“क्रोध”….एक चिंतन…कमल भंसाली

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हकीकत में, क्रोध हमारी दैनिक मजबूरी है, किसी न किसी बात पर हम क्रोधित होते रहते है, गुस्सा करते रहते है । यह जानते हुए भी कि यह शांति के विरुद्ध की क्रिया है, आ जाता है, तो इसका नियमन और संयमन करना काफी कठिन है ।आइये, जानने कि कोशिश करते है, क्यों क्रोध के आगे मजबूर हो जाते है ?, हालांकि स्वयं को नुकसान करने वाली यह क्रिया नुकसान ही ज्यादा करती है।

किसी ज्ञानी आदमी से जब किसी ने यह सवाल किया कि इंसान का सबसे बड़ी दुश्मनी कौन निभाता है,? तो महापुरुष ने जबाब दिया, ” क्रोध या गुस्सा उसका सबसे बड़ा शत्रु है, जिसे बिना नुकसान के नियंत्रण करना बहुत कठिन होता है।” महापुरुष ने सही जबाब दिया। आज के सामजिक परिवेश पर गौर करने से लगता है, देश, प्रदेश, समाज, धार्मिक पंथ और परिवार इस अवगुण के शिकार हो चुके है। क्रोध में ज्यादा अंश ज्वल शीलता का होने के कारण असहनीय होता है, और क्रोध करने वाला इसका स्वयं ही शिकार होता है, इससे उसके शारीरिक अंगों पर विपरीत और नुकसानदेह प्रभाव तो पड़ते ही है, साथ में मन और आत्मा भी नकारत्मक्ता से प्रभावित होती है। क्रोध की स्थिति में विवेक दिमाग से बाहर भाग जाता है, और अनिष्टता को तांडव मचाने की स्वतन्त्रता मिल जाती है। आइये, जानते है, क्रोध में शरीर की क्या स्थिति हो सकती है। शरीर विशेषज्ञो केअनुसार सबसे पहला असर इसका दिमाग के साथ ह्रदय के सम्पर्क पर पड़ता है, और इंसान के रक्त प्रवाह में अनियमिता शुरु हो जाती है, इससे दिल पर पड़नेवाला प्रभाव कभी कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है। निश्चित है, क्रोध रक्त प्रवाह को धमनियों में असहजता प्रदान करता है, और इस असहजता से हर मानव अंग घबराता है। हालांकि चिकित्सक कहते है, क्रोध एक स्वभाविक प्रक्रिया है, गलत लगने वाले किसी आचरण पर इसका आना सहज है, परन्तु सीमा रेखा के अतर्गत रहे, तो जीवन की सक्षमता को भी दर्शाता है।साफ़ हो जाता है, क्रोध को सिर्फ अवगुण की श्रेणी में हम नहीं रख सकते, जब तक इसका दायरा असहनीय न हों।अति क्रोध का दूसरा प्रभाव सम्बंधों और आपसी रिश्तों पर पड़ता है, कहना न होगा, इनसे रिश्तें टूटते है, और उनका वापस वास्तविक स्तर पर आना मुश्किल होता है। यहां संयम से गुस्सा या क्रोध को रोकना ही उचित होता है। चूँकि, क्रोध की विभिन्न किस्म होती है, तदानुसार उसका रुप भी अलग अलग नाम से जाना जाता है। गुस्सा, द्वेष, बदला, आघात, आक्रमण, ईष्या, रौद्र, भयंकर, आदि स्वरुप क्रोध परिवार के सदस्य है।

चूँकि क्रोध काफी हद तक भावनाओं से सम्बन्ध रखता है, खासकर जिनमें तनाव होता है, तो आदमी सिर्फ उसके एक ही पहलू पर गौर करता है, उसे लगता है, उसका इस परिस्थिति में क्रोध करना जायज था, चाहे उसका चिंतन सही न हों। क्रोध का बचपन गुस्सा है, जो किसी भी तरह की विपरीत स्थिति से पैदा होता है। गुस्सा जब तक जायज रहता है, तब तक एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह बाहर शांत रहता है, पर भीतर ही भीतर उसमें विद्रोह की ललक रहती है। इसलिए गुस्से को नियंत्रण की बात हर ज्ञानी आदमी करता है। कहते है, वो आदमी देवता होता है, जिसे क्रोध नहीं आता, परन्तु इसको सत्य नहीं कह सकतें, क्योंकि देवताओं की कहानियों में ऐसे बहुत उदाहरण है, जिसमे देवता भी कुपित होते है, परन्तु ज्यादातर उनका क्रोध अन्याय से सम्बंधित होने के कारण, उनके क्रोध को न्यायोचित बताया गया है।

आखिर, क्रोध आता ही क्यों है ? मानते है, क्रोध जीवन का हिस्सा है, हमारा यह संसार क्रोध के कई कारणों को एक के कार्य से दूसरों को एक कारण क्रोध का दे देता, जब उसमे किसी की भावनाओं को ठेस पंहुचती है। हम अपने जन्म के बाद कई ऐसे दृश्य देखते जिनमे क्रोध, गुस्सा या उसके समकक्ष कोई तत्व हमें आहत करता है, वो जब हमारे चेहरे पर नापसंदगी का भाव दिखाता है, और गुस्से की प्रक्रिया से हम वाकिफ हो जाते है। फ़्रांस के मनोवैज्ञानिक जैक्स लुकान के अनुसार “क्रोध एक मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध है, किसी भी तरह के हमले का अहसास होने पर स्वत: ही हमारी शारीरक प्रणाली उसके लिए तैयार हो जाती है, सक्षमता से मुकाबला करने के लिए”। वो आगे यह भी मानते है, कि यह कमजोरी को छुपाने का मानव ब्रह्मशस्त्र है। हमें. क्रोध जब आता है, जब हम आहत होते दिल से, पर क्रोध और आहत में एक दुरी है, इस दुरी में ही अगर हम संयमित हो जाते है, तो क्रोध को आने से रोका जा सकता है।

क्रोध को कभी भी प्रमाणिक नहीं माना जा सकता, न ही उसे शीघ्र अनुशासित किया जा सकता, क्योंकि यह सदा विवेक के विरुद्ध काम करता है। क्रोध का कारण कुछ भी हो सकता है, झूठ, अन्याय,फरेब, हिंसा, ईष्या, द्वेष, जलन, व्यवस्था, सम्बन्ध या और कोई के प्रति असन्तोष, क्रोध और गुस्सा का कारण हो सकता है। मान लीजिये, कभी हमें कोई काम के लिए, कहीं अति शीघ्र पहुंचना है, और रास्ता किसी कारणवश जाम है, तो अनायस ही हमें ट्रैफिक व्यवस्था पर गुस्सा आने लगता है, यहीं से क्रोध की प्रारम्भिक अवस्था शुरु हो सकती है, अगर जाम किसी कारण काफी देर तक नहीं हटे। प्रारम्भिक अवस्था में क्रोध को सन्तुलित किया जा सकता है। अगर इसे यहां सन्तुलन नहीं करते, तो पता नहीं आगे जाकर यह कहां बिना बरसने वाले बादल की तरह फटेगा, और इसका शिकार वो भी हो सकता है, जिस का कोई दोष नहीं।

क्रोध मानव स्वभाव की एक स्वभाविक क्रिया है, इससे बचने से किसी भी नई समस्या का आगमन रुकता है। अतः जब हम कभी आहत होते है, तो दिल हि दिल में यह स्वीकार कर लेना चाहियें कि हाँ, यहां “मैं आहत हो रहा हूं, पर मुझे धैर्य रखना हैं”। यह चिंतन, गुस्सा कम करने में काम कर सकता है। सारांश यही है, क्रोध, गुस्सा या इसका कोई भी रुप किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, ये किसी भी नगण्य कारण को विध्वंसक बना सकता है। जायज या नाजायज का क्रोध से कोई तालुकात नहीं, अनिष्ट्टता को जन्म देते, इसे देरी नहीं लगती। किसी भी सम्बन्ध और रिश्ते के लिए यह परमाणु बम से कम नहीं है। परन्तु इसका यह भी मतलब नहीं कोई हमेंआघात दे रहा है, हमारे दिल को ठेस पंहुचा रहा है, हम उसे सहन करते रहें, तो हम एक कमजोर व्यक्तित्त्व वाले इंसान कह लाये जा सकते है। संयम, धैर्य और मजबूत चिंतन से हम उसका प्रतिरोध कर सकते है। कहते है, इंसान की आँखों में उसके ठोस इरादों की झलक रहती है, और सामनेवाले के लिए यह समझने की समझ, कि उसके सामने कौन है ? अतः बहादुरी रखे, अनायास क्रोध को धैर्य से वापस भेज दे। इससे हम पूर्ण सुखी न हो, पर हमारी शारीरिक क्षमता को आघात नहीं पँहुचेगा, यह तय है।

चलते चलते…आइये पढ़ते है, क्रोध पर कुछ महापुरुष क्या कहते है…

” क्रोध वह तेज़ाब है, जो किसी भी चीज पर, जिस पर वह डाला जाये, से ज्यादा उस पात्र को अधिक हानि पंहुचा सकता है, जिसमे वह रखा है” ****मार्क ट्वेन
” क्रोध वो हवा है, जो बुद्धि का दीप बुझा देती है” **** रॉबर्ट ग्रीन इन्गे सोर्ल

” क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है, इससे आप ही जलते है” ***** भगवान गौतम बुद्ध

” हर एक मिनट जिसमे आप क्रोधित रहते है, आप 60 सेकेण्ड की मन की शांति खोते है” ***** रॉल्फ वाल्डो इमर्सन

इसके अलावा दोस्तों, भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 2 श्लोक 63 में क्रोध पर कहा है…

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।। 2-63 ॥

( क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मानव अपनी स्थिति से गिर जाता है।)

सन्त कबीर दास जी ने क्रोध पर सही चिंतन धारा दी, उस पर एक नजर डालते है ।

जहाँ दया वहां धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध वहाँ काल है, जहाँ क्षमा वहाँ आप ।।

आज के आधुनिक युग में अति क्रोध आर्थिक नुकसान भी करता है, इसके कई उदाहरण हमारे सामने आते है, जब मान सम्मान के मुकदमों के निर्णय हम तक पहुंचते है।

चिंतन यही है, गुस्सा आने से पहले हम चिंतन करे ” क्या अति गुस्सा जायज है” ?…….कमल भंसाली

नकारत्मकता से सकारत्मक्ता का सफर.एक दृष्टिकोण ..बेहतर जीवन शैली भाग ११ अंश २

सच ही कहा है, किसी ने नजरअंदाज कर देने से कोई भी अदृश्य नहीं होता, यह रवैया जिंदगी के कर्म क्षेत्र में शायद ही हमें कोई सफलता का सूत्र दे , अपितु हमारा एक कदम असफलता की तरफ मोड़ सकता है। नकारत्मक्ता जिंदगी की से पैदा हुई समस्याओं का कोई भी उपचार सरल नहीं होता, सामने कोई कठिन समस्या हमें आती दिख रही हो, और हम उस पर गौर नहीं करे, यह हमारी सकारत्मक सोच तो नहीं कह जा सकती। बेहतर जीवन शैली एक यात्रा ही है
नकारत्मकता से सकारत्मक्ता की, क्यों नहीं आज हम इसी यात्रा सम्बंधित चर्चा करे।

भगवान बुद्ध ने कहा जिसने मरण को समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया। उन्होंने जिस भी सन्दर्भ में कहा हो,
पर इसमे एक संकेत है, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते, यही की हर प्रारंभ्भ का अंत जरुर है। हमारी दैनिक दिनचर्या की जब हम शुरुआत करते है, तो कई कार्यों में कुछ अनसुलझी समस्याएं भी रहती है। हमें उन समस्याओं का समाधान अगर करना है, तो उनका सही विश्लेषण ही कारगर उपाय सूझा सकता है। अगर हम सही परिणाम के विरुद्ध जाते है तो शक्ति क्षय ही होना है। ऐसी समस्याओं में उनके विपरीत परिणाम को मानने से क्षति भी सीमित होगी। एक बात यहां स्पष्ट करनी जरुरी है, कि जहां सही सिद्धान्तों की रक्षा करनी जरुरी हों, वहा संघर्ष जारी रखना उचित होगा। हमारा देश आज भी नैतिकता के मामले में कमजोर हो रहा है, जबकि शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा है। धर्म, कर्म के महत्व पूर्ण ज्ञान की यहां नदियां बहती है, परन्तु उसका सदुपयोग कम होता है। आडम्बरों से दूषित होने वाली ज्ञान गंगा को सब साफ़ रखने की हिदायत तो जरुर देते है, पर जरुरत पड़ने पर वहीं उसको मैली करने में संकोच नहीं करते है। इसे हम हमारी कमजोरी ही माने, यह ही सही होगा।

भगवान बुद्ध ने मरण को समझने की बात कहकर बहुत से दृष्टिकोणों की तरफ इशारा किया, मरण यानी मृत्यु या फिर मौत हम इसे किसी भी नाम से पुकारे, हकीकत यही है, कि यह जीवन रेखा का अंतिम किनारा है। यह रेखा सिर्फ प्राणियों के लिए ही नहीं, अपितु संसार की सभी संचालित पद्धतियों पर भी लागू होती है। दूसरे रुप में इसका स्वरुप बदल जाए, पर सीमा यह तय ही रखती है। हम किसी भी समस्या को ले ले, उसका भी अंत तो तय है, स्वरुप और परिणाम चाहे हमारे पक्ष में नहीं भी हो। वास्तिवकता यही कहती है, हम अगर यह समझ जाते है, तो कोई भी परिणाम हमे झकझोर नहीं सकता और शायद न ही जर्जर और कमजोर कर सकता।

कहते है, बहुत सारी मानवीय समस्याएं परिस्थितियों से नहीं मानव के व्यवहार से पैदा होती है, और उनका निदान प्राकृतिक गुणों से ही सही ढंग से किया जाता। यह भी हमें बताया गया कि ‘क्रोध’ और ‘असंयम’ दो ऐसे जीवाणु है, जो अगर जीवन में लग गए तो विनाश का प्रथम चरण शुरु कर देते है, प्रारम्भ में ही अगर इनका इलाज “प्रेम” से कर दिया जाय, तो कैंसर की तरह फैलने की कम संभावना रहती है। सवाल उठ सकता है, “प्रेम” ही क्यों ? इसका सबसे बड़ा कारण मनोवैज्ञानिकों ने बताया प्रेम में शीतलता और विश्वाश दोनों का समावेश रहता है, जो पीड़ित को सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है। किसी भी इलाज की पहली जरुरत है, कि हम अपने दिमाग को व्यवहार सिखाये, उसे सही के लिये सहमत होना जरूरी है। महान चिंतक अलफ्रेड नार्थ के अनुसार ” We cannot think first and act afterward”। अलेक्स. फ. ओसबोर्न ने अपनी पुस्तक “Applied Imagination” में किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए कुछ सुझाव दिए है, उस मे सबसे महत्व्पूर्ण पहला कदम किसी भी समस्या के समाधान की शुरुआत उसका सही विश्लेषण बताया। उनके अनुसार समस्या की कोई न उम्र होती है और न ही उसकी सीमारेखा। सही और सटीक एक कदम किसी भी समस्या का निदान करने की क्षमता रखता है। वहीं बुर्क बार्टन के अनुसार ” जो अपने में विश्वास नहीं करते, वो कोई भी समस्या को नहीं सुलझा सकते”।भारतीय चिंतकों की अगर बात करे तो वो ज्यादातर भगवान का सहारा लेने की बात करते है। परन्तु हकीकत के पन्ने यही कहते है, जिसने बिना फल की आशा किये, कर्म को महत्व दिया, वो अपनी कई समस्याओं का समाधान स्वतः ही पा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म का सही संदेश दिया है, यही काफी सही समाधान हमारी समस्याओं का कर सकता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्त्वकर्मणि ।।
(कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। कर्म को फल की इच्छा से कभी मत करो, तथा कर्म ना करने में भी कोई आशक्ति न हो।)

‘गीता’ ही नहीं प्रा:य सभी धर्मो के ग्रन्थों ने कर्म और परिश्रम को ही जीवन बदलने वाला शस्त्र माना है। परन्तु कर्म में जब तक आस्था का समावेश न हो, तो परिणाम अनचाहे ही मिलेंगे। जीवन सब दिन परिवर्तन के अनुरुप अपनी क्षमता का विकास तभी करता है, जब हम अपने जीवन को स्वच्छ और साफ़ रखे। सहनशीलता, धैर्य, प्रेम, धर्म, सच्चाई ये पांच तत्व है, जो जीवन को बेहतर जीवन शैली प्रदान करते है। दैनिक जीवन में आधुनिकीकरण से नकारत्मकता की जड़े काफी मजबूत हो गई, इसका कारण उपरोक्त पांच तत्वों का समावेश दैनिक जीवन में काफी कम हो गया। अब अनुसन्धान करने वाले भी मान रहे है कि कई विपदाये तो मनुष्य से ही निर्मित ही होती है। प्रकृति ने प्राणियों को सुख के साधन देने में कभी कोताही नहीं बरती पर मानव ने सदा उसका दुरुपयोग ज्यादा किया, निश्चिन्त है, कीमत तो चुकानी ही होगी। इसलिए हमारा सुधार होना जरुरी है, हमे अपनी आदते, चिंतन,कर्म का तरीका सभी को प्रकृति अनुकूल बनाना शुरु कर देना चाहिए।

नकारत्मक चिंतन अगर हमारे जीवन को धुंधला कर रहा है, हमें असमाजिक दृष्टि से देखा जाता है, और हम ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे और हमारा व्यक्तित्व दबा दबा रहता है। मनोविज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करने से कुछ दिशा निर्देश हमें मिल सकते है। कुछ संकेत उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है। उनसे हम अपने दृष्टिकोणों का समय समय पर मूल्यांकन करे, तो जीवन को सही राह की तरफ ले जाया जा सकता है।

1. हमारी आयु अनिश्चित है।
2. जितना उपयोग हम साधनों का करते है, उससे स्वास्थ्य और दिमाग का सन्तुलन न बिगड़े।
3. नैतिकता पर ही हमारी स्वतन्त्रता इतराती है, नैतिकता का अवमूल्यंन न हो, यही सही दृष्टिकोण है।
4. सही कर्म से ही जीवन को आनन्द मिलता है।
5. गुनाह कितना ही छोटा क्यों न हो, हानिकारक ही होता है। सांप का बच्चे का क्या छोटा ,क्या बड़ा होना ?
6. एक असत्य आदमी को कई तरह से बीमार करता है, संभव हो तो बचना चाहिए।
7. आधी से ज्यादा समस्याएं एक सत्य के द्वारा सुलझाई जा सकती है।
8. अनुशासन जीवन को बांधता नहीं, उसे बहुमूल्य बनाता है।
9. प्रेम में विश्वास की विशेष भूमिका होती है।
10. आस्था ही धर्म का पहला चिंतन है।
11. रिश्तों की गरिमा ही उत्सव प्रदान करता है
12. मानवता के प्रति हमारी गंभीर जिम्मेदारी होती है।
13. प्रकृति का सही उपयोग ही हमें स्वस्थ रख सकता है।
14. इज्जत और सम्मान की जितनी चाह हमारी, उतनी ही सबकी।
15. माता, पिता और परिवार से खुशियों का आभाश हो सकता है।

ऐसे और भी कई जीवन उपयोगी चिंतन हम साहित्य और धार्मिक गर्न्थो से प्राप्त कर जीवन को बेहतर शैली से सुंदर बना सकते है।

माँ पूर्णानन्द ने अपने किसी प्रवचन में कहा ” जो मैं अपनी इच्छा से करता हूं, वो मेरे दिमाग की अपनी दासता है। जो मुझे करना चाहिए,वो करता हूं, सफलता पाने के लिए। परन्तु जो कुदरत के अनुसार घटित होता है,उसे सच्चे दिल से स्वीकार करता हूं, वो भगवान की कृपा है” घटनाकर्मो से युक्त संसार में अगर हम धैर्य से सब सुख-दुःख सहजता से सहन कर लेते है, तो यकीन मानिए हम जीवन बेहतर जीवन शैली के अनुसार ही जी रहे है। एक सन्तोषपूर्ण जीवन आनन्द का अनुपम स्त्रोत होता है। हमें नहीं भूलना चाहिए आखिर इस संसार में हम कुछ समय के यात्री है, हमारा उद्धेश्य यहां की व्यवस्था को प्रेम, भक्ति, संयम, धैर्य, और कर्म के द्वारा समझ आनन्द सहित निष्कलंक वापस लौट जाना है।…….कमल भंसाली

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली भाग ..९..अंश…२..अमृतमय प्रेम…..

भारतीय अध्यात्मक शास्त्रों के अनुसार प्रेम भीतर की चीज है, जब तक अंदर में रहता है, स्वच्छ, सरल, पवित्र और अमृतमय रहता है परन्तु जब यह बाहर आता है, तो प्रायः इसका स्वरुप् बदल जाता है, क्योंकि इसकी जरुरतें इसे स्वार्थी और समझदार बनने पर मजबूर कर देती हैं।
मानव जीवन का पूरा अस्तित्व प्रेम और व्यवहार की धुरी पर घूमते हुए कई तरह के कीर्तिमान स्थापित करता है। प्रेम के तत्व से जन्मा इन्सान आज हर क्षेत्र में विशिष्ठ है, अगर कहीं कमजोर हुआ है, तो सिर्फ नैतिकता के क्षेत्र में, और उसकी कीमत भी वो अपने दैनिक जीवन में चूका रहा है, असुरक्षा की भावना में रहकर ही जी रहा है। अपनी व्यापारिक और आर्थिक प्रगति के नाम पर लोभ में गिरा मानव पता नहीं कभी इस दलदल से निकलेगा या नहीं, अभी यह हम इसे समय के ऊपर छोड़ देते है। ओशो आज के मानव व्यवहार के सन्दर्भ में प्रेम के बारे में कुछ इस तरह की बात करते थे, वो कहते है, ” प्रेम गुलाब के फूल की तरह होता है,जब तक होता है, इतना जींवत, हवाओं में, बारिश में, सूरज की रौशनी में नाचता हुआ, अपने सौंदर्य की घोषणा करता हुआ, लेकिन शाम होते-होते वह मुरझा जायेगा; उसे रोकने के लिऐ तुम कुछ नहीं कर सकते। ह्रदय का गहरा प्रेम हवा की तरह होता है जो तुम्हारे कमरे में आती है, और बाद में विदा हो जाती है। तुम उसे मुठी में बाँध नहीं सकते”। कुछ इस तरह की बात भी निकोलस स्पार्क कहते है, ” Love is like the wind, you can’t see it but you can feel it”। तत्व की बात यह है, प्रेम अस्थायी होते हुए भी जरुरत तक स्थायी है, इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता।
आइये, हम प्रयास करते है, यह जानने का क्या प्रेम को पूर्ण शुद्धता के साथ जीवन की ग्रहण करने की और देने की क्षमता है, हकीकत यहीं कहती है, शुद्ध सोने को भी आकार देने के लिए खाद की जरुरत होती है, तो प्रेम को आकार देने के लिए रिश्तों की खाद दी जाती है। धर्मगुरु कहते है, कि हम कलयुग में जी रहे, और सत्य की कमी के कारण प्रेम की गुणवता और शुद्धता पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वभाविक है। आज के माहौल में प्रेम सफलता के औजार के रुप में ज्यादा प्रयोग करने की जरुरत बन गया, जो आंतरिक नही सिर्फ दीखता है, जब तक उसकी जरूरत हो। आज के असार्थिक युग में सच्चा और सही प्रेम अस्तित्व विहीन होकर लुप्तप्रायः सा हो गया है। परन्तु इससे प्रेम की गरिमा को कम नहीं आँका जा सकता।
प्रेम सबसे ज्यादा रिश्तों में तलाशा जाता है, ये रिश्ते होते तो अनेक है, परन्तु इनमे माँ-पिता, बेटा-बेटी, दादा-दादी,
भाई-बहन आदि प्रारंभिक रिश्ते है, सर्वप्रथम इन्हीं में गुजरता है, और वहीं वो इसे तलाशता है। कहना न होगा संसार में आने के बाद सबसे पहले मनुष्य आश्वस्त प्रेम इन्हीं में ढूंढता है तथा तथ्य की बात यह भी है, कि वो इसको कभी चुकाने वाला ऋण नहीं मानता,कर्तव्य बोध हो तो अलग बात है। इसके बाद का प्रेम दोस्तों, प्रेयसि, पत्नी और अपनी सन्तान में अपने प्रेम के अनुपात में तलाशता है। शारीरक, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक विषमताएं, और अन्य तरह की समस्याएं आने पर उसका दार्शनिक प्रेम आस्था के रुप में धर्म और भगवान में ढूंढता है। प्रेम का कोई भी रुप या स्वरूप हो, पर सशक्त प्रेम को चाहिए सच्चाई, आस्था, विश्वास, निस्वार्थता, तथा सबसे जरूरी सयंम, इनकी कमी हो तो प्रेम अपनी कमजोरी से
ज्यादा प्रभावकारी नहीं हो सकता।

तभी तो रहीम दास जी ने कहा..
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय”

कितना सही और कितने अनुपम भाव से रहीमदास जी ने हमे सचेत किया, क्योंकि वो जानते थे कि बिना प्रेम इन्सान बेहतर जीवन नहीं जी सकता। इसी सन्दर्भ में आइये उनके एक दूसरे दोहे पर गौर करते है…

“बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय”

( “मनुष्य को सोचसमझ कर व्यवहार करना चाहिए, क्यों कि किसी कारणवश यदि बात बिगड़ जाती है, तो फिर उसे बनाना कठिन होता है,जैसे यदि एक बार दूध फट गया तो लाख कोशिश करने पर भी उसे मथ कर मक्खन नहीं निकाला जा सकता”)

प्रेम व्यवहार के रास्ते का यात्री है, जीवन की गतिशीलता में वो अपनी भूमिका संयम और धैर्य के साथ निभाना चाहता है। परन्तु आवेश, क्रोध, ईष्या,लोभ और हिंसा हस्तक्षेप तो कतई स्वीकार नहीं करता, बाकी नकारत्मक तत्व से भी घायल होता है। प्रेम को सकारत्मक ऊर्जा बहुत पसन्द है,और जीवन को हंसते हंसते बेहतर बनाता है। प्रेम की एक खासविशेषता यह भी है, कि यह न रंग, जाति, वर्ण, अमीर-गरीब, निर्बल-सबल, समय और परिस्थिति का मोहताज है। यह एक सहज सरल प्रकाश पुंज है, जो एक की आत्मा से निकल कर दूसरे की आत्मा में रम जाता है। प्रेम ही एक ऐसा तत्व है, जिसकी शोभा विस्तृता में है। धर्म मोह को तो नकार सकता है, पर प्रेम में अपना अस्तित्व जरुर तलाशता है। कहने की बात नहीं बेहतर जीवन शैली बिन प्रेम के असंभव ही लगती है।
ध्यान रखे.. गीता में कहा..
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः” ।।

“ज्ञानी अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और स्वयं को नीचे न गिराये; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही तो अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है।”……….क्रमशः …

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली भाग…८…आशंका, भय और डर.. कमजोरी मन की…कमल भंसाली

अनिश्चतता ही अक्षमता है, जीवन के उद्देश्यों का निम्न मूल्यांकन ही असफलता है । जीवन बार बार नहीं मिल सकता, थोड़ी देर के लिए मान भी ले, तो तय भी नहीं की, वापस इसी मानव स्वरुप में मिलेगा तो फिर, क्यों नहीँ इसके मूल स्वरुप का चिंतन कर इसे विशिष्ठ और बेहतर बना कर हम सार्थक जीवन जियें ?आज हमारे पास भोगने के जितने साधन है, उस से ज्यादा तो हमारे पास भय के कारण होते है । उससे जीवन में निराशा और अनिश्चितता की स्थिति पनपती है।

भय का कमजोर रुप आशंका के नाम से भी जाना जाता है, मानवीय संवेदनाओं की कमजोर चेतना भी हम इसे कह सकते है, जिसका होना या नहीं होना अनिश्चित होते हुए भी हम नकारत्मक चिंतन करते है, वो हमारी आशंका ही कहलाती है । हकीकत में आशंकाओं की सूची असीमित या सीमित होना हमारे मन की मजबूती पर निर्भर करती है।
आशंकाओं से थोड़ा ज्यादा ताकतवार डर होता है, इसमे मन कुछ हद तक प्रतिरोधक भी तैयार करने की स्थिति में रहता है। कहते है, डर में थोड़ी निश्चिता का बोध रहता है, जैसे कोई धमकी देकर डर पैदा करने की कोशिश करता है। इसमें वस्तुस्थिति कुछ हद तक सामने रहती है, अतः मन सुरक्षात्मक भी हो सकता है ।

अगर हम इनकी तालिका बनाये तो शायद कभी पूरी नहीं हो सकेगी, क्यों की भय कभी खत्म नहीं होता। यह तो इन्सान को समाप्त करने का विध्वंसक हथियार है। इसे तो कृष्ण जैसा सारथि मिले तो ही संभाला जा सकता है, परन्तु उसके लिए अर्जुन बनना जरुरी है, जो असंभव है, इस भोगवादी और मिथ्यावादी समय काल में, पर, भय को जीवन में कम करना जरुरी है, नहीं तो जीवन को बेहतर तरीके से जीना मुश्किल ही होगा। आइये, जानते है, भय को कैसे कम किया जा सकता है ?

पहले हम भय की तासीर जानने की कोशिश करतें है, आखिर डर है, क्या ? मनोवैज्ञानिकों की माने तो डर कुछ नहीं है, सिर्फ एक कमजोर अनुभूति है, जो अज्ञानतावश मानव मन में कुछ होने की आशंका और ख़ौफ़ का वातावरण पैदा करती हैं। इसे हम मानसिक अव्यवस्था की श्रेणी में रख सकते है । जो नहीं हुआ या नहीं होने वाला है, फिर भी उसके होने का अहसास भी डर होता है, अगर उसके प्रभाव का नकारत्मक अह्सास है, तो भय यानि डर है। अभाव जिंदगी को सबसे ज्यादा डराता है, अर्थ का अभाव तो जानलेवा भी हो सकता है। अगर ज्ञान का अभाव हो, तो हतासा भी भय पैदा कर सकती है। ध्यान दे, तो छोटे छोटे अणु से विचार मन को प्रभावित करते रहते है, जैसे बच्चों की नादानियां माता पिता को किसी आनेवाले संकट की आहट मालूम होने लगती है।

“The oldest and strongest emotion of mankind is fear, and the strongest and oldest kind of fear is fear of unknown”…H.P Lovecraft

सच ही है कि कुछ होने में चिंता, कुछ नहीं होने का भय सदा दिल में समाया रहता है। कभी तो ऐसा भी महसूस होता है की हमारे रक्त के प्रवाह के साथ भय भी साथ चलता रहता है। चिंतन करने की बात यह है, की क्या भय जब आशंका, डर की श्रेणियां पार कर सामने आ जाता है, तो उस क्षण की मुक्ति संभव है ? विज्ञान और अध्यात्म के अनुसार तीनों ही स्थितियों पर नियंत्रण किया जा सकता है । एक कहावत है, “चिंता यानि अनजान भय मानव को चिता के मार्ग की ओर ले जाती है”। मानव शारीरिक सरंचना का कुछ इस तरह का निर्माण किया गया की उसकी मनोस्थिति के प्रभाव से कभी अछूत नहीं रहे। भारतीय दर्शन शास्त्रों में भय को चारित्रिक कमजोरी भी माना गया है । अतः यह भी कहा गया की इस पर नियंत्रण करने में ज्यादा कोई कठिनाई भी नहीं आती, बशर्ते मन में मजबूती का अंश सक्रिय हो।

अंग्रेजी का शब्द “fear” काफी हद तक तीनों स्थितियों आशंका, भय और डर के लिए उपयुक्त्त माना गया है । जब तीनों स्थितियां संयोगवश एक साथ सामने आ जाती है, तो “ख़ौफ़” बन जाती है, इसे अंग्रेजी में “horror” के नाम से सम्बोधित किया गया है।

कुछ मनोवैज्ञानिक मानते है, कि डर, आंशका, भय इत्यादी चित्त के कुछ कमजोर अंश होते है, जिनकी संवेदनशीलता काफी आक्रमक तो होती ही है साथ में आकस्मिकता का समावेश रहता है, क्योंकि मनुष्य के दिमाग की चेतना के सारे
emergency system जागरूक हो जाते है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड का मानना था, कि “अविश्वास भी डर, आशंका का कोई अंश है, जिससे आंतरिक चेतना अस्वीकार नहीं कर सकती”। जहां इंसान को किसी भी तरह के बाहरी आक्रमण का अंदेशा होता है, वहीं उसकी कार्यशैली में आंशिक भय साफ़ झलकने लगता है । भारतीय साहित्य में भी डर, भय और आशंका का मनोवैज्ञानिक चित्रण काफी प्रभावशाली स्तर पर किया गया है। वात्सायन अज्ञेय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ” शेखर एक जीवनी” में अपने नायक शेखर के भय की हर परिस्थिति का आकर्षक चित्रण किया है ।
महान लेखक जयशंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य “कामायनी” में चिंता का बड़ा अद्भुत समावेश किया । उदाहरण के तौर पर निम्न पंक्तियों पर गौर कीजिये….

“बुद्धि, मनीषा, मति, आशा, चिंता तेरे है कितने नाम
और पाप है, तू, जा, चल जा यहां नहीं कुछ तेरा काम
विस्मृति आ, अवसाद घेर ले, निरवते बस चुप करा दे
चेतनता चल जा, जड़ता से आज शून्य मेरा भर दे
चिंता करता हूं मैं जितनी उस अतीत की, उस सुख की
उतनी ही अनंत में बनती जाती रेखायें दुःख की”

अगर हम आचार्य रजनीश जो “ओशो” के नाम से भी जाने जाते है, की बात माने तो उनके अनुसार भय अजेय है। वे कहते है ” भय को न मारा जा सकता है न ही जीता जा सकता है और केवल समझ ही रुपांतरण लाती है, बाकी कुछ भी नहीं”…

संक्षिप्त में “बेहतर जीवन शैली”यही कहती है, कि समय की धुरी पर अनजाने घटनाक्रम घटने तय है, पर उनसे जीवन को प्रभावित कम करने का तरीका यही है, की जीवन में चिंतनशीलता का अभाव नहीं हो । हमें आध्यातिमकता और साहित्य से जुड़ कर भय की तासीर को कमजोर करना चाहिए, इससे हमारा मानसिक तनाव कम हो जाएगा। जानने की प्रमुख बात यह भी है की हमारी दायित्व की सीमा जितनी कम होगी, तनाव उतना ही कम होगा, जानने की बात है की जाने अनजाने उसे कहीं हम विस्तृत वृत का आकार तो नहीं दे रहें है, ना। हम सिर्फ अपने लिए ही नहीं जीते, हमारा दायित्व परिवार और समाज के लिए भी है अतः हमे अटूट आस्था और दृढ विश्वास के साथ जीवन को मजबूत और भय रहित करने की चेष्टा करते रहनी होगी। यही “बेहतर जीवन शैली”की चाह है।

शायद भगवद् गीता में ठीक ही लिखा है, कि मन की हार ही हार है, जीतना है, तो मन को मजबूत करो, सभी तरह की परिस्थिति के लिए अपनी क्षमताओं का विकास करो…

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव् ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।
( गीता ६/५ )

“ज्ञानी अपने द्वारा अपना संसार – समुद्र से उद्धार करे, और स्वयं ही अपना बन्धु है, परन्तु जिसने आत्मनिग्रह ( स्वयं पर शासन ) नहीं सीखा है, वह स्वयं ही अपना घोर शत्रु बन जाता है।”

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली…भाग..६….सादा जीवन उच्च विचार..यानी नैतिक जीवन..कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली.. भाग…६….. सादा जीवन उच्च विचार…..यानी नैतिक जीवन….

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने किसी लेख में जिक्र किया, ” जिसकी आंतरिक महानता विकसित होगी, उसकी बाह्य प्रतिभा का प्रखर होना नितान्त स्वाभाविक है। लघु को महान बनाने की सामर्थ्य और किसी में नहीं, केवल अंतरंग की महता, गुण कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता में है”। बेहतर जीवन शैली का इस कथन में पूर्ण सर्मपण है। सच यही है की धन किसी को महान नहीं बना सकता, न ही जीवन को सम्पूर्णता प्रदान कर सकता है। आत्मा की विविधता को समझना अगर इतना आसान होता, तो तय था सब का जीवन त्यागमय और सुंदर होता। इंसान कभी पतन के मार्ग का राही नहीं बनता। दोस्तों हमने पिछले भाग में “परिवार” के बारे में विस्तृत चर्चा की और उसी तदानुसार अब “बेहतर जीवन शैली” के सबसे मार्मिक तत्व सादगीपूर्ण जीवन पर हम यहां चर्चा करे, तो शायद जीवन को और बेहतर बनाने की कोशिश कर सकते है।

जीवन सभी जीते है, सब अपने ज्ञान और क्षमता के अनुसार उसे सांसारिक धरातल पर सही ढंग से जीना चाहेंगे। क्षमता का विकास अंतर्मन काफी हद तक स्वयं करना पसन्द करता हैं। पर कहते है, ना, अकेला कोई विशेष नहीं कर सकता, जब तक किसी से सहयोग नहीं लेता। मन को भी ज्ञान और अनुभव की जरुरत पड़ती है। ज्ञान के प्रदाता माता-पिता, गुरु और खुद का अनुभव ही होता है। भोगवादी संस्कृति में ज्ञान की भूमिका से ज्यादा देखादेखी निभाता है, अत बेहतर जीवन शैली हमें एक ही संकेत से समझा रही है, कि जीवन में सादगी के साथ नैतिकता को अपनाना ही मेरा मार्ग है।
आजकल, नैतिकता का भी अपना एक दायरा है, उसे जिंदगी सब जगह दखल नहीं देने देती। पिछले कुछ सालों में सामजिक और पारिवारिक वातावरण में एक अलग ही तरह का बदलाव देखा गया। इस बदलाव ने आपसी सम्बन्धों में आंतरिक अलगाव की भूमिका निभायी और एक अलग चिंतन का मानव नैतिकता की हद पार करने लग गया, हकीकत में यह एक खतरनाक स्थिति है।

आखिर, नैतिकता क्यों जरुरी है ? ये प्रश्न इस लिए पूछा गया क्यों की यह ही एक तत्व है, जो आपसी व्यवहार में अपनी भूमिका से सामने वाले के व्यवहार की ईमानदारी स्थापित करता है। अगर हम मान ले की नैतिकता नहीं हो तो क्या फर्क पड़ता है ? तब कल्पना करना भी शायद कठिन होगा की मानव का अस्तित्व भी रहेगा क्या ? बिना आपसी विश्वास के संसार कैसे चलेगा ?

नैतिकता जब इतनी महत्वपूर्ण है, तो उसकी जिंदगी में अहम भूमिका तो तय है। हम नैतिकता की कोई सही परिभाषा
बनाने में असमर्थ है, परन्तु संक्षिप्त में यही कहना होगा की आत्मिक गुणों का गुलदस्ता है, नैतिकता जिसमे सिर्फ सकारात्मक ऊर्जा ही रह सकती है, नकारात्मकता के लिए कोई जगह नहीं होती। थोड़ी बहुत नैतिकता सभी में जन्म के साथ आती है, परन्तु बेहतर जीवन शैली में नैतिकता अपनी चरम क्षमता के साथ निवास करती है।

कई लोग नैतिकता और आचार शास्त्र को एक ही मानते है,पर हकीकत में दोनों समान नहीं है। आचार संहिता थोपी हुई मान्यता जैसी लगती, परन्तु नैतिकता में अपना प्रभाव होता है। ज्यादातर नीति शास्त्रों में नैतिकता के दो रास्ते बताये,
एक श्रेय ( शुभ) तथा दूसरा अशुभ, नीति शास्त्रों ने सदाचार को ही श्रेय माना है। हम इसके बारे में विस्तृत चर्चा यहां नही कर पायेगें, क्योंकि हमारा उद्धेश्य तो जीवन को बेहतर करना तथा नैतिकता को स्वीकार करने तक ही सीमित है।
नैतिकता के जो शुभ सन्देश है, वो प्रायः सभी देशों में एक समान है, जैसे चोरी नहीं करना परन्तु देश, काल, समय के अनुसार कुछ मूल्यों पर नैतिकता परिवर्तनमय भी है। भारत एक आधात्मिक, धार्मिक और संस्कारिक देश है, हम आज भी जब भी किसी कार्यों को नैतिकता की कसौटी पर तय करने को कहा जाता तो काफी झिझक इस बात की होती है, कहीं हम गलत तरह से तो नहीं कर रहे है ?

हिंसा और नारी उत्पीड़नः की बढ़ती घटनाए आनेवाली किसी भयानक दर्दनाक अवस्था की तरफ इशारा करके कह रही है, नैतिकता को कमजोर मत होने दीजिये। हकीकत की बात भी यही है, कमजोर पड़ती नैतिकता के कारण भ्रष्टाचार
हमारी सबकी आत्मा खोखली कर रहा है। वो दिन दूर नहीं जब मानवता अन्याय से पूर्ण पीड़ित हो जायेगी, जब तक हम
यह आचारसंहिता नहीं स्वीकार कर लेते कि ” अन्याय करुंगा भी नहीं, न ही अन्याय सहन करूँगा”।

जैन आचार्य श्री तुलसी जी ने नैतिकता के प्रति हमें जागरूक करने के लिए एक आंदोलन चलाया “अणुव्रत”का उसमें छोटे छोटे व्रतों द्वारा आदमी अपनी आत्मा का नैतिक सुधार कर जीवन को नया आयाम दे सकता है। उनका एक कथन
“पहले निज पर शासन, फिर अनुशासन” सदाचार की महिमा की तरफ हमें मोड़ना चाहता है। आज की शिक्षा प्रणाली
की कमजोरी को उन्होंने कितनी खूबसूरती से जाना, तभी तो उन्होंने इस आंदोलन को घर घर तक पंहुचाने का निश्चय किया। राष्ट्र के चिन्तनहार इसे स्वीकार जरूर करते है, परन्तु शिक्षा क्षेत्र में इसे अपनाने से डरते है ।

हम सभी इन्सान है, परन्तु जगत के सारे अधिकार तो हमारे पास नहीं है, फिर भी अंहकार रूपी निशाचर हमारी आत्मा में बैठ कर हमें भटकाता है और उसके वशीभूत होकर हम अन्याय करने लगते है । बेहतर जीवन शैली चाहती है की हम अपनी सीमा पहचान कर प्रकृति, मानव तथा जीव जंतु सभी को उनकी उपयोगिता को मान सम्मान दे।

हम सभी सदाचार की आचार संहिता जानते है, उनका पालन करना अगर सीख गए तो काफी हद तक हम बेहतर जीवन शैली के आसपास ही है। यह तो तय है सही आचार संहिता जो की शास्त्रों के अनुसार हमारे देश में चलती है, उसका पालन ही नैतिकता है। कुछ लोग मानते है की आज के सन्दर्भ में नैतिकता की बातें कमजोर आदमी करते है, मुझे लगता है, ऐसे इन्सान साहित्य और समाज से काफी दूर है, वो खुद की हानि तो करते है, अपितु समाज में जहर फैलाने का काम
करते है, तय है, खुद का बनाया विष आगे उन्ही को पीना है ।

आदमी का सदाचार से आत्मिक सम्बन्ध सदा ही रहा है, कुछ काल के लिए उसमे कलुषित भावनाओं का आगमन हो सकता है। सही चिंतन से वो ऐसी भावनाओं पर प्रतिबन्ध लगा सकता है । “सादा जीवन उच्च विचार” का प्रयोग अगर दैनिक जीवन में हम करते है, तो नैतिकता के आसपास ही रहेंगे। कहते आदमी के जीवन पर उसके खानपान और पहनावे का प्रभाव पड़ता है। कपड़ो में शालीनता नहीं हो तो अपने के अलावा दूसरों के मन पर भी असर देखा जा सकता है। खानपान का भी विचारों से गहरा तालुकात रहता है, एक शराबी आदमी का व्यवहार इसका उत्तम उदाहरण है।

सदाचार और नैतिकता की सादगी आदमी की बातचीत में भी होनी चाहिए। व्यक्तित्व की सम्पूर्णता तो लफ्जों में पूर्ण होती है। Leon Trotsky के अनुसार “Abusive language and swearing are a legacy of slavery, humiliation and disrespect for human dignity, one’s own and that of other people.”। इसलिए बेहतर जीवन शैली भाषा की शालीनता को बहुत महत्व देती है। संक्षिप्त में, सादा जीवन और नैतिकता हमे बेहतर बनाती है, यही बेहतर जीवन शैली का दावा है।भूल जायें, हम पीछे क्या थे, पर न भूले हमारी यात्रा बेहतर जीवन शैली की तरफ है, जो हमारी सही और सुखदायक चिंतन हैं।

पर न भूले….”If you translate every mistake of your life into a positive one you will never be a prisoner of your past; you will be a designer of your future”… Brahma Kumaris

मनन रखने की बात है, नैतिकता और सदाचार साथ साथ चलते है, उनमें से एक अगर अलग होता है, तो दूसरा कमजोर होना लाजमी है। इसलिए अपने जीवन में नैतिकता चिंतन कर और सदाचार को व्यवहार में सम्मलित करे.।आइये, जानते है, इनके प्रति हमारा चिंतन कब कमजोर होता है।

1. जब जीवन आर्थिक और मानसिक रूप से कमजोर होता है।
2. जब हम आडम्बरों को अपनाते है।
3. जब हम भोगवादी संस्कृति की तरफ ज्यादा रुख करते है।
4. जब हम भाषा की शालीनता का महत्व नहीं समझते ।
5. जब हम शिक्षा को अपने जीवन में नहीं अपनाते ।
6. जब हमारी आस्था धर्म, संस्कार, व्यवहार, और मानवता के प्रति कमजोर हो।
7. जब हम मानवीय मूल्यों से भरपूर जीवन नहीं जीते।

यह हमारा सौभाग्य है, भारत हमारा देश है, अपने देश से हम सभी प्यार करते है। हमारे देश का सौभाग्य है की यहां महान आत्माओं का सदा वास रहा और आज भी साधु, संत और ज्ञानी लोग हमें अपने जीवन की सम्पूर्णता खोजने में मदद करते है, हमे उनके पास जाकर अपने निरुत्तर प्रश्नों का उत्तर खोजना चाहिए। संक्षिप्त मानव जीवन कहां बार बार नसीब होता है।

चलते चलते…
तुल्यनिन्दास्तुतिंमौंनी सन्तुस्टो येन केनचित्।
अनिकेत: स्थिरमतिभृक्तिमान्मे प्रियो नरः ।।
(गीता १२। १९)

(” जो निन्दा और स्तुति को समान भाव से देखता है. मौन रहता है, जो कुछ मिल जाए, उसी में सन्तुष्ट रहता है, किसी स्थान को अपना घर नहीं मानता और स्थिर चित्तवाला है, वह मेरा भक्त है और ऐसा भक्त मुझे प्रिये है ।)…..”गीतासार”

कमल भंसाली