🍀भीगी रातों के सपने 🍀कमल भंसाली

सावन की भीगी भीगी रातों में
मुझे सपने सुहाने लगते
क्योंकि
उनमें तुम्हारी ख्वाइसों के
मस्त मस्त फूल खिलते
जो
मेरे देह दर्पण को
अपने स्वप्निल नैनों के
झरोखों से निहारते
फिर, मुझे
प्यार के गुलशन की
अजनबी अनुरागी पगडंडियों की
सैर कराते
रिमझिम रिमझिम
बरसती सावन की फुहारों से
मेरी चाहतों को
और भी भिगों देते
सावन की…

प्रियकर
सावन की
गीली मिट्टी की सोंध
फिर भला कहां पीछे रहती
वो मेरे जिस्म को
प्रेमालिंगन कर
अलबेले गीत सुनाती
अपनी इंद्रधनुषी खुशबूओं से
प्रेमान्मत्त हो
स्वर्ण लय के स्वर बिखराती
मेरे विरही दिल के
ह्र्दयकाश में
चांदनी बन छा जाती
सावन की
ऐसी हसीन रातें
बहुत कुछ कहती
जब तुम न हो
तो यही दिल बहलाती
सावन….

रात भी ज्यों ज्यों भीगती
मौसम के प्यार में
सपनें मेरे भी डुबकी लगाते
पलों के कुसुम कुंज में
प्रियतम
खब्बाबी प्यार की झील में
जब जिस्म तुम्हारा
नजर आता
होठ तेरे
आमन्त्रण देते
काली घनेरी
जुल्फे तेरी
मौसम की हरी वादियों में
अंगड़ाइयां लेती
तब मेरा अहसासित मन
उनमें डूब डूब
डुबकी लगाता
सच कहूं
तन मेरा
मधुरस से भीग
कादंबिनी
बन जाता
मन मंदाकनी बन
लहराता
दिल
सावन की घटा बन
तुम पास होती
शायद, तुम पर
प्यार ही प्यार बरसाता
सावन…
रचियता कमल भंसाली