वो बरगद का पेड़….कमल भंसाली

वो, पर्वतों के साये
वो , उठता हुआ धुंआ
वो, दरख्तों के शरण्य
वो, मुस्कराती शाम
जब तुम थी, मेरे साथ
प्रिय, आज भी है, मेरे नाम
प्लास के फूलों सी
तुम्हारी, दबंग मुस्कराहट
और, मेरी नपी तुली झल्लाहट
दोनों का था, कोई संगम
न तुम रुकी, न ही मैं
हम चलते रहे,
रुके वहां,
जहां, तुमने पेड़ों
के तन पर, लिखे
मेरे तुम्हारे नाम
आज ही है, वैसी
कोई सर्द, ठंडी शाम
मैं तो यहां, पर तुम कहां ?

वक्त की बयार
वैसे ही बह रही
फिजा भी सज रही
मुक्त कलिया विस्मयातिरेक
मुस्करा रही
वादिया तुम्हारी तरह
आँचल फैला रही
पाख पंखेरु नीड़ पर
प्रणय के खोज रहे द्वार
मानो, पूछ रहे
कहां है, तुम्हारा प्यार
और, हमारा यार
सहमा सा, दिल मेरा
कर रहा, अपना इकरार
आज भी है, बेकरार
पर, बिन तुम्हारे
वो, बरगद का पेड़
अपने ही तने को
नोच, खुरच रहा
तुम्हारा नाम
किसी और नाम के
पास समेट रहा
हा, सच कहता
मेरा नाम, सिसक सिसक
अपना अस्तित्व
आहिस्ता आहिस्ता
खो रहा ………

कमल भंसाली