🌋महावीर नाम प्यारा🌋कमल भंसाली


मन ध्यान धर

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जीवन है नाम का

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सब कुछ यहां अधूरा

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महावीर नाम ही सिर्फ  प्यारा

           👌

जीवन ध्यान धर….

जग कल्याण
का लाये सवेरा
जो ह्रदय से
महावीर का नाम ले
भव भव का पाप
बन जाये निर्मल
अमृत धारा
सच्चे मन से
जो करले इसे स्वीकार
उसका हो जाये
भवसागर से बेड़ा पार
मन ध्यान धर…

कर्मो के बन्धन होते बड़े विचित्र
पाप के ही होते सब उसमें चित्र
झूठ के पुलिंदे में रहते रिश्ते मित्र
कामनाओं के ही मिलते उन से पत्र

मोह की नगरी
अधजल भरी गगरी
छम छम करती मंदाकनी
छदम् वेश में रहती जिंदगानी
अहिंसा की वेदी पर
हिंसा को है, त्यागनी
जिसने पा लिया
महावीर का ये सार
उसका हो जाये
भवसागर से बेड़ा पार7
मन ध्यान धर…

एक जीवन, एक ही क्षण
एक आत्मा, एक ही भगवन
एक भक्ति, एक ही उपवन
एक ही शरण, एक ही चरण

सत्य, अहिंसा का
एक ही मन्त्र
अंहिसा परमां धर्म
जीओं और जीने दो
महावीर को जिसने
बसा लिया अंदर
समझ लो
उसने लिया जन्म सुधार
मन ध्यान धर…

बेरुखी सनम तुम्हारी….कमल भंसाली

तेरी बेरुखी से, दिल हुआ परेशान
उदासियों में छिपा, थोड़ा लगता हैरान
हर आहट पर, करता तेरा इन्तजार
अपने कदम रख, दिल दहलीज पर
कुछ तो हाल जानले जरा, सितमगर

तुम अपनी वफ़ा पर, कर हजार बार यकीन
पथ प्यार का होता नहीं, जरा भी नहीं कठिन
प्यार ही सब कुछ, जीवन प्यास बुझाने के लिए
जबाब और भी देने होते, दस्तूर निभाने के लिए

खा कसम, कहता प्यार, हर रस्म वो निभाता
सच्चा हूं, इसलिए जन्मों तक संग संग चलता
जूनून है शिकवा करने का, पर नाराजगी न रख
आरजुओं का भी दिल होता, जरा ध्यान इनका रख

प्रियवर, प्रेम पुष्प होता बड़ा निर्मल, जैसे “कमल”
कीचड़ में रहकर भी, खिलता बिन कोई स्पंदन
काया मिलन से ज्यादा सुंदर होता, आत्म मिलन
बता, बरसात की बेरुखी से, कब सुखा नदी जल

दिल की नादानी ठहरी, महबूब की अदा लगी अनजानी
बेसब्री तुम्हारी प्यार में लगती, कितनी जानी पहचानी
झील सी तेरी आँखों में, आज भी तस्वीर कोई अरमानी
आ, दर्पण निहार, मुस्करा, पता नहीं कब रुठ जाये, जिंदगानी ……कमल भंसाली

कतरा कतरा हुई, जिंदगानी….कमल भंसाली

कतरा कतरा
हुई, जिंदगानि
फिर भी रही, अनजानी
बचपन की भूल भुलैया में
खोकर सब कुछ,आई जवानी
नादान ही रही, दीवानी
छदम् रिश्तों में
सच्चा प्यार तलाशती रही
भूल गई
ये दुनिया
आज तक किसने जानी ?
कतरा कतरा हुई……

दोस्तों की दोस्ती
थी, बड़ी सस्ती
हाँ, भरी थी उनमें
रुप, रंग और मस्ती
फूलों में खुश्बू कम
थी, काँटों की ज्यादा चुभन
बावरा, मन मेरा
उनमें ही ढूंढ रहा था, अपनापन
कसमे, वादों के जंगल में
पता नहीं
कब छा गई वीरानी
कतरा, कतरा हुई…..

रिश्तों के चमन का
हाल है, बेहाल
वैभव के सावन में
रंग बिरंगे देता, अहसास
हर कोई लगता खास
ऋतुओं आधारित
रंगत इसकी
कब बदल जाए
कब बदरंग हो जाए
पता, नहीं कब मातम
के बादल छा जाए
कब बरस जाए
नयनों का पानी
कतरा, कतरा हुई….

अभाव के पतझड़ में
कोई नहीं करता
आपस का विश्वास
अपनी ही सांस
कराती मनुहार
जीवन भर का प्रेम
बन जाता, व्यापार
बिन, खरीददार
बिक जाती,अनजानी
कतरा, कतरा हुई…..

वक्त के भँवर में
जब जीवन नैया
लगाये चक्कर
तब रिश्तों की
पतवार न चले
चिंता जब चिता
बन जाए
सुखी लकड़ी
तन न जलाये
गम का धुँआ उड़ाए
ऐसे में कौन गागर भर
छिड़काये, शीतल पानी
अतृप्त आत्मा ढूंढती रहेगी,मंदाकनी……
कतरा, कतरा हुई….

कमल भंसाली