” क्षमा ही जीवन ” ★★कमल भंसाली★★

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किसी गैर का दर्द पीया, तो दिल ने बेहद शुकुन पाया
अपनों के दिए दर्द ने तो दिल को आज तक रुलाया
खेल रोज जिंदगी खेलती, पर अपनों से ही हार जाती
गमगीन, उदास होकर स्वयं से स्वयं ही नाराज हो जाती

हार उम्मीद को जब तोड़ती, हौसले पर ही चोट आती
बढ़ते कदमों की ऊर्जा, तय मंजिल भी अपनी भूल जाती
दर्द गैर कांटो से नहीं, अपने ही गुलशन के फूलों से पाती
फिर भी मुस्कराती रहती,पर अंदर से रोती ही नजर आती

कर्म के मरहम से ही, अपना हर गम सहलाती ही रहती
भूली बिसरी गलतियों से काफी, कुछ जिंदगी सीख जाती
वक्त की फिजा से कुछ उत्साह भरे गीतों को अपना लेती
धर्म और संयम के रास्ते को अब अपनी नई मंजिल बताती

जो कुछ किया, सब वक्त के दरिया में दूर तलक बह गया,
गलत , सही के मूल्यांकन में भ्रमित चिंतन ही पास रह गया
कल का प्यार, स्नेह, विश्वास कितना कुछ नुकसान कर गया
हर जन्म के बन्धनों की, मानों सारी कहानियां दोहरा गया

न अपने, न अब सपने कितना कुछ बदल गई, आज ये जिंदगी
न लहराना, न तरंगो का बहकाना, स्थिरता से रहना सीख गई
दर्पण के अंदाज पर अब मुस्कराती, कितना सुधर गई, जिंदगी
रात के अंतिम प्रहर में, नई सुबह की किरणे बन कर बिखर गई

मोह माया के जंगल से ऊब, नये विचारों से अपने को सजाती
दूसरों के दर्द के अहसास कर, अपनों के दिए दर्द भूल जाती
“क्षमा ही जीवन है”, अस्तित्व अपना आखिर खोज ही, वो लेती
दर्द की पीड़ा है, “आसक्ति,” जाते जाते ये, दुनिया को समझा जाती

★★★★कमल भंसाली★★★★