🚶ख्याल💃✍️कमल भंसाली

दिल तोडा हजार बार
सितमगर ने नहीं पूछा
हाल मेरा एकबार
कैसे कर लूं
ऐसे प्यार पे एतबार
दिल…

माना नादां दिल था मेरा
उस पर था अपने वारा
भूल हुई जज्बात का था मारा
न जाना प्यार में भी कभी होता सवेरा
चारों तरफ तो छाया धुंध भरा अंधेरा
दिल….

नाजनीन को कैसे समझाऊं
डूबे दिल को
कैसे उसके कजरारे नैनों
में तैरना सिखाऊं
लब पर उसके भी प्यार के छाये साये
इस अहसास को उसे
कैसे आहिस्ता से समझाऊं
दिल….

है “खुदा”
दिल उसका सलामत रखना
मेरे अहसासित प्यार को
लम्बी उम्र की दुआ देना
जिंदगी
बिन प्यार न चले
उसका ख्याल
मेरे दिल में
सदा यों ही बनाये रखना
दिल…..
रचियता✍️ कमल भंसाली

💝महफ़िल तुम्हारी जन्नत हमारी💝 ✍कमल भंसाली

“महफिल सजी देखकर तुम्हारी
दिल तो कहता ठहर जाने को
थमती सांसों की कीमत चुकानी भारी
वक्त भी कहता महफिल छोड़ जाने को”

भुलेंगे नहीं हसीन अदाएं, तुम्हारी गुस्ताखियां
ये कनात, ये शहनाइयां और अधूरी मस्तियां

ये महफिले मिले आगे
ख्वाईस ये लेकर जाएंगे
तुम इंतजार न करना
अब जन्मों की है बात
माफ करना बची यही आखरी रात
जिसमे है थोड़े अधूरे बिगड़े अफ़साने
अदद नफस और बचे बिखरे से जज्बात

प्यार जिन्दगी को हमने बहुत किया
मौहब्बत पर ही सदा एतवार किया
गम को भी सिलसिले वार इकरार से जीया
कभी खूबसूरत हुए लम्हों को भी याद किया
तुम्हारी बेवफाई को दिल न माना उसे भी गले लगाया
हर नग्मों से इस महफ़िल को भी सजाया

कल को हमने नहीं देखा
कल तुम हमें न देखो
हसीन वादियों में उठे जब धुंआ
समझना कुछ न कुछ तो हुआ

हम न हो पर महफ़िल सजाकर रखना
दौर वो ही रहे, एक जाम जरा बचा कर रखना
आरजू रब से करना दरवाजा मधुशाला का खुला रखना
बची प्यास की कसम वापिस आने की फरियाद न करना

फुरकत में न हो गफलत उल्फत हो हमारी बरकत
राहबर शबनम की आब सी आरजू हो मेरी मन्नत
रब ही अब आशना, नाखुदा परेशां हो मेरी यह जन्नत
अहलोदिल गम न कर, तेरा मुस्कराना अब जहां की मालियत
रचियता : कमल भंसाली

😱अंतिम कविता 😱 रिश्तों के संदर्भ में 😭मुक्तक के रुप में 😲कमल भंसाली

गम इतने है कि किस किस किस को याद करुं
जख्म खाये दिल ने इतने किस पर मलहम करुं
गैर भी इतना दर्द नहीं देते अपनों की क्या बात करुं
फूल जब कांटे बन जाये तो जीने की क्या बात करुं

हर गम इतना आसान नहीं कि उसका बयान करुं
वफ़ा की कीमत होती बेवफाई पर क्यों ध्यान करुं
जीने की कई वजह है तो उम्र की क्यों गिनती करुं जहर पीना आसान तो अमृत पर क्या विश्वास करुं

कल के सपनों की आज हक़ीक़त कुछ और है
बुरे समय में हर रिश्ते की दीवार बहुत कमजोर है
अंतिम समय में हर सादा पन्ना भी शंकित दागदार है
कुछ नहीं बचा अब सिर्फ अंतिम सांस का इंतजार है

दोस्तों, हर गम का अपना इतिहास है कैसे बयां करुं
अपनों के दिये सरबती गम भारी कैसे उन्हें कम करुं
बोझिल सी मुस्कराहट कैसे दर्पण पर विश्वास करुं
है,खुदा इस बन्दे को समझा कैसे अपना उद्धार करुं

माना अंतिम कविता बड़ी बेरुखी दे देती
पर अंदर के छिपे दर्द को शुकुन भी देती
चंद क्षण ही सही कुछ तो सही सा गुजरा
दर्द कुछ अंदर भी रहा पर सत्य से निखरा

अपने सपने जब पराये नयनों में बस जाते
तो गम के अहसास नासूर बन दिल में दुखते
रिश्तों के धागे को चूर कर स्वयं भी बिखर जाते
अनुभव की दुकान में बिन मूल्य ही बिक जाते

चलो हकीकत यही स्वीकार करने को कहती
जिंदगी अपनों के रहम से नहीं स्वयं ही चलती
अब गम नहीं सताते, दर्द की दुकान नहीं लगती
समझ गई जिंदगी, जीने की भी कोई कला होती

💘इंसाफ का दरवाजा💘 कमल भंसाली

नसीब की बारिश
इस तरह बरसती रही
आंखे भीगती रही
ख्वाइसे दिल जलाती रही
भूल गई जिंदगी
सब कुछ
आस्थाओं के संगम में
प्रेम को तलाशती रही
नहीं जानती
दर्द के शैलाब
जब बेताब हो जाते
तो मकसद सारे
सिमट कर रह जाते
नम नयनों के आंसू
पलको पर ही सुख जाते
नसीब…..

तन्हा हो मन
दिल को समझाता
अपनों के होनें का
दिलाशा देता
पर एक भी स्पर्श
मरहम लगाने से कतराता
अपनों की दहलीज से
जब कोई खाली हाथ लौटता
मत पूछिये
गुनहगार न होते हुए भी
दिल उम्र भर दर्द की
सजा पा जाता
अपने ही वजूद में
तन्हा हो जाता

वक्त फिसलता रहा
जिंदगी लड़खड़ाती रही
दस्तूरी दुनिया
हंसती रही
मर्म की किताब खोली
नसीहते मुस्कराती रही
एक अदद् ख्बाब
क्या टूटा
गफलत की चांदनी भी
दाग को गिनाती रही
दुनिया इसे
मेरी नसीब की बरसात कह
मजाक उड़ाकर
मेरे अपने वजूद को नकारती रही
है, खुदा बता जरा
इंसाफ किसके पास रहा
आज तक मैं किसका दरवाजा खटखटाता रहा….रचियता✍ कमल भंसाली