👉अनचाही हताशा👈 कमल भंसाली

जिंदगी को चाहा था कभी जिन नजरों से
अब वो नजर आती नहीं बात जिंदगी में
कभी सजाना चाहा इसे प्यार के जज्बातों से
अब प्यार दिखता नहीं इसकी महफ़िल में

कशिश भरी प्यार से लबालब जिंदगी
अब तन्हां और मजबूर रहती जिंदगी
कभी पल्लवित होती बहुरंग के फूलों में
आज ढूंढ रहीं स्वयं को टूटे फूटे उशूलों में

क्या दिन थे जिंदगी के, आज हो रहे मोहताज
सजीव होकर भी बजा रही निर्जीव बेसुरे साज
करना था राज दासी हो गई अर्थ तंत्र की आज
समय की मारी, चुपचाप सह रही तनाव सहज

अति साधनों का जहर इसके शरीर में फ़ैल रहा
समय से पहले यौवन बुढापे को स्वीकार कर रहा
बचपन की नादानियों को नशे में मदमय नचा रहा
विषित स्वाद भरे व्यंजनों से उम्र को तरसा रहा

आज की कारगुजारियां कल न हो जाये भारी
संशय में हूं कैसे याद दिलाऊ उसे समझदारी
जरूरतों की चाह में दिनों दिन हो रही यह भारी
जीने की मजबूरी से भटक रही इधर उधर बेचारी
रचियता✍ 🌷कमल भंसाली🌷✍