झूठ को सहारा◆◆सत्य बेचारा***कमल भंसाली***

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कोई भी झूठ से कितनी ही दौलत, शौहरत या नाम कमा ले, परन्तु जीवन पथ में उसे सत्य की जरूरत हर पल रहती है । उसका अंतर्मन सदा अपनी कमजोरी का व्याख्यान करता नजर आएगा, और उसके व्यवहार में इसकी झलक वह स्वयं भी करता है। माना जा सकता है, जीवन में बहुत सी ऐसी स्थितियों से इंसान गुजरता है, जब सत्य बोलने की कमजोरी के कारण वो असत्य का सहारा लेकर, आपसी सम्बंधों का निर्वाह कर, दुनियादारी निभाना उसकी मजबूरी हो जाती है। ये बात भी समझने की हो सकती है, कि सत्य अप्रिय होता है, और सब उसे सहीं ढंग से स्वीकार कर भी नहीं पाते। तभी जीवन ज्ञानी विशेषज्ञ कहते है, ऐसी परिस्थितियों में अल्पमात्रा झूठ भी स्वीकार्य है, क्योंकि यहां उसकी भूमिका आटे में नमक जितनी होती है, और आटे को पाच्य बनाना शरीर के लिए जरुरी होता है। संसार में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए भी झूठ की भूमिका को आज की दैनिक जिन्दगी से बाहर करना मुश्किल होता है। तो क्या संसार आज झूठ की धुरी पर घूम रहा ! आंशिक सत्य भी यही है। परन्तु समझने की बात है, धुरी का अस्तित्व सत्य पर ही टिका है, क्योंकि सत्य हर कर्म से जुड़ा है। झूठ को स्थापित करने के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है, चाहे वो गलत ही क्यों न हो।

झूठ कभी कभी सत्य के ऊपर भारी पड़ता है, परन्तु कुछ समय के लिए, अंदर से अपनी ही कमजोरियों से हार जाता है। जीवन सबको कितनी बार मिलता है, कहा नहीं जा सकता परन्तु शायद यह जरुर निश्चित होगा, कि वर्तमान का जीवन ही उसकी अगला स्वरुप और भूमिका तय करता होगा। वर्तमान जीवन बहुत सारी घटना क्रम से गुजरता है, और हर घटना में सत्य की भूमिका होती है, यह निर्विवाद तथ्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता। मानव मन अस्थिर होता है, कभी कभी वो इन घटनाओं का असली मकसद समझ नहीं पाता और झूठ का सहारा लेकर इनको अपने सही लक्ष्य से दूर ले जाता है।

झूठ का मनोवैज्ञानिक अध्ययन सबसे कठिन होता है, क्योंकि इसका अध्ययन पूर्ण सत्य को अपनाने वाला ही कर सकता है, जो आज के जीवन में सबसे मुश्किल काम है। इसका सात्विक पक्ष गहरा अन्धकारित होने के कारण इसका सही मूल्यांकन आध्यात्मिक सच्चे सन्त ही कर सकते है। झूठ की सबसे बड़ी खासियत यही है, कि कोई भी इंसान अपनी अंतरात्मा से इसे बोलना पसन्द नहीं करता परन्तु गलत परिणामों से बचने के लिए बोल देता है। विश्लेषण की बात है, जिसकी जड़े अंदर तक न हो, उसका अस्तित्व कब तक ठहरेगा। अतः झूठ आखिर में पकड़ा जाता है, और मानव के व्यक्तित्व को खण्डित कर देता है। जो जीवन को समझते है, वो अपनी वाणी का संयमित प्रयोग इसलिए करते है।

झूठ बोलने के जो सम्भावित कारण हो सकते है, उनमें डर, आत्मछवि और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की भावना, और लोभ। झूठ की संक्षिप्त् परिभाषा इतनी सी है, कि सत्य को विकृत करने की कोशिश झूठ है। पर सवाल यह भी है, आखिर सत्य क्या है ? सत्य की परिभाषा अगर आसान होती तो उसकी खोज में इंसान को भटकना नहीं पड़ता, इसलिए व्यवहारिकता के तत्वों में सत्य को स्थापित किया जाता है। इसलिए वस्तुगत चेतना की अवस्था में ही सत्य की पहचान की जा सकती है। सत्य कैसा भी हो, वो सूर्य और चन्द्रमा की तरह ज्यादा नहीं छुप सकता, भगवान बुद्ध ने यहीं संकेत व्यक्तित्व की प्रखरता के लिए दिया था।

सत्य अहिंसाकारी होता है, अगर झूठ में हिंसा नहीं सम्मलित हो, तो उसका नुकसान ज्यादा हानिकारक नहीं होता। परन्तु आज अर्थ की बहुतायत वाला युग है, इन्सान ने सत्य का कम प्रयोग करते करते निजी स्वार्थ के लिए झूठ को बेबाक अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है, इसलिए विचारों में विश्वाश की उष्णता कमजोर हो गई। सच यही है, जिंदगी आंतरिक ख़ुशी और प्रसन्नता की मोहताज हो रही है। पैसो के बलबूते पर हम आज भी कोई व्यक्तित्व निर्माण नहीं कर सकते, हाँ, थोड़े समय का ध्यान लोग हम पर केंद्रित जरुर कर सकते है, जब तक उनका आभाष उन्हें भ्रमित करता है, कि हमारा पैसा उनके कुछ काम आ सकता है। धर्म को आडम्बर बनाने वाले साधु जब भी सच के पहलू में झूठ का सहारा लेने की कोशिश करते है, तो उनका धार्मिक नजरिया अपना अस्तित्व खो देता है। इसलिए व्यवहारिक पक्ष जीवन का मजबूत रखने के लिए ऐसे झूठ का प्रयोग करना गलत नहीं होगा, जिससे किसी भी तरह का आघात एक मानव से दूसरे मानव को नहीं पहुंचाता क्योंकि ये आज के आधुनिक युग की मजबूरी है, जहां अति साधनों के कारण चिंतन के लिए समय कम मिलता है। अल्प आयु का चिंतन बिना सार्थकता का ही होता है।

आइये, सच और झूठ की महिमा और प्रभाव हम अपने दैनिक जीवन के सन्दर्भ में तलाश करने की कोशिश करते है पर उससे पहले यहां स्पष्टीकरण जरुरी हो जाता है कि विचार और सुझाव की कसौटी सच और झूठ दोनों से नहीं कर सिर्फ चिंतन की मर्यादा के अंतर्गत करेंगे तो जीवन को प्रभावकारी बनाने में हमें मदद मिल सकती है। नमूने के नजरिये से कुछ तत्वों की तलाश हम आज के युग अनुसार करने की कोशिश करे, तो हर्ज क्या है !

1. सब जगह सत्य बोलना कोई जरुरी नही है, पर सब जगह झूठ बोलना भी जरुरी नहीं है।
2. झूठ का ज्यादातर प्रयोग कर उसे सत्य की तरह स्थापित नहीं किया जा सकता है, यह भी ध्यान रखने की जरुरत है।
3. सत्य का पूर्ण सहारा हो, तभी किसी की सार्थक और अहिंसक आलोचना उसके कर्म की करनी चाहिए, नहीं तो मौन बेहतर असमहति का अच्छा प्रभाव स्थापित कर सकता है।
4. रिश्तों की मर्यादा खून और दिल दोनों से होती है, अतः अनावयशक झूठ का इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है।
5. कुछ रिश्ते पवित्र होते है, उनमे बेबाक सत्य ही प्रभावकारी होता है, मसलन माता-पिता, पति- पत्नी और जीवन मार्ग दर्शक – गुरु।
6. भगवान और शुद्ध दोस्ती का रिश्ता आत्मा से है, अतः पूर्ण सत्य ही यहां गुणकारी हो सकता है।
7. व्यपारिक, राजनैतिक, और सामाजिक रिश्ते में विश्वास की अधिक मात्रा की जरुरत जरुर होती है, पर स्वार्थ की प्रमुखता के कारण इसमें सच-झूठ का जरुरत के अनुसार प्रयोग करना गलत नहीं कहा जा सकता।
8. देश, प्रकृति, धर्म, दान और प्राणिय प्राण ये पूर्ण आस्था के आत्मिक मन्दिर की मूर्तियां है, अतः यहां सत्य से बेहतर झूठ कभी नहीं हो सकता, अतः इनके प्रति भावना, शुद्ध सच्ची ही कल्याण कारी होती है।
9. जीवन और मृत्यु दो क्षोर है, दोनों ही सांस की डोर से बंधे है, झूठ के अति आक्रमण से कमजोर होते रहते है, परन्तु सत्य की अल्प बुँदे ही इन्हें सही स्थिति में रखने की कोशिश करती रहती है।
10. सत्य को ईमानदारी का साथ देने से जीवन की अगली गति उत्तम हो सकती है।
11. इंसान की इज्जत सत्य कर्म से ही उज्ज्वल होती है।

जैसा की ऊपर हमने कहा, ये कुछ तत्व हो सकते है, जिनसे सच और झूठ को आज के जीवन के अनुसार हमारे जीवन को अपने चिंतन अनुसार हमारी कार्यशैली को प्रभावित कर सकते है, अतः इन्हें अंतिम सत्य की श्रेणी में नहीं रखे, तो उचित होगा। इनके अलावा भी कई तत्व की खोज हर प्राणी अपने सामर्थ्य और अनुभव से कर सकता है।

गौर से पढ़े….
* सत्यस्य वचन श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् ।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम् ।।

{ यद्दपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे ( अर्थात श्लोककर्ता नारद के ) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है, वही सत्य है। } ★ ■■■■ कमल भंसाली ■■■■ ★

जीवन चिंतन, भाग 1…सही समय, सही चिंतन….कमल भंसाली

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कहते है, “मन” तन का मन्दिर है, आस्थाओं से बनी ही मूर्ति इस में स्थापित की जाती है। कहना न होगा कि मन्दिर की प्रसिद्धि इसकी पवित्रता पर निर्भर करती है। मूर्ति के प्रति पूर्णआस्था से मानव स्वयं को विशेष बना सकता है, यह अनुभव पूर्ण आस्तिक को ही हो सकता है, और, इस पर तर्क वितर्क की कोई गुंजाइस नहीं होनी चाहिए। आस्तिक परिवर्तन में विश्वास रखता है, तथा अपनी विचारधारा में लचीला पन आवश्यकता अनुसार ला सकता है। इससे इस बात पर भी सहमत हो सकते है, कि आशावादी होना आस्तिक के लिए सहज होता है, वनिस्पत नास्तिक के। परन्तु पूर्ण नास्तिक में भी परिवर्तन की थोड़ी संभावना हो सकती है, जब उसके विचारों की सार्थकता कमजोर हो। परन्तु, हमारी आत्मा का केंद्रबिंदु “मन” शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से काफी प्रभावित भी होता है, यह एक सहज साक्ष्य है। इसकी पुष्टि हमारे बचपन, यौवन, अधेड़ और बुढ़ापे की अवस्था के विचारों से की जा सकती है।

जीवन तो जीवन है, उसे किसी भी प्रयास से जीने के लायक तो हर प्राणी को बनाना पड़ता है, पर बात उन्हीं की दूर तक की जाती है, जो उसे विशेष ढंग से जीने की कौशिश करते है। मानव को छोड़ कर शायद ही दूसरा प्राणी सामाजिक दबाब में अपना जीवन जीता हो, अतः उनमें मानव से ज्यादा निर्भीकता और हिंसा का भाव देखा जा सकता है। इसलिए मानव मन का विश्लेषण करने के लिए मनोविज्ञान का अविष्कार किया गया। आज दुनिया जितनी बदली वो मानव मन का ही चमत्कार है। यह बात अलग हो सकती है, आखिर दुनिया आज कितनी सहज है ? ऋषि,मुनियों व जीवन विशेषज्ञ गुरुओं ने जीवन के सात्विक पक्ष पर ज्यादा ध्यान इसलिए दिया की मन की चंचलता से इंसान किसी भी प्राणी को नुकसान न पहुंचाने वाले कर्म करे, पर इस चिंतन की पूर्ण सफलता धीरे धीरे कमजोर हो रही है। अति साधनों के विकास ने मानव मन के हर क्षेत्र में अपना कब्जा करना शुरु कर दिया, और आत्मचिंतन की सारी प्रक्रियाओं से उसे उदासीन कर दिया। आज संसार का जो स्वरूप है, आकर्षक है, साधनों से, परन्तु पूर्णतया असुरक्षित सा महसूस कर रहा है। आज हम “आत्मचिंतन” की भूमिका हमारे जीवन के सन्दर्भ में करे, तो क्या हर्ज है, क्योंकि जीवन की संक्षिप्ता से इंकार करना हमारे लिए अंसभव है। जो, जीने वाले क्षणों की श्रेष्ठता तलाश लेते है, उनके लिये आत्मचिंतन की बात साधारण है।

किसी ने कहा ” जीवन क्षण भंगुर है” , ये कितना सही, कितना गलत , हमारा यहां इसको जांचने का कोई इरादा नहीं है, हम इसका भावार्थः अपनी जीवन शैली में अगर खोजे तो शायद हमे महसूस करने में सहायता होगी की “पल” “पल”से शासित जीवन ही हम जीते है। अतः हर पल जीवन अपना नया रुप प्रस्तुत करता है, हमारे विचारो और कर्म के अनुरुप, अतः कोई कहे “जीवन क्षण भंगुर है” तो काफी हद तक सही लगता है। सवाल यह भी हो सकता है, जीवन पल पल से क्यों शासित रहता है ? तो समझने की कोशिश के अंतर्गत हमें यह ध्यान में लाना होगा, शरीर जीवन के लिए जरुर बना है, परन्तु संचालन तो कोई और कर रहा है, जिसे प्रत्यक्ष में हम नहीं जानते वो कौन है, कैसा है, परन्तु उसने हर चेतन में एक ऊर्जा स्त्रोत अवधि अनुसार सबके तन में स्थापित कर दिया, उसी स्त्रोत से शरीर को स्पंदन मिलता है, उसी से चेतना। स्पंदन अपनी दैनिक जरुरत को व्यवस्था निर्देश देता है, तो चेतना कर्म करने की गति, जिससे हमारे जीवन को सार्थकता मिलती है।

प्रश्न किया जा सकता है, जीवन को इतना महत्व क्यों दिया जाय ? तो उसका उत्तर में इतना ही समझना चाहिए, जो चीज बार बार मिलनी शंकित है, उसका मूल्यांकन साधारण स्तर पर करना बुद्धिमानी की बात नहीं होगी। इस सन्दर्भ में मुझे किसी इन्सान की बनाई ये चार पंक्तिया काफी समझदार लगती है।

रोने से किसी को पाया नहीं जाता
खोने से किसी को भुलाया नही जाता
वक्त सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिए,
पर जिंदगी नहीं मिलती वक्त बदलने के लिए !

लिखनेवाले ने किसी भी एवज में इन पंक्तियों का सहारा लिया हो, पर जीवन की उपयोगिता की सही जानकारी का अनुभव हमें कराता है। हकीकत में जीवन में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, “वक्त”यानी “समय” यानी वही “पल”जिसका जिक्र हमने ऊपर किया। कहा भी गया है, जिसने समय को नहीं समझा, वो जीवन क्या समझेगा ? इसलिए पहला चिंतन हमारा “समय” के लिए होना चाहिए। हमारा दैनिक जीवन ही हमें हर दिन एक आयाम की तरफ अग्रसर कराता है, वो आयाम हर इंसान अपने विवेक से करता है। आयाम का सही और गलत होना, उसीके चिंतन पर निर्भर करता है। एक आयाम के कई पहलू हो सकते है, परन्तु उनमे आपसी तालमेल नहीं हो तो चिंतन उपयुक्त्त हो सकता है, चिंतन में विरोधभ्यास न हों तो उसकी निर्थकता ही सामने आती है, हम अपने अंदर के किसी भी तत्व का गलत सही का मूल्यांकन स्थापित नहीं कर सकते । समय का दुरुपयोग सही चिंतन में अपरिवक्ता के अंतर्गत ही माना जाता है। चिंतन समयनुसार समस्याओं के अनुरुप तभी सार्थकता प्रदान करता है, जब अच्छाइयों और बुराईयों की तुलना प्राणी कर सके। गलती करना उतना नुकसान नहीं करता, जितना गलत होना।

समय जीवन को गति और अवधि दोनों का बोध बड़ी मृदुलता से कराता है, और हमारे कर्म को परिणाम भी मुहैया कराता है। देखा जाय तो एक माँ की तरह व्यवहार करता है, जिससे हम समझ के साथ जीवन जीये। जब साधनों का विकास धीमा था, उस समय जीवन चिंतन करता था, झूठ क्यों बोलू ! आज जीवन चिंतन कम करता, सुविधानुसार झूठ का प्रयोग करते संकोच भी नहीं करता ? क्या समय की गति बदल गई, शायद नहीं, जिंदगी अति शिक्षित हो गई, साधनों के मामले में। साधनों की भूख से इंसान लालच के घोर अँधेरे में चिंतन के नैनों पर पटी बाँध अर्थ की दौलत खोजने में लग गया। परिणाम मानवता जीवन की ऊंचाइयों से फिसल रही है, पता नहीं किस गति से जल्द ही गर्त से गहरी खाई में समा जाए। हम समझते है, कुछ अविष्कारों से जीवन को बदल सकते है, काफी सही है, परन्तु यह भी सही है, प्रकृति सब अविष्कारों के दुष्परिणाम सहन कर लेती है, परन्तु जब वो अपना विरोध किसी भी रुप में दर्ज कराती है, तो हम दहल जाते है। भूंकप को ही लीजिये, एक सेकेंड का हमारा अनुभव हमसे क्या नहीं करा देता ? समय और प्रकृति का रिश्ता माँ- बेटा का है, माँ अपने बेटे का ज्यादा दुरुपयोग एक सीमा तक ही सहन करती है, ये समझने और चिंतन की बात है।

जीवन को सत्य से ही समझना पड़ता है, झूठ हमें छलावा ही देता है। जब तक हम उसको नहीं समझते, जिसके कारण हम इस धरती पर है, तो हम जब गौण होंगे, तो शायद कहीं और उसकी कीमत चुकानी ही है, आखिर अर्थ शास्त्र को तो हम सही ही समझते है, ना….आइये चिंतन करते है, फिर एक बार अपने जीवन को सही पथ पर वापस कैसे मोड़े ?, अगर हमने अपनी किसी कमजोरी के अंतर्गत गलत कदम किसी गलत राह की तरफ रख दिये हो, तो। सुबह का भुला शाम को अगर घर वापस आ जाये, तो उसे भूला कहां कहते है ? आखिर, हम अनूह तो नहीं है। ….क्रमश …..कमल भंसाली

चलते चलते …पढ़ लेते है, Richard Aedon का यह सन्देश… “All photos are accurate. None of them is truth”.

“क्रोध”….एक चिंतन…कमल भंसाली

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हकीकत में, क्रोध हमारी दैनिक मजबूरी है, किसी न किसी बात पर हम क्रोधित होते रहते है, गुस्सा करते रहते है । यह जानते हुए भी कि यह शांति के विरुद्ध की क्रिया है, आ जाता है, तो इसका नियमन और संयमन करना काफी कठिन है ।आइये, जानने कि कोशिश करते है, क्यों क्रोध के आगे मजबूर हो जाते है ?, हालांकि स्वयं को नुकसान करने वाली यह क्रिया नुकसान ही ज्यादा करती है।

किसी ज्ञानी आदमी से जब किसी ने यह सवाल किया कि इंसान का सबसे बड़ी दुश्मनी कौन निभाता है,? तो महापुरुष ने जबाब दिया, ” क्रोध या गुस्सा उसका सबसे बड़ा शत्रु है, जिसे बिना नुकसान के नियंत्रण करना बहुत कठिन होता है।” महापुरुष ने सही जबाब दिया। आज के सामजिक परिवेश पर गौर करने से लगता है, देश, प्रदेश, समाज, धार्मिक पंथ और परिवार इस अवगुण के शिकार हो चुके है। क्रोध में ज्यादा अंश ज्वल शीलता का होने के कारण असहनीय होता है, और क्रोध करने वाला इसका स्वयं ही शिकार होता है, इससे उसके शारीरिक अंगों पर विपरीत और नुकसानदेह प्रभाव तो पड़ते ही है, साथ में मन और आत्मा भी नकारत्मक्ता से प्रभावित होती है। क्रोध की स्थिति में विवेक दिमाग से बाहर भाग जाता है, और अनिष्टता को तांडव मचाने की स्वतन्त्रता मिल जाती है। आइये, जानते है, क्रोध में शरीर की क्या स्थिति हो सकती है। शरीर विशेषज्ञो केअनुसार सबसे पहला असर इसका दिमाग के साथ ह्रदय के सम्पर्क पर पड़ता है, और इंसान के रक्त प्रवाह में अनियमिता शुरु हो जाती है, इससे दिल पर पड़नेवाला प्रभाव कभी कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है। निश्चित है, क्रोध रक्त प्रवाह को धमनियों में असहजता प्रदान करता है, और इस असहजता से हर मानव अंग घबराता है। हालांकि चिकित्सक कहते है, क्रोध एक स्वभाविक प्रक्रिया है, गलत लगने वाले किसी आचरण पर इसका आना सहज है, परन्तु सीमा रेखा के अतर्गत रहे, तो जीवन की सक्षमता को भी दर्शाता है।साफ़ हो जाता है, क्रोध को सिर्फ अवगुण की श्रेणी में हम नहीं रख सकते, जब तक इसका दायरा असहनीय न हों।अति क्रोध का दूसरा प्रभाव सम्बंधों और आपसी रिश्तों पर पड़ता है, कहना न होगा, इनसे रिश्तें टूटते है, और उनका वापस वास्तविक स्तर पर आना मुश्किल होता है। यहां संयम से गुस्सा या क्रोध को रोकना ही उचित होता है। चूँकि, क्रोध की विभिन्न किस्म होती है, तदानुसार उसका रुप भी अलग अलग नाम से जाना जाता है। गुस्सा, द्वेष, बदला, आघात, आक्रमण, ईष्या, रौद्र, भयंकर, आदि स्वरुप क्रोध परिवार के सदस्य है।

चूँकि क्रोध काफी हद तक भावनाओं से सम्बन्ध रखता है, खासकर जिनमें तनाव होता है, तो आदमी सिर्फ उसके एक ही पहलू पर गौर करता है, उसे लगता है, उसका इस परिस्थिति में क्रोध करना जायज था, चाहे उसका चिंतन सही न हों। क्रोध का बचपन गुस्सा है, जो किसी भी तरह की विपरीत स्थिति से पैदा होता है। गुस्सा जब तक जायज रहता है, तब तक एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह बाहर शांत रहता है, पर भीतर ही भीतर उसमें विद्रोह की ललक रहती है। इसलिए गुस्से को नियंत्रण की बात हर ज्ञानी आदमी करता है। कहते है, वो आदमी देवता होता है, जिसे क्रोध नहीं आता, परन्तु इसको सत्य नहीं कह सकतें, क्योंकि देवताओं की कहानियों में ऐसे बहुत उदाहरण है, जिसमे देवता भी कुपित होते है, परन्तु ज्यादातर उनका क्रोध अन्याय से सम्बंधित होने के कारण, उनके क्रोध को न्यायोचित बताया गया है।

आखिर, क्रोध आता ही क्यों है ? मानते है, क्रोध जीवन का हिस्सा है, हमारा यह संसार क्रोध के कई कारणों को एक के कार्य से दूसरों को एक कारण क्रोध का दे देता, जब उसमे किसी की भावनाओं को ठेस पंहुचती है। हम अपने जन्म के बाद कई ऐसे दृश्य देखते जिनमे क्रोध, गुस्सा या उसके समकक्ष कोई तत्व हमें आहत करता है, वो जब हमारे चेहरे पर नापसंदगी का भाव दिखाता है, और गुस्से की प्रक्रिया से हम वाकिफ हो जाते है। फ़्रांस के मनोवैज्ञानिक जैक्स लुकान के अनुसार “क्रोध एक मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध है, किसी भी तरह के हमले का अहसास होने पर स्वत: ही हमारी शारीरक प्रणाली उसके लिए तैयार हो जाती है, सक्षमता से मुकाबला करने के लिए”। वो आगे यह भी मानते है, कि यह कमजोरी को छुपाने का मानव ब्रह्मशस्त्र है। हमें. क्रोध जब आता है, जब हम आहत होते दिल से, पर क्रोध और आहत में एक दुरी है, इस दुरी में ही अगर हम संयमित हो जाते है, तो क्रोध को आने से रोका जा सकता है।

क्रोध को कभी भी प्रमाणिक नहीं माना जा सकता, न ही उसे शीघ्र अनुशासित किया जा सकता, क्योंकि यह सदा विवेक के विरुद्ध काम करता है। क्रोध का कारण कुछ भी हो सकता है, झूठ, अन्याय,फरेब, हिंसा, ईष्या, द्वेष, जलन, व्यवस्था, सम्बन्ध या और कोई के प्रति असन्तोष, क्रोध और गुस्सा का कारण हो सकता है। मान लीजिये, कभी हमें कोई काम के लिए, कहीं अति शीघ्र पहुंचना है, और रास्ता किसी कारणवश जाम है, तो अनायस ही हमें ट्रैफिक व्यवस्था पर गुस्सा आने लगता है, यहीं से क्रोध की प्रारम्भिक अवस्था शुरु हो सकती है, अगर जाम किसी कारण काफी देर तक नहीं हटे। प्रारम्भिक अवस्था में क्रोध को सन्तुलित किया जा सकता है। अगर इसे यहां सन्तुलन नहीं करते, तो पता नहीं आगे जाकर यह कहां बिना बरसने वाले बादल की तरह फटेगा, और इसका शिकार वो भी हो सकता है, जिस का कोई दोष नहीं।

क्रोध मानव स्वभाव की एक स्वभाविक क्रिया है, इससे बचने से किसी भी नई समस्या का आगमन रुकता है। अतः जब हम कभी आहत होते है, तो दिल हि दिल में यह स्वीकार कर लेना चाहियें कि हाँ, यहां “मैं आहत हो रहा हूं, पर मुझे धैर्य रखना हैं”। यह चिंतन, गुस्सा कम करने में काम कर सकता है। सारांश यही है, क्रोध, गुस्सा या इसका कोई भी रुप किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, ये किसी भी नगण्य कारण को विध्वंसक बना सकता है। जायज या नाजायज का क्रोध से कोई तालुकात नहीं, अनिष्ट्टता को जन्म देते, इसे देरी नहीं लगती। किसी भी सम्बन्ध और रिश्ते के लिए यह परमाणु बम से कम नहीं है। परन्तु इसका यह भी मतलब नहीं कोई हमेंआघात दे रहा है, हमारे दिल को ठेस पंहुचा रहा है, हम उसे सहन करते रहें, तो हम एक कमजोर व्यक्तित्त्व वाले इंसान कह लाये जा सकते है। संयम, धैर्य और मजबूत चिंतन से हम उसका प्रतिरोध कर सकते है। कहते है, इंसान की आँखों में उसके ठोस इरादों की झलक रहती है, और सामनेवाले के लिए यह समझने की समझ, कि उसके सामने कौन है ? अतः बहादुरी रखे, अनायास क्रोध को धैर्य से वापस भेज दे। इससे हम पूर्ण सुखी न हो, पर हमारी शारीरिक क्षमता को आघात नहीं पँहुचेगा, यह तय है।

चलते चलते…आइये पढ़ते है, क्रोध पर कुछ महापुरुष क्या कहते है…

” क्रोध वह तेज़ाब है, जो किसी भी चीज पर, जिस पर वह डाला जाये, से ज्यादा उस पात्र को अधिक हानि पंहुचा सकता है, जिसमे वह रखा है” ****मार्क ट्वेन
” क्रोध वो हवा है, जो बुद्धि का दीप बुझा देती है” **** रॉबर्ट ग्रीन इन्गे सोर्ल

” क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है, इससे आप ही जलते है” ***** भगवान गौतम बुद्ध

” हर एक मिनट जिसमे आप क्रोधित रहते है, आप 60 सेकेण्ड की मन की शांति खोते है” ***** रॉल्फ वाल्डो इमर्सन

इसके अलावा दोस्तों, भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 2 श्लोक 63 में क्रोध पर कहा है…

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।। 2-63 ॥

( क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मानव अपनी स्थिति से गिर जाता है।)

सन्त कबीर दास जी ने क्रोध पर सही चिंतन धारा दी, उस पर एक नजर डालते है ।

जहाँ दया वहां धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध वहाँ काल है, जहाँ क्षमा वहाँ आप ।।

आज के आधुनिक युग में अति क्रोध आर्थिक नुकसान भी करता है, इसके कई उदाहरण हमारे सामने आते है, जब मान सम्मान के मुकदमों के निर्णय हम तक पहुंचते है।

चिंतन यही है, गुस्सा आने से पहले हम चिंतन करे ” क्या अति गुस्सा जायज है” ?…….कमल भंसाली

प्रेम और वासना.. एक चिंतन, भरी चर्चा…कमल भंसाली

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प्रेम और वासना इंसानी जीवन के वो दो पहलू है, जिनके बिना जिंदगी को लय मिलना मुश्किल होता है। प्रेम को अगर वासना से अलग कर दिया जाय, तो प्रेम की परिभाषा को समझना, जरा मुश्किल ही होता है।जहां शुद्ध प्रेम का केंद्र बिंदु आत्मा को ही माना गया, वहां वासना युक्त प्रेम का केंद्र बिंदु, दिमाग और ह्रदय बताया जाता है। आत्मिक प्रेम निस्वार्थ और निराकार बताया गया, वहां वासना को कई आकार से पहचाना जा सकता है।शुरुआती जिंदगी में दोनों का ही समावेश होता हैं। कुछ विशिष्ट आदमी ही वासना की भूमिका को जीवन से अलग कर पाते है, परन्तु काफी कठिनता से।

प्रेम बिना जीवन नहीं चल सकता, पर बिना वासना के जीवन को संयम से चलाया जा सकता है। पूरी यथा स्थिति को समझने के लिये हमें सबसे पहले प्रेम की परिभाषा को समझना होगा।

प्रेम की शाब्दिक परिभाषा जान ने से पहले यह महशूस करना जरूरी होगा, की प्रेम ज्यादातर आभासीत होकर ही अभिव्यक्ति करता है, और अपनी चरम अनुभूति में स्पर्शमय भी हो सकता है। शुद्ध प्रेम त्यागदायी होता है,उसमे स्वार्थ का निम्नतम अंश ही पाया जाता है। स्वार्थ और वासना की बढ़ती मात्रा प्रेम के स्वास्थ्य के लिए घातक माना जाता है।

प्रेम की उत्तम परिभाषा यही है, इसमे कहीं “मैं” का समावेश नहीं रहता, इसके लिए “हम” ही उत्तम माना गया है। दूसरी बात प्रेम में पवित्रता का आभास होता है, परन्तु वासना के बारे में ऐसा कहने से संकोच का अनुभव होता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है, कि प्रेम सत्यता के आसपास ज्यादा रहना चाहता।

ख़ैर, हम पहले प्रेम का शाब्दिक अर्थ की तरफ ध्यान करते है। प्रेम को कभी कभी प्यार शब्द से भी
सम्बोधित किया जाता है। हिंदी शब्दकोश के अनुसार
प्रेम का मतलब प्रीति, माया, लोभ, और लगाव भी होता है। परन्तु, प्रेम को शब्दों से नहीं अहसास और भाव से ज्यादा अनुभव किया जाता है। प्रेम और प्यार दो शब्दों की एक ही व्याख्या है, दोनों ही अढ़ाई अक्षर से संस्कारित है। दोनों को जोड़ने वाला आधा शब्द सदा अधूरा रहेगा, क्योंकि सच्चा प्यार कभी समाप्त नहीं होता। इतिहास की बात करे तो इसका प्रमाण बहुत सारे प्रेम किस्सों में मिलेगा जहां प्रेम के लिए प्रेमियों ने शुद्ध प्रेम के कारण मौत को गले लगा लिया। आज के दौर में भी ऐसी कई घटनाये, हमारे सामने आती है,परन्तु ऐसे प्यार को नासमझ प्रेम की श्रेणी में ही समझा जाता है।

प्रेम शब्द, जीवन का आधार, सिर्फ मानव के लिए ही नहीं अपितु सभी सजीव प्राणी मात्र के लिए है। हालांकि इसके लिए कोई निश्चित आधार स्थापित नहीं किया जा सकता कि प्रेम का सिद्धांत क्या है। जो इस विषय पर शोध कर रहे है, उनका कहना की इसके बारे में एकमत होना असंभव है। कुछ लोग इसे भगवान की कृपा, कुछ रहस्मय, कुछ आत्मिक, मानते है, पर स्पष्टता कहीं नहीं है। मनोवैज्ञानिक जीक रुबिन के अनुसार शुद्ध प्रेम में तीन तत्वों का होना, अति आवश्यक है, वो है,
1• लगाव (attachment)
2• ख्याल (caring)
3• अंतरंगता (intimacy)
उनका मानना है, इन तीनके के कारण ही, एक आदमी दूसरे से प्रेम चाहता है।

जब की भारतीय दर्शन शास्त्र कुछ और ही बात करता है, उसके अनुसार प्रेम हर एक की आत्मा में रहता है, उसे अहसास कराया नहीं जाता, उसे समझना पड़ता है, उसमे शरीर की उन क्रियाओं को गौण महत्व दिया है, जिनमे स्पर्श की जरुरत होती है, उनके लिए देखने भर से प्रेम प्रकाशित हो जाता है। हमारे यहां कुछ रिश्तों में प्रेम को अवश्यंभावी माना गया है, जिसका नहीं होना लोगो में कुछ अचरज पैदा करता है, जैसे की माता, पिता, बेटा, बेटी और पत्नी, ये कुछ ख़ास रिश्ते है, जिनका प्रेम को शुद्धता के रुप में ही मिलने को, स्वीकार किया गया है, हालांकि सच्चाई यही है, ये ही रिश्ते ज्यादा तकलीफ में होते है।

प्रेम की सबसे बड़ी कमजोरी चाहत होती है, जब किसी से कोई अपेक्षा की आशा करे, और किन्ही कारणों से वैसा न हो, तो जिंदगी निराशमय हो सकती है। विश्वास और सत्य प्रेम के दो बुनियादी तत्व है, जिससे प्रेम सहज ही अपनी शक्ति का संदेश मन में प्रकाशित कर सकता है।

आइये, इस शृंखला में आगे बढ़ने से पहले कुछ जन्मातिक पारिवारिक सम्बन्धों की संक्षिप्त परिभाषा का अनुसंधान करने की चेष्टा करते है। परिभाषाओं के विश्लेषण में जरुरी नहीं कि लेखक की परिभाषा, आपके अनुसार हो, क्योंकि प्रेम का महत्व सबके लिए अपने अनुभव के आधार पर होता है, परन्तु तय यहीं है, सब रिश्तों में प्रेम की उपस्थिति से इंकार करना मुश्किल है।

पति और पत्नी के रिश्ते को काफी संवेदनशील माना गया है, जिसमे आसक्ति और प्रेम दोनों की जगह तय की गई है, चूँकि यह रिश्ता संस्कारो के निर्माण में सहयोग करता है, अतः इस रिश्ते में वासना का उचित गरिमामय प्रवेश की अनुमति स्वीकार की गईं है। सामाजिक दर्शन ऐसे सम्बंधों में हिंसा को छोड़ कर इसे अवैध करार नहीं करता।

सबसे आदर्श रिश्ता माँ का होता है, जिसमे एक ही तरह का शुभता भरा प्रेम अविरल बहता ही रहता है।
इस प्रेम की विशेषता यह होती है, कि इस प्रेम की पहचान से ही इंसान की जिंदगी शुरु होती है, और उत्तरोत्तर आदमी इसके प्रेम के अलग अलग रंगों की पहचान रिश्तों के सन्दर्भ से करने लगता है। माँ का प्रेम जीवन स्पंदन से शुरु होकर अंत तक बिना किसी शर्त अपना दायित्व निभाता रहता है। इस प्रेम में वात्सल्य और स्नेह का अद्भुत समावेश देखा जा सकता है।

पिता का रिश्ता जीवन को सम्बलता और दृढ़ता प्रदान करता है, यह रिश्ता कुछ दायित्यों से मजबूर होने के कारण स्पष्ट प्रेम नहीं प्रकाशित कर पाता, परन्तु आंतरिक होते हुए भी अनिष्ट से बचाता है। इस रिश्तें के प्रति सन्तान की समझ ज्यादातर कमजोर और भ्रामक होती है। सब प्रेम की किस्मों में उत्तम होते हुए भी पिता के प्रति प्रेम सहमा सा रहता है। माता पिता दोनों के प्रेम को समझने वाला आदमी सही जीवन दर्शन का ज्ञान कर सकता है। माता का प्रेम जहां शांत और शीतल और सहज बहने वाली धारा है, वहां पिता का प्रेम जीवन में आने वाली कठोर चट्टानों के प्रति सक्षमता प्रदान करता है। समझने वाली बात है कि “भगवान न दिखने वाले माता पिता होते है, परन्तु माता पिता दिखने वाले भगवान है।”

सबसे सुखद अनुभूति और दोस्ती जैसा रिश्ता भाई- बहन का होता है, इस में अहसास आत्मिक होता है,
माँ के बाद इंसान सात्विक स्नेह, प्रेम, और विश्वास इसी बन्धन में ढूंढता है। बहन पिता के बाद अपनी सुरक्षा का अनुभव इसी रिश्तें में करतीं है, शादी के बाद भी, इस बन्धन का अपना महत्व है।….क्रमश..कमल भंसाली

इंद्रधनुषी चिंतन……कमल भंसाली

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सतरंगी दूनिया की देख चकाचोंध
एकरंगी, आत्मा भटक गई, अबोध
सब रंगो की राहे,अब चलु किस ओर
सब मनमोहक, कहते आ इस ओर

पर अब चाह नहीं, प्यार हो अब स्पर्शित
बन्धन मोह के सब है, सारे, जब वर्जित
लोभ, लालच की धुरी का रंग गहन गहरा
तप की आंच में ही, ढलता है, स्वर्ण सुनहरा

कंचन समझ काया की माया ने अबतक उलझाया
रिश्तों से जीवन को आधा अधूरा ही समझ पाया
आने जाने की विधि में, सब कुछ तो, हो गया पराया
निज को खोजा तो, लगा समय व्यर्थ, सस्ते में गमाया

देर को अंधेर नहीं कहते, तमस में जुगनू टिमटिमाते
अनजाने से लग रहे है, कल के गुजरे हुए, रंगी रास्ते
भटके पथ का राही, चलना है, सिर्फ मंजिल के वास्ते
एक बून्द ज्ञान की ले ले, अंधेरो में आत्मदीपक वास्ते

निष्फिकर हो, कर सफर, जंजाल के जंगल से न डर
आत्मा ही परमात्मा, यही शुद्ध ज्ञान , यही पहला गुर
गुरु ही ज्ञान का द्वार, मात-पिता से हुआ, तेरा जग प्रवेश
यह ऋण चूक गया, तो समझ यह जीवन तेरा है, विशेष

सत रंगी दुनिया, इंद्रधनुषी तेरे कर्म, दोनों का जब होगा मेल
आत्मा का जगना है, तय, बदल दे दुनिया का अजीब खेल
संयमित, चाहत शून्य के योग से सात रंग निखरेंगे बेमिसाल
आत्मा मेरी, हर रंग में सत्य सदा रहता, निर्झर स्वच्छ धवल…..कमल भंसाली

जर्जर होकर टूटता मन ….”अकेलापन”…भविष्य का संभावित खतरा….कमल भंसाली

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हजारों की भीड़ में चलता मानव, आज एक अकेला सा ही चला जा रहा है, इसका अनुभव कभी भी किया जा सकता है। कहने को कह सकते है, आप अपने आप को अकेला, न समझे, हम आपके साथ है। पर, हकीकत में क्या ऐसा होता है ? आइये आज इसी दृष्टिकोण पर कुछ चिंतन करते है। सर्व प्रथम हम भारत की संस्कृति पर जरा गौर करते है, जिसमे हमारे पूर्वजों ने इस अकेलेपन के दर्द को बड़ी सहजता से समझा, और कई तरह के उपाय से इसे कम करने की चेष्टा की, दोस्ती, सम्बन्ध, परिवार और समाज में कोई भी इससे ज्यादा प्रभावित नहीं हो, इसका ख्याल रखा गया। उस समय के चिंतक भी सभी को यही हिदायत देते, “सर्व सुखाय, सर्व हिताय” यानी सबका हित ही सबका सुख हो सकता है। एक का हित और दूसरे का दुःख कम ही स्वीकार्य होता, और इस विचारधारा को नगण्य समर्थन मिलता। आज कि स्थिति के सन्दर्भ में इतना ही कहा जा सकता है, यह चिंतन भारतीय संस्कृति की अब सिर्फ विरासत ही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ, अचानक हमारी सामाजिक चेतना से यह चिंतन क्यों विलुप्त हो रहा ? ऊपरी सतह से देखे, तो समय कि कमी और अर्थ की बढ़ती जरूरत ने आदमी की आत्मिक चेतना को निष्क्रिय कर दिया है, परन्तु इसे पूर्ण सत्यता का दर्जा हम नहीं दे सकते। अर्थ का महत्व कब नहीं था ?, रही समय की कमी, वो भी कैसे मानले, पहले भी जितने घण्टे के दिन रात थे, आज भी उतने के ही है। फिर आखिर क्या हुआ, आदमी अकेलेपन का अहसास क्यों कर रहा है, आजकल ? क्यों वो प्रेम की इतनी बाते करते हुए भी किसीका दर्द बांटने में असफल है ? सवाल संजीदगी से ओतप्रोत है, निश्चय ही उत्तर इतने आसानी से कैसे मिल सकता है ?

ज्यादातर विचारक इसका उत्तर शायद यही देना चाहेंगे कि “मनुष्य का अति भोगवादी संस्कृति के प्रति हर दिन झुकाव बढ़ रहा है, वो इस जीवन के आगे सोचने की बात से कतरा रहा है, हकीकत में अपनी कमजोरियों को ही वो शक्ति समझ रहा है। भूल रहा है, कि समय का जो गलत प्रयोग वो कर रहा है, उसके कारण वो अपनों से भी निरस्त किया जा रहा है”। शायद उनके विचारों से हम कम ही सहमत हो, परन्तु उनकी इस बात में तो दम नजर आ रहा कि आदमी खुद से ही निरस्त हो रहा है, इसका ताजा उदाहरण आज के बिखरते परिवारों में बुजर्गो की दशा पर गौर करने से हमे मिल सकता है। शारीरक शक्ति का क्षय उम्र के अनुसार कम होना लाजमी है, परन्तु उनका मानसिक रुप से कमजोर होना, हर मानव के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि बुढ़ापा तो एक दिन सबके दरवाजे पर दस्तक देगा ही। समय की परख को झुठलाना आसान नहीं हो सकता, चाहे हम आज इसकी परवाह करे या नहीं। आज की नई पीढ़ी कितनी ही सफलता अपने खाते में जमा कर ले, परन्तु एक दिन तो उसे उस सहारे की तलाश जरुर होगी, जिसकी सेवा में प्रेम का अहसास हो। समझने की बात है, अर्थ और साधन जीवन को कुछ लम्बा कर सकते है, परन्तु उस सुख की अनुभूति तो अपनत्व में ही मिलेगा, जो दर्द का अहसास कम कर देता है। कुछ लोगों का चिंतन है, जीवन में सफलता पाने के लिए अकेलापन जरुरी है। कुछ क्षेत्र, कुछ विषयों को छोड़ कर यह भी सच नहीं है, तपस्या एक ऐसा क्षेत्र है, जहां नितांत अकेलापन आवश्यक बताया गया। तपस्या के नियम और विधान एक मनुष्य के लिए होते है, यह ठीक भी है, परन्तु उससे पानेवाला ज्ञान मानव को ही अर्पित किया जाता है। इस बात का पुष्टिकरण करने के लिए भगवान महावीर, बुद्ध, गुरु नानक, ईशा मसीह जैसे तपस्वियों की जीवनी पढ़ कर सकते है।

हम भारतीय सन्दर्भ में ही अकेलेपन की चर्चा कर रहे है, उसी के अनुरुप हमारा आज से कुछ सालों पहले का जीवन और अभी के जीवन से तुलना करे तो शायद यह बात हमारी समझ में आ जानी चाहिए कि पिछले पाँच दसक का जीवन ज्यादातर गांव की गलियों के प्रेममय और संस्कारों से ओतप्रोत परम्परागत परिवारों में पलता था। फर्क इतना ही रहा, उस समय अर्थ और साधनों की कमी नजर आती, परन्तु संस्कारों की नहीं। बच्चों को पड़ोसी तक खिला सकता था, परन्तु आज हाथ लगाने में भी संकोच होता है। ज्यादातर बच्चे आया की गोद में ही खेलते है, माँ बाप तो इतनी ही देख रेख करते है, आया ठीक काम कर रही है, ना। सही भी है, आनेवाले एकाकी युग की ट्रेंनिग अभी से मिल जाए, तो अकेलापन समस्या नहीं रहेगा।

पहले के जीवन और अभी हम जो जी रहे, उसकी तुलना करना सही नहीं है, पर जीवन है, तो हर दृष्टिकोण को नापना भी जरुरी है। आज योग की कितनी जरुरत हो गयी, जो की एक पुरानी पद्धति है। आखिर मानना तो पड़ेगा ही सोने की चमक कभी खत्म नहीं हो सकती। तब यह भी मानना होगा की मानव को आपसी सहयोग और अपनत्व की भी फिर जरुरत होगी। हंसने के लिए इंसानो में ही रहना होगा, हाँ रोने के लिए अकेलापन अच्छा है। चिंतन करे, सफलता सुंदर होती है, पर जब सत्य के साथ साथ चलती है। आँखों पर पट्टी बाँध स्वर्ग की कल्पना तो की जा सकती है, पर देखना मुश्किल ही होता है।

नोबल पुरस्कार विजेता महाकवि गुरुदेव रविंद्रनाथ टेगोर की एक कविता “एकला चलो रे” जब लिखी थी, तो शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी, एक दिन आदमी सबके रहते, अकेला और निरहि हो जाएगा। वैसे तो “अकेला,” शब्द स्वतन्त्रता का प्रतीक लगता है, पर वास्तिवकता यही कहती है, स्वतन्त्रता की अति चाह ने आज आदमी को अकेला और तन्हा कर दिया है। यह एक ऐसा जहर है, जो धीरे धीरे मानव जीवन पर असर कर, उसे और भी कमजोर कर रहा है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण कि अगर बात करे तो ओशो ठीक कहते है ” हम अकेले पैदा होते हैं, हम अकेले मरते हैं। इन दो वास्तविकताओं के बीच हम साथ होने के हजारों भ्रम पैदा करते हैं….सभी तरह के रिश्ते, दोस्त और दुश्मन, प्रेम और नफरत, देश, वर्ग, धर्म । एक तथ्य कि हम अकेले है को टालने के लिए हम सभी तरह की कल्पनाएं पैदा करते हैं। लेकिन जो कुछ भी हम करते हैं, सत्य बदल नहीं सकता। वह ऐसा ही है, और उससे भागने की जगह, श्रेष्ठ ढंग यह है कि इसका आनंद ले”

चलते चलते यही कहना उचित होगा, समय के अनुरुप ही मानव की जीवन क्षमता में परिवर्तन भी आते है, उनकी पहचान अनुरुप हमारा जीवन दर्शन भी होना चाहिए। कभी कभी अकेलापन सुखद भी हो सकता है, अगर सोच सृजनात्मक रहे। ……कमल भंसाली