भारत की गरीब माँ….

“वो” भी कोइ निसहाय
“देवी” थी
सड़क पर खड़ी थी
हाथ में उसके छड़ी थी
फटी फटी साड़ी पहने थी
मायूसी चेहरे पर सजी थी
वो कह रही थी “बेटा” “बेटा”
सब सुनकर अनदेखा कर जाते
फिर भी बिनाभाव, सहभाव थी

थोड़ी दूर सजे पंडाल में
वहां एक सजी सम्पन्न
      “देवी” थी
मखमली आसन पर खड़ी थी
हाथ में उसके त्रिशूल था
सजी सुंदर प्यारी साड़ी में थी
न मिटने वाली मुस्कान थी
लोग लाइन में लगकर थे,बेकरार
कब उनका आये नम्बर
वो, जोड़े हाथ कहे “माँ” “माँ”
वो कहते रहे, हाथ जोड़ते रहे
माँ मुस्कराती रही, बोली कुछ भी नहीं

सवाल जेहन में एक ही समाया
दोनों तरफ ही तो थी, माँ की छाया
एक बोल रही थी, “बेटा” “बेटा”
जबाब हम नहीं दे पा रहे थे
एक को हम “माँ””माँ” पुकार रहे थे
वो हमे जबाब नहीं दे पा रही थी
फर्क, क्या था दोनों ही माँ में
दोनों ही तो कुछ चाह रही थी
बदले में दोनों ही आश्रीवाद का
बहुमूल्य प्रसाद ही दे रही थी
एक निर्जीव होकर चमत्कार दिखा रही
दूसरी सजीव होकर भी कुछ कर नहीं पा रही

जब बात स्वच्छ भारत की
जब बात गांधी के सपनों की
तब एक सवाल अंतर्मन करता
क्या स्वच्छ भारत “माँ” में नहीं बसता
दिल स्वच्छ हो तो सब स्वच्छ रहता
माँ किसी की भी हो
है, तो भारत की “बेटी”
वो गरीब माँ “बेटा” कहे, हम कुछ नहीं कहे
कितना सही कितना गलत है, आप ही कहे….
★★★★कमल भंसाली★★★★

कमल भंसाली