कतरा कतरा हुई, जिंदगानी….कमल भंसाली

कतरा कतरा
हुई, जिंदगानि
फिर भी रही, अनजानी
बचपन की भूल भुलैया में
खोकर सब कुछ,आई जवानी
नादान ही रही, दीवानी
छदम् रिश्तों में
सच्चा प्यार तलाशती रही
भूल गई
ये दुनिया
आज तक किसने जानी ?
कतरा कतरा हुई……

दोस्तों की दोस्ती
थी, बड़ी सस्ती
हाँ, भरी थी उनमें
रुप, रंग और मस्ती
फूलों में खुश्बू कम
थी, काँटों की ज्यादा चुभन
बावरा, मन मेरा
उनमें ही ढूंढ रहा था, अपनापन
कसमे, वादों के जंगल में
पता नहीं
कब छा गई वीरानी
कतरा, कतरा हुई…..

रिश्तों के चमन का
हाल है, बेहाल
वैभव के सावन में
रंग बिरंगे देता, अहसास
हर कोई लगता खास
ऋतुओं आधारित
रंगत इसकी
कब बदल जाए
कब बदरंग हो जाए
पता, नहीं कब मातम
के बादल छा जाए
कब बरस जाए
नयनों का पानी
कतरा, कतरा हुई….

अभाव के पतझड़ में
कोई नहीं करता
आपस का विश्वास
अपनी ही सांस
कराती मनुहार
जीवन भर का प्रेम
बन जाता, व्यापार
बिन, खरीददार
बिक जाती,अनजानी
कतरा, कतरा हुई…..

वक्त के भँवर में
जब जीवन नैया
लगाये चक्कर
तब रिश्तों की
पतवार न चले
चिंता जब चिता
बन जाए
सुखी लकड़ी
तन न जलाये
गम का धुँआ उड़ाए
ऐसे में कौन गागर भर
छिड़काये, शीतल पानी
अतृप्त आत्मा ढूंढती रहेगी,मंदाकनी……
कतरा, कतरा हुई….

कमल भंसाली