₹₹** पहचान**₹₹ कमल भंसाली

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वक्त न बदला, मैं ही बदल गया
कल तक सब के साथ ही चला
आज अकेला ही राही रह गया
पथ मेरा, कितना खुदगर्ज हो गया

कल तक जो अपनेपन का दंभ भरते
मेरे साथ ही अपने हर कदम बढ़ाते
नाज था उन्हें मुझपर , हमराही कहते
आज वही चेहरे, मुझे भीड़ समझते

छोटी सी “अर्थ” की एक हल्की बून्द
रिश्तों की परिभाषा का सच समझाती
भ्रमित नीर से निपजी सम्बंधों की खेती
क्यों जिंदगी, बेवजह अपनी पीठ पर ढ़ोती

कल के लिए, नभ् को मैंने कितना संवारा
फिर भी आज, डूब गया मेरा हर सितारा
देखो, भाग्य का खेल होता कितना गहरा
अपनों से ही मन को नहीं मिलता सहारा

कहने को सब है, आज भी मेरे अपने
पर दिल नहीं देखता, अब उनके सपने
उनकी निगाहों में शक ही झिलमिलाता
प्यार तो अब उनके बहानों में बह जाता

सच तो यह है, कोई किसी का नहीं होता
कपड़े उतारों, तो हर इंसान नंगा ही होता
जीवन एक रंग का सदाबहार सपना नहीं
दूसरों की मजबूरी पर हंसना गुनाह नहीं

मेरी यह कविता, नहीं एक स्वस्थ सन्देश ही समझो
जीवन में अर्थ के अनर्थ की जहरीली संभावना समझो
कल तक जिस “कमल” के फूल ने सबको महकाया
आज, मुरझा गया, तो उसका उपयोग कम नहीं समझो

रिश्तों की कमजोर दीवारे जब गिरती
जीवन के प्रांगण में जगह बढ़ जाती
शिकायत नहीं, अब ख़ुशी ही मिलती
खुद को पहचान, अब, खुद से ही मिलती……..कमल भंसाली