दुनिया “औ” दुनिया…..कमल भंसाली

दुनिया, “औ” दुनिया
रंगो छंदो से सजी दुल्हन बन रहती
कभी अपनों जैसी बातें करती
कभी गैरों की तरह मुस्कराती
किस रंग में क्या है, तेरा
आ, पास बैठ, जरा
कौन सा,. रंग मेरे लिए
बता,जरा….

किसी के लिए करती,श्रृंगार
क्यों करवाती,अति मनुहार
इतनी चाहत भरी पलकों में
किसका कर रही,. इंतजार ?
कौन सी चाहत में, कैसा प्यार
आ, पास बैठ, जरा
कैसा प्यार, मेरे लिए
बता, जरा…

चंचल चाल तेरी
मदहोश तमन्नाओं पर निसार
कैसा है,तेरा भावनाओं का व्यापार
बिनार्थ कुछ नही है, म्यसर
गुनाह की इमारतों पर ही
लिखती, तुम बेमिसाल मुकद्दर
ये कैसा है, तेरा नासमझ व्यवहार
आ, पास, बैठ, जरा
कौन सा, नसीब लिखा,मेरे लिए
बता, जरा …….

न तू अनुचरी, न ही सहचरी
अर्थ की तूं है, अर्द्धांगिनी
लफ्जो के परिधान से सजी संवरी
लगती आडंम्बरों की रानी
अब “असत्य” ही तेरा उत्तराधिकारी
संशय से भरा जीवन लगता भारी
आ, पास, बैठ, जरा
क्या सुखद भविष्य है, तेरे यहां, मेरा
दुनिया,”औ” दुनिया,
बता जरा…

कमल भंसाली