ये कैसी बयार…..कमल भंसाली…

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ये, कैसी हवा, आज फिजा में बह रही
सांस लेने पर, थोड़ी घुटन सी हो रही
वक्त का दरिया, शायद धीरे से सूख रहा
हर कोई, वक्त के लिए परेशां, तरस रहा

समय बदल रहा, या फिर, इंसान बहक रहा
कुछ बात तो है, जो कोई, भी, नहीं समझ रहा
पूर्ण, परिवार का गुलदस्ता टूट कर बिखर रहा
हर फूल, अपना अलग अस्तित्व तलाश रहा

अर्थ की धरा पर, स्वार्थ के फूल उगाए जा रहे
मकसद की पूजा कर, उसी पर चढ़ाये जा रहे
दिखावटी प्रेम के लिए, हर कोई गले मिल रहा
बुरे, समय पर मिलने से, कतरा कर निकल रहा

ये कैसी बयार है, समय से पहले दिशा बदल रही
जवानी आने से , पहले बुढ़ापा का संकेत दे रही
आशाओं के बादल छितरा, शंकित तमस बिछा रही
प्यार के नाम पर, सूखे फूलों को हरा भरा बता रही

कथनी और करनी के फर्क का नहीं रहा,अफ़सोस
जहर पी रहे या अमृत, क्या फर्क,? बुझ रही प्यास
आडंबरों से सजा धर्म, सत्य, में नहीं करता विश्वास
अंहिसा के दामन से निकल रहा, हिंसा का प्रकाश

बागवां की बदनसीबी देखों, लगाया चमन बदल गया
खुशियों का पैमाना, बदनसीबी के आंसुओं से भर गया
कल तक की जिसकी निगरानी, वही फल दगा दे गया
जिंदगी के सारे अनुभवों को शर्मिंदगी का अहसास दे गया……कमल भंसाली