👌काया की माया👌 कमल भंसाली

 

चमड़ी से ढकी, ये हाड़ मांस की काया
भ्रमित हुई देख के, निर्जीवता की माया
सबकुछ पाने के लिए, अपने को लगाया
बता इंसान, तुमने अभी तक क्या पाया ?

जानना जरूरी, पहला सुख है, निरोगी काया
न रहेगी तेरी काया, तो जीवन से, क्या पाया ?
संसार, मरीचिका का जंगल, साधनों में समाया
जो भटक गया, वह वापस कभी न आ पाया

देह धर्म की भी होती है, कोई संस्कारित मर्यादा
निर्जीव साधनों को कभी देखा, पूरा किया वादा
जीवन जब तक रहेगा, तब तक है, सब तुम्हारा
उस दिन को याद रख, जब मिटेगा वजूद तुम्हारा

समझ, लक्ष्मण की सीमा रेखा, न कर इसे पार
अंत सब का होता, उसके बाद तो है, अन्धकार
समय की अवधि होती, पर चाह कहां है, रुकती
निर्मुक्त काया,क्यों तुच्छ कोड़ियों के सामने झुकती ?

छोटी सी जिंदगी, बहुत कुछ सन्देश दे जाती
जग में आने की कोई वजह, तो जरुर बताती
कर्म की बुनियाद पर जिंदगी,नई राह तलाशती
रुकी सांस, सब कुछ छोड़, काया जलने जाती

समझने की बात, जियों और औरों को जीने दो
आत्मा को धर्म के पथ से मोक्ष की मंजिल पाने दो
मानव गुणों को बनाओ,जीने का एकमात्र आधार
संयम से तन मन को मिलता, ज्ञान का हर प्रकार

मुकद्दर की बात है, मानव जीवन हमारी सौगात
पता नहीं, किस जन्म में फिर हो हमारी मुलाक़ात
मकसद अपना कुछ भी, काया का न करे गुमान
कल नहीं रहेगी, जिस पर कर रहें है, हम अभिमान…
♀♀ कमल भंसाली ♀♀

अछूता जीवन…..कमल भंसाली

जीवन कब रहता,अछूता
हर कोई इस को छूता
सरे राह, चलते, चलते
ये, सब कुछ भूल जाता

एक जीवन, कितना कुछ सहता
अपनेपन के द्वार पर बैठ जाता
भीख स्नेह की जब भी माँगता
कंगला, कमजोर समझा जाता

भाषा का अनुरागी बन पछताता
कडुवा सत्य बोल नहीं पाता
झूठ बिना कुछ तौल नहीं पाता
सत्य हिसाब कभी रख नहीं पाता

गुमां था, जिंदगी योंही चलेगी
सदा खुशियों की नदी बहेगी
गम की तरकश का एक, तीर
कितना बहा देता, नयनों से नीर

फूलों सा जीवन जब काँटों पर सोयेगा
तभी तो फूलों का अहसास कर पायेगा
बाती जब जलेगी, तो तैल साथ निभाएगा
पराये दर्द देख, अपना दर्द कम ही पायेगा

अंहकार का दरवाजा, खोलने से पहले
साँसों को तो पूछलो, कब तक आएगी
अभिमान किसका करना, ये तो जानलो
काया की माया, आत्म दर्पण में निहारलो

दूर रोशनदान से आती, किरणों से जानना
जीवन हकीकत है, कितने क्षण की, पूछना
अपनी नश्वरता को समझना, यहीं है, प्रार्थना
एक सांस के बाद, दूसरी की कीमत आंकना……..कमल भंसाली