🏩शायद जिंदगी अब यहां कम रहती🏩कमल भंसाली

हालात कितने बदल गये ?
जिंदगियों के लहजे बदल गये
रिश्तों के निवेदन भी बदल गये
अपनत्व अलसाई सी कली बन गई
मजबूरी हुई तो कभी कभार खिल गई
लक्ष्मी की कृपा जिस पर भी बरस गई
उसे रिश्तों की नई परिभाषा भी समझा गई

इसलिये आज !

घर तो सजे है,शानदार
निर्जीवता का कर श्रृंगार
पर, सुने से रहते इनके द्वार
जैसे रह रहे, सब इनमें बिन प्यार
इंसानी साये नजर आते, कभी कभार
मन्द अंधेरों में हर तस्वीर धुंधली सी लगती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

दीवारों के हर रंग फीके लगते
घरवालों के सपने बिके लगते
गुलदस्ते के रंग गहन गहरे लगते
सजे फूलो. के चेहरे सब्ज बदरंग लगते
घर का सूनापन ख़ामोशी बयान करते
अपने अब यहां कम दिखते
रिश्ते भी अब कम ही निभते
मेहमान भगवान नहीं लगते
जज्बातों में अहसास नहीं डूबते
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

बिन जिंदगी, हर सजावट अधूरी
बिन इंसान, नहीं जीवन की धूरी
घर सजाया, जीवन भगाया
कौन सा बड़ा काम किया ?
अपने ही आशियाने को
सुंदरसा श्मशान बनाया
चाहत के गलियारों में,धूप नहीं दिखती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

सुबह, अलसायी सी कटती
दोपहर, भाग दौड़ में गुम हो जाती
शाम, सुस्ती का फूल थमा जाती
बन्द कमरों से, सिर्फ टीवी की आवाज आती
खाने की टेबल पर, अलग अलग प्लेट सजती
बाहर के खाने से जीभ गुराती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

बेटे का फोन, माँ मुस्कराती
प्रणाम पर, आशीर्वाद देती
बहु का हाल सास पूछती
पोते का ख्याल रखने का कहती
बहु मायके में सब कुछ बताती
सिर्फ ससुराल से कतराती
सैंया भये कोतवाल गुलछरे उड़ाती
न आने के बहाने करती
हतास निराशा से बत्ती गुल हो जाती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती
हकीकत अब यही कहती
घर, सिर्फ सजते,
देखने में, शानदार लगते
आँगन में कोई परछाई
नजर नहीं आती
हल्की सी आहट पर
बिल्ली भी दीवार फांद जाती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती■■◆
रचियता ( कमल भंसाली )

संगम दो जीवन का ★★🎂 कमल भंसाली🎂

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दोस्तों, जीवन के दो रिश्ते दिल की आपसी सहमति से तय होते है, एक “पति-पत्नी” का, दूसरा “दोस्ती” का। दोनों ही रिश्तों की कमजोरी होती है, “गलत फहमी”, दोनों को हि विश्वास की डोरी चाहिए। दोस्ती के रिश्ते में दरार आने के कई कारण हो सकते है, परन्तु दाम्पत्य जीवन में गलतफहमी सबसे खतरनाक बीमारी मानी जाती है, इससे बचना बहुत जरुरी होता है, क्योंकि यह जीवन समर्थक बन्धन है। अभिमान में कोई भी कह सकता है, मैं क्यों परवाह करुं पर हकीकत यही कहती है, यह रिश्ता परवाह करने के लिए बनाया गया है। धर्म शास्त्रों ने इस रिश्ते में अपनी सारी शुभता दी है, ताकि मानव अपने आपको विषम स्थिति में अकेला अनुभव न करे, अपने लिए सुखद भविष्य तैयार कर सके। नर-नारी सृजनकारी होते है, उनसे भविष्य निर्माण होता है, सभी के लिए। कितना अभूतपूर्व है, यह बन्धन। फिर भी आज, इतने “तलाक” ! विस्मय की बात जिस बन्धन में दिल बिना कोई गाँठ बंधा रह सकता है, उसमे ही गाँठ लगाने की जरुरत हो जाती है। मेरा प्रयास इतना ही है, आज के युगल इस बात को समझे, और थोड़ी नम्रता से चिंतन करे, “प्रेम” अमृत की बून्द है, सुख-दुःख झेलनेवाली छतरी है। गलतफेमियों का शिकार इस रिश्ते को न बनाये, वक्त उन्ही को सुखी करता, जो हर रिश्ते की कदर करते है। मैं कोई प्रशिक्षित कवि नहीं हूं, सिर्फ अपनी भावनाये प्रकट करने के लिए लिखता हूं, अतः इसे एक संदेश ही समझे। मैंने इस विषय पर और भी कविताये लिखी है, जो इस ब्लॉग साईड पर उपलब्ध है, पढ़कर सुझाव जरुर दे। “धन्यवाद”।

उस राह की क्या बात करुं
जो तुम तक नहीं पहुंचती
उस याद को क्या समझुं
जो तुम्हे कभी नहीं आती

प्यार किया, उससे इंकार नही
पर गुलाम कहलाऊँ, स्वीकार नहीं
हकीकत यही है, प्यार बन्धन है
दो दिलों की एक नायाब मंजिल है

वक्त कोई फ़रिश्ता नहीं
पर कसौटी है, हर रिश्ते की
जिस सम्बन्ध की डोर कमजोर
तय,उस की उम्र ज्यादा नहीं

चाह थी, गुलशन का हर फूल
जैसी तेरी मुस्कान रहे
हम दोनों की निगाहों में
आपसी दर्द की पहचान रहे

भूल हुई हमसे, छोटी सी सही
कुछ तुमने की, कुछ मुझ से हुई
रास्ता, जब एक सामने
पता, नहीं, फिर
मंजिल, हमसे क्यों दूर हुई

आओं, गिला, शिकवा को
नाप लेते
फिर, से दिल
टटोल लेते
एक बून्द “प्यार” की
अपने दिल में तलाश लेते

न तेरे पास हों, अभिमान
न मेरे पास शान
अब है, दो जान
और एक प्राण
यही है, वो सवेरा
यह घर न तेरा, न मेरा
है, सिर्फ “हमारा”

हम दो
छोटी सी जिंदगी
उसमे कितना कुछ कर जाते
अब नादानी को
अलविदा कहकर, मुस्करा जाते
हमसफ़र है, दोनों
“आ”
दूनिया अपनी, फिर सजा लेते…कमल भंसाली