⭐एक और वनवास🌟 कमल भंसाली🔥

चमन को क्या हो गया
अपनी ही आस्थाओं से रुठ गया
विश्वास के नाम पर
कहीं और खो गया
शायद अपने ही आशियाना
में नजरबन्द हो गया
जो खिलखिलाता बचपन लाता
मासूमियत के अंदाज सीखाता
वो अपनी ही
आग में जल रहा
जीने के गलत मकसद
बता रहा
भटकी राह को
आजादी बता रहा
चमन….

कर्णधारों की हथेलियों से
भाग्य सहला रहा
सत्य के स्तंभ पर
असत्य का झण्डा लहरा रहा
जो उसे लूट रहे
उन्हें ही मसीहा बता रहा
सीमा के सिपाही को
चुप रहने का
संकेत समझा रहा
एक साइन बोर्ड
से कह रहा
देश प्रगति पथ पर
जा रहा
दूसरा बतला रहा
अफवाहों पर ध्यान
न दो
हमारा जहां
अभी नफरत की
फसल उगा रहा
चमन…..

नफरत के सोने से
तैयार हो रही लंका
चारों तरफ
नजर आ रही
शंका ही शंका
हर कोई रावण बन
राम की बात कर रहा
हनुमान बिचारा
एक कोने में बैठ
मूर्छित लक्ष्मण को
निहार रहा
जो बेहोशी में भी
राम की जगह
रावण रावण
बुदबुदा रहा
राम का भाई
रावण के गुण गा रहा
राम हताश हों
फिर, कहीं
एक और वनवास
रहा तलाश ……रचियता कमल भंसाली

ये कैसी बयार…..कमल भंसाली…

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ये, कैसी हवा, आज फिजा में बह रही
सांस लेने पर, थोड़ी घुटन सी हो रही
वक्त का दरिया, शायद धीरे से सूख रहा
हर कोई, वक्त के लिए परेशां, तरस रहा

समय बदल रहा, या फिर, इंसान बहक रहा
कुछ बात तो है, जो कोई, भी, नहीं समझ रहा
पूर्ण, परिवार का गुलदस्ता टूट कर बिखर रहा
हर फूल, अपना अलग अस्तित्व तलाश रहा

अर्थ की धरा पर, स्वार्थ के फूल उगाए जा रहे
मकसद की पूजा कर, उसी पर चढ़ाये जा रहे
दिखावटी प्रेम के लिए, हर कोई गले मिल रहा
बुरे, समय पर मिलने से, कतरा कर निकल रहा

ये कैसी बयार है, समय से पहले दिशा बदल रही
जवानी आने से , पहले बुढ़ापा का संकेत दे रही
आशाओं के बादल छितरा, शंकित तमस बिछा रही
प्यार के नाम पर, सूखे फूलों को हरा भरा बता रही

कथनी और करनी के फर्क का नहीं रहा,अफ़सोस
जहर पी रहे या अमृत, क्या फर्क,? बुझ रही प्यास
आडंबरों से सजा धर्म, सत्य, में नहीं करता विश्वास
अंहिसा के दामन से निकल रहा, हिंसा का प्रकाश

बागवां की बदनसीबी देखों, लगाया चमन बदल गया
खुशियों का पैमाना, बदनसीबी के आंसुओं से भर गया
कल तक की जिसकी निगरानी, वही फल दगा दे गया
जिंदगी के सारे अनुभवों को शर्मिंदगी का अहसास दे गया……कमल भंसाली

आ मुस्करा ले जरा…

कुछ पराये ख्यालों से
नाराज न हो जिन्दगी
कुछ तुच्छ गम से
गमगीन न हो जिन्दगी
खुशियों के समुद्र में
जिन्दादिली की लहरों में
उतर कर मुस्करा, जिन्दगी
ये ही एक पल है, तेरा
आ मुस्करा ले जरा …..

कालधर्म को बहने दे
दुःख को भी नाचने दे
अपेक्षा में न बसा संसार
न ही अपने को धिक्कार
न ही रख मन में विकार
जो मिला कर,वही स्वीकार
ऐसा ही दे जिन्दगी को आकार
सपने सब ही होंगे साकार
ये ही एक पल है, तेरा
आ मुस्करा ले जरा…..

जो तेरे पास वही तेरा
दूर से ही आता सवेरा
थोड़ा सा सबसे फासला
और तेरा नायाब हौंसला
नहीं होने देगा, कभी मजबूर
न नाप किसी का कसूर
कोई नहीं होता,यहाँ पूर्णावतार
नहीं ही जग होता, किसी की जागीर
ये ही एक पल है, तेरा
आ मुस्करा ले जरा……

देख चमन की ओर
कितना उत्साह, कितना शोर
प्रामन्य नहीं, तेरा अवसाद
प्रकृतिकृत ही तेरा, अपना विषाद
सारगर्भित ज्ञान ही, धर्म का आधार
समुत्थान, सिद्धिदायक कर मंगलाचार
आ चल चलते प्यार के चमन में
मुस्कराहट के फूल उछाले गगन में
ये ही एक पल है, तेरा
आ मुस्करा ले जरा….

कमल भंसाली