😁जरा मुस्कराइये😀 कमल भंसाली

“मुस्कराहटों” की अगर वजह होती
तो यकीन कीजिये
“जिंदगी” दिल की दुनिया
से दूर ही रहती
फिर शायद
अजनबी राह में स्वयं चलने को
बिन मकसद मजबूर होती
कुछ नहीं कहती
चुपचाप
बेवजह साँसों का साथ निभाती
इसलिए जरा दिल की भी सुनिये
मुस्कराने की वजह मत ढूंढिये
सिर्फ
“मुस्कराइए”
🌹
कुछ लम्हें बहुत खूबसूरत होते
उनमें जीने के अंदाज निराले होते
निगाहों में हजारों हसीन सपने तैरते
आस्थाओं के “कमल” चाहे उनमें कुछ ही खिलते
मुस्कान मुखरित गुल हो
चमन को गुलिस्तां बना देते
जरा धड़कते दिल से सोचिये
बेवजह भी कभी
सिर्फ
“मुस्कराइये”
🌹

माना हर चुभन से दिल घबराता
जब कभी
जहां की चट्टानों से टकराता
“प्यार” की ख्वाईस रखने वाला क
नाजुक दिल
अपनी ही उदासियों में बिखर जाता
यकीन मानिये
एक मुस्कान से उभर भी जाता
जरा अपने दिल की सुनिये
मुस्कराने की आदत पैदा कीजिये
सदा मुस्कराइये
सिर्फ
“मुस्कराइये”
रचियता✍ कमल भंसाली

💖प्रेमसत्यम💖 कमल भंसाली

दर्द ऐ दास्तां
बहुत कुछ कहती
जिंदगी
गमगीन गेरो से नहीं
अपनों से होती
मोह के चक्रव्यूह में
प्रेम को ढाल समझ
चुप, छुप सब कुछ सहती
जग ने जाने
इसी ख्याल में
तमाम उम्र की पीड़िता बन जाती
मानसिक विक्षप्ता से त्रस्त हो
स्वयं में स्वयं को तलाशती
अफ़सोस से कहती
काश उसे
“अपनों के अपनेपन की समझ होती ” !

समझ अगर
इतनी ही रखे जिंदगी
कोई किसी का कुछ नहीं
किसी की “साँसों” पर,
कोई भी सम्बन्ध न्यौछावर नहीं
शब्दों का खेल है
“प्रेम”
इसमें उलझे नहीं
दस्तूर स्वार्थ के
सब हंस के निभाये
ताकि तीर निशाने पर लग जाये
इसलिए सब “प्रेम” “प्रेम” की रट लगाये

सार यही समझ में आया
दर्द के पहलू में
अपनों का दिया जब गम समाता
प्रत्यमित्र जिंदगी को बना देता
अफ़सोस से
भीतर भीतर ही जिंदगी कुलबुलाती
शायद बुदबुदा कर कहती
काश ” सच्चे प्रेम” और ” मोह” का अंतर समझती
तो प्रेम को प्रदूषित नहीं बनाती
जग में “प्रेम” को परिभाषित कर पाती
।।प्रेम ही “सत्यम, सुंदरम”।।

रचियता कमल भंसाली

👌👌नमन👌👌 कमल भंसाली

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आशा उसी से कीजिये, जिसने हमको बनाया
वो ही देता, सहारा, दूर कितना चाहे, हो किनारा
डगमग हो जब जीवन नैया, क्यों इतने घबराये
जब हाथ पकड़ कर, वो, स्वयं किनारे ले जायें

सुख दुःख होते है, सिक्के के दो पहलू
दोनों तरफ की एक ही होती है, पहचान
निराशा के पलो की सीमितता को ले जान
तो, फिर समझले, हम,जीवन मूल्य है, ज्ञान

दर्द हजारों मिलते, तो क्यों करे हम गम
दया धर्म से सब हो जाएंगे एक दिन कम
चार दिन की जिंदगी, कब तक रोये हम
लेंगे उसका नाम, दर्द सारे हो जाएंगे कम

उसके नाम हजारों, पर है, तो वो है,एक
पथ हजारो ही सही, मंजिल भी तो है, एक
आये है, जाना निश्चित, कर्म करना है, एक
सही कर्म हो, सत्य पूर्ण, प्रार्थना यही है एक

दुःख के भँवर में फसा जीवन, मांगे अपनी ख़ैर
इस दुनिया में न अपना, न गैर, फिर कैसा बैर
पल जो भी बचे, उसको ही, अब करने अर्पण
पवित्र हो जाये आत्मा, प्रभु, स्वीकार करो,नमन
👌👌कमल भंसाली👌👌

कमल भंसाली

अधूरा स्पर्श ★★★★ कमल भंसाली★★★★

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“अलविदा” ही कहा था
मैंने
तुम्हारे नैन भर आये
कुछ दर्द के साये
जो तुमने मुझसे छिपाए
अफ़सोस ही कहलो
साथ चले, पर दिख नहीं पाये
पता नहीं आज
कैसे सामने उभर आये ?

गम की कोई किताब होती
तो सबकुछ समझ जाता
तेरी बेवक्त मुस्कान में
दर्द, तुम्हारे तलाशता
पीकर उन्हें शायद
शुकुन से विदा लेता
जग में “प्यार” को
अपनी मंजिल समझा देता

होठ, तेरे,
अब क्यों थरथराते
मेरे “अलविदा” पर
शब्दों को चिपकाकर
दर्द, तेरे, छिपा ते
औदास्य, चेहरे में
समाये, निः स्पृह राज गहरे
बाहर आ रहे
आज ही, क्यों सारे ?

तुम्हारी चुप्पी को
बन्धन समझ
साथ निभाता रहा
कुछ शंकाओं के फूल
तेरे जुड़े में सजाता रहा
अनचाहे समपर्ण में
अपनी ही आत्मा तलाशता रहा

कब ख्याल करता
औरत के दिल में क्या, क्या होता ?
बदन के हर हिस्से को छुआ
अगर एक कोना
तेरे, मन का टटोल लेता
तो सच कहूं
मुझे, “अलविदा” न कहने का
भी, अफ़सोस नहीं होता…..”कमल भंसाली”

“घटना” ****कमल भंसाली

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घटनाओं से संसार बना
बिन घटना के जग सूना
हर घटना की अलग लय
कहीं सृजन, कहीं क्षय

सुदर्शन चक्र की तरह इसकी महिमा
न इसके लिए दुरी, न इसकी कोई सीमा
कहीं प्रहरी, तो कहीँ है, जग संहारक
कहीं कर्मो का फल, कहीं भाग्य प्रचारक

हर पल, कुछ घटना तय
कहीँ ख़ुशी, कहीं पर भय
इसमे जीवन की हर लय
हर घटना का फल करें,तय

घटनाओं से ही शुरु होती, जिंदगी
घटना ही जीवन का पूरा है, सार
बिन घटना भी है, एक घटना प्रकार
उसी में रहता है, एक लक्ष्य भरा संसार

एक क्षण में बादल बरसते
दूसरे क्षण बिजली चमकाते
उमर घुमड़ सब को डराते
पर कुछ नहीं करते, चले जाते

घटना की हकीकत कोई न जाने
न ही कोई इसकी उपलब्धि पहचाने
शुभता का चिंतन ही इसका उपचार
घटना तय है, सदा चिंतन करो साकार

कहते है, घट घट के वासी की है, पत्नी
नाज नखरों में रहती है, उसकी संगिनी
कुछ न कुछ कर, अपना रुप सदा दर्शाती
एक अदा से, संसार का स्वरुप समझाती

आज हम है, कल नहीं, यह भी एक घटना
जीवन, मृत्यु का खेल, दोनों को ही जीतना
इसी कशमकश में, ख़ुशी और गम करते कुश्ती
समझना जरुरी, घटने में ही समायी, हमारी हस्ती
****कमल भंसाली

विदाई 2016 

आओं, नमन विदाई दे, भाई
विगत साल से हो रही, जुदाई
जाना आना, प्रकृति का उपहार
विगत शुरु करता, सुख का आधार

जानेवाले को करते है, प्रणाम
आनेवाले का भी है, अभिवादन
यही है, जीवन का सच्चा बन्धन
इस बन्धन को सलाम, सलाम

नया साल सबका हो, शुभकारी
अनभुव और ज्ञान से, उपकारी
मानव का मानव से, हो कल्याण
जीवन से न करे कभी, कोई पलायन

देखो, सर्द ऋतू लालनीय मुस्करा रही
फूलों से, वादियों को दुल्हन बना रही
नये साल का भास्कर भी होगा, प्रखर
उल्लासित मन पायेगा,सफल शिखर

हर साल है,अनूठा, न सच्चा, न झूठा
वक्त का करिश्मा,कितना तीखा मीठा
सत्यता की धुरी पर ही घूमता, हर वर्ष
कभी गम, कभी खुशी, स्वीकृत सहर्ष

अनुभव विरासत की देकर कर रहा, विहार
जगत जननी जन्मभूमि को कह रहा, नमस्कार
आनेवाले का जाना तय, यही है जीवन सफर
नव में रहे, विगत के सभी प्रारब्ध विधाता के संस्कार…..

कमल भंसाली

वक्त के सितम……कमल भंसाली

वक्त ने की बेवफाई
गम ने भी नहीं दिखाई, हमदर्दी
फिर भी, दोनों नहीं नाप सके
इस टूटते दिल की गहराई
वो गम देते रहे
मैं, सहता रहा
दिल, बिखरता रहा
मैं, उसे संभालता रहा

वक्त, लाख सितम कर ले
हर सितम को समझा दे
भले ही तुम, मुझे बर्बाद कर देे
मंजिल का हूँ, दीवाना
एक झलक, उसकी मिल जाए
चाहे हजारों लौ में
यह परवाना जल जाए

वक्त, राही हूँ, मंजिल का
“प्यार”, उसी से ही करता
तुमसे, मैं अब कहां डरता
दिल में जब तूफ़ान है, हजारों
“वक्त”, तेरी परवाह कौन करता
जान जरा, मेरे प्यार को
समझ, मेरे इकरार को
बदल जा, छोड़ झूठे अभिमान कों
दुनिया, में आया हूं
कुछ हासिल कर ही जाना
मौत ही तेरा है, आखरी सितम्
उसे भी भेज जरा
देख तो सही, इस दीवाने दिल में
कितना, साहस है, भरा

जाना है, चले जायेंगे
पर अहसास, अपने इरादों का
दुनिया को बता जाएंगे
यह, उनको भी समझा जाएंगे
“वक्त” से न करे, कोई अति प्यार
क्षण में बदल देता जीवन, यार
वक्त की तासीर है, बेवफाई
नासमझ भी, और हरजाई
एक ही जगह नहीं
उसका,अपना जोर
जब प्रभु, खोलते
भक्त के लिए, अपने द्वार………

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली भाग ५ अंतिम अंश…..कमल भंसाली

“परिवार”..इन्सान की सबसे सुंदर व्यवस्था, कई प्रकार के संक्रमणकारी रोगों से ग्रस्त हो गया है, अपनी कमजोरी के कारण बुलन्द आवाज में नहीं धीमे आवाज में अपनी अंतिम स्थिति का आगाज सभी को दे रहा है । आज “बेहतर जीवन शैली”के इस भाग में, हम अंतिम बार यह चर्चा करें कि आखिर क्या परिवार का अस्तित्त्व बचाया जा सकता है ? परन्तु उस से पहले जानते है, कि आखिर परिवार की प्रभाव शालीनता पर कौन से घातक हथियारों ने आक्रमण किया ?
इतिहास के पन्नों में एक उदाहरण प्रभावशाली परिवार का हम याद करें, जिसमे भगवान राम ने पिता के आदेशों का पालन कर परिवार की गरिमा को एक नया मजबूत स्थान दिया. जबकि वो स्वयं भगवान थे । युग परिवर्तन के आज के दौर से थोड़े समय पहले तक परिवार अपनी लय में चल रहा था, परन्तु आदमी को जैसे जैसे अति स्वतंत्रता का चस्का लगा, वैसे वैसे परिवार नवीन रोगों से ग्रसित होने लगा। इसी सन्दर्भ में हम दो प्रमुख कारणों का अवलोकन करते है ।

1.. विचार धाराओं की टकराहट….एक आदमी अपने जीवन काल में कम से कम तीन पीढ़ियों का सामना करता है, एक जिस से आया, दूसरी खुद की, तीसरी अपनी सन्तान की । प्रथम से वो सीखता, दूसरा यानी,खुद पालन या संशोधन करता, तीसरी को वो जो विरासत में आगे दे जाता। हर पीढ़ी के अपने कुछ परिवर्तन होते है, जो समय, काल और जगह के कारण जरूरी बन जाते है, उनकी अवेहलना करने से आपसी टकराहट की संभावनाये परिवार में बढ़ जाती है । बड़े बुजर्ग के पास अनुभव और संयम होते हुए आजकल तटस्थ की भूमिका में रहते, क्योंकि यह राम का युग नहीं, कलियुग है, जहां आदेश पालन कराना,मुश्किल ही होता है। यह बात नहीं की पहले भी विरोध नहीं होता था, परन्तु नीति गत और विधि गत विरोध को समर्थन सामाजिक मूल्यों पर ही मिलता। समाज की पृष्ठभूमि आज से ज्यादा सशक्त उस समय थी। उस समय खान पान और पहनावे सब तय थे, उनमे संस्कारों के कारण विद्रोह कम था, शिक्षा से ज्यादा आत्मा का प्रयोग चिंतन में किया जाता था। सर्व हिताय: सर्व सुखाय: को ध्यान में रख कर ही इंसानी चिंतन रहता था।
देश स्वतंत्र हुआ, कई परिवारों का पलायन अपने निश्चित स्थानों से देश विभाजन के कारण करना पड़ा। आर्थिक तंगी का दौर था, फिर भी परिवार अपनी गरिमा नहीं भूला। परन्तु मानव मन अब अपना संयम अब खो चूका है। वो भोगवादी और लालसा वादी पाश्चात्य संस्कृति का दीवाना बन गया। दीवानगी में विचारों का महत्व नगण्य ही होता है।अतः यह रोग लाइलाज है, क्योंकि इसमे परिवार के सभी तंतु विपरीतता में काम करते है.

2. असंस्कारित आजादी…पहले परिवार में सीमित आजादी होती थी, परिवार एक अपने ही संविधान से बंधा होता था। राजनीति के चतुर खिलाड़ीआचार्य चाणक्य की उस समय की सर्वश्रेष्ठ परिवार की परिभाषा का आज नगण्य अस्तित्व ही नजर आता है, फिर भी एक बार गौर करते है, उन्होंने क्या कहा,
“जहां सदा आनंद की तरंगे उठती हैं, पुत्र और पुत्रिया बुद्धिमान और बुद्धिमती, पत्नी मधुरभाषिणि, परिश्रम से कमाया विपुल धन, उत्तम मित्र, पत्नी से अनुराग, नौकर से अच्छी सेवा मिलती हों। अतिथि का आदर, परमात्मा की उपासना, श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग होता रहे- ऐसा घर धन्य और प्रशंसनीय है”
आचार्य चाणक्य का बताया पूर्ण ऐसा परिवार अब कल्पना की सीमा रेखाओं से दूर होकर एक सुहावनी कल्पना ही रह गया, परन्तु सत्य यह भी है की ऐसे परिवारों का पहले अस्तित्व था । आज जीवन पूर्ण निजी हो गया, अतः परिवार भी स्वार्थी हो गया और भीतरी राजनीति का शिकार हो गया। परिवार और देश का अस्तित्व का आंकलन तभी किया जा सकता है, जब उनमे कुछ झलक सार्वजनकिता की हों।

उपरोक्त दो कारणों के अलावा परिवार और भी कई छोटी छोटी बीमारियों से ग्रसित है, जब तक उसकी उम्र है, परिवार बेहतर जीवन शैली का एक पहलू सदा रहेगा । देवलोक और नर्क का अगर अस्तित्व हम नहीं नकारते तो परिवार बिना कैसे बेहतर जीवन शैली की कल्पना की जा सकती है।

दोस्तों बेहतर जीवन शैली के इस भाग में परिवार के बारे में हमने काफी अंतरंगता से चिंतन किया, आप अपने विचार और अनुभव अगर लिखना चाहते है, तो अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।भारतीय समाज और संस्कृति परिवार का सुख सदा लेती रही हैं, आज भी परिवार ये सुख देने के लिए तैयार खड़ा है, हम ही अपनी नादानी और नासमझी से इस सुख से धीरे धीरे विमुख हो रहे है । नई पीढ़ी को इस पर कुछ समय निकाल कर मनन करना चाहिये कि परिवार का अस्तित्व ही उनके लिए सुरक्षित भविष्य की रुपरेखा तैयार कर सकता है।जवानी के सारे भ्रम बुढ़ापा और बीमारी इन्सान को दर्द की प्रस्तर मूर्ति बना देता है।

समय अब भी है, परन्तु बागडोर नई पीढी के स्वयं के हाथों में है, उन्हें ही तय करना है, अपना भविष्य !
ये जरूर याद रखे… परिवार से अच्छी सौगात इस संसार में दूसरी हमें मिलनी आसान नहीं होगी, क्योंकि “सुखी परिवार ही सच्चा जीवन आधार”।

चलते चलते…..

जवानी रम है, तो बुढ़ापा गम
परिवार है तो नशा भी कम
दर्द और गम दोनों भी खत्म
परिवार यानी जीवन का संगम..

कमल भंसाली