👦”वाह” बचपन 👿कमल भंसाली

” वाह” बचपन प्यारा बचपन लहराता बचपन
भूल कैसे जाऊं नादानियों का सुनहरा उपवन
चंचल शैतान मन और वों मिट्टी से लिपटा तन
बहकते ख्याल, चंचल इधर उधर भागते नयन
वाह बचपन…..

सरसराती पवन और वो बिखरा निखरा नील गगन
उठते गिरते रंग बिरंगे पतंगों में दिल होता तलबी मगन
देख उनकी अठखेलियों खाली जेब भी जरा शर्माती
झूठ बुलवाती,माँ से डाट, पिता से थप्पड़ लगवाती
वाह बचपन…

शैतानियों से भरा जिस्म जब कभी दीवारों से टकराता
नाना नानी याद आते गीत देश भक्ति के ही गुनगुनाते
झंडा ऊँचा रहे हमारा आओ फुटबाल खेले तुम्हारा
ऐसा था बचपन प्यारा हमारा उमंग उत्साह से भरा
वाह बचपन…

फ़िक्र सिर्फ थी ” परीक्षा “जीरो हमारा हीरो
“किताबे” खलनायिका, नकल से मत डरो
चांदनी रातों में अंताक्षरी से शुरु होती बाते
कहानी किस्सो में बीत जाती ठंडी ठंडी राते
वाह बचपन ……

रजाई में सिसकते सपने, भुत प्रेत सब साथआते
हनुमान चालीशा गवाते दोस्त राक्षस बन कर डराते
कभी राम कृष्ण कभी रावण बन अपना डर भगाते
माँ के दुलारे बन उनकी गोदी में निश्चिन्त हों सो जाते
वाह बचपन….

बचपन के रंग प्यारे आज भी रहते रुलाते हंसाते
बचपन के बिछडे दोस्त आज याद बन मुस्कराते
समय के खण्डरों मेंअब भी हम बचपन तलाशते
जीवन के सूखे फूल कभी कभी ऐसे भी महक जाते
वाह बचपन….
रचियता: कमल भंसाली

💖 मन 💖 कमल भंसाली

मन
मंजिल ढूंढ रहा
प्राप्ति की चाह में
अंधेरों में ही भटक रहा
भूल गया
जीवन का दर्शन
स्वस्थ काया उजला मन
नहीं निहारना होगा आत्म दर्पण
मन…

देह भूखी
करती रहती पुकार
मन की कमजोरी
नहीं कर सकता तिरस्कार
गहनतम हो जब चिंतन
बढ़ जाता मन का संयमन
देह भी संकुचाती
उसकी हसरते कम हो जाती
मन …

आत्मा में गुरुता
जब प्रखर हो जाती
जीवन की मधुरता भी
व्यवहारों में झलक जाती
अभिमानी खून गंगाजल बन जाता
जीवन का मकसद उसूलों में ढल जाता
मंजिल का पथ सामने आकर खड़ा हो जाता
मानव का मन मोक्ष की तरफ अग्रसर हो जाता
आत्मा का हाथ पकड़ देह को अलविदा कहता
देह, मन, और आत्मा का संगम योंहीं अविराम चलता
मन….

रचियता✍ कमल भंसाली