अपरिभाषित प्रेम…….कमल भंसाली

पर्यश्रु नैन
जाने दिल का भेद
परिहित मन
रहे सदा बैचेन
दिल की नादानी
अब भी कहती
प्रेम ही जिंदगानी
न जाने बहता दरिया
किसी का नहीं हुआ
बिना दिल प्रेम कब हुआ

शैलाब ही उमड़ा
चारो ओर
मुखड़ा दिखा, सुहाना
सब कहते
यही, प्यार
नहीं, ये है कोई
नया व्यापार
जिसमे है
कामनाओं का नशा
पर नहीं प्यार
जिस्म का इकरार
मन का इंकार
कभी नहीं हुआ
न ही होगा प्यार

प्रेम जाने सब
पर न जाने
सच्चे पक्के रंग
विरही वेदना
रहती प्रेम संग
परिभाषित होती
सिर्फ आशिकी
प्रेम का स्पंदन
है, जीवन बन्धन
बन्ध गया
समझो उसे
प्रेम रोग लग गया
प्रथम अक्षर
प्रेम का पढ़ गया

पाठ अभी अधूरे
बिन आत्मा के
न जाने सब पुरे
मिलन की चाह
कैसी उपासना
कलुषित मन की
है, कंलकित वासना

विहंगम दृष्टि
प्रेम की तरुणाई
मुखर मौन
अधूरेपन की भरपाई
संचित कामना
वासना की चारपाई
आत्मा ने पवित्रता
अंत तक छिपाई
न समझी बात
कब समझ में आई

अंतर्मन साधना
पवित्र भावना
दैहिक संयमन
सृजन का चयन
मृदुल स्पर्श
हो लुब्ध सहर्ष
तो प्रेम है, उपासित
युग ही करेगा विस्मृत
“परिभाषित”……

कमल भंसाली