⭐आज⭐ कल😴 आज🎃 कमल भंसाली

सिर्फ, कल की तरफ न झांको
“आज”पर भी जरा नजर करो
कितना सुंदर शुसील लगता
रंग बिरंगी जानी अनजानी
घटनाओं से सज कर खड़ा रहता
सतत प्रयासी शांत स्वभाव
पल की बुनियाद पर जन्मा
“आज” के नाम से जाना जाता
अपनी सीमित आयु से न घबरा
इतिहास बन मुस्कराता
सदा बहार होनें की खुशबू फिजा में बिखेर जाता
कल….

आने वाला कल का दरवाजा
अनिश्चिताओं से भरा
आज में सुनिश्चित सवेरा
बिता कल अफसोस निर्माता
आने वाला कल सिर्फ सपनें दिखाता
आज जब कल में ढलता
सुरमई शाम से पहचान कराता
अपने सब अधूरे काम उसे सौंप देता
सफल रुप रेखा में भविष्य दृष्यत करा जाता
कर्म फल के बीज से फलित होनें का आशीर्वाद दे जाता
कल…

आज ही कल, कल ही आज
न कोई पहेली, न कोई राज
कहती संत कबीर दास की वाणी
पूरी सच और भविष्य सुहानी
“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होगी, बहुरी करेगा कब”

बन्धु रे
बीत जायेगी जिंदगी, आज नहीं तो फिर कल
जीवन के राही, आज ही पथ, उसी पर चल
सामने खड़ी कल की इन्तजारित इच्छित मंजिल
कब ख्याल बदल जाये, उस से पहले कर हासिल
कल…

✍ रचियता✍🍂कमल भंसाली🍂

🐾संस्कार🐾 कमल 


” संस्कार” शब्द की व्याख्या करने से पहले हमें जीवन की उस अनुभूति के बारे में हर दृष्टिकोण से थोड़ा चिंतन करना जरुरी हो सकता है , जिनमे मानवीय संवेदना अपना अस्तित्व तलाश करती है। आज की भौगोलिक स्थिति में हमारी भूमिका की साख अगर कोई है, तो हमारे “संस्कार”। भारत की सम्पन्नता में आज तक संस्कार की अहम भूमिका रही और आज भी उसकी तलाश किसी ने किसी रुप में की जाती है। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले हम यह जानने की कौशिश जरुर कर सकते है कि विरासत में मिली यह गुणवत्ता क्या हमारे जीवन में आज भी मौजूद है ? सच्चाई से अगर उत्तर दिया जाय तो कह सकते है, कि अब इसका अंतिम स्वरुप ही हमारे पास है, और वो भी रुग्ण अवस्था में। जरा गौर कीजिये, जिस देश में नारी को देवी और माँ, बहन के रुप में देखा जाता था आज उसकी स्थिति कितनी दर्दनाक हो रही है। जहां परिवारों में माता-पिता और बुर्जगों को सही सम्मान दिया जाता, आज वो अकेलेपन की हतासा के साथ जीवन बिताने को मजबूर हो रहे है। भारतीय जीवन कुछ समय से पहले तक दासता के अंतर्गत ही रहा, चाहे वो राजा महाराजाओं का था, या विदेशियों का, उसके अनुरुप ही साधनों की सीमितता भी थी । देश जब स्वतन्त्र हुआ, तब उसके सामने गरीबी एक चुनौती के रुप में सबके सामने खड़ी थी। देश बंट कर हमें मिला, पर समस्याओं के सहित। हमारी पुरानी संस्कृति के संस्कार की समर्थ भूमिका ने हमारे अभी के जीवन को बेहतर बनाने में अपना बहुत कुछ दाव पर लगाया। कहने को तो हम विकास के पथ पर आज काफी आगे की तरफ जा रहे है, परन्तु बहुत कुछ पीछे छोड़ कर, उन्ही में एक है, हमारे सुखी करने वाले संस्कार, जिनमे साधन कम पर आपसी प्रेम का न सूखने वाला सागर हमारे पास था। कहते है, सुख के कई आधार होते है, जिनमे मानव मन खुशियों के नये नये स्वरुप तलाशता है, मन की यहीं चंचलता उसे दुःख की राह पर ले जाता है। आधुनिक युग आर्थिक सम्पन्नता के साथ नवीन साधनों से सजा है, उसकी भव्यता के सामने सरल संस्कारों की एक भी नहीं चल रही, हर दिन बेदम होकर मर रहे है, हां वो संस्कार आज भी अपनाये जा रहे तोड़ मरोड़ कर, जिनमें भव्यता है।

‘संस्कार’ शब्द का अर्थ होता है, “शुद्धिकरण” और इसका सम्बंध मानव जीवन से एक जन्म से कई जन्मों तक चलता रहता है, जब तक उसे जन्म मरण की प्रक्रिया से छुटकारा नहीं मिलता, उसे हम निर्वाण की स्थिति कहते है, ऐसा हमारे ग्रन्थ बताते है। उनके अनुसार संस्कार के दो रुप हो सकते है, एक आंतरिक और दूसरा ब्राह्म रुप। आंतरिक रुप की रक्षा के लिए रीति रिवाजों का सहारा लिया जाता है, जो हकीकत में संस्कारों का ब्राह्म रुप ही हैं। इनका उद्देश्य की पूर्व जन्म से जितनी आत्मिक उन्नति हुई, उससे हम इस जन्म में आगे बढ़े।

ऐसा मानना है, कि भारतीय संस्कारों का निर्माण ऋग्वेद के अंतर्गत शुरु हुआ। संस्कारों का निर्माण आंतरिक आत्मा शुद्धि के साथ सामाजिक नियमों के तहत हुआ, जिससे जीवन को आनन्दमय और सक्षम धरातल मिले। “कुमारिल ” आठवीं सदी का एक तंत्रवार्तिक ग्रन्थ के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से सक्षम होता है, पूर्व जन्म के कर्मो के दोषों को दूर करने से और नये आत्मिक गुणों के उत्पादन से। संस्कार ये दोनों काम करता है, इसलिए ज्ञानित पुराने भारत में संस्कारों की सदा विशिष्ठ भूमिका रही। गौतम धर्म सूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस बताई गई, जिनमे जन्म, मरण, और विवाह सम्बंधित संस्कार ही आजकल ज्यादा नजर आते है, आत्मिक शुद्धि संस्कारों का आडम्बरों सहित प्रयोग करने के कारण अब संस्कारों की श्रेणी में रखने से संकोच आता है।

हमने संस्कार को ऊपर शुद्धिकरण बताया, क्योंकि जीवन को स्वच्छ रखना प्रायः सभी का लक्ष्य होता है, अतः हमारा हर कर्म संस्कारयुक्त हों, ऐसी दिनचर्या को अपनाना हमारा ध्येय होना चाहिए। जब आज हम आधुनिक और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की कोशिश कर रहे है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए, संस्कार वहां भी होते है और वहां संस्कार के कई शब्द है, जिनका वो अपने दैनिक कार्य को उत्कृष्ट बनाने में काम लेते है। आइये जानते है, संस्कार सम्बंधित कुछ शब्द :

*IMPROVEMENT * PERFECTING
*REFINING. * AN INBORN POWER OF FACULTY
*A CONCEPT. * INFLUENCE
*INVESTITURE
*WITH THE SA. * ANY OF VARIOUS ESSENTIAL SANCTIFYING OR PURIFICATORY RITES AS THE
FIRST TAKING OF SOLID FOOD
*REFINEMENT. * CEREMONY
*FINISHING. * ADORNING
*SACRAMENT * PURIFICATION
*( साभार इंटरनेट से )

संस्कार को culture और manners जैसे और भी कई शब्दों से पहचाना जा सकता है। शब्दों की ज्यादा व्याख्या करना यहां हमारा ध्येय नहीं है, अतः आगे बढ़े उससे पहले हम यह मान लेते है, जीवन को सुधारमय गति मानव निर्मित शुद्ध संस्कार ही दे सकते है। संस्कार नहीं होते तो परिवारों का प्रेम भरा निर्माण नहीं होता, रिश्तों की सही पहचान नहीं होती, बड़े, छोटों का ज्ञान नहीं होता, धर्म नहीं होता और शायद यह संसार भी व्यवस्थित नहीं चलता। आज समाज चारों तरफ से अव्यवस्थित और तनाव ग्रस्त महसूस कर रहा है, मान मर्यादाओं की आस्था भी कमजोर पड़ रही है, असत्य वचन बेधड़क इन्सान की जबान से फिसल रहे है, हालात इस कदर बिगड़ रहें है, कि आपसी विश्वास पर प्रश्नचिन्ह लग रहे है। आखिर, ये सब हालात क्या संस्कारों के पतन के कारण नहीं हो रहे ? सही चिंतन इसे नकार नहीं सकता।

अंत में एक सवाल सदा ही सबके लिए चिंतन की बात है, जिंदगी किसी को भी बार बार नहीं मिलती, दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां मृत्यु नहीं पहुँचती, खुशहाल जिंदगी संस्कार के पेड़ पर ही उत्तम फल लगा सकती है, इस जीवन को संस्कार ही सही दिशा निर्देश बता सकता है। अति आधुनिक जिंदगी बिन प्रेम अकेलापन, तन्हाई, सन्त्रास, और दर्दीली ही होती है, उम्र की डगर पर। रुपये की अधिकता बिना संस्कार जीवन को साधनों का सुख शायद दे दे, पर शरीर और मन को खोखला कर देता है, तभी हम उन संस्कारों की बात करते है, जिन्हें हम ने अपनाने में लापरवाही की।

भविष्य का अगर सही निर्माण इस युग की जरुरत रही, तो निश्चित तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए, हमें संस्कार को अपनाना है, नहीं जो मिल रहा है, उसे स्वीकार कर लेना ही उत्तम रहेगा।

चार्ल्स डार्विन के अनुसार ” In the long history of humankind ( and animal kind, too ) those learnt to collaborate and improvise most effectively have prevailed. ”

चूँकि, संस्कार जीवन स्त्रोत्र है, हमें विरासत में मिलते है, अतः इनका पालन विनम्रता से किया जाना चाहिए, और हमें अपने बच्चों की शिक्षा में इसे सम्मिलित भी करने चाहिए, जिससे हम उनके साथ अपने जीवन का तालमेल रख सके। यही एक सही संभावना है, भविष्यत जीवन को खुशहाल रखने की।

संस्कारों को सही और उपयोगी रीति रिवाजों में खोजने से कई अमृतमय गुण प्राप्त होते है, जैसे प्रणाम, आशीर्वाद, प्रेम, स्नेह, विश्वास, अंहिसा, सत्य, समृद्धि, ज्ञान, तपस्या, शान्ति आदि, विचार कीजिये क्या इनसे संस्कारित होना अच्छा नही है ?

नहीं तो फिर कबीर के इस दोहें से हमें, अपने आप को सन्तोष देना होगा….

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।
बोया पेड़ बबूल का , आम कहां से खाय ।।

लेखक* कमल भंसाली

★★झूठ को सहारा, सत्य बेचारा ■■■एक चिंतन■■■ कमल भंसाली

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सत्य और झूठ जीवन के झूले में दो छोर का काम करते है, आजकल, इस कथन को हम चाहकर भी झुठला नहीं सकते। सच की जरुरत सभी को रहती है, पर उसका सब समय साथ निभाना आसान नहीं है, यह हमें स्वीकार कर लेने कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, क्योंकि निश्चित है, कलयुग में आसमान नहीं गिरेगा न ही किसी के लिए धरती फटेगी। सच की कीमत अनमोल होती है, उसे प्राप्त करना आसान नहीं होता। सच और झूठ दोनों का सम्बंध आत्मा से है, सच आखिर सच है, कभी कडुआ भी लगता है, परन्तु परिणाम सटीक और सही ही बताता, अतः आजकी लोभ भरी जीवन शैली इससे दूर ही रहना चाहती है। झूठ मीठा जहर जरुर है, पर गुनाह की दुनिया में रहने वाले इसका भरपूर उपयोग करते है। आधुनिक युग की जीवन शैली भी इससे अछूती नहीं है, दैनिक जीवन की छोटी छोटी समस्याओं को इससे ही निपटने की कोशिश जरुर करती है। झूठ आधुनिक युग का लाइलाज मानसिक रोग बन गया है, न चाहते हुए भी आदतन इन्सान इसका प्रयोग कर लेता है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यही है, की झूठ बोलते आजकल कोई आत्मिक दुःख का भाव नहीं बनता, उलटा चिंतन यह हो रहा है, कि सत्य को कभी उजगार कर दिया तो शायद मेरी सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। आइये, थोड़ा विश्लेषण सच और झूठ का आज के युगानुसार करने की चेष्टा करते है, जानने की यह भी कोशिश करते है, क्या वाकई दैनिक जीवन में हम इन दोनों से कैसे प्रभावित हो रहे है ! ,फिर इसको रोकने में अपनी असमर्थता का भी जिक्र कर लेते है। क्योंकि, हम जानते है, इस प्रयास में आगे हम जा नहीं सकते, आखिर निजी स्वार्थ बिना साधनों भरी जिंदगी हमें कैसे भोग सकेंगे।

शुरुआत आत्मा के साथ करते है, क्योंकि जीवन के सफर में अंतिम पड़ाव पर इनका मूल्यांकन हर तन को करना पड़ता है, गौर करने से यह बात कई बार स्थापित भी की जा सकती है। एक प्राण जाते इंसान के चेहरे पर गौर करने से हमें कभी नजर आता है, कि उसके चेहरे पर पसीना और शरीर में दर्द की प्रकाष्ठता तड़पाती है। कहते है, इसी समय इंसान को सत्यता के दरवाजे से गुजर कर अपनी अगली यात्रा का वीजा लेना पड़ता है और हम जानते है, कि दूसरे अच्छे देश के लिए वीजा प्राप्त करना कितना दुःखदायी होता है। ख़ैर, जब आत्मा की बात कर रहे है, तो थोड़ा पीछे के युग का वो दर्शन आगे लाते है।

रामायण या महाभारत की अगर बात करे तो ग्रन्थ यही बताते है, सत्य जीवन शैली में छाया हुआ था, असत्य को जल्दी गले लगाने से डरते थे। भूल से भी इसका प्रयोग हो जाता, तो लोग प्रायश्चित करने की सोचते। रावण में कई अवगुणों का जिक्र होता है, पर उसमें एक गुण सत्य का था, उसके चलते वो भगवान शिव का परम् भक्त कहलाने लगा और असीम शक्तियों का मालिक बना। परन्तु, जब उसने झूठ का सहारा लेकर माँ सीता का अपहरण किया तो उसे भगवान राम को नष्ट करना पड़ा। कुछ इस तरह महाभारत के युद्ध में हुआ जब सत्यनिष्ठ युधिष्ठरजी को गुरु द्रोणाचार्य का वध करने अश्वथामा हाथी का वध कर सत्य को स्थापित करना पड़ा, हालांकि यह छल के अंतर्गत था, परन्तु इससे उनको भी प्रायश्चित के साथ द्रोणाचार्य के श्राप को भोगना पड़ा। दोनों ही उदाहरण से साबित हो सकता है, जीवन तत्व सच ही है।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।।

सत्य के सन्दर्भ में संत कवि कबीरदासजी का अनमोल और जीवन उपयोगी यह दोहा प्रायः हम लोग सभी समय समय पर गुनगुनाते रहते है, पर आत्मा इससे बेअसर रहती है, क्योंकि इसके व्यवहारिक पहलू पर ही सिर्फ नजर भर रहती है, जीवन आदर्श में आज इसका महत्व नजर कभी कभार ही आ सकता है। दुनिया को देखने और समझने के लिये दो दर्पण हम सदा प्रयोग करते है, एक खुद को निहारने के लिए, दुसरा दुनिया के कार्य कलापों की समीक्षा के लिए। कहने की बात नहीं होनी चाहिए कि हम अपने झूठ को संवार कर सत्य के रुप में ही निहारते है।

जैसे जीवन को परिभाषित नहीं किया जाता, वैसे ही सत्य की सही परिभाषा खोजना आसान नहीं है। अगर मनोविज्ञान के जानकार की बात करे तो उनका सार यही आता है, कि जिसके बोलने बाद याद रखने की जरुरत नहीं हो, वो सत्य है या सत्य के आसपास है। उनके अनुसार बोले हुए झूठ को याद रखना पड़ता है। झूठ को स्थापित करने के लिए कई बार झूठ और बोलना पड़ता है, फिर भी वो सत्य नहीं बन सकता। इसे भी एक सही तथ्य मानना जरुरी है, कि सत्य लम्बी अवधि तक छुपाना मुश्किल से भी मुश्किल होता है। सत्य चैन देता है, झूठ परेशानी बनकर ऐसा मेहमान बन जाता है, जिसको सत्य के द्वारा ही आत्मा से निकाला जा सकता है।

सच शीतल होता है, निरन्तरता का अबाधित प्रवाह है, झूठ ठहरा हुआ, दलदल जिसमें फंसने वाला शायद ही तबतक निकले, जब तक वो सत्य का सहारा न ले। प्रश्न आज जो हमारे सामने खड़ा है ? उसका उत्तर शायद आसान नहीं है, पर जानना भी जरुरी है, जब सच इतना गुणमयी है, तब हम अपनी जीवनशैली में उसका उचित प्रयोग क्यों नहीं कर पाते ? क्यों हम छोटी छोटी गलतियों पर झूठ का दामन पकड़ लेते है ? उत्तर तो शायद ही कोई सही मिले, पर एक चिंतन जीवन को जरुर करना चाहिए कि झूठ का सहारा किसी भी समस्या का समाधान नहीं, सिर्फ कुछ समय के लिए एक सांत्वना भर है। आज आधुनिक उपकरणों का युग है, किसी भी बात की प्रत्यक्ष कीमत आंकनि जब मुश्किल होती है, तो झूठ अति उत्तमता लेकर सत्य का बोध कराने की चेष्टा करता है। मोबाइल का जब से प्रसार हुआ, झूठ व्यापार से परिवार तक फेल गया, विश्वास कमजोर हो रहा है, आदमी भय से आक्रान्त होकर सत्य का साथ निभाने से कतराने लगा है। धर्म कितना ही विरोध करता है, झूठ का, परन्तु अंततः वो भी कमजोर साबित हो रहा है। सवाल यह भी है, क्यों झूठ और सत्य का चिंतन आज के सन्दर्भ में ही किया जाय, जबकि यह तो सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया का एक तत्व रहा है ? इसका उत्तर इतना ही काफी है, कि सत्य
उस समय इतना कमजोर नहीं था, झूठ पर शर्मिंदगी का अहसास होता था, झूठ बोलनेवालों को स्वयं लज्जा का अनुभव होता था। आज की विडंम्बना यही है, की झूठ को दैनिक जीवन शैली में मान्यता मिल गई, और यह स्वीकार कर लिया गया कि झूठ बोलना कोई गुनाह नहीं एक सम्भाविक दैनिक क्रिया है। आज तभी तो यह कोई दावा नहीं कर सकता कि वो सत्यनिष्ठ है, सदा सच बोलने की कौशिश करने वाला इंसान है।

झूठ के कई प्रकार हो सकते है, परन्तु सत्य एक ही रकम का होता है। झूठ पकड़ा जा सकता है, सत्य निर्विक होता है, अतः उसे कोई परीक्षा अनुतीर्ण नहीं कर सकती । पता नहीं, हम जीवन के उस आत्मिक पहलू पर क्यों नहीं गौर कर रहे है, जिसकी पवित्रता के बिना हम अंदर से खुश, सुखी, और प्रसन्नता का अनुभव हमें नहीं हो पाता। हमारा चिंतन क्यों इस तथ्य पर गौर नहीं कर रहा कि एक दिन तो झूठ से अर्जित नाम, दौलत और शौहरत छोड़ कर जाना पड़ेगा और ईश्वर के सामने खड़ा होना होगा, निसन्देह वहां झूठ हमारा, कोई काम नहीं आयेगा। हो, सकता है, सत्य साधारण जीवन दे, पर वो स्वच्छ और सफल जीवन कहलायेगा। हमें भूलना नहीं चाहिए कि हमारे देश में ही पैदा हुए थे, सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र ….आखिर थे, वो भी इन्सान, तो फिर हम क्यों सब जगह झूठ का सहारा ले ….क्या यह सही चिंतन नहीं है ? …..क्रमशः ….कमल भंसाली

“क्रोध”….एक चिंतन…कमल भंसाली

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हकीकत में, क्रोध हमारी दैनिक मजबूरी है, किसी न किसी बात पर हम क्रोधित होते रहते है, गुस्सा करते रहते है । यह जानते हुए भी कि यह शांति के विरुद्ध की क्रिया है, आ जाता है, तो इसका नियमन और संयमन करना काफी कठिन है ।आइये, जानने कि कोशिश करते है, क्यों क्रोध के आगे मजबूर हो जाते है ?, हालांकि स्वयं को नुकसान करने वाली यह क्रिया नुकसान ही ज्यादा करती है।

किसी ज्ञानी आदमी से जब किसी ने यह सवाल किया कि इंसान का सबसे बड़ी दुश्मनी कौन निभाता है,? तो महापुरुष ने जबाब दिया, ” क्रोध या गुस्सा उसका सबसे बड़ा शत्रु है, जिसे बिना नुकसान के नियंत्रण करना बहुत कठिन होता है।” महापुरुष ने सही जबाब दिया। आज के सामजिक परिवेश पर गौर करने से लगता है, देश, प्रदेश, समाज, धार्मिक पंथ और परिवार इस अवगुण के शिकार हो चुके है। क्रोध में ज्यादा अंश ज्वल शीलता का होने के कारण असहनीय होता है, और क्रोध करने वाला इसका स्वयं ही शिकार होता है, इससे उसके शारीरिक अंगों पर विपरीत और नुकसानदेह प्रभाव तो पड़ते ही है, साथ में मन और आत्मा भी नकारत्मक्ता से प्रभावित होती है। क्रोध की स्थिति में विवेक दिमाग से बाहर भाग जाता है, और अनिष्टता को तांडव मचाने की स्वतन्त्रता मिल जाती है। आइये, जानते है, क्रोध में शरीर की क्या स्थिति हो सकती है। शरीर विशेषज्ञो केअनुसार सबसे पहला असर इसका दिमाग के साथ ह्रदय के सम्पर्क पर पड़ता है, और इंसान के रक्त प्रवाह में अनियमिता शुरु हो जाती है, इससे दिल पर पड़नेवाला प्रभाव कभी कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है। निश्चित है, क्रोध रक्त प्रवाह को धमनियों में असहजता प्रदान करता है, और इस असहजता से हर मानव अंग घबराता है। हालांकि चिकित्सक कहते है, क्रोध एक स्वभाविक प्रक्रिया है, गलत लगने वाले किसी आचरण पर इसका आना सहज है, परन्तु सीमा रेखा के अतर्गत रहे, तो जीवन की सक्षमता को भी दर्शाता है।साफ़ हो जाता है, क्रोध को सिर्फ अवगुण की श्रेणी में हम नहीं रख सकते, जब तक इसका दायरा असहनीय न हों।अति क्रोध का दूसरा प्रभाव सम्बंधों और आपसी रिश्तों पर पड़ता है, कहना न होगा, इनसे रिश्तें टूटते है, और उनका वापस वास्तविक स्तर पर आना मुश्किल होता है। यहां संयम से गुस्सा या क्रोध को रोकना ही उचित होता है। चूँकि, क्रोध की विभिन्न किस्म होती है, तदानुसार उसका रुप भी अलग अलग नाम से जाना जाता है। गुस्सा, द्वेष, बदला, आघात, आक्रमण, ईष्या, रौद्र, भयंकर, आदि स्वरुप क्रोध परिवार के सदस्य है।

चूँकि क्रोध काफी हद तक भावनाओं से सम्बन्ध रखता है, खासकर जिनमें तनाव होता है, तो आदमी सिर्फ उसके एक ही पहलू पर गौर करता है, उसे लगता है, उसका इस परिस्थिति में क्रोध करना जायज था, चाहे उसका चिंतन सही न हों। क्रोध का बचपन गुस्सा है, जो किसी भी तरह की विपरीत स्थिति से पैदा होता है। गुस्सा जब तक जायज रहता है, तब तक एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह बाहर शांत रहता है, पर भीतर ही भीतर उसमें विद्रोह की ललक रहती है। इसलिए गुस्से को नियंत्रण की बात हर ज्ञानी आदमी करता है। कहते है, वो आदमी देवता होता है, जिसे क्रोध नहीं आता, परन्तु इसको सत्य नहीं कह सकतें, क्योंकि देवताओं की कहानियों में ऐसे बहुत उदाहरण है, जिसमे देवता भी कुपित होते है, परन्तु ज्यादातर उनका क्रोध अन्याय से सम्बंधित होने के कारण, उनके क्रोध को न्यायोचित बताया गया है।

आखिर, क्रोध आता ही क्यों है ? मानते है, क्रोध जीवन का हिस्सा है, हमारा यह संसार क्रोध के कई कारणों को एक के कार्य से दूसरों को एक कारण क्रोध का दे देता, जब उसमे किसी की भावनाओं को ठेस पंहुचती है। हम अपने जन्म के बाद कई ऐसे दृश्य देखते जिनमे क्रोध, गुस्सा या उसके समकक्ष कोई तत्व हमें आहत करता है, वो जब हमारे चेहरे पर नापसंदगी का भाव दिखाता है, और गुस्से की प्रक्रिया से हम वाकिफ हो जाते है। फ़्रांस के मनोवैज्ञानिक जैक्स लुकान के अनुसार “क्रोध एक मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध है, किसी भी तरह के हमले का अहसास होने पर स्वत: ही हमारी शारीरक प्रणाली उसके लिए तैयार हो जाती है, सक्षमता से मुकाबला करने के लिए”। वो आगे यह भी मानते है, कि यह कमजोरी को छुपाने का मानव ब्रह्मशस्त्र है। हमें. क्रोध जब आता है, जब हम आहत होते दिल से, पर क्रोध और आहत में एक दुरी है, इस दुरी में ही अगर हम संयमित हो जाते है, तो क्रोध को आने से रोका जा सकता है।

क्रोध को कभी भी प्रमाणिक नहीं माना जा सकता, न ही उसे शीघ्र अनुशासित किया जा सकता, क्योंकि यह सदा विवेक के विरुद्ध काम करता है। क्रोध का कारण कुछ भी हो सकता है, झूठ, अन्याय,फरेब, हिंसा, ईष्या, द्वेष, जलन, व्यवस्था, सम्बन्ध या और कोई के प्रति असन्तोष, क्रोध और गुस्सा का कारण हो सकता है। मान लीजिये, कभी हमें कोई काम के लिए, कहीं अति शीघ्र पहुंचना है, और रास्ता किसी कारणवश जाम है, तो अनायस ही हमें ट्रैफिक व्यवस्था पर गुस्सा आने लगता है, यहीं से क्रोध की प्रारम्भिक अवस्था शुरु हो सकती है, अगर जाम किसी कारण काफी देर तक नहीं हटे। प्रारम्भिक अवस्था में क्रोध को सन्तुलित किया जा सकता है। अगर इसे यहां सन्तुलन नहीं करते, तो पता नहीं आगे जाकर यह कहां बिना बरसने वाले बादल की तरह फटेगा, और इसका शिकार वो भी हो सकता है, जिस का कोई दोष नहीं।

क्रोध मानव स्वभाव की एक स्वभाविक क्रिया है, इससे बचने से किसी भी नई समस्या का आगमन रुकता है। अतः जब हम कभी आहत होते है, तो दिल हि दिल में यह स्वीकार कर लेना चाहियें कि हाँ, यहां “मैं आहत हो रहा हूं, पर मुझे धैर्य रखना हैं”। यह चिंतन, गुस्सा कम करने में काम कर सकता है। सारांश यही है, क्रोध, गुस्सा या इसका कोई भी रुप किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, ये किसी भी नगण्य कारण को विध्वंसक बना सकता है। जायज या नाजायज का क्रोध से कोई तालुकात नहीं, अनिष्ट्टता को जन्म देते, इसे देरी नहीं लगती। किसी भी सम्बन्ध और रिश्ते के लिए यह परमाणु बम से कम नहीं है। परन्तु इसका यह भी मतलब नहीं कोई हमेंआघात दे रहा है, हमारे दिल को ठेस पंहुचा रहा है, हम उसे सहन करते रहें, तो हम एक कमजोर व्यक्तित्त्व वाले इंसान कह लाये जा सकते है। संयम, धैर्य और मजबूत चिंतन से हम उसका प्रतिरोध कर सकते है। कहते है, इंसान की आँखों में उसके ठोस इरादों की झलक रहती है, और सामनेवाले के लिए यह समझने की समझ, कि उसके सामने कौन है ? अतः बहादुरी रखे, अनायास क्रोध को धैर्य से वापस भेज दे। इससे हम पूर्ण सुखी न हो, पर हमारी शारीरिक क्षमता को आघात नहीं पँहुचेगा, यह तय है।

चलते चलते…आइये पढ़ते है, क्रोध पर कुछ महापुरुष क्या कहते है…

” क्रोध वह तेज़ाब है, जो किसी भी चीज पर, जिस पर वह डाला जाये, से ज्यादा उस पात्र को अधिक हानि पंहुचा सकता है, जिसमे वह रखा है” ****मार्क ट्वेन
” क्रोध वो हवा है, जो बुद्धि का दीप बुझा देती है” **** रॉबर्ट ग्रीन इन्गे सोर्ल

” क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है, इससे आप ही जलते है” ***** भगवान गौतम बुद्ध

” हर एक मिनट जिसमे आप क्रोधित रहते है, आप 60 सेकेण्ड की मन की शांति खोते है” ***** रॉल्फ वाल्डो इमर्सन

इसके अलावा दोस्तों, भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 2 श्लोक 63 में क्रोध पर कहा है…

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।। 2-63 ॥

( क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मानव अपनी स्थिति से गिर जाता है।)

सन्त कबीर दास जी ने क्रोध पर सही चिंतन धारा दी, उस पर एक नजर डालते है ।

जहाँ दया वहां धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध वहाँ काल है, जहाँ क्षमा वहाँ आप ।।

आज के आधुनिक युग में अति क्रोध आर्थिक नुकसान भी करता है, इसके कई उदाहरण हमारे सामने आते है, जब मान सम्मान के मुकदमों के निर्णय हम तक पहुंचते है।

चिंतन यही है, गुस्सा आने से पहले हम चिंतन करे ” क्या अति गुस्सा जायज है” ?…….कमल भंसाली

मन की हार…कभी नहीं, स्वीकार.. बेहतर जीवन शैली भाग १० ..प्रथम अंश..कमल भंसाली

माना, संसार सुख-दुःख की अनुपम मिसाल है, पर ज्यादातर जीवन पर दुःख ही शासन करता नजर आता है। सुख की चाह ही पहला दुःख हैं, इस चाह में आदमी कितने ही अविवेकपूर्ण निर्णय लेता हैं,पर अंत तक शायद ही सही सुख पाता हो। जन्मतें ही रोना शुरु करने वाला इंसान अपने जीवन में शायद हंसने के अनुपात में ज्यादा रोता ही नजर आता है। बिरले ही कुछ होते हैं, जो सुख की क्षणिकता से परिचित होते और हर परिस्थिति में सामान्य नजर आते है। बेहतर जीवन शैली ऐसे ही इंसानों को तैयार करने में विश्वास करती है। आइये,आज हम इसी चिंतन पर विचार करें कि हम हर स्थिति में सामान्य कैसे रह सकते है।

सबसे पहले यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए की आज के आर्थिक संसार में सुख की परिभाषा भोगवादी संस्कृति से लिपटी हुई है, तथा जीवन उपयोगी साधनों का समुचित प्रयोग करना हर आम आदमी की चाहत है। इसके बाद ही वो नैसर्गिकी भावनाओं की तरफ अग्रसर होकर जीवन के नये आयामों को गूंथने की सतत चेष्टा करता है।

मानव मन की इन्हीं भावनाओं का सहारा लेकर अपने जीवन को सुखी और स्वस्थ बनाता है। यहां यह जान लेना जरुरी है, कि हमारा सारा चिंतन एक साधारण मानव से असाधारण मानव का सफर हैं। साधू, सन्यासी या महापुरुष और ज्ञान-गुरू हमारे दायरे से बहुत ऊपर होते है, क्योकिं वे स्वयं अपना ही नहीं, हम सब का भी जीवन उत्तम करने का प्रयास करते है ।

किसी ने कहा ” जीवन फूलों की सेज नहीं है”, सही भी और हकीकत भी यहीं है, परन्तु यह बात भी सही है, ” जीवन “खाली काँटों” का भी सफर नहीं है। हम अगर जीवन को समझना चाहते है, तो पहले हमें अपने शरीर के महत्व को ही समझना होगा। भारतीय दर्शन में शरीर का भौतिक मूल्य ज्यादा तर जगह नकारा गया है, आध्यात्मिक परिवेश में पले, हम इसको कुछ साँसों का मोहताज समझते है। पर हकीकत यही कहती है, जब तक जीयें, इस चिंतन से थोड़ी दूरी रखनी जरुरी है, और अपने अंतिम पड़ाव का असर निरन्तर जीने वाले जीवन पर इतना ही रहे कि हर अति से बच कर रहे।

आखिर शरीर है, क्या ? एक ऐसा सवाल जिसके हजारों जबाब हो सकते हैं। परन्तु, जीने वाले के लिए यह उसका साक्षात अस्तित्व बोध है, कि वह इस संसार में किसी के द्वारा भेजा गया है, किसी महान उद्धेश्य की पूर्ति हेतु, और उसकी भूमिका काफी संक्षिप्त होते हुए भी बहुत महत्वपुर्ण हो सकती है। शरीर की सरंचना पर गौर करने से हम एक बात दावे के साथ कह सकते है, कि बनानेवाले ने किसी भी तरह से हमे अपूर्ण नहीं बनाया। हमारा एक एक अंग अपना काम समयनुसार सहीं ढंग से संपन्न करना चाहता है, और करता भी है। शरीर के स्थूलता में भी उसने गति प्रदान करने के अंगों को सशक्त और मजबूत बनाया, तथा जीवन के कार्यक्रम जाननें के लिए हमें एक आधुनिक और निरन्तर विकसित दिमाग भी दिया। इन सबसे ऊपर जो बात है, वो हमें सदा याद रखने वाला जीवन दिया है। जिसके अंत का एहसास और उसकी समय सीमा की परिधि बोध की सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत दी तथा हमें जीनें की लालसा दी।

शरीर की ऊपरी सतह पर चमड़ी का सुंदर आवरण देकर उसने इन्सान को संसार में सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ठ बनाया। दुनिया बनानेवाले ने हर सजीव जीव, जन्तु और प्राणी को एक सीमितता दी, परन्तु ‘मानव’ को एक असीमित दायरा दिया, स्वभाविक है, कि जिम्मेदारी का बोध भी उसे दिया। इंसान को अपनी कसौटी पर जांचने के लिए बनानेवाले ने उसके शरीर में एक द्वार बनाया जिसका बोध इन्सान को कम रहता है, और उसे हम “आत्म-द्वार” कह सकते है, संक्षिप्त में हम इसे आत्मा के नाम से भी पुकारते है। कहते है, ना, आत्मा ही “परमात्मा”।

शरीर में विधाता ने कितने ही ऐसे तत्वों को हमारे बहने वाले खून में डाले जिन्हें हम गुण-अवगुण के रुप में परिभाषित करते है, और इनका प्रभाव हमारे शरीर के साथ हमारी संचालक “आत्मा” पर भी पड़ता है। आत्मा की सकल अनुभूति ही जीवन का सार है, उसकी सार्थकता है। मानव चेतना का एक स्वरुप् “मन” है,जो मसितष्क का हि एक प्रकार्य है। यही मसितष्क की उन क्षमताओं का विकास करता है, जिनका चिंतन कर मानव अपने जीवन स्वरुप को गति प्रदान कर सकता है।

आइये, हम हमारे विषय “मन की हार, कभी नहीं” के मूल तत्वों पर गौर करते है।

ओशो, कहतें है कि “हम जो भी करते है, वह मन का पोषण है। मन को हम बढ़ाते है, मजबूत करते है। हमारे सारे अनुभव, हमारा ज्ञान, हमारा संग्रह, सब हमारे मन को मजबूत और शक्तिशाली करने के लिए है”। उनका तो यही मानना है, कि सिर्फ पूर्ण सन्यासी अ-मन की ओर चलता है, बाकी सब मन से शासित होकर चलते है, और यही सुख-दुःख की वजह है। कबीर दास जी मन को गंगाजल की तरह निर्मल मानते है, जिसे आत्मा संचालित करती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मन दो भागों में विभक्त है, एक चेतन दूसरा अचेतन।फ्रायड का मानना था कि मन का सबसे बड़ा भाग अचेतन होता है। उनके अनुसार अचेतन मन व्यक्तिगत होता है और इसका सम्बन्ध मानव के अपने व्यक्तिगत जीवन से होता हैं। उसके अचेतन मन में वही सारी इच्छायें या विचार होते है, जो पहले उसके चेतन मन में थे। हम सभी जानते है की इच्छाएं नैतिक और अनैतिक दोनों प्रकार की होती है। मानव को सिर्फ नैतिक साधनों का उपयोग कर जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उसकी सफलता जितनी निष्कलंक होगी, उतनी ही पवित्र और याद करने योग्य होगी।…..क्रमश……

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली…भाग ९..अंश १..प्रेम..अमृत बेहतर जीवन का..कमल भंसाली

माना, हमारी आजकी जीवन शैली में “प्रेम” शब्द बड़ा भ्रमित करता है, परन्तु इसके बराबर अमृतमय शब्द शायद ही दूसरा होगा। इसकी सही परिभाषा को मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है जितना इसका प्रयोग दैनिक जीवन में दूसरों को आश्वस्त करने में किया जाता है । हालांकि कबीर दास जी इसे अढ़ाई अक्षरों का महत्व्पूर्ण जीवनसूत्र बताते है, परन्तु उनकी यह मीमांसा आज के दौर में कितनी सार्थकता रखती है, कह नहीं सकते। गौर करते है, जरा कबीर दास जी की इस परिभाषा पर जो उन्होंने दोहें के रुप में इस तरह सुनाया।
‘ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोई
ढ़ाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई’
कबीर दास जी के अनुसार सिर्फ ग्रन्थ पढ़नें से कोई ज्ञानी नहीं होता, अगर कोई इन्सान अढ़ाई अक्षर वाले प्रेम को जान ले, तो उनके अनुसार उससे बड़ा ज्ञानी इस संसार में कोई नहीं है । सही भी है, क्यों की बिन प्रेम जीवन अधूरा ही लगता है ? चाहे हम अपने आपको कितना ही ज्ञानी और सफल इन्सान मानें, प्रेम बिना सेवा और भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

कहते है, युग बदलता है, जीवन उद्धेश्य बदलते है और उनके साथ परिभाषाऐं भी बदल जाती है। संत कबीरदास ने जिस प्रेम को समझने का जिक्र किया, वो उनके युग के अनुसार सहज था। शायद उस समय प्रेम प्रदर्शित नहीं होते हुए भी अहसासिस्त था। अनुभूति का विकास प्रेम तत्व के अनुसार ही मन में जगह बना लेता था । प्रेम की प्राप्ति से मनुष्य आत्म ज्ञानी हो जाता था क्यों कि अर्थ और विज्ञान का संक्षिप्त प्रभाव आदमी की जीवन शैली पर था, नैतिकता और संस्कार को जीवन शैली में मुख्य दर्जा प्राप्त था। प्रेम को परिभाषित करने से पूर्व उसे आंतरिकता की शुद्ध तराजू पर अहसास के बाटो से तोलना जरुरी है। मन में हजारों तत्व का समावेश होता है, उसमे प्रेम और शक की भूमिका से जीवन को अछूता नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आज का प्रेम अवधि के धरातल पर अपनी सही जगह तलाशने में असमर्थ सा है ? प्रेम का महत्व जीवन में हर उम्र के लिए अति जरुरी है। मनुष्य जिस क्षण धरती पर आता है, उसी क्षण से प्रेम को समझने की कोशिश करता है, सच तो यही है कि मनुष्य प्रेम की क्रिया का ही उत्पादन है। बच्चा बन कर वो प्रेम के अहसास से अपने को पहचाने की कौशिश करता है, उम्र ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है, वो प्रेम के अनुसार ही अपने जीवन को सजाने में लगा रहता है। आज हम बेहतर जीवन शैली में प्रेम के अनुदान पर विस्तृत चर्चा करना चाहेंगे, आइये, उस से पहले प्रेम शब्द की परिभाषा पर नजर डालते है।

प्रेम का शाब्दिक अर्थ होता है, प्रीति, प्यार, माया, लोभ और लगाव आदि, परन्तु इसमे कई उपसर्ग जोड़कर कई साहित्यिक परिभाषा तैयार की गई । इन परिभाषाओ के अलावा ऐसे कई शब्द भी है, जिनमे प्रेम का भरपूर अनुदान रहता है, जैसे ममता,आशक्ति और भक्ति।

अंग्रेजी में LOVE, AFFECTION आदि शब्दों द्वारा प्रेम को व्यक्त या उसका इजहार किया जाता है। बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी भाषा के शब्दों की जगह विदेशी भाषा का सहारा अपने अहसास को जताने में करने लगे है। कई ज्ञानी गुरुओं का मानना है, “प्रेम शब्द जितना खुड़दरा है उतना ही शुद्ध है, इसको जितना शब्दों की पोलिश से चमकाया जायेगा
उतनी इसकी कीमत प्रेम के बाजार में बढ़ती जायेगी”। परन्तु प्रेम हीरे की तरह स्थूल नहीं है अत: इसकी चमक की अवधि अस्थायी ही मानी जाती है । प्रेम को परिभाषित करके कबीरदास जी ने प्रेम की अवधि और सार्थकता के बारे में कुछ इस तरह बताया..
‘घड़ी चढे, घड़ी उतरे , वो तो प्रेम न हो
अघट प्रेम ही ह्रदय बसे, प्रेम कहिये सोय’
कबीरजी इस दोहें के द्वारा यह समझाना चाहते हैं कि हर क्षण बदलने वाला स्वभाव प्रेम को आत्मसात नहीं कर सकता अतः उसे प्रेम नहीं कहा जा सकता, जिसमे कुछ रूपांतर नहीं बदलता और स्थिरता रहती वो ही प्रेम कहला सकता हैं।

आइये, हम आगे बढ़ते है, और यह जाननें की बेहतर कोशिश करते है कि शारीरिक संरचना में प्रेम क्या भूमिका मानव जीवन में और संसार के अन्य प्राणियों में निभाता है ? यह तो तय हैं की प्रेम एक तत्व है, जिसके बिना किसी भी सजीव जीव का प्रसार होना नामुमकिन है । सृष्टि की संरचना करने वाले को इसका सहारा लेना पड़ा क्योंकि इसके बिना सृष्टि का विकास होना मुश्किल था। पर क्या अकेला प्रेम इसमे सक्षम था, नहीं, अतः उसने इंसानी शरीर को दो स्वरुप् में बनाया। एक पुरुषत्व युक्त दूसरा नारीत्व युक्त, दोनों में कुछ अंतर शारीरिक और मानसिक स्तर पर रखकर दुनिया में उनकी भूमिका तय कर दी, दोनों ने ही सृष्टिकर्ता को निराश नहीं किया। कई विपरीत तत्वों का समावेश दोनों में होते हुए भी उनका प्रेम के मामले में एकागार होना आश्चर्यजनक और अभूतपुर्व ही कहा जाएगा।

प्रेम अदृश्य तत्व होकर भी काफी महत्व पूर्ण भूमिका संसार संचालन में निभा रहा है, प्रेम बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती उसी तरह हमारी दैनिक जीवन शैली इसके बिना बेहतर नहीं हो सकती। हमारा अब तक चिंतन प्रेम की रुपरेखा समझने तक ही सीमित था, जिससें हम प्रेम के महत्व को समझ सके।

आइये, हम जानने की कोशिश करते है, मनोवैज्ञानिक प्रेम के बारे में क्या विचार रखते है।…..
एरिक फ्रॉम में प्रेम की परिचित मान्यताओं का मूल्यांकन कर अपनी पुस्तक ” The art of loving “में कबीर दास जी के सूत्र को सम्बल दिया कि प्रेम को ज्ञान की जरुरत होती है। उनका यह भी मानना था, कि जो खुद से प्रेम कर सकता है, वही दूसरों से भी प्रेम कर सकता है। हकीकत में, फ्रॉम ने स्त्री-पुरुष के प्रेम को साक्ष्य मानकर ही नहीं दूसरे कई पहलुओं पर गौर कर प्रेम के सभी स्वरूपों का विस्तार से विश्लेषण किया। फ्रॉम ने फ्रायड के ‘लिबिडों’ सिद्धान्त को नकार दिया जिसमे उनके मुताबिक़ प्रेम सिर्फ यौन संवेगों की अभिव्यक्ति है। फ्रॉम ने माना प्रेम का मतलब मातृत्व प्रेम, बन्धुवत प्रेम, रागात्मक प्रेम, इश्वरीय प्रेम और आत्म-प्रेम।
भारतीय दार्शनिक गुरु रजनीश कहतें है कि ” अततः देह और दिमाग की सारी बाधाओं को पार कर जो व्यक्ति प्रेम में स्थित हो जाता है, सच मानों वही सचमुच का प्रेम करता है। उसका प्रेम आपसे कुछ ले नहीं सकता, आपकों सब कुछ दे सकता है। तब ऐसे प्रेम का परिणाम करुणा ही माना जाना चाहिए”।
क्रमश……

कमल भंसाली