🌸नये वर्ष के नये संकल्प🌸 भाग 2 🌲संकल्प अनुसन्धान🌲 ✍कमल भंसाली

दोस्तों, नये साल की दस्तक हमारे जीवन में नई ऊर्जा की चाह पैदा करती है। हमें कुछ पुरानी गलत आदतों से दूर होने को प्रेरित करती है । तीन मुख्य संकल्प क्षेत्र पर हम यहां चर्चा अवश्य करेंगे जो आज के आर्थिक, सामाजिक और व्यवहारिक युग के वातावरण में हमें सक्षम बनाते है। हमारे दैनिक जीवन हम में जितने भी छोटे छोटे संकल्प करते है, उनकी धुरी इन तीन क्षेत्रों के अंतर्गत ही ज्यादा घूमती है। आइये, जाने उनके बारे में विस्तार से।

1. स्वास्थय:-

समय का सदपुयोग करना आज की सबसे बड़ी समस्या हमारे जीवन चिंतन की है, आज साधनों के अति प्रयोग से जीवन काफी निराश हो रहा है। पिछले कुछ दसक से आपसी मानवीय सम्बंधों में भावुकता भरे प्रेम के अदृश्य होने से जीवन की अनुरुदनि घुटन बढ़ रही है। मोबाइल और डिजिटल क्रान्ति की तेजी से जीवन को इतना भी समय नहीं मिल रहा कि वो जिस्म और दिमाग की व्यथा भरी समस्याओं पर सही चेतना से अवलोकन कर सके। इसका सबसे बड़ा प्रभाव इन्सान के दिमाग पर पड़ रहा और जीवन गलत आदतों का शिकार हो रहा है। पुराने समय में जहां शारीरिक श्रम जीवन को स्वस्थ रखता, आज दिमागी और मानसिक मेहनत से आँखों को सबसे ज्यादा कृत्रिम रोशनी सहन करनी पड़ती है । स्वास्थ्य तनाव तथा थकावट का अनुभव हमारा दैनिक जीवन ज्यादा कर रहा है। नये साल में हमें स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। हम चाहेंगे, नया साल हमारे स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ ऊर्जात्मक सवेरा लाये और वो तभी संभव हो सकता है जब हम सिर्फ “Early Riser” ही न बने अपितु कुछ समय सुबह की अनुपम सैर, योग और सेवा कार्य आदि में लगाये। हमार सारे संकल्प इस सिद्धांत के तहत होना चाहिए ” पहला सुख निरोगी काया” । जीवन तभी सब चाहित साधन भोग सकता है, जब वो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सम्पन्न रहे। हम आज मिलावट के युग में तो रह ही रहे है, पर साथ में विदेशी और शीघ्र बनने वाले व्यंजनों के शौकीन भी हो गये है, जो हमारी पाचनशक्ति के लिए एक खतरनाक नई चूनोती है। स्वास्थ्य और स्वाद दोनों का सन्तुलन बनाये रखने का अगर नये साल में सही प्रयास हो तो साल भर की स्वास्थ्य चिंताए काफी कम हो सकती है।
अतः नया साल का प्रथम संकल्प स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य कारी हो यह चाहत किसी और की नहीं हमारे प्रिय जीवन की है, समझने की बात है। बाकी जीवन को जब तक सांस सही मिलती रही तब तक वो मजबूरी से भी जी लेगा, अपना यह कर्तव्य अच्छी तरह से समझता है। हम न समझे, तो क्या ?

2. आर्थिक मजबूती:-

आज अर्थ का दर्द ही संसार में ज्यादा फैला है, यह दर्द भी विचित्र होता है, कहीं इसकी बढ़ोतरी से लोग परेशान है तो कहीं इसकी कमी से । आज साधन इजाद करने वाला इंसान उसका गुलाम हो चूका है। कृत्रिम शारीरिक सुख के अधीन हो मानव अर्थ का दास बन चूका है। इसका जाल भी इतना मजबूत है कि साधारण व्यक्तित्व वाला इन्सान जिंदगी भर असन्तुष्टि के कारण तनाव ग्रस्त हो जाता है। हर नये वर्ष मे इसके प्रति हमारी चेतना एक सन्तुलित नीति तय करने का अनुरोध करती है। इस नीति में प्रमुख तत्व सिर्फ संयम ही रहे तो जीवन जरूरतमय अर्थ की ही कामना करेगा तथा इसके अनुसार अनुपालन से मितव्यता का महत्व हमारे जीवन को सदाबाहर स्वस्थ महक से प्रफुलित रखेगा। दोस्तों, गुजारिस है, आप अपने आनेवाले साल को बेहतर बनाना चाहते है तो इस सिद्धांत पर गौर कीजियेगा ” Money saved is money earned” । आज क्रेडिट कार्ड, बैंक व आपसी ऋण एक बिमारी बन कर हमें गलत पथ का दावेदार बनाने की निरन्तर कोशिश करे उससे पहले हमें इनके प्रति एक संयमित दिशा निर्देश तालिका बना लेनी चाहिए। जीवन को सुख और शांतिमय बनाना है तो ये स्वीकार करना सही होगा, ” जितनी बड़ी चदर उतना ही पैर फैलाना”। समझने की बात है, ज्यादा चिंताए हमें शीघ्र ही चिता का रास्ता दिखा सकती है । आनेवाले साल से पहले संयमित जीवन और बचत के महत्व के संकल्प अपना कर हम जीवन को सार्थकता और मजबूती दे सकते है। यह बात भी हमें ध्यान रखनी होगी कि हमारे नये संकल्पों में जरूरी अर्थ उपार्जन के प्रति नकारत्मक्ता कभी नहीं होनी चाहिये, संयम और मितव्यता कभी ऐसी सलाह नहीं देती। आज का आर्थिक दौर में कमाने के साधनों की कोई कमी नहीं है, वैसे ही अर्थ खोने के खतरे भी बढ़ रहें है, दोनों ही परिस्थितयों के प्रति जागरूक रहना सही होगा। लालच, जुआ, सट्टा, अति विश्वास, झूठी विलासिता और भी नुकसान के तत्वों से बचना हमारे लिए बेहतर होगा। शेयर बाजार के अच्छे निवेशक बने पर नकली सौदो के जुआरी नहीं। अपनी मासिक बजट योजना को उचित मॉर्गदर्शन दीजिये। आजकल बचत के सुरक्षित हजारों तरह के उत्पादन बाजार में आ रहे है, अध्ययन कर, ज्ञान बढ़ा कर, जानकारों के साथ विचार विमर्श कर हम अपनी तनाव रहित पूंजी का निवेश इनमें कर बढ़ोतरी करे तो शायद नया साल हमें एक सुनहरे भविष्य से सज कर हमारे जीवन को सुख और सम्पन्नता का अहसास दे सके।

3. समय और कर्म :

कर्म इंसान की सकारत्मक ऊर्जा तैयारी करता है और समय का सदुपयोग जीवन के प्रति स्वस्थ आस्था प्रदान करता है, ऐसा जीवन शास्त्र से सम्बंधित जानकारी रखनेवाले लोग अच्छी तरह से जानते है। आज आदमी की कीमत उसका कार्य तय करता है। कर्मशील इंसान जीवन में इसकी भूमिका को भूलता नहीं और शारीरिक स्वास्थ्य की अनुकूलता तक अपने चुने हुए व्यवसाय, नौकरी या अन्य तरह के कामों में जीवन को उलझाये रखता है, इसका कारण समय के साथ तालमेल बढ़ाना । जीवन में निराश के आगमन का प्रथम कारण ही है, समय का उपयोग न कर, खाली रहकर वक्त नष्ट करना। इंतजार ही एक ऐसा तत्व है जिसको ज्यादा सहन करना असहज होता है, निराश जीवन इसका जल्दी शिकार होता है। नये साल के लिए तय किये संकल्पों को योजनामय करने के लिए समय और कर्म दोनों ही महत्व रखते है ।हमें यह जानकर ही आगे बढ़ना होगा कि शारीरिक श्रम और दिमागी काम का आपसी संतुलन रहने से समय की भी कीमत बढ़ जाती है। हम जीवन के अच्छे और खराब क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व व सन्तुलन कायम रख सकने में सफल भी हो सकते है। सवाल उठता है, कैसे जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए हम समय का प्रयोग करे ? इस सन्दर्भ में दो तथ्य हमारा साथ निभा सकते है वो है शारीरिक चेतना और आत्मिक ज्ञान, फर्ज बन जाता है हमारा हम आलस्य और झूठ से इनको दूर रखे।

हर दिन की उपयोगिता को समझकर जीवन समर्थित कार्य को समय देने के बाद भी कुछ समय जो बचे, उसमें सुबह की शुद्ध वातावरण की प्रकृतिमय सैर, योग, ध्यान को उचित स्थान देना सही होगा। साप्ताहिक समय में अच्छा साहित्य अध्ययन, अपने पसन्दीदा मन को खुश रखने वाले कार्य मसलन दोस्तों और अपनों के साथ मनोरंजन देने वाले प्रोग्रामों में सम्मलित होना, जिससे दैनिक तनावों से राहत मिले। साल में एक बार अपने पसन्दीदा पर्यटन के लिए सोचना अच्छा संकल्प कहा जा सकता है। आशावादी परिणाम प्राप्त करने के लिए हमें सी.बी.एडवर्ड के इस कथन को ध्यान से पढ़ना होगा, ” Insight on getting the very best out of what you have to do. Be positive in your attitude. Merely negative cricism never got anyone anywhere. Moaning (कराहना) groaning (दुःखी होकर कराहना) makes work ten time harder. It is not only job you are doing makes life good. It is the spirit you put in it. ध्यान देकर अगर हम सोचे हम स्वयं के लिए भी नहीं दूसरों के लिये भी उतने ही महत्वपूर्ण बन सकते है, जब तक हम कर्म की सही मीमांसा समझते है। वैसे भी गीता के इस श्लोक से भी जीवन में कर्म का महत्व स्वयं ही समझ में आ जाता है।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि ”

सीधे शब्दों में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संसार के हर प्राणी को ये ज्ञान प्रदान किया है ” तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञान निष्ठा में नहीं । कर्ममार्ग में कर्म करते तेरा किसी भी अवस्था में कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिये न ही तू कर्मफल का हेतु बन और तेरी अकर्म में भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये”।

समय के अनुसार किये अच्छे कर्म सफलता और असफलता दोनों ही अवस्था में सन्तोष दायक जीवन को गतिमय रखते है। आनेवाले साल की सुगमता भी परिवर्तन पर निर्भर होती है, तय हमें करना होगा परिवर्तन की शुरुआत कब और उसकी दिशा किस और होगी ! *** क्रमश…..

लेखक: कमल भंसाली

😃मंजिल की खुशबू 💆✍ कमल भंसाली

सपनें हजारों देखे तुमने प्यारी जिंदगी
ख्याल भी बहुत आते तुम्हें प्यारी जिंदगी
समझ जरा हर आहट को आना नहीं कहते
दूर के ढोल तो सदा योंही सुहाने लगते
सपने सच नहीं होते, सब ख्याल अपने नहीं होते

आ जरा
बैठ मेरे पास
दे, अपना हाथ
अब समझ जरा
जीने का राज गहरा
मेहमानी अंश हम में है भरा
समझ ज्यादा सुविधाओं का खतरा
तन मन जिसने बनाया हमारा
वो रखता सारा हिसाब तुम्हारा

हर कोई, किसी का साथ नहीं निभाता
हर दीप पथ को आलोकित नहीं करता
तुम निहार, सबको सबका एक ही यथार्थ
इस जहां का दस्तूर प्यार में भी होता स्वार्थ

हर क्षण, यह समझाता
कर्म ही सच्चा दोस्त
हर, हकीकत में साथ निभाता
फल कुछ भी मिले
स्वीकार दिल से करता
नये आयामों से उसे सजाता
फिर, हमसफ़र बन साथ सदा निभाता
तेरी चाही मंजिल तक तुम्हें पंहुचाता

न गम कर न पाने का
न मायूस हो
किसी के बेगानेपन का
आगे तेरी, प्यारी मंजिल
कर रहीं, इंतजार तेरे आने का
आ ले चलता, उस राह पर
जहां अपनी मंजिल से
मिलकर, हर कोई मुस्कराता
अपने होने के अहसास को
नन्हीं आशा की बूंदों से खुशनुमां बनाता
हर ख्याल, हर सपना
जिसके आलिंगन को तरसता…रचियता✍कमल भंसाली

💅कर्म का मर्म “धर्म” ✍कमल भंसाली✍ प्रथम चरण

“धर्म” मानव के लिए सिर्फ एक शब्द नहीं अपितु एक सुखद आत्मिक स्पर्श है, साथ में मानव कर्म की सात्विकता के अंश की मीमांसा भी है। सीधा साधा धर्म किसी भी भव्यता का भी मोहताज नहीं है, न ही वो आडम्बरों और पंथो की डोर से बंध कर कोई नीतिगत सिद्धांत तय करता है। इंसानी फितरत धर्म की लाखों परिभाषाएं बना ले , पर सच यही है, “धर्म कभी भी प्रदर्शित नहीं होना चाहता”, वो हमारे दैनिक कर्मो द्वारा अर्जित परिणामों के फल से स्वयं ही दृष्टिगत हो जाता है। धर्म का सम्बंध हर जीवित प्राणी से है, धर्म का शरीर और आत्मा दोनों से ही सम्बंध रहता है। कुछ आधात्यमक शास्त्रों के अधीन होकर हम यह भी कह सकते है कि हर आत्मा की एक ही चाहत होती है, वो अक्षुण रहें कहीं से भी खण्डित न हों जिससे उसके वापसी सफर में कम कष्ट हों या न हो । धर्म इसमें उसको सहयोग करता है। आत्मा एक चीज से बहुत घबराती वो है मन की चंचलता। मन की चंचलता सांसारिक सुख और दुःख दोनों का निर्माण करने की क्षमता रखती है। हम जीवन के धार्मिक पहलू पर दृष्टिकोण तय करे, उससे पहले हमें एक नजर इस श्लोक पर जरुर डालनी चाहिए, शायद जिससे हम कुछ हद तक धर्म कि परिभाषा के आसपास के माहौल से परिचित हो सकते है।

अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेयन्द्रिय संयमा ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशक धर्म साधनम् ।।

( अंहिसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप, और ध्यान धर्म के साधन है।)

सवाल यह भी किया जा सकता है, क्या इनके अलावा बचे कर्मों में अधर्म समाया है, नहीं, सच्चे आत्मिक चिंतकों के अनुसार चेतनामयी आत्मा जिस कर्म की अच्छाई को पुष्टि कर दे और उस से दूसरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे तो वो कर्म भी धर्म की सांकेतिक परिभाषा के अंतर्गत ही आता है।धर्म कि हम सब बातें और चर्चा करते है, पर हम उससे कितने प्रभावित है और हमारे जीवन में उसकी क्या भागदारी है ! ये एक सत्य सवाल है, जो हर एक की आत्मा जीवन के अंधेरों में स्वयं से पूछती है। हालांकि सन्तोषजनक उत्तर कर्म से ही जाना जा सकता है, पर यह पूर्ण सत्य की कमी की वजह से जान पाना जटिल है।अति संपन्न धर्म शालीनता चाहता है, उसे अपने नाम की चर्चा में जरा भी उग्रवाद या प्रशंसा की चाहना पसन्द नहीं है। माना जाता है, मानव जाति के उदय के साथ धर्म और कर्म का भी उदय हो गया था। हालांकि कर्म ने पहले जीव विज्ञान के तहत अपना वजूद मानव को स्वीकार करा दिया। कर्म मानव की पहली जरुरत थी, अपने आपके अस्तित्व को बचाने के लिए। कुछ कर्मो के नकारत्मक फल पाने के बाद मानव ने कर्म की नैतिकता पुष्टि के लिए आत्मिक तराजू पर उसे तोलना शुरु कर दिया तब ” धर्म” की शालीनता हर प्राणी तक को समझ में आने लगी। अब हम “धर्म” शब्द को भारतीय परिवेश में बतलायी परिभाषा के अंतर्गत समझने की कोशिश करते है। वास्तव में धर्म एक संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ बहुत व्यापक है। ध + र + म = धर्म । ध देवनागरी वर्णमाला का 19 वा अक्षर और तवर्ग का चौथा व्यंजन है। भाषाविज्ञान के दृष्टि से यह दन्त्य, स्पर्श, घोष, तथा महाप्राण ध्वनि है। संस्कृत के अनुसार धा ( धातु ) + ड विशेषण- धारण करने वाला, पकड़ने वाला होता है। यानी जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म कभी विभक्त नहीं हुआ, न ही गलत परिभाषित होता है, पंथों के आडम्बरों में कितना धर्म सही है, यह एक तर्क का विषय भले ही हो पर धर्म की परिपक्वता सत्य से पोषित होने कारण उसकी अखण्ड पवित्रता आज भी बरकरार है। इसलिए ये हमें सदा सुनने को मिलता रहेगा कि” धर्म की जड़ हरी होती है”। ये प्रकृति का धर्म के प्रति अपना विशिष्ट अनुराग है।

चूँकि धर्म जीवन का एक हिस्सा है, अतः आत्मबोध से उसकी अपनी अनुबन्धनता है। यही आत्मबोध हर इंसान की कमजोरी और मजबूती का निर्माणिक तत्व है। अगर धर्म के वैज्ञानिक पहलू पर एक नजर से चिंतन करे तो हमें धर्म को जाती, पंथ, समुदाय, देश और काल से विच्छिन करना जरुरी होगा क्योंकि ये इंसानी जरुरत की इजाद की हुई धाराणायें है, जिनमें ऐसी कोई भी गारन्टी नहीं मिलती कि ऐसा करने से हमें देवत्व या आत्मा को निर्वाण मिल जाएगा। इस कथन को सहजता से स्वीकार करने में स्वामी विवेकानन्द यह सन्देश शायद सहयोग करे जिसमे उन्होंने कहा है ” तुम्हे अंदर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हे पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्हे आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई गुरु नहीं है”। वास्तिवकता भी इस बात को स्वीकार ही करेगी की धर्म सात्विक रसात्मक तत्व है, सदा अप्रभावित रहता है, न यह किसी से कलंकित किया जा सकता न ही ये किसी से आलोचित हो सकता। दस सहः तत्व से निर्मित धर्म जीवन को अखण्डता, विशालता, आत्मिक सम्पन्नता, उसकी अपनी नैसर्गिक का सही अनुभव कराना चाहता है। हर मानव, धर्म के इस सूक्ष्म चिंतन को नकारता भी नहीं पर पूर्णता से भी इसे स्वीकारता भी नहीं, दुःख या उसकी मजबूरी कह लीजिये सीधे सरल समुज्ज्वल सत्य पर उसका विश्वास जीवन की कई अँधेरी टेडी मेड़ी पगडंडियों पर अक्सर डगमगा जाता है। मानव कि इस कमजोरी ने “माध्यम” को जन्म दिया, जिसकी शायद ही कोई जरुरत नहीं थी। पर वक्त की अपनी करामत होती है, उसका आनन्द वो कई तरह से लेता है। मानव वक्त का एक हिस्सा है, अतः “धर्म” का बाहरी स्वरुप भी प्रभावित होना लाजमी हो गया और क्षेत्रीय स्थल के अनुसार समझा जाने लगा। हम अपने देश के सन्दर्भ में इस पर ज्यादा चिंतन नहीं कर सकते, क्योंकि हर सकारत्मक और नकारत्मक क्षेत्र में लोग अपनी सुविधा अनुसार इस का सिर्फ शाब्दिक उपयोग करते है, जिसकी परवाह अमृतमय धर्म कभी नहीं करता। धर्म सिर्फ उस विशेष मानव से ही सम्बंध रखता है जो उसके अस्तित्व को स्वीकारता है, सामूहिकता से उसका कोई सम्बंध शायद ही हो। आर्थिक युग में धर्म को सामूहिक रूप देकर पुण्यता की खरीद समझना सिर्फ एक मानसिक क्रिया का ही स्वरुप है। निज- धर्म की शुद्धता की कसौटी स्वयं इन्सान का अर्जित आत्मिक सन्तोष ही होता है। जब कोई आडम्बरो से सजा समुदाय, जाति, पंथ या देश जब धर्म निर्देशक होने का दावा करता तो कहने में संकोच नहीं हो सकता उनका उद्धेश्य धर्म को समझने में संकुचित ही है, या फिर, किसी अस्वीकृत छवि को प्रचलित और प्रसारित करने का प्रयास मात्र है ।

कहते है, राजा हरिश्चंद्र ने सत्य से बंध कर ही धर्म को अपना जीवन आधार बनाया और कभी भी कर्तव्य के प्रति अपनी आस्था को मोह, स्वार्थ, झूठ, फरेब, लालसा, असंयमन आदि नकारत्मक चिंतन का शिकार नहीं होने दिया। जिंदगी सभी के पास एकल रुप में सीमित अवधि लेकर आती है, अपूर्णता के जंगल में सही राह भूल जाती है और स्वयं निभने वाले धर्म से दूर होकर जब उसे अपनी विपरीत दिशा में होने का अनुभव शुरू होता है, तो धर्म को पाने के लिए छटपट करने लगती है। संसार की विचित्रता को देखिये, जो धर्म अपने हम में स्वयं समाहित हो एकान्तिय होना चाहता है, अपने प्रत्येक तत्व के साथ मसलन सच, संयम, धैर्य, सेवा, स्नेह, प्रेम,साधना, अहिंसा और तप उन्हें हम अनदेखा कर झूठ, भोग, अधैर्य, तिरस्कार, घृणा, हिंसा, अंहकार आदि संसारिक मंजिल प्राप्ति के साधनो को अधिक महत्व देते है। अफ़सोस इतना ही है जन्म से जीवन के अंतिम क्षण तक की सवेंदनशील स्थितियों में जहां इन्सान का हमराही प्राकृतिक धर्म होना चाहिए, वहां व्यवहारिक आडम्बर कितनी शान से खड़ा मुस्करा रहा होता है। हमारे परिमार्जनीय कर्मों में ही शायद संभावित धर्म माखन के रुप में सम्माहित है, हमें इसलिए अपने हर कर्म का आत्ममंथन नियमानुसार करने की जरुरत है। वैसे भी उपदेश से ज्यादा धर्म को साथ साथ रखने की कोशिश में स्वयं का स्वयं ही आत्म मूल्यांकन करने का प्रयास सर्वश्रेष्ठ होता है, ये मेरी नहीं जीवन सुधारक विशेषज्ञों की राय है …..क्रमश …लेखक *** कमल भंसाली***

नकारत्मकता से सकारत्मक्ता का सफर.एक दृष्टिकोण ..बेहतर जीवन शैली भाग ११ अंश २

सच ही कहा है, किसी ने नजरअंदाज कर देने से कोई भी अदृश्य नहीं होता, यह रवैया जिंदगी के कर्म क्षेत्र में शायद ही हमें कोई सफलता का सूत्र दे , अपितु हमारा एक कदम असफलता की तरफ मोड़ सकता है। नकारत्मक्ता जिंदगी की से पैदा हुई समस्याओं का कोई भी उपचार सरल नहीं होता, सामने कोई कठिन समस्या हमें आती दिख रही हो, और हम उस पर गौर नहीं करे, यह हमारी सकारत्मक सोच तो नहीं कह जा सकती। बेहतर जीवन शैली एक यात्रा ही है
नकारत्मकता से सकारत्मक्ता की, क्यों नहीं आज हम इसी यात्रा सम्बंधित चर्चा करे।

भगवान बुद्ध ने कहा जिसने मरण को समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया। उन्होंने जिस भी सन्दर्भ में कहा हो,
पर इसमे एक संकेत है, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते, यही की हर प्रारंभ्भ का अंत जरुर है। हमारी दैनिक दिनचर्या की जब हम शुरुआत करते है, तो कई कार्यों में कुछ अनसुलझी समस्याएं भी रहती है। हमें उन समस्याओं का समाधान अगर करना है, तो उनका सही विश्लेषण ही कारगर उपाय सूझा सकता है। अगर हम सही परिणाम के विरुद्ध जाते है तो शक्ति क्षय ही होना है। ऐसी समस्याओं में उनके विपरीत परिणाम को मानने से क्षति भी सीमित होगी। एक बात यहां स्पष्ट करनी जरुरी है, कि जहां सही सिद्धान्तों की रक्षा करनी जरुरी हों, वहा संघर्ष जारी रखना उचित होगा। हमारा देश आज भी नैतिकता के मामले में कमजोर हो रहा है, जबकि शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा है। धर्म, कर्म के महत्व पूर्ण ज्ञान की यहां नदियां बहती है, परन्तु उसका सदुपयोग कम होता है। आडम्बरों से दूषित होने वाली ज्ञान गंगा को सब साफ़ रखने की हिदायत तो जरुर देते है, पर जरुरत पड़ने पर वहीं उसको मैली करने में संकोच नहीं करते है। इसे हम हमारी कमजोरी ही माने, यह ही सही होगा।

भगवान बुद्ध ने मरण को समझने की बात कहकर बहुत से दृष्टिकोणों की तरफ इशारा किया, मरण यानी मृत्यु या फिर मौत हम इसे किसी भी नाम से पुकारे, हकीकत यही है, कि यह जीवन रेखा का अंतिम किनारा है। यह रेखा सिर्फ प्राणियों के लिए ही नहीं, अपितु संसार की सभी संचालित पद्धतियों पर भी लागू होती है। दूसरे रुप में इसका स्वरुप बदल जाए, पर सीमा यह तय ही रखती है। हम किसी भी समस्या को ले ले, उसका भी अंत तो तय है, स्वरुप और परिणाम चाहे हमारे पक्ष में नहीं भी हो। वास्तिवकता यही कहती है, हम अगर यह समझ जाते है, तो कोई भी परिणाम हमे झकझोर नहीं सकता और शायद न ही जर्जर और कमजोर कर सकता।

कहते है, बहुत सारी मानवीय समस्याएं परिस्थितियों से नहीं मानव के व्यवहार से पैदा होती है, और उनका निदान प्राकृतिक गुणों से ही सही ढंग से किया जाता। यह भी हमें बताया गया कि ‘क्रोध’ और ‘असंयम’ दो ऐसे जीवाणु है, जो अगर जीवन में लग गए तो विनाश का प्रथम चरण शुरु कर देते है, प्रारम्भ में ही अगर इनका इलाज “प्रेम” से कर दिया जाय, तो कैंसर की तरह फैलने की कम संभावना रहती है। सवाल उठ सकता है, “प्रेम” ही क्यों ? इसका सबसे बड़ा कारण मनोवैज्ञानिकों ने बताया प्रेम में शीतलता और विश्वाश दोनों का समावेश रहता है, जो पीड़ित को सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है। किसी भी इलाज की पहली जरुरत है, कि हम अपने दिमाग को व्यवहार सिखाये, उसे सही के लिये सहमत होना जरूरी है। महान चिंतक अलफ्रेड नार्थ के अनुसार ” We cannot think first and act afterward”। अलेक्स. फ. ओसबोर्न ने अपनी पुस्तक “Applied Imagination” में किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए कुछ सुझाव दिए है, उस मे सबसे महत्व्पूर्ण पहला कदम किसी भी समस्या के समाधान की शुरुआत उसका सही विश्लेषण बताया। उनके अनुसार समस्या की कोई न उम्र होती है और न ही उसकी सीमारेखा। सही और सटीक एक कदम किसी भी समस्या का निदान करने की क्षमता रखता है। वहीं बुर्क बार्टन के अनुसार ” जो अपने में विश्वास नहीं करते, वो कोई भी समस्या को नहीं सुलझा सकते”।भारतीय चिंतकों की अगर बात करे तो वो ज्यादातर भगवान का सहारा लेने की बात करते है। परन्तु हकीकत के पन्ने यही कहते है, जिसने बिना फल की आशा किये, कर्म को महत्व दिया, वो अपनी कई समस्याओं का समाधान स्वतः ही पा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म का सही संदेश दिया है, यही काफी सही समाधान हमारी समस्याओं का कर सकता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्त्वकर्मणि ।।
(कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। कर्म को फल की इच्छा से कभी मत करो, तथा कर्म ना करने में भी कोई आशक्ति न हो।)

‘गीता’ ही नहीं प्रा:य सभी धर्मो के ग्रन्थों ने कर्म और परिश्रम को ही जीवन बदलने वाला शस्त्र माना है। परन्तु कर्म में जब तक आस्था का समावेश न हो, तो परिणाम अनचाहे ही मिलेंगे। जीवन सब दिन परिवर्तन के अनुरुप अपनी क्षमता का विकास तभी करता है, जब हम अपने जीवन को स्वच्छ और साफ़ रखे। सहनशीलता, धैर्य, प्रेम, धर्म, सच्चाई ये पांच तत्व है, जो जीवन को बेहतर जीवन शैली प्रदान करते है। दैनिक जीवन में आधुनिकीकरण से नकारत्मकता की जड़े काफी मजबूत हो गई, इसका कारण उपरोक्त पांच तत्वों का समावेश दैनिक जीवन में काफी कम हो गया। अब अनुसन्धान करने वाले भी मान रहे है कि कई विपदाये तो मनुष्य से ही निर्मित ही होती है। प्रकृति ने प्राणियों को सुख के साधन देने में कभी कोताही नहीं बरती पर मानव ने सदा उसका दुरुपयोग ज्यादा किया, निश्चिन्त है, कीमत तो चुकानी ही होगी। इसलिए हमारा सुधार होना जरुरी है, हमे अपनी आदते, चिंतन,कर्म का तरीका सभी को प्रकृति अनुकूल बनाना शुरु कर देना चाहिए।

नकारत्मक चिंतन अगर हमारे जीवन को धुंधला कर रहा है, हमें असमाजिक दृष्टि से देखा जाता है, और हम ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे और हमारा व्यक्तित्व दबा दबा रहता है। मनोविज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करने से कुछ दिशा निर्देश हमें मिल सकते है। कुछ संकेत उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है। उनसे हम अपने दृष्टिकोणों का समय समय पर मूल्यांकन करे, तो जीवन को सही राह की तरफ ले जाया जा सकता है।

1. हमारी आयु अनिश्चित है।
2. जितना उपयोग हम साधनों का करते है, उससे स्वास्थ्य और दिमाग का सन्तुलन न बिगड़े।
3. नैतिकता पर ही हमारी स्वतन्त्रता इतराती है, नैतिकता का अवमूल्यंन न हो, यही सही दृष्टिकोण है।
4. सही कर्म से ही जीवन को आनन्द मिलता है।
5. गुनाह कितना ही छोटा क्यों न हो, हानिकारक ही होता है। सांप का बच्चे का क्या छोटा ,क्या बड़ा होना ?
6. एक असत्य आदमी को कई तरह से बीमार करता है, संभव हो तो बचना चाहिए।
7. आधी से ज्यादा समस्याएं एक सत्य के द्वारा सुलझाई जा सकती है।
8. अनुशासन जीवन को बांधता नहीं, उसे बहुमूल्य बनाता है।
9. प्रेम में विश्वास की विशेष भूमिका होती है।
10. आस्था ही धर्म का पहला चिंतन है।
11. रिश्तों की गरिमा ही उत्सव प्रदान करता है
12. मानवता के प्रति हमारी गंभीर जिम्मेदारी होती है।
13. प्रकृति का सही उपयोग ही हमें स्वस्थ रख सकता है।
14. इज्जत और सम्मान की जितनी चाह हमारी, उतनी ही सबकी।
15. माता, पिता और परिवार से खुशियों का आभाश हो सकता है।

ऐसे और भी कई जीवन उपयोगी चिंतन हम साहित्य और धार्मिक गर्न्थो से प्राप्त कर जीवन को बेहतर शैली से सुंदर बना सकते है।

माँ पूर्णानन्द ने अपने किसी प्रवचन में कहा ” जो मैं अपनी इच्छा से करता हूं, वो मेरे दिमाग की अपनी दासता है। जो मुझे करना चाहिए,वो करता हूं, सफलता पाने के लिए। परन्तु जो कुदरत के अनुसार घटित होता है,उसे सच्चे दिल से स्वीकार करता हूं, वो भगवान की कृपा है” घटनाकर्मो से युक्त संसार में अगर हम धैर्य से सब सुख-दुःख सहजता से सहन कर लेते है, तो यकीन मानिए हम जीवन बेहतर जीवन शैली के अनुसार ही जी रहे है। एक सन्तोषपूर्ण जीवन आनन्द का अनुपम स्त्रोत होता है। हमें नहीं भूलना चाहिए आखिर इस संसार में हम कुछ समय के यात्री है, हमारा उद्धेश्य यहां की व्यवस्था को प्रेम, भक्ति, संयम, धैर्य, और कर्म के द्वारा समझ आनन्द सहित निष्कलंक वापस लौट जाना है।…….कमल भंसाली

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली ….एक चिन्तन

आदमी कितना ही ज्ञानी और शिक्षित क्यों न हो उसकी पहचान बिना धन के नगण्य हो जाती है | धन अपनी क्षमता से सभी कमाते है | समय था, धन इतना अपेक्षित मायना नहीं रखता था, आदमी रोटी कपड़े के प्रबंध से संतुष्ट हो जाता था |
कर्म प्रधान जीवन होते हुए भी मान सम्मान को बराबर महत्व देता था | आज साधन प्रदान जीवन जीने वाला सिर्फ अर्थ को महत्व देता है, स्वास्थ्य पर ध्यान देना उसकी पूरी मजबूरी है,अन्यथा वो बेपरवाह जीवन ही जीता |

एक सवाल जो सही उत्तर चाहता है की क्या अति साधन का उपयोग कर आज का “मानव जीवन”ज्यादा सुखी है ? सवाल की तह तक जाने से पहले यह जानना ज्यादा सही होगा, आखिर जीवन है, क्या ?”जीवन” किसी भी मानव को धरती पर रहने की अनुमति है, जन्म के बाद, इसे हम temporary visa भी कह सकते है | हर मानव को सीमित समय ही मिलता परन्तु दिमाग अनंत क्षमताओं से भर पूर होता है | आदमी को बनानेवाले ने एक गुण मापक भी दिया ताकि अपनी गलती का अहसास करता रहे, की क्या वो जो भी कर रहा है, वो सही है, हम उस यंत्र को “आत्मा”के नाम से जानते है | शरीर, दिमाग और आत्मा एक दूसरे से जुड़े है, तथा हम इन्हें हमारे जीवन के त्रिदेव भी कह सकते है |
दिल और मन एक ही सिक्के के दो पहलू है ये ही हमें प्रोत्साहित करते की हम कैसे अपने जीवन को बेहतर बना सकते है | आइये, जरा वर्तमान की तरफ रुख करते है |

आज युग पूरी तरह से परिवर्तन हो गया, आधुनिकता तथा विज्ञान दोनों ही समान रुप से एक दुसरे का सहयोग कर रहे है | जो आज कमजोर साबित हो रहे, वो है, संस्कार, चेतना, शरीर, प्रेम, स्नेह, संयम और आत्मा | दिमाग ने शरीर का तथा आत्मा का साथ छोड़ कर आधुनिकता और विज्ञान का साथ देना शुरु कर दिया | ये एक विपरीत क्रिया है जो आगे जाकर अपनी अशुभता का परिचय देगी | सच तो मानो रूठ कर कोसो दूर चला गया उसकी छवि आत्मा में दिनोदिन कमजोर पड़ती जा रही है | मोबाइल को ही लीजिये पता नहीं कितने झूठ का आदान प्रदान इसके द्वारा रोज किया जाता है | किसी लेखक ने कभी अपने एक जासूसी पात्र से कहलाया “जितना बड़ा जूता होगा, उतनी ज्यादा पालिस की जरूरत होगीं” | आज के दैनिक जीवन का यही हाल है | सुबह उठते ही मंजन से लेकर रात को सोने तक हम इतनी वस्तुओं का प्रयोग करते है, जो हमें बाजार से लानी पड़ती है, कर्म से ज्यादा हम भोग करने लग गये |

आज कुछ सवाल हमारे अपने लिए स्वयं से पूछने जरूरी हो गये | हम चाहे तो जबाब न दे पर अपने आप से भागकर
हम कहां जायेंगे, जब तक देरी हो उससे पहले कुछ आत्म अवलोकन करने में हर्ज ही क्या है ? सबसे प्रथम हम अपने आप से पूछते है, ” हमारे जीने का मकसद क्या है, साधारण जीवन या थोड़ा विशिष्ठ जीवन या फिर पूर्ण सहज विशिष्ठ जीवन” ?

साधारण जीवन एक बिना या सीमित चिंतन का जीवन है, ज्यादातर इस जीवन को ही जीते है. विशिष्ठ जीवन वहीं जीते है, जो इसका मूल्य मन से समझते हैं, उनके दिमाग में कुछ अलग और शानदार जीवन जीने की तमन्ना रहती हैं |
सहज विशिष्ठ जीवन वो ही जीता है, जो अपने सत्कर्म और पूर्ण सत्य से जीवन को मूल्यांकित करते है और इस युग में अब इनका मिलना दुर्लभ ही कहा जा सकता है |

आज के दौर में थोड़ा विशिष्ठ जीवन जीना काफी महत्व पूर्ण है, इसके अंतर्गत शारीरक रूप से स्वस्थ, मानसिक दृढ़ता, आर्थिक सक्षमता, मानवीय व्यवहारिक दृष्टिकोण और धार्मिक संस्कार प्रवृत्ति का होना अत्यंत जरूरी होता है | चंद इन्सान ऐसे होकर अपने होने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करते है | ये किसी भी श्रेणी से आ सकते है,चाहे वो वैज्ञानिक या इंजीनियर या खिलाड़ी या व्यापारी हो |

उनकी ये सब “श्रेणिया” उनका परिचय ही होता है, बाकी उनके द्वारा किया जन कल्याण कार्य ही उनका सार्वजनिक व्यक्तित्व तय करता है | हकीकत में इसे ही जीना कहते है, बाकी को हम खाना पूर्ति श्रेणी में ही रख सकते है |
यह मानना भी यहाँ गलत होगा जो संयम से जीते है, वो सिर्फ अपने लिए जीते है, वास्तव में ये वो अच्छे इन्सान होते है जो जीवन को ज्यादा मानसिक शांति पूर्ण बनाना चाहते है तथा उन्हें अपनी सीमाओं की जानकारी होती है |
अत: हम अगर ऐसा जीवन जीते है, तो सही जीवन ही कहा जाएगा और हमें अपने वजूद पर गौरव होगा |
आइये जानते है, हम इसे कैसे कर सकते है …….?

बचपन तक की यात्रा बिना पारिवारिक जिम्मेदारी की होती है, जिसमे शारीरिक और मानसिक ऊर्जाए तेजी से बाहरी वातावरण के अनुसार अपना विस्तार करती है | शरीर ओर चिन्तन में बाहरी और भीतरी स्वरूप में परिवर्तन के आसार नजर आने लगते है | जीवन अपनी नई जिम्मेदारियों के माहौल के प्रति संतुलन बनाये रखने की चेष्टा में लग जाता है |
यह समय काफी सवेंदनशील होता है, यौवन अपनी चरमसीमा की तरफ अग्रसर होने लगता है | भटकाव की भूमिका नये मधुर संपर्को के लिए लालायित रहने लगती है | ऐसे समय संयम ही एक उपाय होता है, जिसका उपयोग नितांत जरूरी होता है | हकीकत में, शानदार सफल या निराशा से ग्रसित व्यक्तित्व की बुनियाद इसी उम्र से शुरु होती है |…..क्रमश

कमल भंसाली