😆तुम्हारी मुस्कराहट😅✍ कमल भंसाली

तुम जरा मुस्करालो
जिंदगी को मकसद मिल जायेगा
जरा मेरा यकीन कर लो
हर मंजिल को स्वर्णिम सवेरा मिल जायेगा
तमस में भटकती राहों को मंजिल द्वार मिल जाएगा
पथ गीतों को बहारों के आने का संदेश मिल जाएगा
तुम जरा….

तुम्हारे मुस्कराने के हर अंदाज से
चमन की हर कली खिलखिलाती
दीप आशाओं के प्रज्वलित करती
सुख सन्देश की किरणे बिखेर जाती
अपनी एक मुस्कराहट को जरा सहमति दे दो
मुस्कराकर जग को ये स्वर्णिम सा सन्देश दे दो
तुम जरा….

कल तुम्हारी मुस्कराहट जीवन पथ की हो जाएगी
तेरी मुस्कराहट मेरे से होती हर मंजिल तक जाएगी
हमारी हो जग में हर चेहरे की रौनक बन इठलाएगी
स्वरः वीणा के सुर में सज लय से मधुरता ही लायेगी
सह्रदय से निकली मुस्कराहट मंदाकिनी बन जाएगी
तुम….

कल न भी होंगे तो मुस्कराहट जहां में रहेगी
यह अमानत हमारी सदाबहार ही कहलाएगी
उपहार हमारा यह हर सांस में खुशबू ही फैलाएगा
हर दिन उज्ज्वलता की प्रखरता से निखर जाएगा
यह ख्याल कर जब हर कोई मधुरता से मुस्करायेगा
सच कहता जग मुस्कराहटों का गुलशन कहलायेगा
तुम जरा….

मायूसी को जिंदगी में न पनाह दो तो मुस्कराओगे
उदासी को अंदर तक न सैर कराओ तो मुस्कराओगे
प्रेम को जीवन का मकसद बनाओ तो मुस्कराओगे
मकरन्द बन कर छा जाओ तो भी तुम मुस्कराओगे
पल की एक मुस्कराहट से हर दिल मे बस जाओगे
तुम जरा…

😃मुस्कराहटों का गुलशन जीवन “हमारा”😃कमल भंसाली

अगर चाहत हमारी जिंदगी में खुशियों की है, तो निसन्देह हमें मुस्कराहटों की खेती करनी होगी, सवाल स्वयं ही उभरता है क्या मुस्कराहटों की भी पैदावार होती है ? उत्तर में हमें रॉबर्ट लुइस स्टीवेन्सन के उस कथन में तलाशते है, जिन्होंने बड़ी दर्दीली और मार्मिक से गुजरते हुए लिखा ” There is no duty that we so much understand as the duty of being happy”। हमारी विडम्बना है हम मुस्कराहट का मूल्यांकन सिर्फ दूसरों के चेहरे पर देखकर करते है जबकि हकीकत यह है हमारे चेहरे की जमीन भी उतनी या उनसे ज्यादा उपजाऊ है। व्यकितत्व का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञ मानते है, जीवन की निराशा को आंशिक सफलता की मुस्कराहट भी कम करती है जिससे शरीर और मन दोनों को अनावयशक तनाव की कमी महसूस हो सकती है, और उत्साह का आगमन जीवन में वापस होना शुरु हो जाता है। प्रसन्नता भरी मुस्कराहट विपरीत परिस्थितयों को अनुकूल होने में संजीवनी का काम कर सकती है।

जिंदगी का सबसे बड़ा तनाव यही है कि हम उसे स्वयं नहीं जीने की कोशिश करते अपितु दूसरों में उसके सही जीने के तरीके ढूंढते रहते है। जबकि हकीकत यही है, जिंदगी बड़ी संजीदगी से रहना चाहती, हर समय उसे मुस्कराना सही नहीं लगता पर कुछ ख़ास लम्हों में वो खुश होकर मुस्कराना जरूर चाहती, हमें इस संक्षिप्त सत्य को समझ लिया तो समझिये मुस्कराहटों की खेती करना भी हमें आ जाएगा।

जीवन क्यों दुखी होता है ? समस्याओं से, जी ‘नहीं’, जीवन हमारी अक्षमताओं से ही घबराता है, जिन्हें हम कभी अपनी सक्षमताओं से नहीं मिलाते। हमारी नैतिक और मानसिक कमजोरियों के कारण हम स्वयं से ही दुःखी होते है। अलबत्ता यह बात जरूर है, हम उसके कारणों का खासकर वो जो प्रायः नहीं होते उनका ही जिक्र करते रहते है। हमारी स्वभाविक चेतना में कई तरह की कमिया होती है, जिन्हें हम नजरअंदाज करते रहते है और यही हमारे व्यकितत्व को शायद मुस्कराने से रोकती है।

कहते है, जीवन के भविष्य को जो खुशनुमा माहौल की सैर कराते है, वो कभी भी निराश का दामन नहीं थामते। सवाल करना भी उचित हो सकता है कि हम किस तरह से जीवन को भविष्य की सैर करा सकते है ? भविष्य के सुनहरे और सक्षमता से ओतप्रोत सपने देखने वाले इंसान में यह क्षमता होती है बनिष्प्त जो अपने उद्देश्यों को हरदम सवालों के घेरे में बंधे रखते है। Marcus Aurellius के इस कथन पर हमें सदा गौर करना सही होगा ” The true worth of a man is to be measured by the objects he pursues” । हमारी सच के दामन से बन्धी मुस्कान हमें हमारे भविष्य के प्रति आशवस्त करती है।

मुस्कराना जीवन की मजबूरी नहीं है, अपितु जीवन को यह निस्फिक्री का सन्देश देती है। हमें दो बातों पर सुखी और प्रसन्न जीवन को जीने के लिए गौर करना चाहिए, एक सत्यता भरा नैतिक जीवन की चाहत दूसरा विध्वंसकारी तत्व चाहतों के दरबार की जी हजुरी से बचना यानी संयमित जीवन की ख्वाईस। विश्वास करना जायज होगा, जीवन में मुस्कराने की वजह नहीं तलाशनी होगी। अपनी किताब ‘The Magic of Thinking Big में Dr David J. Schwartz लिखते है “एक सच्ची और सही मुस्कान दुश्मनी को पिघला देती है, जिससे दैनिक जीवन में आनेवाली कई तकलीफो और कुंठाओं का सहज, सरल समाधान हो सकता है”। सही भी है, हमारी मुस्कान कठिन परिस्थितियों को निर्मल बनाने का काम करती है और हमें निराशा से बचाती है।

हर वस्तु के निर्माण में कुछ तत्वों का सहयोग सदा जरुरी होता है, सही और गुणकारी मुस्कान में दिल की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। “दिल खुश तो चेहरा भी खुश” और मुस्कराते चेहरा का आकर्षण हर कोई को सबसे अलग कर अपना प्रभाव छोड़ता है। दूसरों को सहजता का अनुभव हमारा व्यवहार और मधुरमय भाषा कराती है। भाषा और मुस्कान का चोली दामन का साथ होता है। शब्द और विचार हमारी शारीरिक भावभंगिमाओं को सहज करने में सहयोग देते है। जैसा की Vernon Howrad कहते है ” Happiness is the way you are, not the way things are”। इतने कम तत्वों से संग्रहित मुस्कान अंहिसक होकर भी अपनी सकरात्मक क्षमताओं से लबालब होती है।

इस लेख का कोई बड़ा चौड़ा दावा नहीं है कि इतना कुछ चिंतन करने के बाद हम जिंदगी में मुस्कराने की कला सीख जाएंगे क्योंकि हमारा चिंतन का तरीका ही हमारी जिंदगी जीने का मालिक है। परन्तु, विश्वास करना होगा H. D.Thoreau के इस कथन का ” The man is richest whose pleasures are the cheapest”। आइये संक्षिप्त में कुछ मुस्कान सम्बंधित जानकारीयों पर एक नजर डालते है, जिससे हमारी मुस्कानों की पैदावर सदा बढ़ती रहे।

1.मुस्कान की खेती में आत्मिक शांति एक अच्छी उर्वरक खाद का काम करती है।
2. आंतरिक प्रसन्नता उन अच्छे कार्यों से ही आ सकती है, जिनसे दूसरों के चेहरे खिलखिलाते नजर आते हो।
3. खुशियां देने वाले वातावरण का निर्माण कर हर इंसान एक मुस्कराहटों भरे गुलशन का बागवान बन सकता है।
4. उत्साह, उमंग, जोश से दिल को नित नई रागिनियों से बहलाते रहे।

5. ध्यान रहे हमें, जीवन में सच और संयम के अनुपात से ही ख़ुशी की उत्तम फसल तैयार की जा सकती है जिससे त्याग के फूल दूसरों के प्रसन्नता के देवी देवताओं पर अर्पण होते रहे, और खुशियों की न खत्म होने वाली मंगलमय पैदावर से हमारी जिंदगी सम्पन्न व स्वस्थ रहकर अपनी तय मंजिल पथ पर अविराम अग्रसर होती रहे। जीवन पथ के सजग राही बन गुनगुनाते रहे,

“खुशियां ही, खुशियां
ऐसी हो जिंदगी की डलिया
जिनमे हो मुस्कराहटों के फूल
और खिलखिल करती हजारो कलिया
महकती रहे हर जीवन की बगिया” ।
लेखक: कमल भंसाली

🍹प्यार करो🍦कमल 💜भंसाली💛

पाश्चात्य देशों से आयातित “वैलंटाइन डे” जिसका कल हमारे देश का एक बड़ा धनाढ्य शिक्षित वर्ग खासकर नव जीवन को पसन्द करने वाले बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करेंगे। ये युवक – युवतियों के लिए प्रेम का इजहार करने का दिन माना जाता है। संकोच की सब सीमाओं को लांघकर मनाया जानेवाला यह दिवस भारतीय संस्कृति के अनुरूप कहीं भी नजर नहीं आता, पर बदलते समय के प्रभाव को नकारना आज मुश्किल है।अगर उपरोक्त इंग्लिश शब्द का हमारी भाषा के अंतर्गत परिभाषित किया जाय तो “प्रेम दिवस” एक सही सटीक परिभाषा होगी। हकीकत में हमारी संस्कृति के अनुरूप यह दिन कोई नया महत्व नहीं रखता, क्योंकि भारत में हर रिश्ते में प्रेम हर रोज छलकता है। परन्तु पाश्चात्य देशों के इस त्यौहार में जिस प्रेम को महत्व दिया गया वो प्रेमी – प्रेमिका के आपसी रिश्तों को नजदीकियों की विशेष छूट देने का बहाना ही लगता है। इस कविता का सार इतना ही तथाकित प्रेम- दिवस को हमारे देश के सामाजिक रीति- रिवाजों के अंतर्गत ही आगे बढ़ाना सही है, इससे ज्यादा कुछ और नहीं……कमल भंसाली

***”प्यार” करो ***

हां,
“प्यार” करो
इससे इंकार न करो
“प्यार”
जीवन का श्रृंगार
प्यार
मन की उपासना
दिल से इसे स्वीकार करो

बिन प्यार
जीने को नहीं मिलता
कोई आधार
प्यार हर एक अधिकार
इसका दुरूपयोग न करो
फिर, प्यार करो
जी भर कर करो

पर ध्यान रहे
प्यार न हो मोहताज
सिर्फ एक दिन का
ये तो सतरंगी
सुरमई प्रेमांग
इसके हर ढंग पर
विश्वास को न्यौछावर करो
फिर, प्यार करो…

सुबह की हर कली
भास्कर की किरणों से खिलती
धवल चांदनी भी
प्यार से ही मुस्कराती
हर आवश्यकता की जननी
जिंदगी
प्यार की चाहत से ही
आगे बढ़ती
इस पर जरा गौर करो
फिर, प्यार करों….

प्यार
को प्यार ही रहने देना
इसे रिश्तों की
बस्ती में बसा देना
कोई इल्जाम न देना
उपहारों से कीमत न आंकना
आज के मिलन को
व्यापार का नाम न देना
बन्धन है प्यार
इसकी नाजुकता बनाये रखना
सपनों में बसा
इसे टूटने न देना
हो सके
तो तपस्या के फूलों से
जीवन के
गुलदस्ते में सदाबहार रखना
मेरी इस बात को
थोड़ा समझ कर स्वीकार करो
फिर, प्यार करो

एक दिवस का प्यार
बिन बंदिश बहक जाता
जिस से जिस्म दहक जाता
फिर प्यार नहीं
वासना का शूल इसे चुभ जाता
जिंदगी को
दर्द की गहरी खाई में
अस्तित्व विहीन कर जाता
जाते जाते
बदनामी के आँचल से ढक जाता
कड़वे सच की औषधि
“संयम” की आज के लिए स्वीकार करो
फिर, प्यार करो

वक्त बदल ता रहता
जिंदगी का दामन भी ढीला पड़ जाता
पर सच्चा प्यार
जीवन की हर राह को हर्षाता
एक आंसू
जब न रहे, तो
अगर किसी के नयनों गिरता
तो प्यार
प्रार्थना बन उपाषित हो जाता
धरती को
मकसदों का गुलशन बना देता
इस तपस्या को “आत्मा” से स्वीकार करो
फिर, प्यार …….

रचियता: कमल भंसाली

ये कैसी बयार…..कमल भंसाली…

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ये, कैसी हवा, आज फिजा में बह रही
सांस लेने पर, थोड़ी घुटन सी हो रही
वक्त का दरिया, शायद धीरे से सूख रहा
हर कोई, वक्त के लिए परेशां, तरस रहा

समय बदल रहा, या फिर, इंसान बहक रहा
कुछ बात तो है, जो कोई, भी, नहीं समझ रहा
पूर्ण, परिवार का गुलदस्ता टूट कर बिखर रहा
हर फूल, अपना अलग अस्तित्व तलाश रहा

अर्थ की धरा पर, स्वार्थ के फूल उगाए जा रहे
मकसद की पूजा कर, उसी पर चढ़ाये जा रहे
दिखावटी प्रेम के लिए, हर कोई गले मिल रहा
बुरे, समय पर मिलने से, कतरा कर निकल रहा

ये कैसी बयार है, समय से पहले दिशा बदल रही
जवानी आने से , पहले बुढ़ापा का संकेत दे रही
आशाओं के बादल छितरा, शंकित तमस बिछा रही
प्यार के नाम पर, सूखे फूलों को हरा भरा बता रही

कथनी और करनी के फर्क का नहीं रहा,अफ़सोस
जहर पी रहे या अमृत, क्या फर्क,? बुझ रही प्यास
आडंबरों से सजा धर्म, सत्य, में नहीं करता विश्वास
अंहिसा के दामन से निकल रहा, हिंसा का प्रकाश

बागवां की बदनसीबी देखों, लगाया चमन बदल गया
खुशियों का पैमाना, बदनसीबी के आंसुओं से भर गया
कल तक की जिसकी निगरानी, वही फल दगा दे गया
जिंदगी के सारे अनुभवों को शर्मिंदगी का अहसास दे गया……कमल भंसाली