होली आई रे…फूलों की बहार लाई रे…*♥♥♥कमल भंसाली*****


दोस्तों होली की शुभकामनायें, समय था,कभी गले मिलकर देते थे। कभी, होली मनाते समय हुई कुछ गलतियों की क्षमा बड़ों को प्रणाम कर मांगते थे।अब कई तरह की दूरियों से जीवन सीमित से विस्तृत हो गया। अब होली पर आनाजाना एक परम्परागत रीति रिवाज मात्र रह गया है। आज भी ,याद है,बचपन में सदा होली का इन्तजार रहता था, क्योंकि यही एक त्यौहार था, जो जीवन को गीत, संगीत, के साथ दोस्ती और रिश्तेदारों से हर रोज मिलवाता था। राजस्थान की होली में घूमर का इतना महत्व था, कि होली कम से कम पन्द्रह दिन पहले दिल और दिमाग में छा जाती थी। उस समय स्वांग बन कर गांव के प्राय: सभी घरों में होली के गीत गाने, हर मौहल्ले की टोली को बुलाया जाता था, रात को हर जगह चंग, ढोल, नृत्य के साथ ,गीतों की बहार छा जाती। कलकता में भी सात दिनों पहले होली पर जबरदस्त गाने बजाने का प्रोग्राम हर रात को बड़ा बाजार की चुनिंदा इमारतों की छत पर होता। कहना न होगा, प्रायः सब जाति के लोग उसमें पहुंच जाते थे, वहां न कोई बड़ा होता, न छोटा, न कोई मालिक न नौकर सिर्फ मस्त माहौल होता, खाना पीना, ठंडाई के साथ भंग का गोला। आज शरीर और मन दोनों ही अक्षम हो गये, गावों से दूर होकर मन से भी कमजोर हो गए है। अब तो होली प्रांगनो, और छत से निकल कर मानों कमरों में बन्द हो गयी। प्रोग्राम भी वैसे जिनमें अपनी भूमिका दर्शक के रुप में और सन्तुष्टि नहीं के बराबर ? हम आज समय की कमी के नाम पर, पूर्ण तय अर्थ तन्त्र के गुलाम हो गए। हम नहीं जानते की आंतरिक ख़ुशी क्या है, एक झूठी दुनिया के लिए हम अपनी संस्कृति को भुला रहे, वक्त ही इसका मूल्यांकन करेगा कि हम कितने गलत हो रहें है। मेरी इस कविता में होली की गिरती साख और पहले की होली की याद, दोनों का ही संयोजन करने का प्रयास मात्र है। अच्छी लगे तो शेयर करे, नहीं तो होली का मजाक समझे। आनेवाली, आपकी होली मंगलकारी और शुभ हों…….कमल भंसाली

लकीरें ही रह गई, अदृश्य हो रहे रंग
चारों और से धुंधली, हो रही “होलिका’
रंगो, छन्दों की देवी के बदल गए ढंग
अवशेषों की स्मृति में, बज रहे है चंग

गुलाबी, प्रेम रंग, अहंकार के पानी में बह गया
हरा रंग, बिन आत्मा की, माटी में मिल गया
होली के साथ अब दिल जलते, कम ही मिलते
रिश्तों की बुनियाद में, स्वार्थ के गुलाल उड़ते

समय का कोईं है, अजब गजब फेर
होली आज कितनी असहाय, कमजोर
उमंग, उत्साह, मस्ती का रंगीन,त्योंहार
रस्म रंगने की, न कोई रंगनें को तैयार

जमाना बीत गया, याद आती गांव की रसीली होली
कुरता भीगा रंग से, प्यार से भीगी, गौरी की रेश्मी चोली
गुलाल गालों की रंगत बदले, मिजाज भांग की गोली
गालियां लगे प्यारी, जब सामने आ जाए जीजा साली

नाजुकता से परिवारों में छा जाती
जब चलती फाल्गुनी धीमी, मस्त बहार
प्रफुल्लित मन ढूंढता मस्त, खुशियां हजार
होली खेलते बड़े, बूढ़े, मौहल्ले का पूरा परिवार

रिश्तों में बुनियाद प्यार, गीतों में जवानी सदाबहार
होली आई रे भैया, भाभी सहेलियों सहित रहना तैयार
भंग गोली देना, गाली देना, रखना पकवान तैयार
पड़ोसी, रिश्तेदार और दोस्त आएंगे खेलने तेरे द्वार

गौरी के गाल, सैंया का भाल
नीची नजर, ऊपर उड़े गुलाल
मारी पिचकारी, भीगी चूनड़
गौरी जरा, अपना पल्लू संभाल

ये अब है, सब सपना, हकीकत न रंग, न रँगना
न कोई है अब अपना, किसके लिए, किससे मिलना
घर कोई ऐसा नजर आता नहीं, जहां प्यार बसता
कई रंगों की दुनियां में, अब सच्चा रंग नहीं मिलता

होली न जाने, जात पात
दिन भर सब संग रंग खेलों
गाओं, नाचों बनाओं मस्त रात
बाहर निकालें सारे छिपे जज्बात

होली कहती शायद बूढी हो गई मैं, वक्त नहीं अब मेरे साथ
या सूख गए तुम्हारे अहसास और फीके पड़ गये जज्बात
यह भी बहुत है, याद कर लेते हो, जब आये मेरी अंतिम रात
याद रखना इतना, बिन रंग जीवन, जलना नहीं अच्छी बात

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दोस्तों, हर त्योंहार कुछ कहता
जीवन आपसी खुशियों में ही बसता
यहीं एक त्यौहार है, जो हंसाता
गम को गुलाल बना उड़ा देता
मेरी शुभकामनाए, आपका प्यार
खेल रहे है, ना, सतरंगी रंगो से इस बार……..

♥♥♥कमल भंसाली♥♥♥

कमल भंसाली