🐧खामोशी भरा 🐧” मौन”🐧 एक अनुसन्धान सार्थक चर्चा 🐤 कमल भंसाली

जीवन के क्षेत्र में मौन” और “खामोशी” दो शब्द ऐसे है, जिनका मतलब प्रायः एक जैसा होते हुए भी हटकर लगते है। खामोशी जहां वीराना और तन्हाई का रहस्यमय वातावरण महसूस कराता वहीं मौन में शांति का अतिरिक्त आभास होता है। मौन को योगिक तत्व भी माना गया है। आत्मिक उत्थान में मौन का सहयोग धर्म शास्त्रों ने भी स्वीकार किया है। आज हम मौन और खामोशी की अनुसन्धानत्मक चर्चा जीवन की समस्याओं के तहत करेंगे जिससे हम अपने व्यक्तित्व को विपरीत अवस्था में भी प्रखर रखने की कला से अनभिज्ञ न रहें। संसार और मानव एक दूसरे के पूरक होते हुए भी सब जगह एक दूसरे का साथ नहीं निभा सकते क्योंकि अनगनित विचारों में समान समावेश कभी नहीं हो सकता। संसार रिश्तों और सम्बन्ध से जुड़ा है, उसका अपना नियम शास्त्र है, जो नैतिकता के सूत्रो से धनाढ्य भी है, पर नकारत्मकता की धूरी पर ज्यादातर घूमने से रिश्तों में तनाव की स्थिति अनुसार अशांति का वातावरण तैयार करता रहता है। ऐसे समय मौन और खामोशी ही बिगड़ती स्थिति को संभाल सकते है। यह कहना गलत न होगा कि उनकी भूमिका में सकारत्मक ऊर्जा रहती है और नकारत्मक्ता के वातावरण से कुछ समय के लिए हमें उस से दूर रहनें को राजी कर लेती है।

“खामोशी” एक शांत, ठंडा और रहस्यमय शब्द ही नहीं एक ऐसा अहसास है, जिसमे हजारों तरह की शंकाए समाहित रहती है। कहते है एक खामोशी अनगनित सवालो का जबाब होती है। खामोशी का सबसे खूबसूरत पहलू इसका मौन स्वभाव है, जिससे मानव आत्मा शायद इसे सबसे ज्यादा पसन्द करती है, क्यों कि ये उसे अनचाहे झूठ का प्रयोग करने से बचाती है। हमारा मकसद खामोशी से परिचय करने का इसलिए जरुरी हो जाता है कि आज का जीवन पल पल में समस्याओं से आक्रांत हो अपने व्यक्तित्व को कमजोर कर, हमें शारीरिक और मानसिक रुग्णता का अहसास कम उम्र से ही कराना शुरु कर देता है। जीवन की विडम्बना है, इसकी अति भोगवादी प्रवृति और सुख साधनों की तलाश परन्तु इसका अर्थ ये नहीं जीवन अपनी इस कमजोरी के प्रति जागरुकता नहीं रखता, उसकी गतिशीलता से ही हमें समझ में आ जाना चाहिए कि जीवन हमें बार बार संयम का अवरोधक प्रयोग करने का संकेत देता रहता है। प्राणी मात्र में सब तरह की शक्तियों का सन्तुलित अंश होता है, जिससे जीवन सम्बंधित हर कार्य- कलाप को पूर्णता प्राप्त हो और उस की गतिशीलता में कोई रुकावट न हो। वैसे शरीर का प्रत्येक अंग का अपना महत्व है, परन्तु हमारी जीभ या जिसे हम जिह्हा भी कहते है, के बिना शरीर की हर चंचलता को कायम नहीं रखा जा सकता। उदर पूर्ति का मुख्य साधन यही है, परन्तु हमारे हर अहसास को कर्म के दर्शन और परिचय की जिम्मेदारी भी इसकी है। खामोशी कहीं लहजे में सक्षमता की आंतरिकता की साक्ष्य हो सकती है, पर,पूर्ण समाधान का साधन नहीं माना जा सकता, इसलिए स्थान और स्थिति के अनुसार खामोश रहना सही है। हर जगह खामोश रहना भी गलत साबित होता और अनचाहे परिणाम भी इससे जीवन में आ सकते है।

सवाल किया जा सकता है कि क्या खामोश रहना स्वभाव को जन्म से प्राप्त तत्व है ? या वातावरण से उपजी कोई स्वभाविक शारीरिक क्रिया है। अगर मनोविज्ञान या शरीर विज्ञान की बात करे तो यह तय है कि जन्म से इसका कोई ताल्लुकात नहीं है, यह स्वभाव की सभाविक क्रिया ही मानी जानी चाहिए जिसके अंतर्गत परिस्थितियों अनुरूप खामोशी का उपयोग इंसान द्वारा किसी प्रश्न के अंतर्गत उसके उत्तर से बचना होता है, यानी यह एक रक्षात्मक अस्त्र के रुप में इसका प्रयोग किया जा सकता है। ओशो ने जीवन दर्शन पर बहुत कुछ कहा उनके अनुसार “अगर हम सब शब्दों में जिएं तो सब अलग – अलग है। और अगर हम मौन में जिएं तो हम सब एक है। भाषा तोड़ती है, मौन जोड़ता है”।आइये हम खामोशी का आगे और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करे, उससे पहले उसके शुरुवाती शाब्दिक परिचय से अवगत होनें की कोशिश करते है। खामोशी चूँकि हिंदी शब्द है, अतः उसके पर्याय की जानकारी यहां उचित होगी। खामोशी यानी चुपी, शांति, मौंन, निशब्द आदी पर गौर करने की बात है कि खामोशी का पर्याय शांति माना गया है, अतः अगर हमें जीवन को शांतमय वातावरण में जीना है, तो बहुत सी समस्याओं का उपचार खामोशी के द्वारा उचित होगा। इंग्लिश भाषा में इसके लिए सही प्रयुक्त शब्द “SILENCE” है, उसका उचित उपयोग हमें बहुत सी महत्वपूर्ण जगहों पर दृष्टिगत होता भी है, जैसे अस्पताल की दीवारों पर जहां इंसान अपने दर्द को खामोशी से सहन करता है। क्योंकि कहा भी गया है ” A Meaningful silence is always better than a Meaningless words. खामोशी को इंग्लिश में “HUSH, SPEEECHLESLY, MUTELY, SILENTLY, TACITURNLY, WORDLESSLY भी कहा जाता है।

भारतीय दर्शन शास्त्रों ने मौंन को आत्म-नीति निर्धारक तत्व माना है, क्योंकि इसमें चिंतन की क्रिया प्रभावकारी ढंग से अपना वर्चस्व प्रदान करती है। “मौंन सर्व थेसाधकम् ” यानी वाचालता विनाशक है, मौन में बड़े गुण है। पंचतन्त्र में भी कहा गया ‘मौंन सर्वार्थसाधनम’ यानी मौन सारे काम बना देता है। शरीर की विभिन्न क्रियाओं पर मौन का प्रभाव व्यापक होता है, क्योंकि शब्दों के गलत इस्तेमाल से आदमी हैरान और परेशान रहता है। सच का सामना न करनेवालों के लिए मौन सुरक्षात्मक उपाय है। उम्र के अंतिम पड़ाव में भारी होती साँसों को राहत दे अपने कर्मों का मूल्यांकन कर अल्प प्राप्त समय का सदुपयोग सहयोगी भी है। राजनीति शास्त्र में मौन को कुटिलता भरा प्रभावकारी अस्त्र माना जाता है । भारत के नोवें प्रधानमंत्री स्व. श्री पामुलपति वेंकट नरसिंह राव मौनी बाबा के नाम से मशहूर थे, उनकी इस क्षमता से उनके सहयोगी और विरोधी दोनों ही घबराते थे। ये उनके व्यक्तित्व का सबसे सक्षम गुण था, जिसका उपयोग उन्होंने बड़ी बेखूबी से किया। चाणक्य की चुप्पी और कुटिलता का आज भी उदाहरण दिया जाता है।

इन्सान की फितरत होती है वो सही समय खामोश या मौन कम ही रहता है, और गलत समय गलत शब्दों का प्रयोग भी करता है। इस तरह की स्थिति से वो सामाजिक प्राणी के रुप में मानव विरोधी कार्य को अंजाम भी देता है, जो आत्मिक और धार्मिक दृष्टिकोण से कहीं भी उचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि समाज और देश में इससे तनाव का वातावरण तैयार होता है, जो किसी का भला नहीं करता है, स्वयं का भी। अतः इस स्थिति से बचने के लिए हमें खामोशी को अपने जीवन में उचित जगह प्रदान करनी चाहिए। विनोबा भावे ने मौन और खामोशी को आत्मा का संरक्षक माना है, क्योंकि मौन एक योगिक क्रिया भी है। हमारा मन चंचल हो जब उपद्रव करता है तो मौन द्वारा ही उसका सही उपचार किया जा सकता है, क्योंकि मौन से मन की चंचलता की मौत हो जाती है और आत्मा की शक्ति बढ़ जाती है। हम अपने ही जीवन काल बीते समय पर गौर करे तो स्पष्ट हो जाएगा कि हमने काफी समय व्यर्थ की बहसों में गुजारा है और उससे हमें हासिल सिर्फ तनाव जिससे हम मानसिक ताप, चिंता और ब्लड प्रेशर, ह्र्दय रोग, या डायबिटीज जैसे खतरनाक रोगों का सानिध्य प्राप्त हुआ। मौन को विभिन्न धर्म शास्त्रों और उनके पंथो ने पूर्ण सहमति प्रदान की है । इसे आत्मिक उन्नति का साधन भी माना है, जैन धर्म की पूरी धुरी इसी तत्व पर घूमती है क्योंकि मौन से वातावरण अहिंसक हो जाता है । उनके ग्रन्थों के अनुसार इसके प्रयोग से मन अपनी चंचलता तो खोता है पर आत्मिक ध्यान द्वारा मानव मोक्ष प्राप्ति की और अग्रसर हो सकता है । न बोलने से अनुचित शब्दों के प्रयोग के अलावा वातावरण में उड़ने वाले सूक्ष्म जीवों की हत्या से बचा जा सकता है। अहिंसा में विश्वास करने वाला जैन धर्म मौन को अंतरात्मा की शक्ति को मजबूत करने का साधन बताता है, जो सही भी लगता है।

आज के आर्थिक युग में जब जीवन विपरीत परिस्थितयों से जूझ रहा होता तब पीड़ित मनुष्य सबसे पहले अपने रिश्तेदारों और सम्बंधियों से उपेक्षित होकर निराशा के अंधेरों में भटक जाता है। उसकी सही बात को भी वो लोग झूठ मानने लगते है और अविश्वास करने लगते है। ऐसे समय में ऐसे इंसान को यही सही सलाह होगी वो खामोशी का सहारा लेकर अपनी इस स्थिति से सक्षमता पूर्ण संघर्ष करे। Mandy Hale की सलाह है, कहते है समय बदलते देरी नहीं करता और सारे सम्बनधों को अपनी उसके प्रति चिंतनधारा को बदलना स्वत् जरुरी हो जाएगा। हकीकत यह कहती है कठिन समय में ही अपनों की पहचान होती है, नहीं तो वो सजावटी समान की तरह होते है क्योंकि सामाजिक प्राणी मनुष्य की यह सामजिक लाचारी होती है। अतः इस सजावट को बनाये रखने के लिए कठिन परिस्थितयों में खामोशी का जरूरत अनुसार उपयोग करना चाहिए।

अब नीति शास्त्र के अनुसार इस सन्दर्भ में बात करे तो हर वस्तु और गुण का दूसरा पहलू भी होता है जो उसका नकारत्मक प्रभाव होता है। अतः मौन और खामोशी का उपयोग सही समयानुसार परिस्थितियों के अनुरूप किया जाता है, तो निसन्देह यह शक्ति प्रदाता है अन्यथा यह आंतरिक कमजोरी भी साबित कर सकता है। हम यह सदा ध्यान रखें कि अन्याय करना जितना बुरा है उससे ज्यादा उसको सहन करना भी। ऐसी अवस्था खामोश या मौन रहकर अपने कमजोर व्यक्तित्व का परिचय न देना ही श्रेयस्कर होगा, समय की इस उचित मांगः पर हमें जरूर गौर करना चाहिए।
In the End, we will remember not the words of our enemies, but the silene of our friends. The ultimate tragedy is not the oppression and cruelty by the bad people but the silence over that by the good people. Martin Luther King Jr.

सबसे ज्यादा फायदा खामोश वातावरण का धरा पर रहनेवाले हर प्राणी को होता है। शोर पर्यावरण का पहला नकारत्मक पहलू है, आज सारा विश्व इंसानी ऑर तकनीकी यंत्रो के शोर से भयभीत है। शरीर, मन और आत्मा पर बदलते परिवेश की बदमिजाजी का कहर बढ़ रहा है। अति स्वार्थमय प्राणी वातावरण को अपनी नाजायज हरकतों से भले ही दूषित करे पर जीवन तो उसका स्वयं का ही खतरे का आभास बीमारियों द्वारा तो जरूर करता रहेगा। दोस्तों संभलना जरूरी है, वातावरण को खामोशी दीजिये और अपने आप को ज्यादा संयमित बना मौन का सकारत्मक प्रयोग रोज कीजिये। शायद इससे हमारी भविष्यत जिंदगी कुछ सुंदर और शुकून भरी हो जाये। याद कीजिये वातावरण के दुष्परिणाम पर बनी मनोज कुमार की फ़िल्म ” शोर” और उसके इस गाने की ये पंक्तिया:
कुछ पाकर खोना है कुछ खोकर पाना है
जीवन का मतलब तो आना और जाना है
दो पल के जीवन से एक उम्र चुरानी है
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खामोशी और मौन से ही अब जिंदगी सजानी है
…………..लेखक कमल भंसाली…………

” प्यार और वासना” ….एक चिंतन भरी चर्चा..भाग 2 अंश 2 ★★कमल भंसाली ★★

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“वासना” शब्द कि विडम्बना यही है, एक जायज क्रिया के साथ नाजायज की तरह व्यवहार किया जाता है। अंदर से सबका इससे आंतरिक रिश्ता होते हुए भी, इस के प्रति अवहेलना और तिरस्कार पूर्ण नजरिया रखते है। आखिर, वासना से इतनी घृणा क्यों ? क्या वासना प्रेम की एक जरूरत नहीं, क्या वासना आकांक्षाओं का सुंदर स्वरुप नहीं है ? ऐसे और भी सवाल है, जिनके उत्तर हम यहां तलाशने की कोशिश करते है, पर उससे पहले हमें वासना का सही परिचय प्राप्त करना होगा। वात्सायन ऋषि थे, उन्होंने वासना एक स्वरूप कामवासना के बारे में बहुत कुछ लिखा, उन्होंने भी स्वीकार किया, बिना वासना प्रेम का अस्तित्व नहीं है, हकीकत में बिना वासना प्राणी जीवन धरती पर आ नहीं सकता। ये संसार बनानेवाले की महत्व पूर्ण चिंतन का वास्तविक कारण है, अतः वासना शब्द से नफरत करना कहीं भी जायज नहीं लगता। यहां यह बताना जरुरी है, अभी, हम यहां कामवासना नहीं, सिर्फ वासना के बारे में बात कर रहे है। दोनों में बुनियादी फर्क इतना ही है, काम का शरीर से, और वासना का मन से सम्बन्ध है। अतः कामवासना का मतलब हुआ, मन की दैहिक या शारीरिक वासना। जब की वासना का इंगित रुख सिर्फ मन और आत्मा से जुड़ा है, जिसे इंग्लिश में हम “Lust” के नाम परिचित है, हालांकि दोनों जीवन साथी है।

वासना का शाब्दिक अर्थ पर बिना गौर किये, उसके बारे में सही मूल्यांकन प्राप्त करना असंभव है, वासना का सही अर्थ है, कामना, इच्छा ( जैसे मन की वासना ), भावना ( जैसे काम वासना ), अज्ञान, ( जैसे वासना का तिरोहित होना )। गौर कीजिये, कौन सा प्रेम है, जिसमे कामना, भावना और अज्ञान का समावेश न हों। किसी भी रिश्ते के प्रेम में इसके किसी एक तत्व का समावेश तो रहेगा। माँ के रिश्ते पर गौर करे, तो इसमे भविष्य की सुरक्षा तिरोहित है। हमारी विडम्बना है, हम सत्य से दूर भागते रहते है, उसका सामना करना, हमारे वश कि बात नहीं है। हम प्रेम की बात करते है, पर जब वासना से सम्बंधित कोई चर्चा आती है, तो मानों हम असभ्य लोगों के प्रदेश का सफर कर रहे है। समझने की बात है, शरीर प्रेम से बना है, और जिंदगी भर प्रेम पाने में अपना अस्तित्व खो देता है, ज्यादातर असफल होकर इस संसार से विदा भी हो जाते है। असफलता का एक ही कारण है, उसने प्रेम में तो वासना को ढूंढा, पर वासना में प्रेम ढूंढने से वो कतराता रहा। मूल के प्रति उसका लगाव कम होता, ब्याज के आकर्षण में ही फंसता है, यह मानव स्वभाव है।

वासना शारीरक और मानसिक क्षमता को पूर्ण करने वाला महत्वपूर्ण सूत्र है, इसकी अवहेलना करना, अपने अस्तित्व को नकारना जैसा है। शरीर सम्बन्धी वासना एक दैहिक क्रिया है, इसके अलग अलग स्वरुप है। भारतीय संस्कृति इसके एक ही स्वरुप को मान्यता देती है, वो है, पति-पत्नी के रिश्तों में, जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त हो गई है। पर, वास्तिवकता यहीं है, अब यह एक विश्वास का प्रश्न है, जिसका उत्तर भी शायद सही न हो, पर यह सही है, आज रिश्तों के दूसरे दायरों में भी इसे स्वीकार किया जाता है। दैहिक वासना का स्वरूप आधुनिकता ने इतना बिगाड़ दिया, की समलैंगिता के सम्बंधों की मान्यता के लिए आंदोलन होने लगे है, कई देशो में जिनमे हमारा देश भी शामिल है, उन्हें मान्यता देने के करीब पँहुच रहे है। हकीकत यही कहती है, जो भी कर लो, अपने स्वार्थी आयाम बदल लो, पर प्रकृति अपने उद्धेश्य से कभी नहीं भटकती है, मानव भटकता है, और अपना नाश वो खुद ही अपनी हरकतों से खुद ही कर लेता है। चूँकि हमारा यह विषय यहां नहीं है, अतः हम इसे वक्त के ऊपर ही छोड़ देते है। बाकी हम को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए, कि वासना से हम भी वंचित नहीं रह सकते, परन्तु उचित और अनुचित के दायरे में रहे, तो जीवन निर्णायक पथ का हकदार बन जाता हैं।

वासना का मनोज्ञान करना है, तो “आत्मा” शब्द पर आस्था जरुरी है, जो इस सरंचना के पक्ष को नहीं पहचाने की कोशिश करते, उनके लिए वासना दरिंदगी से ज्यादा कुछ नहीं हो सकती, हकीकत में वो सामाजिक सुरक्षा पर आक्रमण करने वाले दानव बन जाते है। काम, शरीर की स्वभाविक और प्राकृतिक क्रिया है, सुंदरता से काम विचलित होता है। काम जब संयमित नहीं रहता, तो उसका सौंदर्य बोध अपराधिक आकार में बदल जाता है, और अत्याचार और दुराचार की सारी सीमाये लांघने की कोशिश करता है। आत्मा की पवित्रता इसे रोकने की जबरदस्त कोशिश करती है, धर्म के प्रति आस्था की बातें समझाती है, इसके बावजूद भी अगर वासना का रुप नहीं बदलता, तो मानवता को अनिष्टता झेलनी पड़ती है। आज साधनों की अतिरिक्तता ने हमारी चाहतों पर तेज गति के पंख लगा दिए है, हमारी इच्छायें अनियमित हो रही है, काया को सुखी करने माया की जरुरत बढ़ रही है, तब हमें समय कहां, ये चिंतन करने का कि नैतिकता हमारी आत्मा में किधर सो रही है।

जेस सी स्कॉट के अनुसार “मानव कला का बेहतरीन नमूना है”। कुछ मानको में ऐसा ही लगता है, बनाने वाले ने उसमे हर तरह के रंग का प्रयोग किया है। जब चित्र सुंदर हो तो निश्चित है, उसकी चाहत सभी को होती है, नारी-पुरुष का शरीर जब कलाकार की उत्तम कृति हो, तो चाहत को वासना के सन्दर्भ ही मूल्यांकित करना ठीक होगा, प्रेम तो भीतरी तत्व है, उस में चाहत को तलाशना, सही नहीं कहा जा सकता। नो रस से बना प्राणी, किसी भी रस से अछूता कैसे रह सकता है ? ज्ञानी से ज्ञानी आदमी कह नहीं सकता, उसके पास एक भी चाहत नहीं है। जयशंकर प्रसाद का एक काव्य ग्रन्थ ” कामायनी” है, उनकी इस रचना की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है, हमें अहसास दिलाता कि मानव मन का दर्पण गुण और अवगुण नहीं दिखाता, वो तो उसकी सही मानसिकता की पहचान कराता है, समयनुसार वो उनसे अपनी बुद्धि और विवेक से उनसे अपना श्रृंगार करता है। फ्रायड ने वासना को दैहिक जरूरत माना, और उसने इसकी सीमित स्वतंत्रता को उचित ठहराने में कई परीक्षणों का उदाहरण दिया। कार्ल जुंग स्विट्जरलैंड के एक प्रतिभाशाली मनोवैज्ञानिक और धर्म शास्त्रों के जानकार थे, शुरुवाती दौर में वो फ्रायड के मनोविज्ञान के ज्ञान से प्रभावित थे, परन्तु वो उनकी इस बात से कभी सहमत नहीं हुए कि मानव वासना एवं अन्य इच्छाओं का दास है। 1937, में जुंग भारत आये, और महर्षि रमन के सानिध्य से समझ गए कि ” मानव के भीतर असीमित शक्तियां है, यदि वासनाओं एवं इच्छाओं का रूपांतरण कर दिया जाय तो मानव जीवन एक अनमोल वरदान साबित हो सकता है”।

प्रेम और वासना दोनों को समझना आसान नहीं होता, ऊपरी सतह पर हम इनका विश्लेषण आत्मा और शरीर की प्रक्रिया के रुप में ही करते है, पर जब कभी हमें प्रेम को कसौटी पर कसना पड़ता है, तो हमें लगाव रुपी वासना का सामना करना ही पड़ेगा। वासना मानव मन की सबसे बड़ी दुर्बलता है, क्योंकि जिन तीन तृष्णाओं से मन बंधा दासत्व भोगता है, उसमें कामतृष्णा, भव तृष्णा और विभव तृष्णा
तीनों का संगम होता है। समझने की बात है, संसार पुरुष और नारी द्वारा बना है, उनका आपसी आकर्षण असामान्य नहीं हो सकता क्योंकि दोनों के लिए रुप, शब्द, गंध, रस और स्पर्श से बढ़करअन्य कोई आलंबन नहीं होता । ओशो यानि आचार्य रजनीश के अनुसार “निषेध” मन के लिए निमंत्रण है, विरोध मन के लिए बुलावा है, और मनुष्य जाति इस मन को बिना समझे आज तक जीने की कौशिश करती रही है। सारांश यहीं है, प्रेम निराकार होता है, ह्र्दय से अहसास किया जा सकता है, पर वासना आकारित होती है, अतः चेहरे की रुप रेखा में सम्माहित होती है, किस रुप में, कब पैदा होगी, कहा नहीं जा सकता।….क्रमश…कमल भंसाली

जर्जर होकर टूटता मन ….”अकेलापन”…भविष्य का संभावित खतरा….कमल भंसाली

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हजारों की भीड़ में चलता मानव, आज एक अकेला सा ही चला जा रहा है, इसका अनुभव कभी भी किया जा सकता है। कहने को कह सकते है, आप अपने आप को अकेला, न समझे, हम आपके साथ है। पर, हकीकत में क्या ऐसा होता है ? आइये आज इसी दृष्टिकोण पर कुछ चिंतन करते है। सर्व प्रथम हम भारत की संस्कृति पर जरा गौर करते है, जिसमे हमारे पूर्वजों ने इस अकेलेपन के दर्द को बड़ी सहजता से समझा, और कई तरह के उपाय से इसे कम करने की चेष्टा की, दोस्ती, सम्बन्ध, परिवार और समाज में कोई भी इससे ज्यादा प्रभावित नहीं हो, इसका ख्याल रखा गया। उस समय के चिंतक भी सभी को यही हिदायत देते, “सर्व सुखाय, सर्व हिताय” यानी सबका हित ही सबका सुख हो सकता है। एक का हित और दूसरे का दुःख कम ही स्वीकार्य होता, और इस विचारधारा को नगण्य समर्थन मिलता। आज कि स्थिति के सन्दर्भ में इतना ही कहा जा सकता है, यह चिंतन भारतीय संस्कृति की अब सिर्फ विरासत ही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ, अचानक हमारी सामाजिक चेतना से यह चिंतन क्यों विलुप्त हो रहा ? ऊपरी सतह से देखे, तो समय कि कमी और अर्थ की बढ़ती जरूरत ने आदमी की आत्मिक चेतना को निष्क्रिय कर दिया है, परन्तु इसे पूर्ण सत्यता का दर्जा हम नहीं दे सकते। अर्थ का महत्व कब नहीं था ?, रही समय की कमी, वो भी कैसे मानले, पहले भी जितने घण्टे के दिन रात थे, आज भी उतने के ही है। फिर आखिर क्या हुआ, आदमी अकेलेपन का अहसास क्यों कर रहा है, आजकल ? क्यों वो प्रेम की इतनी बाते करते हुए भी किसीका दर्द बांटने में असफल है ? सवाल संजीदगी से ओतप्रोत है, निश्चय ही उत्तर इतने आसानी से कैसे मिल सकता है ?

ज्यादातर विचारक इसका उत्तर शायद यही देना चाहेंगे कि “मनुष्य का अति भोगवादी संस्कृति के प्रति हर दिन झुकाव बढ़ रहा है, वो इस जीवन के आगे सोचने की बात से कतरा रहा है, हकीकत में अपनी कमजोरियों को ही वो शक्ति समझ रहा है। भूल रहा है, कि समय का जो गलत प्रयोग वो कर रहा है, उसके कारण वो अपनों से भी निरस्त किया जा रहा है”। शायद उनके विचारों से हम कम ही सहमत हो, परन्तु उनकी इस बात में तो दम नजर आ रहा कि आदमी खुद से ही निरस्त हो रहा है, इसका ताजा उदाहरण आज के बिखरते परिवारों में बुजर्गो की दशा पर गौर करने से हमे मिल सकता है। शारीरक शक्ति का क्षय उम्र के अनुसार कम होना लाजमी है, परन्तु उनका मानसिक रुप से कमजोर होना, हर मानव के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि बुढ़ापा तो एक दिन सबके दरवाजे पर दस्तक देगा ही। समय की परख को झुठलाना आसान नहीं हो सकता, चाहे हम आज इसकी परवाह करे या नहीं। आज की नई पीढ़ी कितनी ही सफलता अपने खाते में जमा कर ले, परन्तु एक दिन तो उसे उस सहारे की तलाश जरुर होगी, जिसकी सेवा में प्रेम का अहसास हो। समझने की बात है, अर्थ और साधन जीवन को कुछ लम्बा कर सकते है, परन्तु उस सुख की अनुभूति तो अपनत्व में ही मिलेगा, जो दर्द का अहसास कम कर देता है। कुछ लोगों का चिंतन है, जीवन में सफलता पाने के लिए अकेलापन जरुरी है। कुछ क्षेत्र, कुछ विषयों को छोड़ कर यह भी सच नहीं है, तपस्या एक ऐसा क्षेत्र है, जहां नितांत अकेलापन आवश्यक बताया गया। तपस्या के नियम और विधान एक मनुष्य के लिए होते है, यह ठीक भी है, परन्तु उससे पानेवाला ज्ञान मानव को ही अर्पित किया जाता है। इस बात का पुष्टिकरण करने के लिए भगवान महावीर, बुद्ध, गुरु नानक, ईशा मसीह जैसे तपस्वियों की जीवनी पढ़ कर सकते है।

हम भारतीय सन्दर्भ में ही अकेलेपन की चर्चा कर रहे है, उसी के अनुरुप हमारा आज से कुछ सालों पहले का जीवन और अभी के जीवन से तुलना करे तो शायद यह बात हमारी समझ में आ जानी चाहिए कि पिछले पाँच दसक का जीवन ज्यादातर गांव की गलियों के प्रेममय और संस्कारों से ओतप्रोत परम्परागत परिवारों में पलता था। फर्क इतना ही रहा, उस समय अर्थ और साधनों की कमी नजर आती, परन्तु संस्कारों की नहीं। बच्चों को पड़ोसी तक खिला सकता था, परन्तु आज हाथ लगाने में भी संकोच होता है। ज्यादातर बच्चे आया की गोद में ही खेलते है, माँ बाप तो इतनी ही देख रेख करते है, आया ठीक काम कर रही है, ना। सही भी है, आनेवाले एकाकी युग की ट्रेंनिग अभी से मिल जाए, तो अकेलापन समस्या नहीं रहेगा।

पहले के जीवन और अभी हम जो जी रहे, उसकी तुलना करना सही नहीं है, पर जीवन है, तो हर दृष्टिकोण को नापना भी जरुरी है। आज योग की कितनी जरुरत हो गयी, जो की एक पुरानी पद्धति है। आखिर मानना तो पड़ेगा ही सोने की चमक कभी खत्म नहीं हो सकती। तब यह भी मानना होगा की मानव को आपसी सहयोग और अपनत्व की भी फिर जरुरत होगी। हंसने के लिए इंसानो में ही रहना होगा, हाँ रोने के लिए अकेलापन अच्छा है। चिंतन करे, सफलता सुंदर होती है, पर जब सत्य के साथ साथ चलती है। आँखों पर पट्टी बाँध स्वर्ग की कल्पना तो की जा सकती है, पर देखना मुश्किल ही होता है।

नोबल पुरस्कार विजेता महाकवि गुरुदेव रविंद्रनाथ टेगोर की एक कविता “एकला चलो रे” जब लिखी थी, तो शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी, एक दिन आदमी सबके रहते, अकेला और निरहि हो जाएगा। वैसे तो “अकेला,” शब्द स्वतन्त्रता का प्रतीक लगता है, पर वास्तिवकता यही कहती है, स्वतन्त्रता की अति चाह ने आज आदमी को अकेला और तन्हा कर दिया है। यह एक ऐसा जहर है, जो धीरे धीरे मानव जीवन पर असर कर, उसे और भी कमजोर कर रहा है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण कि अगर बात करे तो ओशो ठीक कहते है ” हम अकेले पैदा होते हैं, हम अकेले मरते हैं। इन दो वास्तविकताओं के बीच हम साथ होने के हजारों भ्रम पैदा करते हैं….सभी तरह के रिश्ते, दोस्त और दुश्मन, प्रेम और नफरत, देश, वर्ग, धर्म । एक तथ्य कि हम अकेले है को टालने के लिए हम सभी तरह की कल्पनाएं पैदा करते हैं। लेकिन जो कुछ भी हम करते हैं, सत्य बदल नहीं सकता। वह ऐसा ही है, और उससे भागने की जगह, श्रेष्ठ ढंग यह है कि इसका आनंद ले”

चलते चलते यही कहना उचित होगा, समय के अनुरुप ही मानव की जीवन क्षमता में परिवर्तन भी आते है, उनकी पहचान अनुरुप हमारा जीवन दर्शन भी होना चाहिए। कभी कभी अकेलापन सुखद भी हो सकता है, अगर सोच सृजनात्मक रहे। ……कमल भंसाली