🎠अस्तित्व बोध🎭कमल भंसाली

दास्तां ऐ कामयाबी जमाना हजार बार कहता

पर स्वयं के अपने वजूद को समझ नहीं पाता

फिर भी गरुर इतना की खुद में भी नहीं समाता
एक सांस के जीवन में राम से रावण बन जाता

सब कुछ समझ कर भी जीना नहीं आया
झूठ और अंहकार को ही हमराही बनाया
सत्य, जीवन की ऊर्जा है, समझ नहीं पाया

कल के अभिमान भरे ऊजालों ने इतना भरमाया
पलक खोली तो चारों तरफ अँधेरा नजर आया
कंचन की काया से जब कभी भी दिल लगाया
पतन की फिसलन पर कभी वो नहीं संभल पाया

भूल गया चार दिन की होती जवानी की चांदनी
ठंडी पड़ी काया कब तक गायेगी प्रेम रागिनी !
अमावस की रात में घूमती वासना की भूतनी
भस्म कर, अवशेष को जलायेगी बेरहम अग्नि

टूटे रास्ते जीवन पथ के हो गए मंजिल विहीन
किस भी तरफ देख पथिक, हर कोण है, संगीन
बुझी सी सांस, मिटी सी आस, जिंदगी की प्यास
नासमझ से ख्यालों से जीवन हुआ बेहद उदास

बीत गया वो वापस नहीं आता, कसक छोड़ जाता
जो बचा वो भी कभी निरहि मन न समेट पाता
दस्तूर सारे ये ही समझाते, आ लौट चले एक बार
मिला जीवन गमा के, मुश्किल समझना किस ओर !…..

रचियता ***कमल भंसाली