🌜अधूरा चाँद 🌛✍कमल भंसाली

बहती हुई सरगमी बहार
आकाश में छाये सितारे बेशुमार
पर अधूरे चाँद को
ये क्या हो गया
धुंधला कर
बादलों में क्यों खो गया ?
चांदनी से रुठ गया
या अपनी ही उदासियों में
सिमट कर मायूस हो गया
तन्हा हो काले बादलों में छिप गया
चांदनी को भूल गया
ये चाँद को क्या हो गया ?

गलत अंदाज की लहरें
जब लहराती
चांदनी विरहन बन
चाँद से रुठ जाती
अधखुली खिड़की के इंतजार पर
मायूसीयों में पसर जाती
कुछ क्षणों में विलीन हो
सन्देश दे जाती
मंजिले प्यार की
राहे है यार की
जिंदगी वफ़ा और एतवार की
चांदनी चाँद से नही खफा
चाहत सिर्फ उसकी वफ़ा
चूक हुई कभी छिपती नहीं
वफ़ा के बिना प्यार की तपिश ठहरती नहीं
ये चाँद …

खोया खोया चाँद
रूठी सी चांदनी
करते एक दूजे को याद
गरुर के मारे न करे फरियाद
अस्तित्वहीन हो न हो जाये बर्बाद
सिमटी सी कलाओं में ही चाँद की बुनियाद
मंजिल प्यार की करती हरदम एक ही फरियाद
सच्चे समर्पण बिन पूरी कब हुई है कोई जग मुराद
ये चाँद..

धुँधलाया चाँद खो गया
पथ भरष्ट हो कलंका गया
बेसब्र चांदनी मुरझा गई
दाग चाँद पर देख दंग हो गई
विरहन बन जग का जहर बन गई
दूर तक उदासी का आलम बिखरा गई
ये चाँद….
अधूरा चाँद
तन्हा हो बहक गया
मद्धिम हो कह गया
चांदनी की हकीकत समझा गया
दिल की दुनिया पर
जब भी नजर डाली
मिली सदा वो खाली
बन मधुशाला की प्याली
गैरों की प्यास बुझाती रही
खुद को खुद में ही तलाशती रही
तन्हाइयां को कैसे समझाता !
अधूरा चाँद आखिर किसके लिए मुस्कराता !
ये चाँद….

रचियता: कमल भंसाली