💕प्रेम पुजारी💕 कमल भंसाली

दिल की दुनिया बसा डाली फिर भी लगता खाली
दिल को जो आबाद करे अब वो हवाये नहीं चलती
निगाहों में प्यार की जगह नफरत की आंधी दिखती
वफ़ा की कीमत नहीं बाजार में बेवफाई ही बिकती

नाम मौहब्बत है शराब बन मदिरालयों में परसती
जिस्म के हर हिस्से में वासना बन हैवानियत बनती
दिल की बातें करती पर कातिल बन कर इठलाती
पता नहीं किस फूल से ये कौनसी महक निकलती

कल तक जो सिर्फ मौहब्बत होती आज है रोती
किसकी है यह बेटी जो इतने गहरे रंग ये बरसाती
उल्फत कह कर सिर्फ हसरतों के जाम ही छलकाती
आग यह कैसी जो लग जाने के बाद कभी न बुझती

प्यार की भूखी दुनिया सिर्फ प्यार की ही बात करती
दस्तूर जो इसके जरूरी उन्हें कभी भी नहीं निभाती
लेने को राजी पर जब देने की बारी हो तो कतराती
फिर भी प्यार की चाहत तो हर दिल को है ललचाती

त्याग सच्चे प्रेम की मंजिल, नफरत से रहो दूर
ये ही एक सन्देश जग को करता हिंसा से दूर
आज की बात करो कल की कोई हस्ती नहीं होती
बड़ा सोचो तो सच मानों जिंदगी सदाबहार ही रहती

आज हो कल न भी हो पर चमन योंही आबाद रहे
कभी वापस आओ तो तुम्हारी अमानत जवां रहे
विदा इसलिए प्यार से होना कुछ तो तुम्हारा यहां रहे
तुम थे यहां कभी “प्रेम के पुजारी” जग को याद रहे

😆तुम्हारी मुस्कराहट😅✍ कमल भंसाली

तुम जरा मुस्करालो
जिंदगी को मकसद मिल जायेगा
जरा मेरा यकीन कर लो
हर मंजिल को स्वर्णिम सवेरा मिल जायेगा
तमस में भटकती राहों को मंजिल द्वार मिल जाएगा
पथ गीतों को बहारों के आने का संदेश मिल जाएगा
तुम जरा….

तुम्हारे मुस्कराने के हर अंदाज से
चमन की हर कली खिलखिलाती
दीप आशाओं के प्रज्वलित करती
सुख सन्देश की किरणे बिखेर जाती
अपनी एक मुस्कराहट को जरा सहमति दे दो
मुस्कराकर जग को ये स्वर्णिम सा सन्देश दे दो
तुम जरा….

कल तुम्हारी मुस्कराहट जीवन पथ की हो जाएगी
तेरी मुस्कराहट मेरे से होती हर मंजिल तक जाएगी
हमारी हो जग में हर चेहरे की रौनक बन इठलाएगी
स्वरः वीणा के सुर में सज लय से मधुरता ही लायेगी
सह्रदय से निकली मुस्कराहट मंदाकिनी बन जाएगी
तुम….

कल न भी होंगे तो मुस्कराहट जहां में रहेगी
यह अमानत हमारी सदाबहार ही कहलाएगी
उपहार हमारा यह हर सांस में खुशबू ही फैलाएगा
हर दिन उज्ज्वलता की प्रखरता से निखर जाएगा
यह ख्याल कर जब हर कोई मधुरता से मुस्करायेगा
सच कहता जग मुस्कराहटों का गुलशन कहलायेगा
तुम जरा….

मायूसी को जिंदगी में न पनाह दो तो मुस्कराओगे
उदासी को अंदर तक न सैर कराओ तो मुस्कराओगे
प्रेम को जीवन का मकसद बनाओ तो मुस्कराओगे
मकरन्द बन कर छा जाओ तो भी तुम मुस्कराओगे
पल की एक मुस्कराहट से हर दिल मे बस जाओगे
तुम जरा…

💔 अफसोस 💖 कमल भंसाली

बहकती रही नादान जिंदगी, मै सदा प्रेप्सू ही रहा
खुशियों की तलाश में टूट कर सदा बिखरता रहा
मदहोशी में अप्रमाणित रिश्तों को ही गले लगाता रहा
किसके लिए क्या हूं ? सच के इस सवाल को टालता रहा
बहकती…

प्रेम की परिभाषा सिर्फ इतनी ही समझ पाया
जब भी चाहा जिसको, उसी ने मुझे ही रुलाया
देने की आतुरी ने, उन्हें कुछ और ही समझाया
हिसाब इतना ही रखा, सबके दिल मे स्वार्थ पाया
बहकती…..

कर गुजर गया जो जीवन मे, वो अफसोस नहीं
बिन मंजिल के इस राही की नई कोई खोज नहीं
उपलब्धियों के संसार मे नगण्यता का हूं, अवतार
फर्क क्या पड़ता ? जब संसार को मै स्वीकार ही नहीं
बहकती….

कभी हुआ होगा ऐसा सच के दर्पण को मैने नहीं छुआ
तब हर रिश्ता दिल के मंदिर में मूर्ति बन स्थापित हुआ
जब काले साये गम के मंडराने लगे वही फूल बने अंगारे
जिनमें रहते सौरभ भावुक भरे अहसासित प्रेयम सितारे
बहकती…

मत समझना यह अफसोस है अपना कोई मेरा
सोया मन जाग रहा, सब साफ है कोई नहीं मेरा
कल के सफर में अकेले ही जाना अब निश्चय मेरा
दुआ करना, किसी जिंदगी में न हो अपनत्व का अंधेरा
बहकती…..

सारांश:
कह नहीं सकता जग झूठा या फिर मेरा अफसोस
कह नहीं प्रेम किसका सच्चा किसका किससे खास
नाप तोल की तराजू पर नहीं तुलता यही है “अफसोस”
संभावनों के बाट ही गलत, यही है शायद सही सारांश

रचियता✍कमल💔भंसाली✍

🌷आध्यात्मिक मुक्तक🌷कमल भंसाली

की हुई तपस्या जब जग से पुरस्कृत हो जाती
लोगों की वाह वाह और उपहारों में खो जाती
निष्कलंक आत्मा जग की तराजू में तुल जाती
राह अपनी वो भूल इधर उधर में भटक जाती
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निहंग आत्मा ईश्वर की प्रेरणा बन ही जग में आती
अनन्त मंजिलों में सिर्फ निर्वाण की इच्छा रखती
जग उपासक हो यहीं से वो आगे ही बढ़ती जाती
स्वयं से दूर हो पर हित से निरीक्षित योग्य हो जाती
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भूख, प्यास तप नहीं, तप तो है, अमृत गुणों का विकास
बिन आडम्बर की साधना अनजाने पथ पर करे प्रकाश
प्रेम, स्नेह से होकर दूर कोई तपस्वी नहीं बन सकता
कर्म लिप्त भोग से इन्सान मोक्ष को नही तलाश सकता
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काया की माया न समझे वो सदा अच्छे बुरे में उलझे
बिन काया कब किसने अस्तित्व पाया जो ऐसे समझे
दिखावटी कर्म से ही मन को दिन रात उलझाये जो रखे
तो समझ तपस्वी, आत्मिक अमृत को प्रभु कैसे परखे
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तपस्या की परिभाषा सांसारिकता के उदर में समाही
जीवन की समझ में ही तपस्या की तस्वीर छितराई
सत्य कर्म के थाल में ही हर साधना ने सही जगह पाई
मानव जन्म ने ही मोक्ष के अमृत कलश में जगह पाई
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प्रेम, स्नेह, अहिंसा में समाई आस्था भरी प्रभु प्रार्थना
लोभ, लालच, ईष्या, द्वेष के त्याग से होती आराधना
भोग, क्रोध, मोह से वंचित जो हो वो ही होती साधना
सत्य की राह में चलना ही मोक्ष में आत्मा का विसर्जन
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