🔴विशिष्ट🔴कमल भंसाली🔘

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बिखरी मंजिले
टूटे सपने
अक्सर मुझे छेड़ते
कहते रहते
आओ हमें
जरा सा भी छू लो

मैं बेदम सा सिपाही
इधर उधर दौड़ता
पर अपनी ही
कमजोरी की
सड़ी गली आदतों की
जंजीरे नहीं तोड़ पाता
निरस्त हो
उनकी और ही झांकता

देख मेरी
मायूसियों की फितरत
फिर भी
उनका स्वभाव नहीं बदलता
आज भी
वो उकसाते
सच मानिए
मेरे पीछे
वैसे ही दौड़ते

गलत न समझिये
मेरी इस हरकत को
उनको
अपनी गिरफ्त में लेना
आज भी
मैं अपना धर्म समझता
नौकरी जिसकी
कर रहा
नमक उसी का
अंदर से बोलता

कर्तव्य की वेदी पर
शहीद होना ही
अपना धर्म है
इतनी सी बात
मैं सही समझता
शपथ मेरी
मुझे समझाती
जो नहीं थकता
प्रयासित रहता
एक दिन
बिखरे सपने समेटता

हर मंजिल को
पकड़ कर
नई राह तलाशता
उन्हीं राहों में
उन्हें खड़ाकर
विशिष्ट कहलाता …..
रचियता….कमल भंसाली

🌹अजनबी प्यार 🌹 कमल भंसाली🌹

पूनम की चांदनी सा उसका चेहरा

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पहले प्यार का दर्द आज भी गहरा 

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याद आ रहे बीते लम्हों के अहसास

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उसे भूल जाऊ, असफल मेरे सारे प्रयास

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हसीन सितारों से सजी नशीली रात
मेरे दिल में छाये, कुछ रंग भरे जज्बात
इंद्रधनुषी अप्सरा जैसी, थी खूबसूरत
आज भी याद है, मुझे उसकी सूरत
थी, कोई, छोटी सी प्यारी मुलाक़ात

वो कौन थी, मुझे नहीं ख्याल
थी कोई भी, पर थी हसीना बेमिसाल
उसकी आँखों की रंगत
में, मुझे नजर आती जन्नत
कल वो मेरी हो जाए
मांगता रहता, दिल मेरा मन्नत

अफ़सोस, ऐसा कुछ नहीं हुआ
जगा सपना, सोया ही रह गया
मैं तो दीवाना हुआ
पर, नहीं हुई वो दीवानी
खत्म हो जानी थी, यहीं यह कहानी
पर एक तरफा प्यार, ऐसा होने नहीं देता
प्रथम प्यार हजार दर्द अनजाने दे जाता
एक अजनबी रिश्ता
कितनी सहजता से
दिल की गहराइयों में उत्तर जाता

हाँ, नाजो से पली
वो, गुलाबी कली
सामने वाली गली में रहती
कभी कभी ही बाहर निकलती
आदत थी उसकी,
आँख झुकाकर चलती
दो चोटी में समाये बाल, नागिन लगते
उसके सुर्ख लब कुछ भी कहने से डरते
चेहरे पर गुलाब खिलते
मानों गालो के गड्ढों में
दरवाजे जन्नत के खुलते
चाल उसकी कयामत की
नाजायज, दुश्मन लगती
कुछ दिन फिर नहीं, दिखती

कशिश से भरपूर
किसी मोड़ पे
जब कभी टकराती
लगता, मुझे
आँखों ही आँखों से जैसे कहती
डरती हूं, साजन, पर
प्यार तुम्ही से हूँ, करती
अगले पल
पास से गूजर जाती
कुछ नहीं कहती
अंगुली से आँचल संभाल गुजर जाती
सन्नाटे में, अपनी आहट छोड़ जाती
बदन की महक, फिजा में बिखर जाती
भावनाओं के जंगल में अकेला छोड़ जाती

एक दिन किस्मत हुई, जरा मेहरवान
गुजर रहा उसकी गली से
सामने था,उसका घर
खुली थी, एक खिड़की
वो, बेठी थी, कुहनियों के सहारे
दर्पण में निहारे
अपना सलोना चेहरा
जैसे खोज रही, राज गहरा
पड़ी उसकी, मुझ पर नजर
हल्की सी मुस्कान, लबो पर गई ठहर
उठाई उसने, चाहत की नजर
कसम उसकी
आँखों में मेरे छा गई बहार
लगा वादा कर गई
मिलने का इस बार
मानों जवानी को मिली, सौगात
बैचेन रहने लगा दिल, दिन रात
बदलती करवटे देती, अनेक जज्बात

पता नहीं, जूनून था या उसका प्यार
प्रार्थनामय, हो करता, रोज उसका इंतजार
सही कहा, प्यार नहीं उतरने वाला बुखार
सूरत उसकी, सामने आती बार बार

फिर जो होना था, वही हुआ नहीं
जो नहीं होना था, वही हुआ
अनकहा प्यार को खोना था, कहीं
खो गया, इस जहां में कहीं
तलाश में तमाम उम्र गुजर गई
वो, फिर कभी नजर नहीं आई
एक हल्की सी मुस्करहाट से
चीर कर, मेरा दिल ले गई
नहीं जानता, आज वो कहां
मेरे टूटे के दिल के सिवाय
सच, कुछ नहीं जानता, दोस्तों
अब अपनी प्रथम हसरतों के सिवाय…
रचियता ….कमल भंसाली

तिरंगे का दर्द….कमल भंसाली

दूर शहर की
छोटी सी
कच्ची तंग गली में
एक छोटे से
स्कूल में
स्वाधीनता दिवस पर
देश का
कोई कर्णधार
तिरंगा झंडा
फहरा रहा
पास में बैठे
कई अधनंगे
बच्चें मुस्करा रहे
ताली बजा रहे
कीचड़ भरी उनकी
आँखों में शायद
उनका उन्नत भविष्य
झंडे की तरह
इधर उधर लहरा रहा
लहराते झंडे ने जब
उस ओर देखा
बिन कपड़ों के
जर्जर तन की
असहाय
मुस्कराहट पर
रोना आया
उसे अपने लहराने पर
लज्जा का साया
नजर आया
सिमट कर
चिपक गया
अस्तित्व के
डंडे से
मानों मुरझा गया
सोच रहा
अब नहीं लहराना
अब नहीं इतराना
इससे अच्छा तो
शहीदों के शरीर पर
लेट जाना
तय किया लाख बार
कोई फहराले
जब तक निरीह आँखिन की
दूर नहीं हो मजबूरी
तब तक स्वाधीनता का
नहीं, मेरा देश अधिकारी
न ही उचित है, मेरा लहराना
हे प्रभु, शहीदों के इस देश
को जरा संभालना
जानता हूँ, अब तक
जो मुझे फहराते
मेरी सफेद पट्टी पर
कालिख लगाते
झूठे वादों के पुलिंदों में
अपने खुद के घर सजातें
इन मासूमों का हिस्सा भी
इन्हें नहीं पंहुचाते
शर्म, मुझे आ रही
देश उन्हें माफ़ कर रहा
करोड़ों के लुटेरे
मुझे फहरा रहे
निरीहता से ताली
बजवा रहें
हद है, उनकी बेशर्मी की
अब भी, गुनगुना रहे
जन गण मण….