस निर्णय में कुछ गलत नहीं लगता, परन्तु इसके बावजूद भी अगर परिवार में आय के साधन नहीं बढ़ते तो चिंतन की बात होती है, कि लिया हुआ कर्ज किस तरह शोध होगा। कर्ज की एक विशेषता है की इसके ऊपर चुकाने वाला ब्याज समय की तरह चलता रहता और जब तक नहीं रुकता जब तक हम उसे चुकता नहीं कर सकते । कहते है ” कर्ज देने वाले को मूल से ज्यादा ब्याज प्यार होता है “।

अभी हम अपने व्यक्तिगत कर्ज की बात करेंगे जो हम रिश्तेदारो, दोस्तों, जान पहचान के लोग या फिर दलाल के मार्फत लेते है । आजकल बैंकों से व्यक्तिगत कर्ज और क्रेडिट कार्ड के द्वारा भी मिलता है । कोई समय था, आदमी को उसकी साख पर कर्ज मिलता था अब ऐसी बात नही है। आदमी की जान पहचान और आपसी मिलीभगति से कुछ भी संभव है, हालांकि बाद में रुपया उधार देने वाला पछताता है। आप अगर किसी को यह कहें की मुझे अभी कुछ अर्थ की जरूरत है, आप ईमानदार है, आप वापस लौटाने की भावना भी रखते है, परन्तु आपको कर्ज नहीं मिलेगा। ख़ैर, यह तय है, आजकल उधार लेना भी एक कला है ।

परन्तु कर्ज को अच्छा नहीं कह सकते आखिर विशिष्ठ जीवन शैली तभी सुगम हो सकती है, जब हम इस बीमारी से दूर ही रहे । कर्ज की अगर विशेष जरुरत हो और जीवन की किसी समस्या से निदान पाना जरूरी है, तो यह सदैव ध्यान रखना होगा, समयानुसार हमें उसे लौटाना है। कर्ज लेना मजबूरी जरूर है, परन्तु उसे आदत बनाना ठीक नहीं। समझदार इन्सान कर्ज लेने से पहले अपने संयोजित साधनों मूल्यांकन करके ही कर्ज लेता है, जिससे किन्ही विशेष परिस्थिति में उसे वापस लौटने में तकलीफ नही हों। कुछ लोग गहने रख कर कर्ज लेते है, मेरी राय में इससे बचना चाहिए। कड़े ब्याज पर प्राप्त यह कर्ज बड़ी तकलीफ से चुकता होता है, उससे अच्छा है, उन्हें बेच दे ।
कर्ज लेने से पहले किसी भी के लिए पहले उसका विश्लेषण करना जरूरी है । हो सके तो निम्न बातों पर गौर जरुर करे :-

1. कर्ज लेना क्या बहुत ही जरूरी है ?
2. कितना कर्ज लेना जरूरी है ?
3. ब्याज की दर उचित है, या नहीं
4. देने वाले व्यक्ति की क्या क्षमता है ?
5. देने वाले का स्वभाव और व्यवहार अनुकूल है या नहीं
6. रकम लौटाने के समय का सही अनुमान
7. कर्ज सम्बंधित दस्तावेज की जांच
8. कर्ज लौटाने की तारीख याद रखना

ज्ञानी आदमी कहते है, रिश्तेदारों से कर्ज लेने से पहले तीन बार सोचना चाहिए, क्योंकि वे रिश्तों के बाहरी आवरण को चोट पहुंचा सकते है । भीतरी प्रेम रिश्तों और मित्रों में अगर है, तो सच के साथ हालात का भी उन्हें अंदाज रहता है, और आपसी सम्बन्ध को कोई नुकसान नहीं होता ।

परिवर्तन संसार में कई तरह के होते है, परिवार की प्रति जिम्मेदारी निभाते कई कर्ज आज भी लिए जाते है, पर देखने में यही आता जो कर्ता उसे लेता है, वो ही उसकी चिंता में मर जाता है या कई मानसिक शारीरिक बीमारियों का शिकार हो जाता है । कम होती उम्र, आय की कमी, परिवार में उसका कम होता शासन तथा उसके अपने नैतिकता के प्रति विचार उसे असहाय और कमजोर कर देते है। ऐसे परिवार बहुत से मिलेंगे, जिनमे पिता ने बच्चों को शिक्षित करने, शादी करने तथा अन्य कोई पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने के लिए कर्ज लिया, यह सोच कर की जब वो कमाने लग जाएंगे तो कर्ज चुकाने में कोई तकलीफ नहीं होगी । अगर ऐसा होता है, तो ठीक है, शुभ कर्ज था, परन्तु ज्यादातर देखने में आता है, आजकल कमाते ही सब कुछ भूल जाते है, और अपनी खर्चीली आदतों और झूठी शान शौकत के चक्कर में माता पिता का लिया उनके हित में उचित कर्ज भूल जाते । इस तरह की भूल अगर विशिष्ठ चिंतन वाला आदमी कर जाता है, तो यही समझना उचित होगा की यह कर्ज उसके लिए शुभ नहीं था । पहले जब भरे पुरे परिवार का मालिक मरता तो लोग कहते, की पीछे सुखी संसार छोड़ गया अब अगर इस तरह का कर्ज लेने वाला मरता है, तो लोग कहेंगे की देखों परिवार पर कर्ज का भार छोड़ गया । कहने का सार यही है, हम भविष्य निर्धारित कर्ज कभी न ले, यह हमारी बेहतर जीवन शैली के विपरीत काम कर सकता है ।
कर्ज का ज्यादा जिक्र करना आवश्यक नहीं क्यों की इसके बारे में सब अनुभव के दौर से गुजरते है या गुजरे है । ध्यान इतना ही देना है, की बेहतर जीवन शैली इससे प्रभावित न हों ।

चलते चलते……
“सच वो दौलत है, जिसे पहले खर्च करो, जिंदगी भर आनन्द करो, झूठ वो आनन्द है, जिससे क्षणिक सुख पाओं और जिंदगी भर चुकाते रहो”…..अज्ञात

कमल भंसाली

दर्द के रंग……

दर्द हजारों बसे, दिल में
किस किस की बात करूं
एक हो तो आपको बताऊं
पर हजारों को भी कहां छुपाऊं

हर दर्द ने इतना जरुर अहसान किया
अपनी पहचान का तत्व समझा गया
संयम, धैर्य और सहने के गुण बता गया
असहज, मन को नायाब तरीका बता गया

आप निश्चिन्त रहिये, मेरे हजूर
दर्द की मैं आपको सौगात नहीं दूंगा
न हि अपने दर्द आप से बाटुंगा
सिर्फ कुछ दर्द के रंग निहारूंगा

आप इन्हें जो भी समझे
मुझे तो दिन में ये तारे नजर आते
कुछ अनचाहे नजारे दिखाते
कुछ आत्मा की धूप में जल जाते

दर्द जीवन का अभिसार
समझे तो ज्ञान का जरिया
इसको कैसे पीये, कैसे जीये
यह सब का अपना नजरिया

कुछ दर्द गहरे जख्म से निकलते
नासूर बन कर दिल में बसते
रोता हूं, तो लोग कहते, हंसता
मुस्कराता, तो कहते देखो, रोता

हल्के दर्द तो हमदर्दी पा जाते
पर टीस कभी दिल को दे जाते
अवयस्क गम की अनुप्रेक्षा नहीं
इनकी उम्र की भी मुझे फ़िक्र नहीं

कुछ दर्द की अजीब दास्तान
उनसे कोई भी नहीं पहचान
दिल के दरवाजे पर दस्तक देते
पराये होकर भी अपने लगते

कुछ दर्द है अस्तित्व विहीन होतें
अहसास की बुनियाद पर जीते
चेहरे पर पसीने की बुँदे बन
कशमकश में मुझे डाल जाते

डरता और सहमता जिनसे
“वो”, दर्द तन्हा रात के मेहमान
ऊपर से मधुर, भीतर से बेईमान
मेरी आत्मा, मेरे नयन ही नहीं
तकिये के गिलाफ तक भिगों देते
“वो” अंदर से सुस्त कदम बढ़ाते
“अपनों” के तरकश से निकलते
बाण बन दिल पर विस्फोट करते
कितने मेरे दिल के टुकड़े हुए
ये, देखकर ही जाते..
आह, भरकर मुस्कराते…

कमल भंसाली

उम्र का दर्द

खोयी सी चांदनी
बिखरा सा मन
अधूरी सी अछूती
एक अहसासी चुभन
और वो तम्हारा
सहर्ष स्पर्श का स्पंदन
आज भी ढूंढ़ता
निष्कासित सा जीवन

तह किये हुए पन्ने
उड़ उड़ कर बिखर रहे
यादों की औस से
भिग भिग कर सहम रहे
जो कल तक मेरे थे
आज वो दूर हो रहे
कुछ के तो अक्षर
तक ओझल हो रहे

अनपेक्षित स्मृतियों के अवशेष
हल्की धुंध सी लकीरे
कभी कभी बीते क्षण संवारे
तब तुम्हारे संग बिताये
मानस पटल पर रंगीन
पल को हल्के से उतारे

तीखे नयनों की मकबूलियत
हया से संवरी तुम्हारी सूरत
मकरंद सी मेरी ख्व्वायिसे
जब याद आते प्यार के किस्से
तुम न जानों कितने मुश्किलें देते
फिर से परिभाषित होने वाले
मखमली दिल के कितने हिस्से

उम्र की सीमा रेखा
तनाव देती कितना तीखा
परिधि में बांधते
संस्कारित रास्ते
दर्प का जिया जीवन
कितना झुक जाता
याद करा रही है
उम्र की बची अधूरी
आहत भरी जीवन रेखा

अंत का इंतजार
जानता हूँ न होगा बेकार
मौत का संकित पुंज
तमस में बेठा है साकार
आज नही तो कल
पा जाएगा अपनी मंजिल
दर्द की कई सीमाओं को
लांघ जाएगा, विचलित मन
अलविदा,तुम्हे कह जाएगा
असहाय हुआ, यह तन……

कमल भंसाली