आधुनिकता का श्रृंगार

आधुनिकता खड़ी बाजार में
अवलोकन कर रही
अपने ही श्रृंगार का
मुस्करा के जीवन को
ललचा रही
असत्य के दलालों से
गलत इशारे करवा रही
इन्सान को भौतिकता
के मदिरालय में
कामनाओं के जाम में
हवश की शराब
पीला रही
अपनी ही जीत का
जलसा मानव द्वारा
मनवा रही

कल का नैतिकवाद
बन्धनों में बंध
भूल गया
अपने सत्य के
सारे छंद
कितना अव्यवहारिक
हो गया प्रियवंद
कल तक खुद मुस्कराता
आज जर्जरता से
होकर परेशान
अपने से ही भागता
ठोकर खाकर भी
नहीं संभलता
नशा है, जिंदगी
कहकर “चिल्लाता”

आधुनिकता का दल्ला
पहना रहा सब को
झूठ और लालच का
जादू भरा छल्ला
वासना की रानी
नैनों से नृत्य कर
जंगल में मंगल
मना रही
इंसानी जज्बातों को
पाषाण की मूर्ति
बनाकर
बीच चौराहे पर
लगा रही

शर्म “जिंदगी”को नहीं
“चिंतन”को आ रही
मकसद नहीं हो रहा पूर्ण
समस्याए बढ़ रही
नहीं कोई है, निवारण
क्या ऐसे ही जलालत
देती रहेगी “आधुनिकरण”
कर “मानव”
थोड़ा सा तो मनन…..

कमल भंसाली