चले चल…मन

कठिनाइयां हजारों, दुर्गम रास्ते
मत डर मन, मेरे वास्ते
मंजिलों की परवाह नहीं
उनके लिए रुकना नहीं
तय, कभी झुकना नहीं
चले चल……

वीरानों के साये में
अपने साथ नहीं निभाते
अंधकार की प्रचण्डता में
तो अपनी छाया भी गुम हों जाती
फिर साथ का रोना, क्यों
चले चल….

कैसी परवाह, कैसा मौका
चारों तरफ धोखा ही धोखा
सच,अंधविश्वास ही तेरा
सब कुछ यहां चलता
सारा जग तेरे लिए
बता कब रुका ?
चले चल …

मीत, अब यहां नहीं
कोई तेरा
न कोई है, संगी साथी
न ही तेरा कोई अपना
समझ जीवन अब
एक बेरहम सपना
तूं, सोया था अब तक
भला हुआ, तेरा
आँख खुली
आगे बढ़, हुआ नया सवेरा
चले चल…

कुछ पल की खूबसूरती
आत्मा में ले ले
एक अंतिम मुस्कान
दिल के हर कोने से
दुनिया को दे दे
कर्ज यहां का, यहीं
अपने को है,चुकाना
चले चल…

कमल भंसाली