तिरंगे का दर्द….कमल भंसाली

दूर शहर की
छोटी सी
कच्ची तंग गली में
एक छोटे से
स्कूल में
स्वाधीनता दिवस पर
देश का
कोई कर्णधार
तिरंगा झंडा
फहरा रहा
पास में बैठे
कई अधनंगे
बच्चें मुस्करा रहे
ताली बजा रहे
कीचड़ भरी उनकी
आँखों में शायद
उनका उन्नत भविष्य
झंडे की तरह
इधर उधर लहरा रहा
लहराते झंडे ने जब
उस ओर देखा
बिन कपड़ों के
जर्जर तन की
असहाय
मुस्कराहट पर
रोना आया
उसे अपने लहराने पर
लज्जा का साया
नजर आया
सिमट कर
चिपक गया
अस्तित्व के
डंडे से
मानों मुरझा गया
सोच रहा
अब नहीं लहराना
अब नहीं इतराना
इससे अच्छा तो
शहीदों के शरीर पर
लेट जाना
तय किया लाख बार
कोई फहराले
जब तक निरीह आँखिन की
दूर नहीं हो मजबूरी
तब तक स्वाधीनता का
नहीं, मेरा देश अधिकारी
न ही उचित है, मेरा लहराना
हे प्रभु, शहीदों के इस देश
को जरा संभालना
जानता हूँ, अब तक
जो मुझे फहराते
मेरी सफेद पट्टी पर
कालिख लगाते
झूठे वादों के पुलिंदों में
अपने खुद के घर सजातें
इन मासूमों का हिस्सा भी
इन्हें नहीं पंहुचाते
शर्म, मुझे आ रही
देश उन्हें माफ़ कर रहा
करोड़ों के लुटेरे
मुझे फहरा रहे
निरीहता से ताली
बजवा रहें
हद है, उनकी बेशर्मी की
अब भी, गुनगुना रहे
जन गण मण….