🔥अनुभव ⭐ एक सार्थक चर्चा 🌞 कमल भंसाली

“अनुभव” एक शानदार शब्द होने के साथ सक्षमता प्रदान करने का सही और सुंदर साधन है। शास्त्रों से लेकर धार्मिक ग्रन्थों ने इसको महत्व दिया है। जीवन अपनी विभीषताओं से जब भी उलझता है, तब अनुभव एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है, शर्त यही है, कि वो हमारे पास अर्जित किया हुआ होना चाहिए। प्रश्न किया जा सकता है, अनुभव में आखिर ऐसा क्या है, जिससे उसे इतना महत्व दिया जा रहा है ? सही वस्तुस्थिति को समझने के लिए हमें अनुभव के साथ परिचय करना सही होगा। अनुभव का हिंदी में शाब्दिक अर्थ प्रत्यक्ष ज्ञान, काम की जानकारी, तजुर्बा आदि होता है। जरा और स्पष्ट शब्दों में अगर कहे तो प्रयोग और परीक्षा से प्राप्त ज्ञान भी अनुभव कहलाया जा सकता है। तर्क संग्रह के अनुसार ज्ञान के दो भेद होते है, स्मृति और अनुभव। संस्कार से प्राप्त ज्ञान स्मृति समझा जाता है, कर्म से प्राप्त ज्ञान अनुभव के दायरे में आता है। भारतीय शास्त्रों ने अनुभव को दो भागों में विभक्त किया है, यथार्थ अनुभव और अयथार्थ अनुभव। यहां तक तो शास्त्र एक मत है, पर उन्होंने जब यथार्थ अनुभव के चार भेद किये तो विभक्ति उनके अंदर भी हुई,। वस्तुतः ज्यादातर जो चार भेद स्वीकार करने योग्य थे, वो है,

1.प्रत्यक्ष, 2. अनुमिति, 3. उपमिति, 4. शाब्द ।

अयथार्थ अनुभव के सिर्फ तीन भेद माने गए,

1.संशय, 2. विपर्यय तथा 3. तर्क

यहां स्पष्ट करना उचित है, संदिग्ध ज्ञान को संशय, मिथ्या ज्ञान को विपर्यय तथा ऊह ( संभावना) को तर्क कहते है। तर्क सभी अनुभव ज्ञान का जबरदस्त दुश्मन है। अनुभव की जगह हम कभी अंग्रेजी शब्द Experience का प्रयोग करते है। इस शब्द में ज्ञान, व्यवहार, अनुभव कौशल, परीक्षा आदि सभी तत्वों का अर्थ सम्मलित है, एक पूरक और व्यवहारिक शब्द होने से इंग्लिश न जानने वाले भी इसको समझ जाते है। अनुभव रहित जीवन बिन दिशा और पतवार के कभी भी साहिल छूं नहीं पाता, यही एक गूढ़ तथ्य जो जीवन दर्शन का कोई भी समझ जाता तो उसे अपनी असफलता के प्रथम चरण पर अफ़सोस नहीं होगा, क्योंकि उसे पता है, असफलता, सफलता की पहली सीढ़ी है, तथा उसके पास रहा अनुभव उसे अपनी उन गलतियों का ज्ञान करा देता है, जो उसकी असफलता के कारण हो सकते हैं।

चूँकि अनुभव का सूक्ष्म सा कण भी सक्षमता को बढ़ाता है, अतः अनुभव के प्रति हमारी लाचारी कभी भी नहीं होनी चाहिए। यह भी समझना होगा कि चूँकि अनुभव दुर्लभ और अमूल्य होता है, किसी भी दुकान में नहीं मिलता, उसको तो उन से प्राप्त किया जाता है, जिन्होंने अपने कर्म, सोच, मेहनत, और आत्मिक ज्ञान से उसे प्राप्त किया है। क्षेत्र के अनुसार अनुभव अपनी विशिष्टता स्वयं इस तरह से तैयार करता है कि कई क्षेत्रों का ज्ञान स्वत् ही उसमे सम्मलित हो जाते है। कहने की बात नहीं अनुभव और ज्ञान एक दूसरे के पूरक है, कह सकते है, इनका चोली दामन का साथ है।

कल्पना करने में कोई हर्ज नहीं होगा की आज जितने रुप के अति आधुनिक साधन का अविष्कार किया गया, क्या बिना अनुभव के उत्तमता की कसौटी पर खरे उतरते ? शायद, कदापि नहीं। निसन्देह कर्म की कोख से ज्यादातर अनुभवों का जन्म स्वत् ही हो जाता है, पर उनका लालन पालन की भूमिका ज्ञान ही निभाता है। जान लेने की बात है, कि इंसान अपने अनुभवों और ज्ञान के द्वारा ही अपना परिचय इस संसार में तय करता है। आज जब हम कभी भी अपने मन की तथा शरीर की अवस्था की जांच करते है, तो भूल जाते है कि हमारे दैनिक कर्मो के अनुभव से वो भी प्रभावित हो सकते है। उदाहरण के तौर पर इस तथ्य को तो स्वीकार करना ही चाहिए कि गुस्से की हालत में हमारे शरीर और मन का हर हिस्सा जर्जर और कमजोर हो जाता है, और उसका विकृत प्रभाव हमारे चेहरे पर स्वयं ही आ जाता है, वैसे ही किसी सकारत्मक, जगहित का आत्मिक काम हमारे चेहरे को चमक देता है।

कोई दो राय नहीं होगी, जो हमें समझाएगी कि सिर्फ अनुभवित होना, या किसी अनुभवी से मार्ग दर्शन प्राप्त करने से विशिष्टता प्राप्त हो जायेगी, सही नहीं है, और क्योंकि अनुभव तभी गुणकारी होता जब हम उसे अभ्यास की कर्मठ कसौटी पर उसके खरे पन को जांचते है। हालांकि अनुभव शुद्ध सोना है, पर हमे दैनिक जीवन में लगातार नये नये गुणों के गहने बनाने है, तो कसौटी पर अनुभव के शुद्धता की जांच कर लगातार अभ्यास की आदत डालनी होगी। क्योंकि कहा गया है, :

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान ।

( जब रस्सी को बार बार पत्थर पर रगड़ने से पत्थर पर निशान पड़ सकता है, तो निरन्तर अभ्यास से मुर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है। )

आज संसार चारों तरफ से नवीनतम साधनों की खोज में लगा है, दूसरी तरह से हम कह सकते है, आज ज्ञान चारों तरफ बिखरा है, अगर उसे हमें अपने लिए समेटना है, तो निश्चिन्त है, कि अनुभव और अभ्यास दैनिक जीवन की जरुरत है। परन्तु, जो सबसे मुख्य बात ध्यान रखने की है, वो है, अपनी योग्यता पर विश्वास करके अनुभव प्राप्त करना। जब हम अपने ऊपर विश्वास की बात कर रहे है तो सदा ध्यान रखना होगा की अतिविश्वास से भी बचे।

“Anything that you learn becomes your wealth, that cannot be taken away from you; whether you learn it in a building called school or in the school of life. And not all things that you learn are taught to you, many things you realise you have taught yourself.”…C Joy Bell

इसलिए अपनी आंतरिक चेतना की जागरुकता से अनुभव प्राप्त करना ही उचित लगता है।

जिंदगी को किसी भी क्षेत्र में बेहतर और अनुभवी बनाने के लिए उपरोक्त कथ्य एक शानदार सूत्र है, इंसान का कर्म क्षेत्र में अभ्यास से किया यह अनुबन्ध उसे प्रगति की तरफ ले जाता ही नहीं बल्कि उसे अपने चुने क्षेत्र का विशिष्ट विशेषज्ञ भी बना देता है। यहां पर एक बात स्पष्ट कह देनी जरुरी हो सकती है, जब हम किसी क्षेत्र की बात करते है तो हमारा मकसद मानव और दूसरे प्राणियों को लाभ पंहुचाने वाले क्षेत्र के बारे में है, न कि उन के जो दहशत फैलाते है, हालांकि उनमें भी अनुभव अपनी खासी भूमिका निभाता है। सर्व कल्याण ही स्वयं का कल्याण करता है, इसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि सकारत्मक चिंतन ही जीवन को महत्वपूर्ण बनाता है ।

प्रश्न किया जा सकता है, अनुभव को किन स्त्रोतों से पाया जा सकता है ? मनोविज्ञान के अनुभवी जानकार बताते है, कि अनुभव स्वयं अर्जित प्रक्रिया है, जो हर चेतन के अंदर जन्म प्रक्रिया में समाहित रहती है, और जीवन अस्तित्व की सुरक्षा के लिए स्वत् ही समझ में आ जाती है। चूँकि यह प्रक्रिया स्वयं की समझ से तैयार होती है, तो व्यवहारिक जगत के लिए ज्यादा सार्थक नहीं बन पाती और बाहरी अनुभव की जरुरत धीरे धीरे होने लगती है। चूँकि हम मानव जीवन के सन्दर्भ में अनुभव को तलाश रहे है, तो लाजमी है, हम अपने जीवन के अंदर ही इसकी भूमिका को परखे। समझ के बात इतनी ही है, जो पहला जीवन सूत्र है वो है, अपने जीवन के अस्तित्व को सुरक्षित बनाये रखना।

अनुभव का सम्बंध आत्मा और मन से जुड़ा होता है, अतः ये हमारी जीवन रेखा को संचालित करता है। अनुभव प्राप्त करने के लिए हमारे पास वैसे आज बहुत साधन है, जो हमें हमारे अर्थपूर्ण जीवन को कामनामय बनाता है। परन्तु सुख, शान्ति से युक्त जीवन जीने के लिए तथा हमारी असफलताओं को सफलता में परिणित करने के लिए जो ज्ञान हमें चाहिए, वो हम बड़े बुजर्गो, माता-पिता, रिश्तेदारों, शिक्षक, आध्यात्मक धर्म गुरुओं, अच्छी पुस्तकों तथा आसपास के वातावरण की ऊर्जाओं से ज्यादातर प्राप्त होता है। हमें कदापि नहीं भूलना चाहिए, डिग्रियों से मिला ज्ञान हमारी सक्षमता को सर्व श्रेष्ठ बना सकता है, पर शिष्ट नहीं, जो हमें स्वस्थ और मुस्कानभरा वातावरण दे सके। ध्यान रखना होगा प्राप्त धन दैनिक जीवन के साधन जुगाल कर सकता है, पर दैनिक आत्मिक शान्ति नहीं। यह चर्चा तभी सफल हो सकती है, जब हम तकनीकी शिक्षाओं को अंहकार से दूर रखकर अपने से ज्यादा जीवन अनुभवी व्यक्तित्व की तलाश करे और अपने अनुभव को ज्ञान के रूप में बदलने की सोच रखे।

भ्रमित अर्जुन अगर सारथी बने श्रीकृष्ण के अनुभव को ज्ञान के रुप स्वीकार नहीं करता तो महाभारत का उज्ज्वल पक्ष शायद कभी भी हमारे सामने नहीं आ पाता और हम अमृतमय “गीता” ज्ञान से वंचित हो जाते। क्यों नहीं हम अर्जुन बन हमारे जीवन सारथि माता पिता और गुरुओं के अनुभव से ज्ञान लेकर जीवन के महाभारत में विजयी बने।

श्रीकृष्ण प्रदत्त गीता का ज्ञान युगों युगों तक मानव को प्रेरणा देता रहेगा, जिनके पास अनुभव की कमी है, ज्ञान किसी से लेना संकोच कारी लगता है, उन्हें गीता सार समझने की कोशिश करनी चाहिए। सच यहीं है, जहां ध्यान, वही ज्ञान। चलिए, सुखी, सफल जीवन के लिए गीता के कुछ तत्व पर नजर डालते है। ध्यान रहे, पूर्ण गीता ज्ञान प्राप्त करना लेखक जैसे साधारण आदमी के लिए असंभव है।

1. बिना किसी उचित कारण, सन्देह मत करो
2. क्रोध मनुष्य का दुश्मन है
3. मन की लगाम अपने हाथों में रखो
4. उठो और मंजिल की तरफ बढ़ो
5. अपने विश्वास को अटल बनाओं
6. वासना, क्रोध और अति लालच से दूर रहों
7. हर एक पल कुछ सिखाता है
8. अभ्यास आपको सफलता दिलाएगा
9. सम्मान के साथ जियो
10. खुद पर विश्वास रखो
11. कमजोर मत बनना
12. मृत्यु सत्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता
13. कुछ भी ऐसा मत करो जिससे खुद को तकलीफ हो
14. मेरे लिए सब एक समान हैं
15. बुद्धिमान बनो
16. सदा कर्म शील रहो
17. डर छोड़ लक्ष्य की तरफ बढ़ो
18. सहारे की तलाश नहीं, सहारा देने लायक बनो

अनुभव की सुंदरता निरन्तरता है, जीवन की सुन्दरता सक्षमता है, दोनों की सुंदरता से प्रभावित होकर जो कर्म हम करते है, उसका परिणाम ही सफलता या असफलता तय करता है, प्रसिद्ध बास्केट बाल खिलाड़ी Tim Duncan ने अनुभव के प्रसंग में कहा, ” Good, better, best. Never let it rest. Until your good is better and your better is best.”……शुभकामनाएं …लेखक कमल भंसाली…

“आशीर्वाद ” अमृतमय ऊर्जा प्रदाता■■■कमल भंसाली■■■

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“आशीर्वाद” एक ऐसा अमृतमय शब्द है, जिसकी चाहत हर कोई इंसान अपने जीवन की शुभता के लिए करता है। इस शब्द की सबसे प्रमुख विशेषता है, कि ये किसी भी मानवीय सीमा रेखा से बंधा नहीं रहता। इस शब्द को मानो कोई अमृतमय वरदान मिला है, इसका विरोध कोई भी जाति, धर्म, परिवेश, क्षेत्र, समाज और भूमिमण्डल का कोई देश नहीं करता है। ऐसा क्या है, आशीर्वाद में और क्यों इसे हम इसे जीवन पूरक तत्व के अंतर्गत लेते है, जरा इसका अध्ययन करने की कोशिश करते है। इसकी सम्पूर्ण विवेचना करना किसी के भी वश की बात नहीं है, अगर आपके पास इस लेख के अलावा भी कोई जानकारी है, तो उसे इसमे सम्मलित समझ कर ही इसे पढ़ने की चेष्टा करे।

आशीर्वाद शब्द की अगर हम सबसे पहले विवेचना करे, तो शायद हमारी सही शुरुआत हो, इसलिए हम यहीं से प्रारम्भ करते है। आशीर्वाद यानी आशीष या असीस, ये तो हुआ इसका शाब्दिक अर्थ, परन्तु ये उन शुभ विचारा से जुड़ा है, जिनसे हम दूसरों से कुछ आत्मिक प्रोहत्सान लेते है, या किसी को देते है। इसकी विवेचना भी हम जरुर करेंगे, पर धीरे धीरे। सबसे पहले हमें ये जानकार आश्चर्य हो सकता है, कि ” आशीर्वाद” एक अकेला शब्द है, इसके समकक्ष कई और शब्द हो सकते है। परन्तु यह जान कर जरा हैरानी हो सकती है कि इसका कोई पर्यायवाची और विलोम शब्द नहीं होता है। अतः इसकी शुभता पर हमारी कभी कोई शंका नहीं होनी चाहिये। चूँकि इस शब्द की पवित्रता पर कोई सवाल नहीं है, अतः आशीर्वाद हर देश में प्रयोग दैनिक जीवन में कई बार किया जाता है। हालांकि हमारा मोह अंग्रेजी भाषा से, अपनी धरोहर भाषा से ज्यादा है, परन्तु “आशीर्वाद ” हम ज्यादातर अपनी ही भाषा में देते है।

आशीर्वाद की कई विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है, कि यह सिर्फ हमें उम्र से बड़ों से मिलता है, सिर्फ गुरु ही एक इसका अपवाद है, जो हमसे ज्ञान में बड़े होते है, इसे हम उनसे भी ले सकते है,। आशीर्वाद है, ही ऐसा है, जिसकी शुद्धता पर हम कोई प्रश्न नहीं कर सकते। आशीर्वाद सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है, इसमे देनेवाले की आत्मा की पवित्र ऊर्जा भी होती है, जो लेनेवाले के भाग्य के नवनिर्माण में सहयोग करती है। आशीर्वाद का भारतीय संस्कृति में सबसे उच्च स्थान हासिल है, इसलिये जन्म से ही बच्चे को आशीर्वाद देना शुरु हो जाता है और बचपन से उसे प्रणाम करने की आदत डाली जाती है, जिससे उसे आशीर्वाद मिलता रहे और उसका जीवनपथ आसान हो जाए। हमारे यहां बड़े बुजर्गो और गुरु के आशीर्वाद का बहुत महत्व है। भगवान को हम सब किसी ने किसी रुप में अपना जीवन ईष्ट मानते है, और उनके आशीर्वाद के लिए लम्बी लाईनो में खड़े होते है। परन्तु हमारी संस्कृति में गुरु महिमा को अम्परम्पार माना गया है, क्योंकि वो ही उस तक के वापसी सफर का सही रास्ता दिखाने की कोशिश करते है,अतः गुरु का दर्जा काफी उच्चस्थान पर है। हकीकत में सही भी लगता है, क्योंकि बिन गुरु ज्ञान पाना आसान नहीं होता और बिना ज्ञान का जीवन, “जीवन” नहीं कहलाता। इस सन्दर्भ में महान संत कबीरदास का जिक्र करना सही होगा, उन्होंने कहा ” गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पॉय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय”। पर क्या आज के युग में गुरु के प्रति इस दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है ? यह एक चिंतन की बात है, जिसका जबाब आज के आर्थिक युग में तलाशना व्यर्थ होगा। आज हमलोगों को ज्ञान की नहीं जीवन तकनीक की जरुरत ज्यादा है, और तकनीक खरीदी जाती है। अतः जिसकी कीमत तय हो, वो कीमती जरुर कहला सकती है, पर वह विशिष्ट नहीं हो सकती, यह भी तय है। विशिष्ट बिना “श्रद्धा” का पैदा होना, वो भी आत्मा में, कठिन काम है।

आशीर्वाद को अंग्रेजी में BENEDICTION कहते है, इसे इंग्लिश में और भी कई शब्दों में लोग व्यक्त करते है, उसमे bless (noun), Wish ( Verb), Valedictory (Adjective) परन्तु ये सहयोगी शब्द है, पर्याय नहीं। हिंदी में आशीर्वाद का संक्षिप्त अर्थ किसी की मंगलकामनाओं के लिये बडों की ओर से कहे हुए शुभ वचन समझना ही सही होगा। चूँकि हमारा लक्ष्य इसके महत्व को जानना ज्यादा है, और आशीर्वाद का अर्थ हमारे दिमाग में बचपन से सही समाया हुआ है। हम अब जरा आगे बढ़ने की सोचते है।

हमारे जीवन को जो सबसे पहला आशीर्वाद मिलता है, “वो” ही देता है, जिसने इस धरा के लिए हमें निर्माण कर भेजा है। हमें भी उसका तहदिल से शुक्रगुजार होना चाहिए, और उसकी पवित्रता का आभास करने के लिए रोज उसका नमन करना चाहिए। माँ ही वो देवी है, जो हमें पनपने के लिए नौ महीने अपनी देह में जगह ही नहीं प्यार भरा आशीर्वाद, “स्वयं” बिन मांगे देती रहती और सभी से हमारे कोख में सलामती, और सही जन्म के लिए दूसरों से आशीर्वाद लेती। जिस घर में प्रेम का आँगन होता है, वहा परिवार का हर सदस्य जैसे दादा, दादी, बड़े बुजर्ग सदस्य हमें जन्मते ही आशीर्वाद देना शुरु कर देते है, हकीकत यहीं है, इस प्यार से ही हमारी जीवन समझ शुरु होती है। ध्यान देने की बात है, जन्म तक हमे कितने बिन मांगे आशीर्वाद हमे मिलते है, पता नही हम बड़े होकर उनका मूल्य क्यों नही समझ पाते। पिता और गुरु का आशीर्वाद सहजता से प्राप्त होना थोड़ा मुश्किल होता है, क्योंकि ये जीवन संस्थापक की भूमिका करते है, और इनसे कटु अनुभव प्राप्त होते है,,जो जीवन को आगे सहज और सरल करने में श्रेष्ठ होते है। इनके प्रति अगर आस्था हमारी नहीं हो तो निश्चित है, यह व्यवहारिक आशीर्वाद दे देंगे, परन्तु आत्मिक नहीं और उसके बिना सही ज्ञान मिलना मुश्किल काम है। इन दोनों रिश्तों को चाहिए, नम्रता और आज्ञा पालन और दोनों जरुरी है, सही, सुंदर और समृद्धिमय जीवन के लिए। जिनको आशीर्वाद की कीमत में आस्था नहीं होती उनके लिए यह सम्बन्ध कमजोर होते है, और उनको कोई विशेष उन्नतमय जीवन हासिल भी नहीं होता, यह तथ्य है, स्वीकार या अस्वीकार की इसमे कोई भूमिका नहीं है।

आशीर्वाद एक ऊर्जा है, इसका संचालित अनुभव हमारी आत्मा करती है। तथ्य यही कहते है, अगर हमारी आस्था इससे जुडी होती है, तो सुखद परिणामों की प्रतीक्षा ज्यादा दिन नहीं करनी पड़ती। किसी विशेष प्रयोजन या उद्धेश्य के लिए चाहा गया आशीर्वाद प्रयास में मृदुलता जरुर करता है, हालांकि परिणाम तो वक्त की मेहरवानी और अपनी सक्षमता पर निर्भर होता है। आशीर्वाद को कभी भी प्राप्त वरदान नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये मनुष्य की क्षमता के बाहर है। फिर भी , राजा महाराजा क्या देवताओं तक इसकी महिमा है। आशीर्वाद के परिणाम गौण जरुर रहते है, पर शुभता में इसका होना तय है। नम्रता से अगर दुश्मन से भी आशीर्वाद लिया जाय तो वो भी इंकार नहीं करते। इसका उदाहरण महाभारत के उस प्रकरण में हमें नजर आ सकता है, जब अर्जुन भीष्म पिता से आशीर्वाद उसी युद्ध की विजय के लिए मांगते है, जिसमे वो अर्जुन के विरुद्ध युद्ध करनेवाली सेना के सेनापति थे। परन्तु आज हम यह नहीं कह सकते कि ऐसी परिस्थितयों में ऐसा आशीर्वाद मिलेगा, इसका एक ही कारण है, हमारे जीवन से नैतिकता का गायब हो जाना।

आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए हमें नम्र बनकर प्रणाम और प्रार्थना दोनों की जरुरत होती है। जब हम अपने इष्ट से आशीर्वाद लेना हो तो आत्मा की पवित्रता जरुरी होती है, उसी पवित्रता से हमको प्रार्थना और प्रणाम के स्वरुप जो आशीर्वाद मिलेगा, वो हमें सकारत्मक बनाकर किसी भी क्षेत्र की सफलता की तरफ निश्चिंत आयाम जरुर प्रदान कर देगा। बड़ों से आशीर्वाद पाने के लिए हमेंअभिमान को दरकिनार करना होगा,और सम्मान सहित उनके चरणों को छूना होगा। कई वार हमारे हाथ उनके चरणों तक नहीं पहुंचते आधी दूर ही रहते, किसी भी कारण से, तब शायद इससे वो परिणाम नहीं प्राप्त हो सकते, जिनका पाना हमारा लक्ष्य था।

अंततः यह जानना भी उचित ही होगा, कि शुभकामना, मंगलकामना, भी जीवन उपयोगी है, अगर किसी की आत्मा की गहराई से आती हो पर ऐसा होना हर समय संभव नहीं होता क्यों कि ज्यादातर हम इनका व्यवहारिक प्रयोग ही करते है। मजबूरी है, मिलती है, तो कह देते है, अर्थ की दुनिया में आखिर दिखावटी सम्बंध भी तो कोई चीज है।…….कमल भंसाली

मूल्यांकन स्वयं का…सम्बंधों के सन्दर्भ में…भाग 1 ★★कमल भंसाली ★★

स्वयं को चिन्हित कर, स्वयं का मूल्यांकन करने वाले विरले ही महापुरुष होते है। दूसरों के व्यक्तित्व और उनके कार्य पर नजर रखने वाले सब जगह नजर आते है, हो सकता है, हम भी उनमें से एक हो ? अगर ऐसा है, तो निश्चित है, हम एक कमजोर व्यक्तित्व के मालिक है। हमारा जीवन बिना किसी सार और उद्धेश के चल रहा है। क्यों नहीं हम आज विचार करे, हम अपने व्यक्तित्व को सही और शुद्ध कसौटी पर परखे। समय रहते, अगर हम अपनी कमियों को समझले, और उन्हें दूर करने की चेष्टा करे, तो हो सकता हम अपने जीवन को एक सही पहचान दे सके।

हमें मानने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, कि हम इस धरती के साधारण से इंसान है, और हर आती जाती सांस के मोहताज है। परन्तु जब जीवन मिला है, तो कोई उद्धेश्य इसमे भेजने वाले का जरुर है, नहीं तो हमें वो और किसी दूसरे रूप में भी भेज सकता था। इंसानी जीवन मिलना कोई साधारण बात तो है, नही, यह हमारा प्रथम चिंतन हमें प्रेरित करता है, कि हम अपना स्वयं मूल्यांकन समय समय पर करते रहे, पर हम करते नहीं, क्योंकि हम अपने को इसका दावेदार नहीं समझते। इस भूल का सुधार हम जितना जल्दी करेंगे, उतना जल्दी ही हमारा जीवन आत्मिक आनन्द प्राप्त करना शुरु कर देगा। किसी एक क्षेत्र की सीमित सफलता चाहे हमें महान न बनाये, पर गरुर और अभिमान कि परत हमारे व्यवहार पर लगा देती है। इस से बचने वाला इंसान बहुत दूर तक की यात्रा सहजता से करता है। अभिमान जिस मानवीय व्यवहार को प्रभावित करता है, उन्हें हम सम्बंध या रिश्ते भी कहते है। आज हम इसी बाबत कुछ चिंतनमयी चर्चा संक्षिप्त में करे, तो क्या हर्ज है ?

हर जीवन यात्रा, माता के गर्भ से शुरु होती है, हर प्राणी की, पिछले जन्मों का लेखा जोखा का भी उसमे असर होता होगा। परन्तु, बिना प्रमाण उस पर बहस करने से अच्छा है, हम इस जन्म को सार्थकता प्रदान करे, और जीवन उद्धेश्य को समझने की कोशिश करते रहे। कहते है, प्रथम कदम से ही इंसान को समझ मिलनी शुरु हो जाती है। उसेअपनी शारीरिक पूर्णता और क्षमता का अहसास हो जाता है, वो अपनी भूख की पहली ललक से समझ जाता है, उसे इतने दिन कहां आश्रय मिला था, और दुनिया के प्रथम, स्नेहशील, विशुद्ध प्रेम का अनुभव, वो माँ के आँचल के अंदर पाकर, इस जीवन के प्रति आशस्वत हो जाता है, और वो अपनी दैहिक और कुछ हद तक मानसिक प्रगति की तरफ अग्रसर होने लगता है। माँ के स्नेह भर प्यार का अहसास के बाद उसे जो पूर्ण सुरक्षा का अनुभव होता है, वो होती है, पिता की बांहे, जहां उसे दैनिक अनुभव से अहसास हो जाता कि माँ और पिता के अनुबन्ध का वो एक उपहार है, जिसमें वो अपना भविष्य अवलोकन करता है, और उसे अपनी प्रगति और सुरक्षा के आश्वासन का अहसास हो जाता है l चूँकि उसे संसार में अपनी भूमिका को स्वयं ही ढूंढना है, वो उसकी तलाश में समझदार होकर अपने जीवन की मकसद यात्रा शुरु कर देता है, धीरे धीरे प्रकृति उसकी सारी प्रारम्भिक बाहरी सुरक्षा सुविधा वापस लेनी शुरु कर देती है। यहीं से वो अपने संस्कार, ज्ञान, बुद्धि, विवेक से अपनी स्वयं की जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देता है। जैसे कोई भी यात्रा में असुरक्षा का खतरा रहता है, वैसे सही जीवन यात्रा भी काफी कठिन होती है, खतरों से भरपूर होती है। इसे सुलभ और सुखद बनाने में एक रक्षा कवच की तरह काम करता है ” सम्बंध “।

सम्बंध की परिभाषा जीवन के हिसाब से इतनी ही बनती है, जब हम विपरीत परिस्थितयों में गिरने लगते है, तो सहीं सम्बन्ध दीवार बन गिरने नहीं देता। बाकी सम्बन्ध या तो रिश्ते होते है, या व्यवहारिक कार्य क्षेत्र से बनते है, कुछ सम्बंध शरीर के लिए कुछ आत्मा के लिए, कुछ दिल के होते है। हर सम्बंध का अपना क्षेत्र होता है, उसी के अनुरुप ही हमारे जीवन की उनकी जरुरत होती है। सारे सम्बंधों की कड़ी आपसी व्यवहार से जुड़ी होती है, सम्बंध का बनना और बिगड़ना इसी पर निर्भर करता है। सम्बंध का स्वास्थ्य भावना और वाणी पर ज्यादा निर्भर करता है। हमें सम्पन्न और स्वस्थ जीवन के लिए सम्बंधों की भूमिका पर सदा ही गौर करना चाहिए। सम्बंधों की मजबूरी भी होती है, प्रेम के धागे के दो क्षोर होते है, प्रेम पर जब जरा सा आघात दोनों में से कोई भी करता है, तो सम्बंधों की डोर कमजोर होती है। ये तो, हम सभी जानते है, संवेदनशील कई धागों से कोई डोरी या डोर बनती है। इन धागों की विश्वस्ता पर ही उसकी मजबूती निर्भर करती है। इसलिए हर सम्बन्ध का जीवन के सन्दर्भ में समय समय पर मूल्यांकन जरुरी होता है। हर सम्बंध की आस्था को टटोल कर ही कोई नजदीकी सम्बंध बनाना चाहिए। सावधानी बरतना भी उतना ही जरुरी है, जितना सम्बंधों को मधुरता देना। एक गलत सम्बंध जीवन को भी खतरा दे सकता है। सब मिठास भरे सम्बंध असली नहीं होते, समय समय पर कसौटी पर कसने से ऐसा अनुभव भी किया जा सकता है। कुछ सम्बंध कडुवे भी कभी लगते है, जैसे पिता, गुरु या सही दोस्त या शुभचिंतक का, उन पर हमें विश्वास करने का कारण ढूंढना चाहिए क्योंकि किसी समझदार ने कहीं लिखा है, ” रिश्तों की बगियां में एक रिश्ता, नीम के पेड़ जैसा भी रखना, जो सीख भले ही कड़वी देता हो पर तकलीफ में मरहम भी बनाता है”।

सम्बंधों का मनोविज्ञान जाने बिना सम्बंधों की सही विवेचना करना मुश्किल होता है, आइये संक्षिप्त में उसको भी जानने की कोशिश कर लेते है। हर वो रिश्ता खरा है, जो विपरीत स्थिति में हमारा साथ बिना किसी शर्त के निभाता है, ऐसे रिश्ते का अहसान और गरिमा को कभी भी खण्डित नहीं करने की सोच ही, सही सोच है। समय कठिन दौर में चल रहा हो, रास्ता नहीं दिख रहा, सत्य के साथ ऐसे सम्बंधों से राय लेने में कोई हर्ज नहीं है, और अगर वो सहयोग कर रहे है, तो उस सहयोग का सही उपयोग करना चाहिए, स्थिति सही हो जाये तो तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हुए, उन्हें उनका सहयोग वापस कर देना उचित होगा। कहना न होगा, आज के आर्थिक युग में अर्थ की कमी के सन्दर्भ में ही उपरोक्त कथ्य सही है।

सम्बंध शब्द सम और बन्ध दोनों का संयुक्त उद्बोधन है, जिसका मतलब ही होता है, समान सम्बंध इसी दृष्टि से हर सम्बंध को निभाया जाना चाहिए, गरिमा अनुसार। अर्थ की कसौटी पर किसी भी सम्बंध या रिश्ते को परखा जाता है, तो उसमे प्रेम की मात्रा ढूंढने का साहस कम ही लोगों में होता है, और निश्चित है, उनके पास भरपूर ज्ञान है, क्योंकि वो जानते है, अर्थ का वक्त कभी भी बदल सकता है।

हालांकि रिश्तों की तासीर में नजदीकी ही मुख्य है, परन्तु कुछ दुरी का पर्याय होना भी आवश्यक है। सत्य को पूर्ण नंगा देखना मुश्किल काम होता है, क्योंकि आँखे सहन नहीं कर सकती। कुछ आवरण हर सम्बंध की जरुरत है, अतः गरिमानुसार ही व्यवहार ही उचित होता है, इसमें वाणी और शब्द ही सम्बंधों की इज्जत अपने रुत्बों के अनुसार तय करते है, अतः सबंधों को अमृतमय बनाने है, तो अभिमान को दूर रखकर उचित भाषा का प्रयोग श्रेयस्कर होता है। …..क्रमश…..कमल भंसाली